पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद एक अप्रत्याशित घटनाक्रम यह रहा कि मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की राज्य में सख्त सीमा बाड़बंदी की मांग पर बांग्लादेश की प्रतिक्रिया सामने आई.
बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान के विदेश मामलों के सलाहकार हुमायूं कबीर ने पत्रकारों से कहा कि उन्हें “कंटीले तारों से डर नहीं लगता”.
यह एक दिलचस्प प्रतिक्रिया है आखिर एक शांतिपूर्ण देश को अपने पड़ोसी देश द्वारा अपनी सीमा सुरक्षित करने से क्या दिक्कत हो सकती है?
हालांकि, कबीर ने कहा कि बांग्लादेश भारत के आंतरिक मामलों में दखल देने में कोई रुचि नहीं रखता और वह सिर्फ बातचीत के जरिए केंद्र सरकार से ही संपर्क करेगा, लेकिन उनकी प्रतिक्रिया कुछ और संकेत देती है.
यह साफ दिख रहा है कि पश्चिम बंगाल में बीजेपी की जीत ने बांग्लादेश के भीतर बेचैनी पैदा कर दी है.
बांग्लादेश के राजनीतिक तंत्र के कुछ वर्गों के लिए, राज्य में ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की सरकार होने से जल बंटवारे, सीमा प्रबंधन और सुरक्षा सहयोग जैसे मुद्दों पर बातचीत में ज्यादा गुंजाइश रहती थी.
लेकिन अब जब केंद्र और राज्य दोनों जगह बीजेपी सत्ता में है, तो यह उम्मीद की जा रही है कि भारत की पूर्वी नीति भारत के हितों के अनुसार ज्यादा तालमेल और तेज़ी के साथ आगे बढ़ेगी और बांग्लादेश की चिंताओं के लिए कम जगह छोड़ेगी.
शायद यही वजह है कि बांग्लादेश अब तीस्ता नदी से जुड़े निवेश और तकनीकी विशेषज्ञता के लिए चीन की तरफ ज्यादा खुलापन दिखा रहा है.
अगर देखा जाए तो बांग्लादेशी राजनयिक के बयान किसी वास्तविक स्थिति से ज्यादा राजनीतिक आशंकाओं और धारणाओं की प्रतिक्रिया लगते हैं. साथ ही, बांग्लादेश का अभी भी बातचीत की बात करना एक सकारात्मक संकेत है और यही वह जगह है जहां भारत को सावधानी से काम करने की ज़रूरत है.
लंबे समय तक बांग्लादेश भारत के प्रभाव क्षेत्र में रहा है. अगर इसमें बदलाव आता है, तो यह भारतीय कूटनीति और रणनीतिक पहुंच की विफलता भी मानी जाएगी.
अविश्वास भारत-बांग्लादेश रिश्तों की पहचान नहीं बन सकता
यह देखना दिलचस्प है कि जिन सीमाओं का मकसद दोनों देशों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है, उन्हीं पर इतनी प्रतिक्रिया दी जा रही है. सीमा बाड़बंदी सिर्फ अवैध घुसपैठ रोकने के लिए नहीं होती, बल्कि तस्करी, मानव तस्करी और बड़े सुरक्षा मुद्दों से भी जुड़ी होती है. इसी वजह से बांग्लादेश का भारत से “मानवीय रवैया” अपनाने की अपील कुछ ज्यादा खिंची हुई लगती है.
आखिरकार 1971 में भारत के सैन्य और राजनीतिक हस्तक्षेप ने बांग्लादेश को एक स्वतंत्र राष्ट्र बनने में बड़ी भूमिका निभाई थी. साथ ही इतिहास भारत को सुरक्षा संबंधी जायज चिंताएं भी देता है और नई दिल्ली को बिना शक की नजर से देखे अपने हितों की रक्षा करने का पूरा अधिकार है.
भारत और बांग्लादेश के रिश्ते सिर्फ सीमा सुरक्षा या राजनीति तक सीमित नहीं रहे हैं.
नई दिल्ली ने हमेशा ढाका की वित्तीय सहायता, विकास परियोजनाओं, इंफ्रास्ट्रक्चर सहयोग और लाइन ऑफ क्रेडिट के जरिए मदद की है. हाल ही में भारत ने ईंधन सहायता के तौर पर 5,000 टन डीजल भी भेजा था.
2017 के रोहिंग्या शरणार्थी संकट के दौरान भारत ने ‘ऑपरेशन इंसानियत’ के तहत म्यांमार से हिंसा के कारण भागकर आए शरणार्थियों की बड़ी संख्या को संभालने में बांग्लादेश की मदद की थी.
सरकारों और कूटनीति से आगे भी भारत-बांग्लादेश रिश्तों का एक और पहलू है, जिस पर अक्सर ध्यान नहीं दिया जाता.
भारत ने लेखिका तस्लीमा नसरीन को शरण दी और विवादों तथा धमकियों के बावजूद उनके बोलने और जीने के अधिकार का समर्थन किया. इसी वजह से बांग्लादेश के विदेश मामलों के सलाहकार का लहजा थोड़ा गलत जगह पर लगता है. बांग्लादेश को दोनों देशों के साझा इतिहास को भी याद रखना चाहिए.
भारत के हर सुरक्षा कदम को तुरंत दुश्मनी या अपमान के नज़रिए से नहीं देखा जाना चाहिए. हर देश आखिरकार अपने हितों की रक्षा करेगा और भारत भी इससे अलग नहीं है.
आखिर में दोनों देशों को एक-दूसरे की संप्रभुता का सम्मान करते हुए साथ काम करने का रास्ता निकालना होगा, क्योंकि भूगोल और इतिहास ने दोनों को इतनी मजबूती से जोड़ा है कि लगातार अविश्वास रिश्तों की नींव नहीं बन सकता.
आमना बेगम अंसारी एक स्तंभकार और टीवी समाचार पैनलिस्ट हैं. वह ‘इंडिया दिस वीक बाय आमना एंड खालिद’ नाम से एक साप्ताहिक यूट्यूब शो चलाती हैं. उनका एक्स हैंडल @Amana_Ansari है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
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