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Monday, 12 October, 2026
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सतीशन की जीत में छिपी कांग्रेस की परेशानी, अदूर प्रकाश ने उजागर की अंदरूनी कलह

मई में मुख्यमंत्री बनने के बाद—जब उन्होंने केसी वेणुगोपाल को पीछे छोड़ दिया था—कांग्रेस खेमे से वीडी सतीसन के ख़िलाफ़ यह पहला सार्वजनिक विद्रोह था.

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30 सितंबर को शाम ढलते ही केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम ऐसी हिंसक झड़पों की चपेट फंस गया, जिन्होंने 1990 के दशक की याद दिला दी. 

मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ भारतीय युवा कांग्रेस (AIYC) के मार्च से शुरू हुआ आंदोलन तब अराजक हो गया जब कथित रूप से ‘स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया’ (SFI) के कार्यकर्ता उसमें शामिल हुए और उन्होंने कथित रूप से बियर की बोतलें फेंकनी शुरू की. SFI के कूदने से पहले AIYC के कार्यकर्ताओं ने जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ झंडे दिखाए तो भाजपा के कार्यकर्ताओं के साथ उनकी छिटपुट झड़पें हो चुकी थीं. 

इसलिए, जब यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) के संयोजक अदूर प्रकाश ने केरल प्रदेश कांग्रेस कमिटी (केपीसीसी) के मुख्यालय इंदिरा भवन में 1 अक्तूबर को प्रेस कनफरेंस का आयोजन किया तो उम्मीद की जा रही थी कि वे इन मसलों पर बयान देंगे. लेकिन वह प्रेस कॉन्फ्रेंस मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन के कामकाज और सलाह-मशविरा न करने की उनकी कार्यशैली पर हमले करने का मंच बन गया और इसने सत्ताधारी गठबंधन में गहरी आंतरिक कलह को सामने ला दिया.       

प्रकाश का तात्कालिक गुस्सा मीडिया में आ रहीं इन खबरों से भड़का था कि कैबिनेट मंत्री वाले दर्जे के दो अतिरिक्त पदों में से एक पद ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक (AIFB) को, और एक पद इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) को दिया जा रहा है. ये दोनों दल गठबंधन के सहयोगी हैं. पूर्व मंत्री एम.के. मुनीर को प्रशासनिक सुधार आयोग का अध्यक्ष बनाया गया था, और AIFB के महासचिव जी. देवराजन को दिल्ली में केरल के विशेष प्रतिनिधि के पद पर नियुक्त किया गया था.      

प्रकाश ने कहा कि इन नियुक्तियों का फैसला करने से पहले कोई सलाह-मशविरा नहीं किया गया, जिसके कारण उन्हें प्रेस के सवालों के सामने चुप रह जाना पड़ा. उन्होंने आरोप लगाया कि इससे पहले सांस्कृतिक संस्थाओं के लिए नाम तय करने में भी उनसे कोई सलाह नहीं की गई. प्रकाश ने घोषणा की कि मुख्यमंत्री को चार्टर्ड विमान वाले विवाद में अपनी सफाई देनी चाहिए. 

पहली खुली बगावत 

मई में कांग्रेस के संगठन महासचिव के.सी. वेणुगोपाल को मात देकर मुख्यमंत्री बने सतीशन को अब कांग्रेस की ओर से पहली बार खुले विरोध का सामना करना पड़ रहा है. प्रकाश के दावों में दम में तो दम है, लेकिन इन दावों को खुलकर कहने का जो समय और जो स्थान (KPCC मुख्यालय) चुना गया उस पर सबका ध्यान गया.  

यह सब तब हुआ जब सतीशन सबके निशाने पर थे. अभी एक सप्ताह पहले ही वे निजी तौर पर चार्टर किए गए विमान से यात्रा करने की सफाई देने की कोशिश करने और उस यात्रा के प्रायोजक की पहचान जाहिर न करने के कारण विवादों में फंस गए थे. इस संकट के साथ उन्हें एक चुनावी डंक भी लगा, 38 स्थानीय निकायों में हुए उपचुनावों में यूडीएफ तीन सीटें हार गया. बमुश्किल पांच महीने पहले हुए विधानसभा चुनाव में हारने के बाद वाम दलों ने उसे बड़ा झटका दे दिया.  

प्रकाश के आक्रोश को तुरंत वेणुगोपाल से जोड़कर देखा जाने लगा. लेकिन अलप्पुझा के सांसद ने संतुलित जवाब देते हुए कहा कि इन मसलों पर पार्टी में चर्चा की जाएगी. प्रकाश भी कोई मामूली नेता नहीं हैं, वे मध्य त्रावणकोर में पार्टी के एझावा समुदाय के चेहरे हैं, राज्य में मंत्री रह चुके हैं, और अट्टिंगल से सांसद हैं. प्रकाश का विद्रोह ऐसे समय में उभरा है जब भाजपा ने IUML को कैबिनेट मंत्री का छठा पद दिए जाने पर विरोध जाहिर किया था. इसने 2012 के ‘पांचवें मंत्री पर विवाद’ की याद दिलाई, जब मलाबार की पार्टी ने विधानसभा में अपनी सीटों की संख्या के अनुपात में एक अतिरिक्त मंत्री पद पर दावा किया था. उस विवाद को लेकर भारी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण हुआ था और राज्य में भाजपा का प्रभाव बढ़ा था. 

IUML ने मुख्यमंत्री पद के लिए सतीशन का जिस तरह खुलकर समर्थन किया था उसे काफी उछाला गया और कांग्रेस में एक धड़ा यह कयास लगा रहा है कि छठा कैबिनेट मंत्री पद कहीं लेन-देन वाला मामला तो नहीं है. IUML को इस बार पांचवां मंत्री पद देने की कोई स्थिति नहीं थी क्योंकि विधानसभा में उसे कॉंग्रेस की सीटों के मुक़ाबले एक तिहाई सीट ही मिली थी. 

अंकुश की कमी 

मुख्यमंत्री बनने के बाद से सतीशन को लगभग पूरी आजादी मिली हुई थी. केपीसीसी के पदस्थ अध्यक्ष सनी जोसेफ को उनके कैबिनेट का सदस्य बना दिया गया था. वेणुगोपाल मुख्यमंत्री पद की दावेदारी में विफल रहने के बाद कमजोर पड़ चुके थे और वे सतीशन के कामकाज में दखल देने की स्थिति में नहीं थे. वेणुगोपाल का समर्थन करने के कारण केरल की प्रभारी, अखिल भारतीय कॉंग्रेस कमिटी (AICC) महासचिव दीपा दासमुंशी भी दरकिनार हो गई थीं.

इस सबका नतीजा यह हुआ कि सतीशन पर कोई अंकुश नहीं रहा और वे मनमाने फैसले करने लगे. विचार-विमर्श का काम मंत्रिमंडल के जिम्मे डाल दिया गया है.

पार्टी की प्रदेश इकाई में असंतोष पनपने लगा. कई पुराने नेता राज्य के 16 बोर्डों और निगमों के अध्यक्ष पद के लिए होड़ कर रहे हैं, जबकि बाकी कई नेता अपनी चाल चलने के मौके का इंतिजार कर रहे हैं. कई नेता सतीशन की लोकप्रियता से सहमे हुए हैं और जनता की कमजोर याददाश्त पर भरोसा करते हुए उनकी तुलना ओमन चांडी से नहीं बल्कि पूर्ववर्ती मुख्यमंत्री पिनरई विजयन से करने लगे हैं.

कांग्रेस के अनुभवी नेता कहने लगे हैं कि सतीशन ने अपने छोटे-से कार्यकाल में ही उचित प्रक्रियाओं को किस तरह खारिज कर रहे हैं. इन नेताओं का कहना है कि के. करुणाकरण या चांडी भी अपने उत्कर्ष के दौर में कोई एकतरफा फैसला करते थे तब भी उचित प्रक्रियाओं का पालन किया करते थे. उदाहरण के लिए, UDF के सहयोगियों एम.के. मुनीर और जी. देवराजन को कैबिनेट मंत्री बनाने के फैसले की घोषणा करने का अधिकार प्रकाश का था क्योंकि वे मोर्चे के संयोजक हैं. फैसले से पहले चर्चा न किए जाने पर सतीशन को औपचारिकता के नाते संयोजक को एक पत्र लिखना चाहिए था.

कैबिनेट दर्जे के इन पदों का निर्माण पूर्व वाम मोर्चा सरकार ने पुराने नेता वी.एस. अच्युतानंदन और दल बदलने वाले के.वी. थॉमस को जगह देने के लिए किया था. उस समय कांग्रेस ने और खासकर सतीशन ने इसका भारी विरोध किया था. प्रकाश के करीबी सूत्रों का कहना है कि अब यू-टर्न लेते हुए उस तरह के फैसले का जो समर्थन किया गया है उस पर व्यापक चर्चा की जानी चाहिए थी क्योंकि यह उनके मुताबिक एक ‘नीतिगत फैसला’ है. 

वैसी स्थिति में, कांग्रेस के अनुभवी नेता वी.एम. सुधीरन प्रशासनिक सुधार आयोग के अध्यक्ष पद के सबसे मजबूत दावेदार होते और पी.जे. कुरियन दिल्ली में राज्य के प्रतिनिधि होते. 

सतीशन की मर्जी पर UDF

सतीशन के आलोचक बताते हैं कि उन्होंने केपीसीसी की पिछली कार्यकारिणी की सदस्य दीपा दासमुंशी को कोई सूचना नहीं दी, यूडीएफ की अब तक में एकमात्र बैठक चार महीने बाद 30 जुलाई को की गई. हुई. केपीसीसी को निष्क्रिय कर दिया गया है, उसके अध्यक्ष को सतीशन के अधीन बिजली मंत्रालय में सिमटा दिया गया है. 

तीन में से दो कार्यकारी अध्यक्षों— ए.पी. अनिल कुमार और पी.सी. विशुनाथ— को भी मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है. प्रदेश सचिव और कार्यालय प्रभारी एम. लिजु भी मंत्री बन गए हैं. यही स्थिति प्रदेश युवा कॉंग्रेस अध्यक्ष ओ.जे. जनीश की है. कॉंग्रेस के कई जिला अध्यक्ष चुनाव जीतकर विधायक बन गए हैं. हर स्तर पर प्रदेश सरकार ने पार्टी की जगह ले ली है जिसके कारण संगठन उपेक्षित हो गया है. 

सतीशन जब विपक्ष के नेता थे और उनसे जब सवाल किया जाता था कि विजयन को कौन चुनौती देगा, तब उनका जवाब यही होता था— ‘टीम UDF!’ तब वे सामूहिक निर्णय लेने की बात किया करते थे, और कहा करते थे कि AICC राज्य पर बराबर नजर रखेगी. लेकिन अब सत्ता में आने के बाद वे पार्टी को निष्प्रभावी कर रहे हैं और खुद ही फैसले लेते हैं.      

सतीशन को संतुलित करने के लिए कांग्रेस को KPCC का नया अध्यक्ष तुरंत चुनना चाहिए. वेणुगोपाल अभी भी मुख्यमंत्री बनने का दांव गंवाने का जख्म सहला रहे हैं, और जोसेफ की जगह कौन लेगा यह सवाल अधर में लटका है. सतीशन ने पुराने नेता कोडीकुन्निल सुरेश का समर्थन किया है, जिनके नाम पर कॉंग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी सहमति जताई है. 

लेकिन वेणुगोपाल अपने गुट के मैथ्यू कुझलनाथन या शफी परंबिल को दूसरे कार्यकारी अध्यक्ष पद के लिए समर्थन दे सकते हैं. जोसेफ वझक्कन रमेश चेन्नीथला की पसंद हैं. सामुदायिक समीकरण वझक्कन या कुझलनाथन के रूप में ईसाई चेहरे के पक्ष में जा सकता है, जो IUML को अतिरिक्त मंत्री पद दिए जाने के कारण कैबिनेट का हिस्सा बनने से रह गए थे, जबकि सतीशन कुझलनाथन के ज्यादा पक्ष में नहीं हैं. 

मुख्यमंत्री के करीबियों को प्रकाश की नाराजगी के पीछे साजिश नजर आती है और वे इसमें वेणुगोपाल का हाथ देखते हैं. वे बताते हैं कि सतीशन की मंडली के सिवा किसी ने उनका समर्थन नहीं किया लेकिन  वेणुगोपाल की वफादार, प्रदेश महिला कांग्रेस अध्यक्ष जेबी माथर ने किस तरह खुलकर प्रकाश का समर्थन किया. 

इस बीच, मुख्यमंत्री खुद को ‘निवेश लाने वाले’ नेता साबित करने के लिए कैफ़े और जिम के उदघाटन करने में जुटे हैं. पिछले सप्ताह उन्होंने अपनी व्यस्तता का जिक्र करके मंत्रिमंडल की साप्ताहिक बैठक नहीं की. चार्टर्ड विमान वाले विवाद के मामले में को लेकर सवालों से भागते फिरकर वे पारदर्शिता की धज्जी उड़ा रहे हैं. लेकिन सवाल यह है कि यह सब कब तक चलेगा? 

आनंद कोचुकुडी केरल के एक सीनियर पत्रकार हैं. वे @TheKochukudy पर ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं.

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