सभी कॉकरोच फिर से उन्हीं दरारों और कोनों में लौट गए हैं, जहां से वे झुंड में बाहर निकले थे. वे उस विरोध प्रदर्शन के बाद खुशी मनाते हुए लौटे, जो सोशल मीडिया की रील्स से भरा हुआ था और जिसने सरकार को उनकी मांगें मानने पर मजबूर कर दिया. लेकिन हर कोई खुश नहीं है. जो लोग भारत में बांग्लादेश और नेपाल जैसा माहौल बनाने का सपना देख रहे थे, वे निराश हैं. अगर उन्होंने यह सोचा था कि कॉकरोच के कमजोर पंखों के सहारे वे फिर से सत्ता में लौट आएंगे, तो यह उनकी गलतफहमी थी. पुरानी व्यवस्था अब हमेशा के लिए खत्म हो चुकी है. हमेशा की तरह वही लोग. वंशवादी विपक्ष, उनके लेफ़्ट-लिबरल समर्थक, वामपंथी अराजकतावादी और अर्बन नक्सल. जो 2014 से पहले के दौर की वापसी चाहते थे और खुलेआम “बुरे दिन” लौटाने की बात कर रहे थे. अब वे निराश हैं, भले ही ऊपर से “हमारे बच्चों” की जीत का जश्न मनाने का दिखावा कर रहे हों.
हालांकि, एक ऐसा समूह है जो इस बात से बेहद मायूस है कि आंदोलन “लक्ष्य हासिल किए बिना” खत्म कर दिया गया. जो लोग हमेशा नाराज रहने में ही आनंद लेते हैं, वे वही कर रहे हैं जिसमें वे सबसे माहिर हैं. सोशल मीडिया पर वे हैरानी, दुख और बेचैनी जता रहे हैं कि जब मंजिल सामने दिखाई देने लगी थी, तभी पीछे हट गए. उन्होंने इस आंदोलन में हिस्सा नहीं लिया. न सीधे तौर पर, न किसी समूह के रूप में और न ही अपने उन नारों के साथ जो युद्ध के नारों की तरह गूंजते हैं. हालांकि कुछ लोग व्यक्तिगत रूप से इसमें शामिल हुए, लेकिन उन्होंने अपनी पहचान जाहिर करने से बचाव किया.
आप समझ ही गए होंगे कि मैं किसकी बात कर रहा हूं. मुस्लिम विचारक, राय बनाने वाले लोग, पॉडकास्टर और सोशल मीडिया पर सक्रिय लोग. जो हिंग्लिश में वही बातें कहते हैं, जो उलेमा उर्दू में कहते हैं. मुस्लिम वोट के सौदागर, जिनके विचार मुस्लिम लीग से अलग नहीं हैं, भले ही उनकी भाषा संविधान के शब्दों से भरी हुई हो.
एक समूह के तौर पर वे इस आंदोलन से दूरी बनाए रहे. शायद यह उनकी नई रणनीतिक समझ का संकेत था. या शायद आंदोलन के आयोजकों ने ही उन्हें दूरी पर रखा. लेकिन आंदोलन में कूदने की स्थिति तक पहुंचकर भी वे खुद को किनारे मंडराने से रोक नहीं पाए. वे व्यवस्था संभालते रहे और लगातार बिरयानी के पैकेट पहुंचाते रहे.
यह बीजेपी विरोधी शायद ही कोई ऐसा आंदोलन रहा हो जो “सांप्रदायिकता” या मुसलमानों के हाशिए पर जाने और उनकी राजनीतिक अहमियत खत्म होने के मुद्दे पर आधारित न रहा हो. अगर कुछ हुआ, तो इस आंदोलन ने इन सब बातों को स्वीकार किया, सामान्य बनाया और संस्थागत रूप भी दिया. सबसे अहम बात यह रही कि मुसलमानों ने भी चुपचाप इसकी सहमति दी. “बड़े मकसद” यानी हिंदुत्व को हराने के लिए उन्होंने खुद को खुशी-खुशी अदृश्य बना लिया और पर्दे के पीछे रहने को स्वीकार कर लिया.
मुस्लिम वोटों के एक बेहद चालाक सौदागर ने कहा, “हमने यह लड़ाई आउटसोर्स कर दी है.” जो भी हो, इस पूरी कहानी का मतलब यह है कि मुसलमान हर समय लड़ाई के मूड में नहीं रह सकते. शायद बिना कहे और अनजाने में ही सही, मुसलमानों को अब यह एहसास होने लगा है कि भारत की राजनीति की जमीन अब पूरी तरह बदल चुकी है.
ऐसा लगता है कि मुसलमान अब एक अलग राजनीतिक समूह के तौर पर पहले जैसी ताकत नहीं रखते, जैसी 2014 से पहले के तथाकथित सेक्युलर दौर में थी. उनके वैचारिक मुद्दों का असर गैर-वैचारिक सोच रखने वाले Gen Z पर नहीं पड़ता. यह बदलाव काफी समय से चल रहा है. यहां तक कि वे राजनीतिक दल भी, जो मुस्लिम वोट बैंक पर टिके हुए हैं, अब समझ चुके हैं कि लोग मुस्लिम-केंद्रित गैर-जरूरी मुद्दों से थक चुके हैं. इसलिए वे भी अब “सेक्युलरिज्म” के नाम पर वोट मांगने से बचते हैं. मुसलमानों को अब SC, ST और OBC के साथ पहले की तरह नहीं जोड़ा जाता. दिलचस्प बात यह है कि सेक्युलर दलों की भाषा में “मुस्लिम” शब्द की जगह अब “अल्पसंख्यक” शब्द ने ले ली है.
मुसलमानों के लिए ‘कॉकरोच’ आंदोलन एक नया मोड़
खुद मुसलमान भी अंदर ही अंदर उन तीखे और लगातार चलने वाले नैरेटिव से थक चुके हैं, जो उनकी जिंदगी को मस्जिद से लेकर बाजार, कार्यस्थल और व्हाट्सऐप ग्रुप तक घेरे रहते हैं. वे इससे बाहर निकलना चाहते हैं, लेकिन कोई दूसरा वैचारिक रास्ता न होने के कारण ऐसा नहीं कर पा रहे. अगर उनके पास एक मजबूत बौद्धिक वर्ग या कुछ अच्छे बुद्धिजीवी भी होते, तो वे खुद को पीड़ित दिखाने वाले इस रक्तमय नैरेटिव और उससे पैदा होने वाली मानसिकता में इतने नहीं फंसते.
लेकिन दुर्भाग्य से उनके पास ऐसे कुछ सच्चे बुद्धिजीवी भी नहीं हैं, जो उनकी स्थिति का सही विश्लेषण कर सकें और आगे का रास्ता दिखा सकें. अक्सर यह शिकायत सुनने को मिलती है कि मुसलमानों के पास नेतृत्व नहीं है. काश ऐसा होता. उनके पास तो जरूरत से ज्यादा राजनीतिक नेता रहे हैं. उन्होंने सिर्फ समुदाय को लगातार टकराव की राह पर बनाए रखा. जहां तक उनके विचारकों की बात है. चाहे वे मंचों पर बैठे उलेमा हों, मुशायरों के शायर, सेमिनारों के अकादमिक लोग, अखबारों के पत्रकार या यूट्यूब चैनलों के विशेषज्ञ. इन सबने हालात और बिगाड़े. समुदाय की असली समस्याओं की ओर ध्यान दिलाने के बजाय उन्होंने उसके इतिहास, राजनीति और समाज की गलतियों को सही ठहराने का काम किया.
भारत के मुसलमानों को ऐसे नए विचारकों की जरूरत है, जो उन्हें यह समझा सकें कि उनकी पहचान और उनका भविष्य भारतीय है. अरब, फारसी या तुर्क नहीं. और उन्हें संसद और विधानसभा में आबादी के हिसाब से प्रतिनिधित्व की मांग से आगे बढ़कर अपनी भारतीय पहचान को अपनाना होगा.
इसी वजह से यह ‘कॉकरोच’ आंदोलन मुसलमानों के लिए एक अहम मोड़ साबित हो सकता है. इस आंदोलन से उनकी दूरी. चाहे रणनीति के तहत रही हो या किसी और वजह से. शायद उस जरूरत की शुरुआत हो सकती है, जिसमें वे अत्यधिक राजनीतिक होने की स्थिति से बाहर निकलें. इसी अति-राजनीतिक सोच ने पूरे समुदाय को गुस्से, अस्थिरता और तनाव से भर दिया है. मुस्लिम सोच का गैर-राजनीतिक होना ही सांप्रदायिकता से बाहर निकलने की पहली शर्त है. इस नजरिए से देखें तो आंदोलन के दौरान उनकी चुप्पी कमजोरी नहीं थी, बल्कि एक व्यावहारिक सोच थी, जो टकराव की राजनीति को खत्म करने का आधार बन सकती है. वही टकराव की राजनीति, जो मध्यकालीन भारत के धार्मिक युद्धों की याद दिलाती है.
अल्पसंख्यक धर्म
राजनीतिक शांति ही वह रास्ता है जो किसी भी अल्पसंख्यक समुदाय के लिए सबसे सही माना जाता है. इसे हम “अल्पसंख्यक धर्म” कह सकते हैं.
अल्पसंख्यक का सबसे पहला और सबसे बड़ा धर्म है कि वह बहुसंख्यक समाज के साथ शांति से रहे. क्योंकि अगर टकराव होता है, तो संविधान से मिले उसके सभी अधिकार और सुरक्षा खतरे में पड़ सकते हैं. तब उसे इस सच्चाई का सामना करना पड़ेगा कि देश की अवधारणा, राज्य की व्यवस्था, संविधान और सरकार, सब बहुसंख्यक समाज के आधार पर चलते हैं. ऐसे में अल्पसंख्यक के पैरों तले जमीन खिसक सकती है.
‘अल्पसंख्यक’ की अवधारणा राष्ट्र-राज्य बनने के बाद आई. भारत में मुसलमान एक अल्पसंख्यक हैं. संविधान के अनुसार हर मुसलमान, बहुसंख्यक समाज के हर व्यक्ति के बराबर है. लेकिन बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक की अवधारणा यह भी बताती है कि दोनों समुदायों की सामूहिक स्थिति एक जैसी नहीं है. इस सच्चाई को नकारना, राष्ट्र और राष्ट्र-राज्य की अवधारणा को नकारने जैसा होगा.
मुसलमानों के लिए खुद को अल्पसंख्यक मानना आसान नहीं है. क्योंकि मध्यकाल में वे शासक रहे और ब्रिटिश शासन के दौरान टू-नेशन थ्योरी के जरिए खुद को एक अलग राष्ट्र मानने लगे थे. आजाद भारत में जब उनके हित में होता है, तब वे अल्पसंख्यक होने का अधिकार इस्तेमाल करते हैं. जैसे अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के अल्पसंख्यक दर्जे की कानूनी लड़ाई में. लेकिन कुल मिलाकर वे खुद को बहुसंख्यकों के बराबर, उनके विरोधी और प्रतिद्वंद्वी की तरह पेश करते हैं.
अपनी मशहूर किताब आवाज़-ए-दोस्त में मुख्तार मसूद ने बंटवारे के बाद का एक किस्सा लिखा है. उत्तर प्रदेश की तत्कालीन राज्यपाल सरोजिनी नायडू का अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में स्वागत करते हुए एक छात्र नेता ने कहा था. “या तो हम आपके बड़े दुश्मन हैं, या छोटे भाई. बीच की कोई और राह नजर नहीं आती.” फैसला उन्हें करना है. लेकिन दोनों बातें एक साथ नहीं चल सकतीं.
अल्पसंख्यक का धर्म है कि वह बहुसंख्यकों का दोस्त बने. जैसे बहुसंख्यकों का धर्म है कि वे अल्पसंख्यकों के प्रति उदार रहें. और यह भी कहा जा सकता है कि भारत के बहुसंख्यक समाज पर उदारता की कमी का आरोप नहीं लगाया जा सकता.
लेकिन जब भी मुस्लिम नेता हिंदुओं का भरोसा या सद्भाव हासिल करने की बात सुनते हैं, तो जिस नाराजगी से प्रतिक्रिया देते हैं, उससे उस मानसिकता की झलक मिलती है जिसने सदियों तक भारत पर शासन किया. वे अपने पुराने प्रजा वर्ग से सद्भाव हासिल करना अपनी शान के खिलाफ मानते हैं. वे संविधान में समानता का हवाला देकर दोस्ती की हर सलाह को खारिज कर देते हैं. काश उन्हें संविधान की प्रस्तावना में लिखा “बंधुत्व” भी याद रहता. शायद रहता, अगर संविधान उन्होंने बनाया होता.
अल्पसंख्यक का धर्म यह भी है कि वह बहुसंख्यक समाज के विवादों में आग में घी न डाले. भारत बहुत बड़ा देश है और यहां एक अरब से ज्यादा हिंदू हैं, जिनमें बेहद विविधता है. यहां मंथन हमेशा चलता रहता है. कई बार जाति, लिंग, क्षेत्र और भाषा जैसे मुद्दों पर तनाव भी पैदा होता है. लेकिन आखिरकार भारत की सभ्यता की समायोजन और सह-अस्तित्व की परंपरा इन विवादों को शांत कर देती है. ऐसे समय में अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों के अंदरूनी मामलों में दखल नहीं देना चाहिए.
वोट बैंक की सेना खत्म करें
1990 के दशक में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद जाति राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा बन गई. उत्तर प्रदेश, बिहार और दूसरे राज्यों में जाति आधारित पार्टियों का दबदबा हो गया. मुसलमान भी उनके साथ खड़े हो गए और एमवाई फॉर्मूला चुनावी राजनीति का बड़ा हथियार बन गया, जिसने यादव पार्टियों को सत्ता में बनाए रखा. मुसलमानों ने एकजुट होकर उन्हें वोट दिया. आज भी देते हैं. सामाजिक न्याय के प्रति प्रेम की वजह से नहीं, बल्कि इसलिए कि हिंदू समाज का बंटा रहना उन्हें फायदेमंद लगता है.
अगर मुसलमान सच में सामाजिक न्याय के पक्षधर होते, तो सबसे पहले अपने समाज में मौजूद जातीय भेदभाव को स्वीकार करते और ब्राह्मणवाद से ज्यादा अशराफवाद की चिंता करते. अल्पसंख्यक का धर्म “फूट डालो और राज करो” की राजनीति करना नहीं है. अगर आप जोड़ नहीं सकते, तो कम से कम तोड़ने का काम भी मत कीजिए.
जब मुसलमानों ने अपने सामूहिक वोट बैंक का इस्तेमाल एक पार्टी को दूसरी पार्टी के खिलाफ किया, तो वे असल में समाज के एक हिस्से को दूसरे हिस्से के खिलाफ खड़ा कर रहे थे. मतदान गुप्त होता है और किसी को नहीं पता कि किसने किसे वोट दिया. अगर मुसलमान अपनी व्यक्तिगत सोच के आधार पर वोट दें, तो कोई समस्या नहीं है. लेकिन वोट बैंक एक ऐसा तरीका है जिससे अल्पसंख्यक बहुसंख्यकों को बांटते हैं, चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं और लोकतंत्र को विकृत करते हैं.
जब अल्पसंख्यक बहुसंख्यकों को बांटने में सफल नहीं रहे, तो उन्होंने बहुसंख्यकवाद का आरोप लगाना शुरू कर दिया. मुस्लिम वोट बैंक का असर कम होने के बाद उनके नेताओं और उदारवादी समर्थकों ने भारत में फासीवाद, तानाशाही और बड़े पैमाने पर नरसंहार जैसे आरोपों का माहौल बनाया. सवाल यह है कि अगर किसी नेता का खुलेआम मजाक उड़ाया जा सकता है और उसे गालियां दी जा सकती हैं, जैसा कि कॉकरोच आंदोलन के दौरान देखा गया, तो फिर यह कैसा फासीवाद है. अगर यही फासीवाद है, तो क्या वे इसे मुस्लिम देशों में भी देखना चाहेंगे.
मुसलमान अक्सर कहते हैं कि वे कम बुरे को चुनने के लिए वोट देते हैं ताकि ज्यादा बुरे को रोका जा सके. इसका मतलब हुआ कि वे एक हिंदू के खिलाफ दूसरे हिंदू को वोट देते हैं. उनकी सोच में जो मुस्लिम नहीं है, वह दुष्ट है, चाहे कम दुष्ट हो या ज्यादा. अल्पसंख्यक धर्म यह नहीं कहता कि बहुसंख्यकों को दुष्ट माना जाए. जो अल्पसंख्यक ऐसा करेगा, वह खुद भी शांति से नहीं रह पाएगा और दूसरों को भी शांति से नहीं रहने देगा.
किसी भी धार्मिक अल्पसंख्यक का सबसे बड़ा धर्म है कि वह बहुसंख्यकों के धर्म का अपमान न करे और उन्हें अपने धर्म में बदलने की कोशिश न करे. धर्म परिवर्तन की कोशिश युद्ध से भी ज्यादा गंभीर है. क्योंकि युद्ध केवल राजनीतिक जीत चाहता है, जबकि धर्म परिवर्तन जनसंख्या और विचारधारा दोनों को बदलने की कोशिश करता है. मुसलमानों को कम से कम अल्पसंख्यक होने की इस बुनियादी नैतिकता का पालन करना चाहिए.
अल्पसंख्यक धर्म का पालन करने के लिए मुसलमानों को राजनीति से दूरी बनानी होगी. कॉकरोच आंदोलन से उन्हें यही सबसे बड़ी सीख लेनी चाहिए. राजनीति से दूरी का मतलब यह नहीं है कि वे वोटर लिस्ट से अपना नाम हटाएं या वोट न दें. इसका मतलब सिर्फ इतना है कि वे धार्मिक समूह के तौर पर नहीं, बल्कि एक सामान्य नागरिक की तरह वोट दें. वोट बैंक एक ऐसी सेना है जिसे खत्म कर देना चाहिए.
इब्न खल्दुन भारती इस्लाम के अध्येता हैं और इस्लामी इतिहास को भारतीय नज़रिए से देखते हैं. वे @IbnKhaldunIndic पर ट्वीट करते हैं. उनसे ibn.khaldun.bharati@gmail.com पर ईमेल के ज़रिए संपर्क किया जा सकता है. ये उनके निजी विचार हैं.
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