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Monday, 12 October, 2026
होमदेशदिल्ली में प्रदर्शन, पुलिस की कार्रवाई और हिरासत: SC ने क्यों नहीं लिया स्वतः संज्ञान?

दिल्ली में प्रदर्शन, पुलिस की कार्रवाई और हिरासत: SC ने क्यों नहीं लिया स्वतः संज्ञान?

2011 में, SC ने रामलीला मैदान में बाबा रामदेव के सो रहे समर्थकों पर दिल्ली पुलिस की आधी रात की कार्रवाई का स्वत: संज्ञान लिया था और दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई का आदेश दिया था.

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नई दिल्ली: जून 2011 में रामलीला मैदान की घटना, 2013 में पंजाब पुलिस द्वारा एक महिला की सरेआम पिटाई का मामला, 2023 में मणिपुर का वह वीडियो जिसमें महिलाओं को नग्न अवस्था में घुमाया गया था, 2026 में NCERT की नई सामाजिक विज्ञान की किताब को लेकर हुआ विवाद और दिल्ली में हाल के रेप के मामले. ये सभी ऐसे उदाहरण हैं, जिनमें सुप्रीम कोर्ट ने खुद से कार्रवाई शुरू की, यानी किसी पीड़ित व्यक्ति के रिट याचिका या जनहित याचिका (PIL) दायर किए बिना ही मामले पर संज्ञान लिया.

सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत मिली अपनी स्वतः संज्ञान (Suo moto) लेने की शक्ति का इस्तेमाल पुलिस की ज्यादतियों, मानवाधिकारों के उल्लंघन और न्यायपालिका के लिए गंभीर खतरे वाले मामलों में दखल देने और कार्रवाई करने के लिए किया है.

लेकिन 10 अक्टूबर को दिल्ली में विरोध प्रदर्शन और लोगों को हिरासत में लिए जाने की घटनाओं के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने खुद से संज्ञान नहीं लिया. इससे एक अहम संवैधानिक सवाल सामने आया है: जब पुलिस की ज्यादतियों और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के अधिकार के उल्लंघन के आरोप सामने आते हैं, तो किन बातों के आधार पर अदालत खुद से कार्रवाई करने का फैसला करती है?

जुलाई में भी, जब तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर CJP के विरोध प्रदर्शन के दौरान दिल्ली में हिंसा और प्रदर्शन हुए थे, तब भी अदालत के स्वतः संज्ञान लेने को लेकर सवाल उठे थे.

संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ स्वप्निल त्रिपाठी ने दिप्रिंट को बताया कि सुप्रीम कोर्ट की स्वतः संज्ञान लेने की शक्ति से जुड़ी सबसे बड़ी व्यवस्था संबंधी चिंता यह है कि इसका इस्तेमाल काफी हद तक अदालत की अपनी मर्जी पर निर्भर करता है.

उन्होंने कहा कि आम याचिकाओं, जिनमें जनहित याचिकाएं भी शामिल हैं, के जरिए शुरू होने वाली सुनवाई से अलग, ऐसे कोई स्पष्ट नियम या तय मानक नहीं हैं जो यह बताते हों कि अदालत को कब स्वतः संज्ञान लेना चाहिए या ऐसी कार्यवाही का दायरा क्या होना चाहिए.

इस वजह से, उन्होंने कहा कि अदालत कब और किन मामलों में दखल देगी, यह काफी हद तक न्यायाधीशों के विवेक पर निर्भर करता है.

त्रिपाठी, जो विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी में संवैधानिक कानून की टीम चर्खा का नेतृत्व करते हैं, ने बताया कि अलग-अलग न्यायाधीश अपनी स्वतः संज्ञान लेने की शक्ति का इस्तेमाल अलग-अलग तरीके से करते हैं.

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में उनकी DPhil रिसर्च में सुप्रीम कोर्ट की स्वतः संज्ञान लेने की शक्ति के इस्तेमाल का अध्ययन किया गया था. इस रिसर्च में पाया गया कि अदालत कब दखल देने का फैसला करती है, इसे लेकर “कोई एक जैसा पैटर्न या साफ तौर पर पहचाने जा सकने वाले मानदंड नहीं हैं”.

उन्होंने कहा, “इससे पता चलता है कि यह अधिकार काफी हद तक विवेक पर निर्भर करता है और इसका इस्तेमाल एक जैसा नहीं होता. इसलिए, बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि मामले की सुनवाई करने वाले न्यायाधीश या बेंच की प्राथमिकताएं और सोच क्या है.”

मानवाधिकार के मामलों में लंबे समय से मुकदमे लड़ने वाले वरिष्ठ वकील कॉलिन गोंसाल्विस ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट अपनी स्वतः संज्ञान लेने की शक्ति का इस्तेमाल 10 अक्टूबर को पुलिस की ज्यादतियों के आरोपों पर कार्रवाई करने के लिए ही नहीं, बल्कि मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर अपने पहले के आदेशों में हुई उन गलतियों को सुधारने के लिए भी कर सकता है, जिन्हें उन्होंने “गंभीर गलतियां” बताया.

उन्होंने माना कि यह अदालत की बहुत शक्तिशाली शक्ति है. उन्होंने समझाया कि अगर अदालत को लगता है कि उससे गलती हुई है और अन्याय हुआ है, तो वह अपना फैसला पूरी तरह बदल सकती है. उन्होंने कहा कि बस एक बात जरूरी है, “उनके पास इसके कारण होने चाहिए. यानी उन्हें यह स्वीकार करना होगा कि उनसे बहुत बड़ी गलती हुई है और वे उसे सुधार रहे हैं.”

गोंसाल्विस ने तर्क दिया कि अदालत SIR पर अपने पहले के आदेशों पर दोबारा विचार करने के लिए भी इसी शक्ति का इस्तेमाल कर सकती है, क्योंकि उनके मुताबिक, “बड़ी संख्या में मतदाताओं को सूची से बाहर करना एक गंभीर गलती थी.”

SC lawyers speak to media during a protest march from to Jantar Mantar on Saturday. | ANI
शनिवार को जंतर-मंतर तक विरोध मार्च के दौरान मीडिया से बात करते सुप्रीम कोर्ट के वकील. | ANI

आपातकाल के दौरान सुप्रीम कोर्ट के फैसले की तुलना करते हुए, जब जस्टिस एचआर खन्ना ने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने के लिए बाकी लोगों से अलग रुख अपनाया था, गोंसाल्विस ने कहा कि यहां स्थिति “आपातकाल से भी ज्यादा साफ है. अगर आप पूरे देश में SIR के जरिए 15-18 लाख लोगों को मतदाता सूची से बाहर कर सकते हैं, तो समझिए कि आपने एक बहुत बड़ी गलती से भी ज्यादा गंभीर गलती की है.”

उन्होंने आगे कहा, “इसलिए, अगर आप अपनी स्वतः संज्ञान लेने की शक्ति का इस्तेमाल करते हैं, तो ऐसा तभी हो सकता है जब सुप्रीम कोर्ट का कोई न्यायाधीश यह स्वीकार करे कि मुझसे बहुत बड़ी गलती हुई है.”

दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों और पुलिस द्वारा लोगों को हिरासत में लिए जाने की घटनाओं पर बात करते हुए गोंसाल्विस ने चेतावनी दी कि पुलिस की ज्यादतियों को ही सबसे बड़ा मुद्दा नहीं मानना चाहिए. उन्होंने कहा कि ध्यान उन फैसलों पर रहना चाहिए, जिनकी वजह से उनके मुताबिक ये विरोध प्रदर्शन हुए.

उन्होंने कहा, “पुलिस की ज्यादतियां और लोगों पर लगाए गए आरोप, बड़ी संख्या में लोगों को मतदाता सूची से बाहर करने की तुलना में कुछ भी नहीं हैं.”

स्वतः संज्ञान लेने की शक्ति की शुरुआत कैसे हुई

सुप्रीम कोर्ट में स्वतः संज्ञान लेने की शक्ति से जुड़े कानून और फैसलों की बुनियाद 1990 के सुनील बत्रा मामले में देखने को मिलती है. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने खुद कहा था कि जब मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है, तो अदालत में मामला लाने के अधिकार (लोकस स्टैंडी) से जुड़े सख्त नियमों में ढील दी जा सकती है.

इस मामले में यह भी स्थापित किया गया कि अदालत मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए अनुच्छेद 32 के तहत खुद से कार्रवाई कर सकती है या किसी अनौपचारिक सूचना के आधार पर भी मामला उठा सकती है.

यह मामला एक कैदी के लिखे पत्र के बाद सामने आया था. उस पत्र में एक दूसरे कैदी को प्रताड़ित किए जाने की जानकारी दी गई थी. इसके बाद से सुप्रीम कोर्ट के अलग-अलग न्यायाधीशों ने अलग-अलग समय पर कई मामलों में स्वतः संज्ञान लिया है. पर्यावरण और सामाजिक मुद्दों से जुड़े कई मामलों में भी सुप्रीम कोर्ट ने खुद से कार्रवाई करते हुए निर्देश दिए हैं.

सबसे हाल के उदाहरणों में जस्टिस जेबी पारदीवाला की अगुवाई वाली बेंच द्वारा दिल्ली में हाल ही में हुए रेप के मामलों पर स्वतः संज्ञान लेना शामिल है. अदालत ने दिल्ली-NCR में, खासकर रात के समय, महिलाओं की सुरक्षा बढ़ाने के लिए कई व्यावहारिक निर्देश दिए. साथ ही, इन निर्देशों को लागू करने के लिए संबंधित थानों के प्रभारियों को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया.

इस साल की शुरुआत में चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कक्षा 8 की NCERT सामाजिक विज्ञान की किताब में न्यायपालिका में “भ्रष्टाचार” से जुड़े विवादित हिस्से पर स्वतः संज्ञान लिया था. इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के आधार पर अदालत ने देशभर में किताब की छपी हुई और डिजिटल कॉपियों को वापस लेने का आदेश दिया. इसके बाद 1 सितंबर 2026 को कार्यवाही बंद कर दी गई, जब NCERT ने बताया कि इस सामग्री को संबंधित समिति की उचित मंजूरी नहीं मिली थी.

इस साल अप्रैल में पश्चिम बंगाल में SIR की प्रक्रिया के दौरान न्यायिक अधिकारियों पर हुए हमलों का सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया था. अदालत ने केंद्रीय बलों की तैनाती और स्वतंत्र जांच के आदेश दिए थे.

पुलिस की ज्यादतियों से जुड़े पुराने मामले

पुलिस की ज्यादतियों से जुड़े सबसे अहम मामलों में जून 2011 की रामलीला मैदान की घटना शामिल है. उस समय दिल्ली पुलिस ने भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़े स्तर पर भूख हड़ताल कर रहे बाबा रामदेव और उनके हजारों समर्थकों को वहां से हटाने के लिए आधी रात को कार्रवाई की थी. उस समय समर्थक सो रहे थे. पुलिस ने आंसू गैस का इस्तेमाल किया और बल प्रयोग किया.

इस मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस की कड़ी आलोचना की थी. अदालत ने कहा था कि पुलिस ने वहां आराम कर रहे लोगों के शांतिपूर्ण जमावड़े पर “मनमाने और बर्बर” तरीके से बल प्रयोग किया. उन्हें न तो पर्याप्त चेतावनी दी गई और न ही शांतिपूर्वक वहां से जाने का मौका दिया गया.

अदालत ने उन पुलिसकर्मियों और अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक और विभागीय कार्रवाई के निर्देश दिए थे, जिन्होंने इस कार्रवाई के दौरान अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल किया था.

त्रिपाठी ने जुलाई 2026 के विरोध प्रदर्शनों पर सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया की तुलना 2011 के रामलीला मैदान विरोध प्रदर्शन से भी की.

उन्होंने बताया कि 20 जुलाई को हुई हिंसा के दो दिन बाद जब इस मामले को पहली बार सुप्रीम कोर्ट के सामने रखा गया, तो संभवतः अदालत से स्वतः संज्ञान लेने की मांग की गई थी. लेकिन मुख्य न्यायाधीश ने ऐसा करने से इनकार कर दिया और कहा कि कोई याचिका दायर नहीं की गई है.

उन्होंने कहा कि अदालत ने घटना के करीब एक हफ्ते बाद ही इस मामले पर सुनवाई की, जब एक औपचारिक याचिका दायर की गई.

इसकी तुलना 2011 के मामले से करते हुए, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने एक दिन के भीतर स्वतः संज्ञान लिया था और संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा था, त्रिपाठी ने कहा कि यह अंतर “दिखाता है कि एक जैसे मामलों में भी अदालत का रवैया लगातार एक जैसा नहीं रहा है.”

जुलाई 2023 में, मणिपुर में दो महिलाओं को नग्न अवस्था में घुमाने और उनके साथ यौन हिंसा किए जाने का वीडियो सामने आने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया था. अदालत ने इस घटना को संवैधानिक और मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन बताया था.

मार्च 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने अखबारों में छपी उन खबरों पर स्वतः संज्ञान लिया था, जिनमें पंजाब पुलिस के जवानों द्वारा एक महिला को सरेआम पीटने और पटना में प्रदर्शन कर रहे संविदा शिक्षकों पर लाठीचार्ज किए जाने की जानकारी दी गई थी.

मौजूदा मामले पर वापस आते हैं

स्वतः संज्ञान लेने की शक्ति की तुलना जनहित याचिका से करते हुए त्रिपाठी ने कहा कि उनका मानना है कि “पुलिस की बर्बरता के आरोप ऐसे मामले हैं, जिनमें अदालत को दखल देना चाहिए. अगर अदालत दखल नहीं देती, तो स्वतः संज्ञान लेने की शक्ति का असली मकसद ही खत्म होने का खतरा है.”

उन्होंने कहा कि यह भारतीय सुप्रीम कोर्ट के पास मौलिक अधिकारों की रक्षा करने का एक अहम साधन है और यह जरूरी है कि इस शक्ति का इस्तेमाल इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए होता रहे.

गोंसाल्विस ने कहा कि अदालत पुलिस की हिंसा के आरोपों पर कार्रवाई करने के लिए स्वतः संज्ञान ले सकती है. उन्होंने सुझाव दिया कि पत्रकारों, कार्यकर्ताओं और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों में शामिल दूसरे लोगों के वीडियो सबूतों की जांच जजों की एक स्वतंत्र समिति से कराई जा सकती है.

उन्होंने कहा, “दूसरे नुकसान यानी पुलिस की ज्यादतियों के मामले में, सीधा सा तरीका यह है कि सभी पत्रकारों और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों में शामिल हर व्यक्ति को अपने वीडियो क्लिप न्यायाधीशों की एक समिति को देने का निर्देश दिया जाए. अगर वीडियो क्लिप से पता चलता है कि किसी पुलिस अधिकारी ने शांतिपूर्ण लोगों पर जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग किया और उन्हें गंभीर नुकसान पहुंचाया, तो अनुच्छेद 311 के तहत उसकी सेवा समाप्त कर दी जाए.” अनुच्छेद 311 सरकारी सेवाओं में काम करने वाले लोगों को बर्खास्त करने, सेवा से हटाने या पद में कमी करने से जुड़ा है.

उन्होंने कहा कि पुलिस के व्यवहार की ऐसी किसी भी जांच के कारण उस मुद्दे से ध्यान नहीं हटना चाहिए, जिसे वह इससे भी ज्यादा बुनियादी समस्या मानते हैं.

उन्होंने कहा, “इस गलती को सुधारने के लिए न्यायाधीशों में यह कहने का बहुत साहस होना चाहिए कि उनसे गलती हुई है. उन्हें स्वतः संज्ञान लेकर आदेश देना चाहिए और कहना चाहिए कि SIR को जारी रहने देने का हमारा फैसला बहुत बड़ी गलती थी. इसलिए हम अपने पहले के सभी आदेश वापस लेते हैं और मतदाता सूची को उसी स्थिति में बहाल करते हैं, जैसी वह SIR से पहले थी.”

उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “लेकिन सवाल यह है कि क्या न्यायाधीशों में इतना दृढ़ विश्वास है? और इसके लिए बहुत ज्यादा दृढ़ विश्वास और बहुत ताकत की जरूरत है. किसी न्यायाधीश को यह कहने के लिए बहुत हिम्मत चाहिए कि उससे गलती हुई है. इसलिए सवाल यह है कि क्या जस्टिस में इतनी हिम्मत है? और अगर है, तो क्या वह ऐसा करेगा?”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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