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Thursday, 22 October, 2026
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CJP पर सख्ती, राहुल के मार्च पर नरमी? प्रदर्शन पर मोदी सरकार के दो चेहरे

भारत कुछ समय के लिए पुलिस स्टेट बन सकता है, लेकिन यह मिलिट्री स्टेट नहीं बन सकता.

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10 अक्टूबर के बाद से हुई घटनाओं ने भारतीय राज्य के दो चेहरे दिखाए हैं. उस दिन कॉकरोच जनता पार्ट (सीजेपी) के बड़े प्रदर्शनों को जिस तरह कुचला गया, उससे चिंता पैदा हुई. सवाल उठा: क्या इससे भी कड़ी कार्रवाई होने वाली है? लेकिन दो दिन बाद ही राज्य ने राहुल गांधी की अगुवाई में और ज्यादातर विपक्षी दलों के समर्थन से निकाले गए बड़े मार्च को सुप्रीम कोर्ट की ओर जाने दिया. सुप्रीम कोर्ट एक अहम संवैधानिक जगह है. एक ही मांग कर रहे इन दोनों प्रदर्शनों के साथ राज्य का व्यवहार इससे ज्यादा अलग नहीं हो सकता था.

10 अक्टूबर ने चिंता क्यों बढ़ाई?

सोचिए, उस दिन क्या-क्या हुआ. खबरों के मुताबिक, राज्य ने मध्य दिल्ली को बंद करने के लिए 40,000 पुलिस और अर्धसैनिक बल के जवान तैनात किए. दिल्ली आने वाली कई मेट्रो स्टेशनों और ट्रेनों को बंद कर दिया गया. घंटों तक इंटरनेट सेवाएं बंद रहीं. हिंदू दक्षिणपंथी संगठनों के लोगों को छात्रों पर हमला करने से रोकने में पुलिस नाकाम रही. करीब 7,000 लोगों को हिरासत में लिया गया या गिरफ्तार किया गया. बड़े पैमाने पर गिरफ्तार करने से पहले पुलिस को प्रदर्शन के नेताओं को डिटेन करने के लिए विमानों और घरों में भी भेजा गया. भारतीय राज्य ने एक पुलिस स्टेट की तरह काम किया.

चीन पर नज़र रखने वाले कई लोगों ने सोचा कि अब आगे क्या होगा. चीन के एक जाने-माने विशेषज्ञ ने मुझसे पूछा कि भारत बड़े तियानआनमेन प्रदर्शनों और उनके खूनी अंत से कितना दूर है.


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तियानआनमेन और भारत के हाल के प्रदर्शनों की कहानी

जो लोग तियानआनमेन के प्रदर्शनों को याद करने के लिए काफी उम्र के हैं, उन्हें याद होगा कि अप्रैल-मई 1989 में हज़ारों छात्रों ने चीन के शासकों को चुनौती दी थी. उन्होंने चीन के जंतर-मंतर यानी बीजिंग के तियानआनमेन स्क्वायर पर कब्जा कर लिया था. वे ऐसे देश में लोकतंत्र चाहते थे, जहां कभी लोकतंत्र लागू नहीं हुआ था. इस बात पर बहस है कि वे शासकों को चुनने के लिए चुनाव चाहते थे या सिर्फ स्वतंत्र नागरिक सभाएं चाहते थे, जो फैसले ले सकें, लेकिन कम से कम वे चाहते थे कि कम्युनिस्ट पार्टी और चीन की एक-दलीय सरकार समाज में अपनी प्रमुख भूमिका कम करे और नागरिकों को ज्यादा आज़ादी दे.

आखिरकार चीनी स्टेट ने प्रदर्शन को कुचलने के लिए सेना को बुलाया. बीजिंग की सड़कों और चौकों पर टैंक भेजे गए. दूसरे कई शहरों में भी टैंक भेजे गए. अनुमान है कि कई सौ छात्रों की मौत हुई और इससे भी ज्यादा लोग घायल हुए और गिरफ्तार किए गए. कुछ सैनिक भी मारे गए. इसके बाद चीन में राष्ट्रीय स्तर पर छात्रों का कोई बड़ा प्रदर्शन नहीं हुआ. जो प्रदर्शन हुए, वे स्थानीय स्तर तक ही सीमित रहे.

मैं अप्रैल-मई 1989 में छात्र था. बीजिंग में जो हुआ, उसे देखकर मेरे शिक्षक Myron Weiner (MIT), जो 1945 के बाद भारत के सबसे बड़े अमेरिकी विद्वानों में से एक थे, ने कहा था कि भारत में ऐसा नहीं हो सकता. कोई भी सरकार, चाहे वह कितनी ही अलोकप्रिय क्यों न हो, दिल्ली में टैंक भेजने का आदेश नहीं देगी. 10 अक्टूबर को यह बात सही साबित हुई. क्योंकि भारत एक लोकतंत्र है, इसलिए देश के नागरिकों के खिलाफ सेना का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, सिवाय हिंसक विद्रोह जैसी स्थितियों के.

इसके अलावा, चीन का राष्ट्राध्यक्ष आम तौर पर सेना का प्रमुख भी होता है, चाहे कानूनी रूप से या व्यवहार में. तियानआनमेन प्रदर्शनों के दौरान चीन के शासक Deng Xiaoping के मामले में यह व्यवहार में सही था. डेंग सेना को जिस तरह आदेश दे सकते थे, वैसा भारत में करना बहुत मुश्किल है.

इसे आसान शब्दों में कहें तो भारत कुछ समय के लिए पुलिस स्टेट बन सकता है, लेकिन सैन्य राज्य नहीं बन सकता, खासकर तब जब प्रदर्शन शांतिपूर्ण हों. सिर्फ ऐसा राज्य जो खुले तौर पर संविधान की अनदेखी करे, इस लंबे समय से चले आ रहे नियम को तोड़ सकता है.

फिर 12 अक्टूबर को पुलिस राज्य भी प्रभावी रूप से गायब हो गया.

राहुल गांधी की अगुवाई में विपक्षी दलों ने बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों को जुटाया. वे शांतिपूर्वक सुप्रीम कोर्ट की ओर बढ़े. मध्य दिल्ली के बड़े हिस्से में धारा 163 लगाई गई थी, जो पुरानी धारा 144 जैसी है और पांच या उससे ज्यादा लोगों के इकट्ठा होने पर रोक लगाती है. लेकिन हजारों लोगों के बीच मौजूद भावना को देखते हुए पुलिस ने इसे सख्ती से लागू नहीं किया. पुलिस ने लोगों को अपनी भावनाएं ज़ाहिर करने दीं, जब तक प्रदर्शनकारी शांतिपूर्ण रहे. और वे शांतिपूर्ण ही रहे.

16 अक्टूबर को एक बार फिर पुलिस राज्य लौट आया, जब CJP ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन करते हुए तिरंगा लहराने का आह्वान किया. लेकिन पुलिस की कार्रवाई हुई जरूर, फिर भी वह 10 अक्टूबर जैसी बड़ी नहीं थी.

अलग-अलग व्यवहार क्यों?

दिल्ली पुलिस को नियंत्रित करने वाली केंद्र सरकार के इस दोहरे व्यवहार को हम कैसे समझें?

राज्य ने ऐसा लगता है कि उस अंतर को अपनाया जो विद्वानों के बीच काफी लोकप्रिय हो गया है. इसमें एक तरफ NGO और नागरिक संगठनों के नेतृत्व वाले नागरिक समाज और दूसरी तरफ राजनीतिक दलों के नेतृत्व वाले राजनीतिक समाज की बात की जाती है. राज्य ने यह संदेश दिया कि अगर सरकार जरूरी समझे तो नागरिक समाज को कुचला जा सकता है, लेकिन राजनीतिक समाज को कम से कम अभी बर्दाश्त किया जा सकता है.

यह गौर करने वाली बात है कि राजनीतिक समाज और नागरिक समाज के बीच यह अंतर सभी को स्वीकार नहीं है. इसकी वजह सीधी है कि ट्रेड यूनियन और छात्र संगठन, जिन्हें आम तौर पर नागरिक समाज में रखा जाता है, उन्हें पूरी तरह गैर-राजनीतिक नहीं कहा जा सकता. इसी वजह से विद्वानों का एक समूह, जिसमें मैं भी शामिल हूं, नागरिक समाज को गैर-राजनीतिक नहीं मानता. दक्षिण भारत के फिल्म सितारों के फैन क्लब भी हमेशा राजनीति में बड़ी भूमिका निभाते रहे हैं. यही बात RSS के लिए भी सही है. हम नागरिक समाज को गैर-सरकारी मानते हैं, गैर-राजनीतिक नहीं.

लेकिन सरकारों को यह अंतर अक्सर बहुत सुविधाजनक लगता है. वे आसानी से कह सकती हैं कि नागरिक समाज संगठनों को गैर-राजनीतिक होना चाहिए और अगर वे प्रदर्शन करते हैं या सरकार का विरोध करते हैं, तो उन्हें दबाया जाना चाहिए.

इन्हीं दलीलों का इस्तेमाल करते हुए मोदी सरकार ने अक्सर भारत के नागरिक समाज पर हमला किया है. इसमें गैर-सरकारी शैक्षणिक और रिसर्च संस्थान भी शामिल हैं क्योंकि भारत में प्रदर्शन करना संविधान से मिला अधिकार भी है, इसलिए इस दलील में एक बड़ी समस्या है. यह संविधान के एक प्रावधान से टकराती है.

भारत में दमन की सीमाएं

चूंकि संविधान का उल्लंघन हुआ है या नहीं, इसका अंतिम फैसला करने का अधिकार न्यायपालिका के पास है, इसलिए ऐसी स्थितियों में अदालतों का व्यवहार बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है. जब तक सरकार को यह भरोसा रहता है कि न्यायपालिका की संभावना उसके पक्ष में है, तब तक सरकार नागरिक समाज संगठनों की ओर से किए जाने वाले प्रदर्शनों को दबाती रह सकती है.

CJP कोई राजनीतिक पार्टी नहीं है, बल्कि एक नागरिक समाज संगठन है. दमन होने पर उसे न्यायपालिका के समर्थन की ज़रूरत है और अगर उसे यह समर्थन नहीं मिलता, तब भी उसके पास बड़े पैमाने पर जनता के समर्थन के जरिए सार्वजनिक जगह में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने का रास्ता है. यहां तक कि सत्ताधारी पार्टियां भी जनता का समर्थन खोने को लेकर चिंतित रहती हैं और उपलब्ध शोध बताते हैं कि कभी-कभी, अगर हमेशा नहीं, तो अदालतें भी अपनी सार्वजनिक छवि और विश्वसनीयता को लेकर सोचती हैं.

इसलिए CJP के नेतृत्व में हुए दो प्रदर्शनों को खत्म कर देना कहानी का अंत नहीं है. यह मानना मुश्किल है कि अपनी लोकप्रियता को देखते हुए CJP वापस अपना रास्ता नहीं बनाएगा. इस बीच राजनीतिक दल भी सरकार पर दबाव बनाते रहेंगे. प्रदर्शन तब तक जारी रहने की संभावना है, जब तक कम से कम कुछ प्रमुख मांगें पूरी नहीं हो जातीं.

चीन में नागरिक समाज संगठनों को प्रभावी रूप से काम करने की अनुमति नहीं है और न ही विपक्षी दलों को अनुमति है. यही एक और वजह है कि तियानआनमेन को लेकर पैदा हुई चिंता सही नहीं थी.

आशुतोष वार्ष्णेय इंटरनेशनल स्टडीज़ और सोशल साइंसेज़ के सोल गोल्डमैन प्रोफेसर और ब्राउन यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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