अमेरिकी और इजरायली विमानों ने 27-28 फरवरी 2026 की रात 1 बजकर 15 मिनट पर ईरान के खिलाफ जिस मुहिम की शुरुआत की वह दो महीने से ज्यादा चली. हमला शुरू होने के मिनट भर में ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई समेत करीब 40 बड़े अधिकारी मारे गए. 24 घंटे के अंदर एक हजार से ज्यादा ठिकानों पर हमला किया गया. पेंटागन ने इसे ‘ऑपरेशन फ्यूरि’ नाम दिया, तो इज़राइल ने ‘ऑपरेशन रोरिंग लायन’ नाम दिया. मई के शुरू में जब तक युद्धविराम हुआ तब तक दोनों देशों की वायुसेनाओं ने हजारों उड़ान भरी, दसियों हजार टन गोला-बारूद गिराई, ईरान के एयर डिफेंस नेटवर्क लगभग नष्ट कर डाला, और इजरायल को उस युद्ध में अपने 70 हजार रिजर्व सैनिकों को सक्रिय करने को मजबूर किया जिसमें एक भी सैनिक को जमीन पर पैर रखने की जरूरत नहीं पड़ी.
हर मामले में यह लड़ाई दोहराई गई थी. इससे आठ महीने पहले, जून 2025 में इजरायल ने अपने इसी शत्रु के खिलाफ ‘ऑपरेशन राइजिंग लायन’ नाम से एक छोटी मुहिम चलाई थी जिसमें 200 इजरायली विमानों ने अपने अड्डे से 2,000 किमी दूर एक साथ किए गए शुरुआती हमले में ईरान के कई कमांडर मारे और परमाणु इन्फ्रास्ट्रक्चर को नष्ट कर दिया. इससे दो महीने पहले, भारत ने पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले के जवाब में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के तहत क्रूज़ और प्रिसीजन गाइडेड मिसाइलों से हमले करके पाकिस्तान में आतंकवादियों के नौ अड्डों और 11 हवाई अड्डों को नष्ट किया. इस ऑपरेशन में एक भी सैनिक ने सीमा पर नियंत्रण रेखा पार नहीं की. इसके साथ रूस और यूक्रेन चार साल से ऐसा युद्ध लड़ रहे हैं जिसकी दिशा हवाई हमले ही तय कर रहे हैं और खंदकों से ऊपर संकरे पहाड़ी इलाकों में सस्ते ड्रोन उस काम को अंजाम दे रहे हैं जो कभी तोपखाने के जिम्मे था.
देशों के बीच लड़ाई के तौर-तरीके में कुछ है जो बदल गया है. कभी हवाई ताकत का इस्तेमाल युद्ध को तेज करने के लिए किया जाता था, इसका इस्तेमाल तब किया जाता था जब कूटनीतिक प्रयास विफल हो जाते थे और सीमित उपाय नाकाफी साबित हो जाते थे. लेकिन आज, शुरुआत इसी के इस्तेमाल के साथ की जा रही है. यह अब अंतिम विकल्प नहीं बल्कि पहला कदम बन गया है.
चलन बनना
शंकालु किसी भी मामले को अलग-थलग कहकर खारिज कर सकते हैं. ‘राइजिंग लायन’ वही था जो इजरायल करता रहा है. ऑपरेशन सिंदूर दशकों से एक रिवाज पर चलते आ रहे जाने-पहचाने शत्रु को सबक सिखाने की कार्रवाई थी. लेकिन ‘रोरिंग लायन’ और ‘ऑपरेशन फ्यूरि’ 2025 को एक विसंगति के रूप में देखना मुश्किल बनाते हैं. एक साल के अंदर एक ही देश के खिलाफ एक ही मूल पटकथा को ज्यादा बड़े पैमाने पर दोहराया गया—पंगु बनाने वाला हमला, कोई सार्वजनिक चेतावनी नहीं, कोई जमीनी आक्रमण नहीं. इजरायली अधिकारियों का दावा है कि बाद में जो कार्रवाई की गई उसने ईरान के बचे-खुचे अधिकांश एयर डिफेंस ढांचे को नष्टकर दिया, और उसकी नौसेना को केस्पियन सागर और खाड़ी में खदेड़ दिया. अमेरिकी अधिकारियों का दावा है कि ईरान के मिसाइल तथा ड्रोन उत्पादन तंत्र समेत रक्षा उद्योग के बड़े हिस्से को नष्ट कर दिया गया है. पक्के आंकड़े जो भी हों, युद्धभूमि को लेकर दावों को हमेशा सावधानी से लेना ही ठीक रहता है, दिशा स्पष्ट है: ईरान के खिलाफ एक साल के अंदर दूसरा हवाई हमला पहले हमले के मुक़ाबले न तो छोटा था और न संयमित था, वह कहीं बड़ा था.
इस प्रवृत्ति का अध्ययन किया जाना चाहिए. इसलिए नहीं कि कोई एक अभियान नियम को स्थापित कर देता है बल्कि इसलिए कि दो साल में तीन अलग-अलग शत्रुओं के खिलाफ की गई कार्रवाइयों के चार मामले एक ही दिशा की ओर संकेत कर रहे हैं.
अब क्यों
तीन बातों ने मिलकर इसे संभव किया है. पहली बात तो सटीक निशानेबाजी ही है, जो अब इतनी सटीक हो गई है कि कोई देश जनसंहार किए बिना या ऐसा लंबा युद्ध चलाए बिना (जिसमें हवाई ताकत के इस्तेमाल को राजनीतिक रूप से महंगा माना जाता था) किसी हुकूमत के अगुआ की हत्या करके, उसके मिसाइल उत्पादन को भंग करके, उसके कमांड ढांचे को कमजोर करके वास्तविक रणनीतिक प्रभाव पैदा कर ऑपरेशन सिंदूर में आतंकी ढांचे पर हमला करते हुए पाकिस्तान के नागरिक तथा आर्थिक ठिकानों को निशाना नहीं बनाया गया. बताया जाता है कि ‘रोरिंग लायन’ के शुरुआती हमलों में निरंतर जमीनी निगरानी रखी गई ताकि हमलावर को कोई नुकसान न हो.
दूसरी बात यह थी कि ‘किल चेन’ ध्वस्त हो गया था. एपिक फ्यूरी के पहले हमले में बॉम्बर विमान, फाइटर जेट, हवा में ईंधन भरने वाले विमान और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर विमान को एक साथ तालमेल के साथ तैनात किया गया. इस संयुक्त हमले में पहले ही दिन कथित तौर पर सैकड़ों ठिकानों को निशाना बनाया गया. यूक्रेन में यह एकजुटता छोटे और कम ख़र्चीले स्तर पर आजमाई गई: जायजा लेने वाला ड्रोन अपनी पहली उड़ान में ही कुछ किलोमीटर दूर किसी खंदक में वीडियो में उस पर नजर रख रहे ऑपरेटर के निर्देश पर मिनटों में हमला हमला भी कर सकता है.
तीसरी बात, लागत की है. माना जाता है कि यूक्रेन वर्ष 2025 में ही करीब 45 लाख ड्रोन के उत्पादन का लक्ष्य रखा था. जिस लड़ाई मे लिए कभी महंगे विमानों के कई स्क्वाड्रनों की जरूरत पड़ती थी वह अब कुछ सौ डॉलर वाले ड्रोन की मदद से काफी कम खर्च पर लड़ी जा सकती है. यह गणित हमेशा के लिए सिर्फ वायुसेनाओं तक सीमित नहीं रहने वाली, यह भाड़े के लड़ाकों, अलगाववादियों, और आतंकवादियों की पहुंच में भी आएगी जिन्होंने कभी वायुसेना नहीं बनाई है.
अभी सब कुछ तय नहीं हुआ है
इस सबका मतलब यह नहीं है कि युद्ध में तेजी लाने की शुरुआत हमेशा के लिए हवाई ताकत के बूते ही होगी. भारत के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने इसमें निहित प्रोत्साहन को स्पष्ट करते हुए पिछले साल ही कहा कि सरकारें फोर्स का ज्यादा सहारा लेंगी क्योंकि राजनीतिक मकसद लंबी लड़ाइयों की जगह छोटी लड़ाइयों से हासिल किए जा सकते हैं. लेकिन चार मुद्दे, जो कितने भी उल्लेखनीय क्यों न हों, युद्ध के सिद्धांत तय नहीं करते. ऑपरेशन सिंदूर आतंकवाद विरोधी कार्रवाई थी. ‘राइजिंग लायन’ और ‘रोरिंग लायन’ उस देश को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने और उसकी हुकूमत को बदलने के लिए चलाई गई मुहिम थी जिसका एयर डिफेंस नेटवर्क बिखर रहा था. यूक्रेन दो देशों के बीच भीषण टकराव का बिल्कुल अलग ही मामला है. बहरहाल, यह प्रवृत्ति वास्तविक रूप ले चुकी है और अभी स्वरूप ही ले रही है, तय सिद्धांत नहीं बन गई है.
आगे क्या होगा यह इस पर निर्भर होगा कि ये तीन बातें तुरंत हो जाएं—सैन्य अभियान छोटे होते जाएं और उनके अग्रिम मोर्चे ज्यादा ताकतवर हों क्योंकि लड़ने वाले सेनाओं के पूरी तरह सक्रिय होने से पहले जीतना चाहेंगे; एक और समानांतर बात यह हो रही है कि लड़ाई को लंबा खींचा जा रहा है और उसे कई स्तर पर लड़ा जा रहा है, जैसा कि रूस के मामले में देखा जा रहा है कि 2025 और 2026 में उसने सीधी टक्कर लेने की जगह ड्रोन व मिसाइल के संयुक्त हमले की चाल अपनाई; और जिन लड़ाकों को युद्ध में तेजी पर काबू करने के बारे में कभी सोचने की जरूरत नहीं पड़ी वे कम लागत में पहला हमला करने की क्षमता बढ़ाने लगे.
तारीफ भी और चिंता भी
जो कुछ नया हो रहा है उसमें से कुछ तो निश्चित ही प्रशंसनीय है. पाकिस्तान में नागरिक इन्फ्रास्ट्रक्चर को बचाते हुए आतंकी अड्डों को नष्ट करने वाली निशानेबाजी में, या अपनी वायुसेना के शून्य नुकसान के दावे के साथ एक देश के शीर्ष नेताओं का सफाया करने वाले हमले में पुराने जमाने के हवाई हमलों के मुक़ाबले ज्यादा सटीकता हासिल की जा रही है. भारत के कई स्तरों वाले एयर डिफेंस ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान एक साथ 600 पाकिस्तानी ड्रोनों के हमले का जिस तरह मुक़ाबला किया वह इस बात का सबूत है कि जब निवेश में पहल की जाती है तब डिफेंस भी हमले से तालमेल बैठा सकता है.
असली चिंता यह होनी चाहिए कि आर्थिक मामला अलग दिशा में जा रहा है. इंटरसेप्टर जिन ड्रोनों और मिसाइलों को मार गिराते हैं वे उनके मुक़ाबले बहुत ज्यादा महंगे होते हैं. यह अंतर ड्रोन उत्पादन की लागत में कमी आने के साथ हर साल बढ़ता जा रहा है. इजरायल और अमेरिका ने 2025 और 2026 में भी ईरान के जवाबी हमलों का सामना करने के लिए अपने बहुकीमती, सीमित भंडार को खर्च किया. लेकिन कमजोर थैली वाला कोई देश ऐसा कारोबार ज्यादा दिनों तक नहीं चला सकता. इसके साथ एक मनोवैज्ञानिक जोखिम भी है—दोनों पक्षों में मसले के समाधान के बिना अपनी जीत का एहसास युद्ध को दोहराने जोखिम कम करने की जगह बढ़ाता ही है.
निष्क्रिय पहलू
इनमें से कोई भी अभियान केवल विमानों के बूते सफल नहीं हुआ. इजरायली जेट विमानों ने सीमा पार किया भी नहीं था कि साइबर ऑपरेशनों और इंटरनेट ब्लैकआउट के कारण ईरानी कमांड के बीच तालमेल गड़बड़ा गया था. अंतरिक्ष स्थित ओपन सोर्स उपग्रह चित्रों ने युद्ध से हुए नुकसान का असली जमीनी आकलन उपलब्ध हो रहा था, जो कि देश की खुफिया एजेंसियों की जायदाद हुआ करता था. इलेक्ट्रोनिक युद्ध ने एयर डिफेंस के प्रदर्शन को स्वरूप दिया, जबकि फायर को नियंत्रित करने वाले रडार केवल दिशा निर्देशन को नाकाम करने के लिए सक्रिय हुए. ये डोमेन न केवल हमले को ज्यादा समर्थन देने लगे हैं बल्कि यह भी तय करने लगे हैं कि पहले कदम के तौर पर इनमें से एक को लांच किया जा सकता है या नहीं.
घरेलू सबक
भारतीय वायुसेना को पिछले दो वर्षों में कई नीरस मगर अहम सबक मिले हैं. नेटवर्क से जुड़े और कई स्तर वाले एयर डिफेंस कारगर होते हैं. धीरज के साथ किया गया देसी एकीकरण जितना भी धीमा क्यों न हो, आयातों पर निर्भरता को दूर करता है. ‘ब्रह्मोस’ को पक्का होने में समय लगा, लेकिन वह ऑपरेशन सिंदूर में हमले का निर्णायक हथियार साबित हुआ. गोला-बारूद और इंटरसेप्टर के भंडार बनाने की जरूरत पर शांतिकाल में विचार करने की जगह उसे योजना में प्राथमिकता देनी होगी. ईरान ने मिसाइलों के भंडार का इस्तेमाल किया. रूस, फ्रांस, इजरायल, और घरेलू उद्योग आदि विभिन्न श्रोतों से हासिल बेड़े एकीकरण में तब तक टकराव पैदा करते रहेंगे जब तक भारत उन प्लेटफॉर्मों से सेंसर डाटा हासिल करने का स्पष्ट ढांचा नहीं बना लेता जिन प्लेटफॉर्मों को आपस में संवाद करने की दृष्टि से नहीं तैयार किया गया था.
व्यापक सबक यह है कि युद्ध की शुरुआती चाल बदल गई है. जो देश कभी अपने विमानों का इस्तेमाल करने से पहले हफ्तों तक सोच-विचार किया करते थे वे अब फैसला करने के चंद घंटे के अंदर उनका इस्तेमाल करने लगते हैं. अब युद्ध जल्दी खत्म होने के कारण दुनिया में ज्यादा स्थिरता आ रही है या नहीं, या कि लड़ाई शुरू करने में देरी न किए जाने के कारण खतरा कहीं ज्यादा बड़ा हो गया है या नहीं, ऐसे सवालों के जवाब अगला दशक ही देगा.
एयर वाइस मार्शल प्रशांत मोहन (रिटायर्ड) एक फाइटर पायलट थे. वे अभी नई दिल्ली में सेंटर ऑफ़ एयरोस्पेस पावर एंड स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ में एडिशनल डायरेक्टर जनरल हैं. विचार निजी हैं.
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