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Tuesday, 29 September, 2026
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जलवायु संकट की कीमत चुका रहा नेपाल, बालेन शाह ने दुनिया से मांगा हिसाब

भारत और चीन को एक साथ जिम्मेदारी उठाने और जवाब देने के लिए मजबूर कर नेपाल के युवा प्रधानमंत्री ने दिखाया कि जलवायु को लेकर कूटनीति अभी खत्म नहीं हुई है.

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नेपाल के सबसे कम उम्र में चुने गए प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह, जिन्हें बालेन के नाम से जाना जाता है, उन्होंने 24 सितंबर को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा में शायद अपने सबसे प्रभावशाली भाषणों में से एक दिया.

कम इशारों और औपचारिक बातों के साथ बालेन ने “एक युवा देश की मौत और तबाही…और उन परिवारों के बारे में बात की, जो अपने उन अपनों का इंतजार कर रहे हैं, जो कभी घर नहीं लौटेंगे.” वह नेपाल में हाल में आई अचानक बाढ़ का जिक्र कर रहे थे.

अगर दोनों भाषणों के बीच तुलना की जाए, तो उनका संदेश राजा महेंद्र विक्रम शाह के संयुक्त राष्ट्र महासभा में दिए भाषण जितना ही प्रभावशाली था. 1967 में नेपाल के राजा ने बिना समुद्र वाले, छोटे और विकासशील देशों के सामने आने वाली चुनौतियों के बारे में बात की थी. उन्होंने गुटनिरपेक्षता और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की भी जोरदार वकालत की थी.

राजा महेंद्र ने नेपाल में बिना राजनीतिक दलों वाली पंचायती व्यवस्था और मजबूत राजशाही का दौर पेश किया था. संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिमालयी देश ने अपने दोनों पड़ोसी देशों—भारत और चीन के बीच 1962 के युद्ध के बाद एक तटस्थ जगह की मांग की थी.

59 साल बाद लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए प्रधानमंत्री ने उसी बहुपक्षीय मंच पर भाषण दिया. उन्होंने उस “हिमालयी सुनामी” की बात की, जिसमें “1,400 लोगों की मौत और 6,000 लोग लापता” हुए.

सिर्फ अपील करने से आगे बढ़ते हुए बालेन ने साहस के साथ कहा, “भोटे कोशी-त्रिशूली आपदा सिर्फ एक स्थानीय त्रासदी नहीं थी; यह दुनिया के लिए एक चेतावनी थी. और मैं आज आपसे पूछता हूं: क्या हमने सच में उस चेतावनी को सुना है?”

अपील से आगे अपनी बात रखना

यह साफ नहीं है कि बालेन के संयुक्त राष्ट्र महासभा में पहले भाषण को सुनने के लिए हॉल में कितने प्रतिनिधि मौजूद थे. वे दोपहर के सत्र में 17वें वक्ता थे और 22 सितंबर को कार्यवाही शुरू होने के बाद से 106वें वक्ता थे. लाइव प्रसारण में हॉल में अपेक्षाकृत कम लोग दिखाई दे रहे थे.

हालांकि, यह ज्यादा साफ है कि बालेन के भाषण ने हॉल के बाहर भी ध्यान खींचा है. इसकी वजह भाषण में कही गई बातें और उनका व्यापक राजनीतिक असर है. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि उनके सवालों का जवाब कौन देगा. क्या ग्रीनहाउस गैसों का सबसे ज्यादा उत्सर्जन करने वाले देश, बड़ी अर्थव्यवस्थाएं, औद्योगिक देश या बहुपक्षीय और क्षेत्रीय मंच इसका जवाब देंगे? या फिर पूरी दुनिया, जिसे नेपाल से ध्यान हटाकर यूरोप और पश्चिम एशिया के संकटों की ओर देखना पड़ रहा है?

दुनिया में ग्रीनहाउस गैसों का सबसे ज्यादा और तीसरा सबसे ज्यादा उत्सर्जन करने वाले देशों चीन और भारत के बीच बसे नेपाल का प्रतिनिधित्व करते हुए बालेन ने जलवायु परिवर्तन से “दुनिया की छत” पर पड़ रहे असर को लेकर चेतावनी दी. उन्होंने भारत और चीन का ज़िक्र भी बहुत संतुलित लेकिन असरदार तरीके से किया.

बालेन ने नेपाल के पड़ोसी देशों भारत और चीन के उन लगातार जारी प्रयासों का भी ज़िक्र किया, जिनके तहत 26 अगस्त की आपदा के बाद लापता लोगों को ढूंढने और नेपाल को फिर से सामान्य स्थिति में लाने में मदद की जा रही है. साथ ही उन्होंने “नेपाल, भारत और चीन की अगुवाई में हिमालयी जलवायु लचीलापन तंत्र स्थापित करने” की ज़रूरत पर जोर दिया. काठमांडू की ओर से ऐसे मंचों पर इस तरह की बात बहुत कम देखने को मिलती है, इसलिए इसे एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक कदम माना जा सकता है.

प्रस्तावित तंत्र का उद्देश्य “सैटेलाइट डेटा और विशेषज्ञता साझा करना…खतरनाक ग्लेशियर झीलों की निगरानी करना…संयुक्त शुरुआती चेतावनी प्रणाली को मजबूत करना” है. इसके साथ ही “सीमाओं के पार मदद के बीच तालमेल बनाने” की अपील की गई है.

इसके बाद सवाल बना रहता है: ऐसी पहलों के लिए पैसा कौन देगा? खासकर तब, जब भारत जैसे देश खुद को उभरती वैश्विक ताकत के साथ-साथ विकासशील देश के रूप में भी पेश कर रहे हैं. ऐसे देशों का कहना है कि ‘साझी लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारियों’ के सिद्धांत के तहत वे अभी भी बड़ी मात्रा में जलवायु वित्त पाने के हकदार हैं.

हालांकि, ऐसी खबरें भी आई हैं जिनमें आरोप लगाया गया कि चीन ने डेटा और शुरुआती चेतावनियां साझा नहीं कीं. बीजिंग ने इन आरोपों को झूठा बताया है. दोनों तरह की खबरें सुर्खियां बन रही हैं.

इस बीच, इस बात पर लगातार बहस जारी है कि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन की जिम्मेदारी किसे लेनी चाहिए. दुनिया के शक्तिशाली देश खुद का बचाव करते रहे हैं. लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि नेपाल लंबे समय से चाहता रहा है कि उसकी बात सुनी जाए और प्रधानमंत्री बालेन के संयुक्त राष्ट्र महासभा में दिए भाषण ने यही किया.

नेपाल दुनिया के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 0.1 प्रतिशत से भी कम योगदान देता है और अगर बालेन के शब्दों में कहें, “हम (नेपाल) ने यह संकट पैदा नहीं किया. फिर भी इसकी बहुत बड़ी कीमत हमें चुकानी पड़ रही है.”

लेकिन दो बड़ी एशियाई अर्थव्यवस्थाओं और दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेनाओं के बीच स्थित एक ऐसे देश के लिए, जिसकी कोई समुद्री सीमा नहीं है, अपनी बात दुनिया तक पहुंचाना आसान नहीं हो सकता.

सोशल मीडिया पर ‘पे अप’ आंदोलन

नेपाल में विनाशकारी बाढ़ आने के बाद से ही सोशल मीडिया पर मुख्य रूप से जेन ज़ी की अगुवाई वाला “पे अप” आंदोलन ट्रेंड कर रहा है. 36-वर्षीय विश्व नेता के भाषण के बाद इस आंदोलन को एक नया चेहरा मिल गया है. एक तेज-तर्रार वीडियो में नेपाल के एक युवा ने तंज कसा.

वीडियो में कहा गया, “PAY UP. हमें आपकी सहानुभूति वाले वीडियो नहीं चाहिए. हमें जवाबदेही चाहिए. आपने औद्योगीकरण किया. आपने मुनाफा कमाया. आपने प्रदूषण फैलाया. अब बिल चुकाइए.”

दिलचस्प बात यह है कि न्यूयॉर्क टाइम्स की “नेपाल की Gen Z जलवायु आपदाओं को लेकर दुनिया के प्रदूषण फैलाने वालों से सवाल कर रही है” शीर्षक वाली रिपोर्ट में बताया गया है कि देश में कई लोग मुआवजे की मांग कर रहे हैं. इसकी वजह यह है कि हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने और टूटने का सबसे ज्यादा असर नेपाल पर पड़ रहा है. रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि बालेन ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में क्या मांग करने से परहेज किया.

बालेन ने अपने भाषण में भारत और चीन का कई बार ज़िक्र किया. पहली बार उन्होंने मिलने वाली और आगे मिलने वाली मदद के लिए दोनों देशों की सराहना की. दूसरी बार जलवायु परिवर्तन से जुड़ी साझा परेशानियों के संदर्भ में दोनों देशों का ज़िक्र किया. तीसरी बार उन्होंने नेपाल, भारत और चीन की अगुवाई में हिमालयम क्लाइमेट रिसिलियेंस मैकेनिज्म बनाने का प्रस्ताव रखा.

शाह ने किसी देश का नाम लिए बिना एक तरह से यह संकेत दिया कि “जलवायु न्याय सिर्फ संयुक्त राष्ट्र के किसी दस्तावेज में लिखा एक सुंदर वाक्य बनकर नहीं रह सकता.”

युवा नेता ने माना कि दुनिया को ऐसे तरीके की जरूरत है, जिसमें काम करने पर जोर हो. इसमें “वितरण का न्याय” और “प्रक्रिया का न्याय” शामिल हो. पहले का सवाल है कि “कीमत कौन चुकाता है” और दूसरे का सवाल है कि “किसकी बात सुनी जाती है.”

इसके अलावा, बालेन ने बिना लंबी प्रक्रिया के अनुदान के रूप में मदद, नुकसान और क्षति कोष तथा वैश्विक पर्यावरण सुविधा से सहायता देने की मांग की. उन्होंने कहा, “जब घर में आग लगी हो, तो हम परिवार से 50 फॉर्म भरने के लिए नहीं कहते. हम कार्रवाई करते हैं. जलवायु न्याय का मतलब भी यही होना चाहिए.”

प्रधानमंत्री ने दुनिया से जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अलग-अलग मौकों पर थोड़ी-थोड़ी कार्रवाई करने के बजाय इसे साझा और तत्काल समस्या के रूप में देखने की अपील की, ताकि “तैयारी की संस्कृति” बनाई जा सके.

जब असाधारण परिस्थितियों के लिए उतने ही असाधारण प्रयासों की जरूरत होती है, तो बालेन का यह प्रयास एक प्रमुख उदाहरण बना हुआ है.

एक संकट से जूझ रहे देश की जिम्मेदारी संभालने के बाद बालेन ने देश की अब तक की सबसे गंभीर जलवायु आपदाओं में से एक को देखा है. उन्होंने उसी के अनुसार देश का प्रतिनिधित्व किया और ऐसे महत्वपूर्ण सवाल उठाए, जिनका जवाब दिया जाना जरूरी है.

ऐसे समय में जब मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में बहुपक्षीय मंचों में सुधार की जरूरत पर बहस हो रही है और संयुक्त राष्ट्र महासभा एक सालाना कार्यक्रम बन गई है, जिसमें शीर्ष नेताओं की संख्या कम और दूसरे प्रतिनिधियों की संख्या ज्यादा होती है, नेपाल जैसे देशों ने एक बार फिर इन मंचों को प्रभावी बनाने की ज़रूरत सामने रखी है.

ऋषि गुप्ता ग्लोबल स्ट्रैटेजिक अफेयर्स के एक्सपर्ट हैं.

इस लेख में व्यक्त विचार पूरी तरह लेखक के अपने हैं और किसी भी रूप में उनके वर्तमान या पूर्व संस्थानों के विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं करते.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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