नरेंद्र मोदी सरकार ने जेन ज़ी के प्रदर्शन के दौरान असामान्य तरीके से कदम पीछे क्यों खींचे और यह बीजेपी के भविष्य के चुनावी प्रदर्शन के लिए क्या संकेत देता है?
नीट पेपर लीक के खिलाफ छात्रों के प्रदर्शन को आसानी से दबाया नहीं जा सका. इसके कई कारण थे. जंतर-मंतर पर धरना जैसे-जैसे चलता रहा, यह 2011 के अन्ना हजारे आंदोलन जैसा दिखने लगा, जिसमें बड़ी संख्या में मध्यम वर्ग के परिवार सड़कों पर उतरे थे. मेरे ऐसे दोस्त हैं, जो किसी राजनीतिक कार्यक्रम में कभी नज़र नहीं आते, वे भी अपने बच्चों के साथ जंतर-मंतर पहुंच गए. इसके बाद उन्होंने अपने उन बच्चों के लिए जो अब राजनीति को लेकर जागरूक हो चुके थे, पढ़ने के लिए किताबों और लेखों की सूची भी मांगी. कुछ मामलों में जब माता-पिता बच्चों को जाने नहीं देना चाहते थे, तो बच्चे चुपके से निकल गए. वे 20 जुलाई को संसद मार्च में शामिल होने के लिए बस, ट्रेन और यहां तक कि फ्लाइट से भी पहुंचे. हालात ऐसे हो गए कि दिल्ली पुलिस और सीआरपीएफ, जिसने ज्यादा से ज्यादा 5,000 प्रदर्शनकारियों के आने की उम्मीद की थी, उसे 50,000 से ज्यादा लोगों की भारी भीड़ का सामना करना पड़ा.
यह पहली बार नहीं था जब अधिकारी हालात से अनजान रह गए हों और न ही यह आखिरी बार होगा. बहुत से लोगों के मन में सरकार से कुछ हद तक असंतोष और खुले तौर पर विरोध करने पर नुकसान उठाने का डर, दोनों मौजूद हैं. यह डर मोदी सरकार की बदले की भावना वाली कार्रवाई के कारण भी है.
लेकिन जैसे-जैसे ज्यादा से ज्यादा लोग प्रदर्शन में शामिल होते हैं, यह डर कम होता जाता है. राजनीतिक वैज्ञानिक सुजैन लोहमैन ने पूर्वी जर्मनी में 1989 के लीपजिग मंडे प्रोटेस्ट का विश्लेषण करते हुए तर्क दिया था कि जैसे-जैसे प्रदर्शन का आकार बढ़ता है, विरोध करने की कीमत कम होती जाती है. इससे जोखिम से बचने वाले लोग भी प्रदर्शन में शामिल होने के लिए तैयार हो जाते हैं.
जून की शुरुआत में जो परिवार प्रदर्शन स्थल से दूर रहते, वे जुलाई में सोशल मीडिया से मिले समर्थन और कम होते डर के कारण जंतर-मंतर पहुंचने लगे. जब संसद मार्च का समय आया, तब हज़ारों छात्रों ने यह तय कर लिया था कि प्रदर्शन में शामिल होने का संभावित फायदा—तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देने के लिए मजबूर करना—संभावित नुकसान से ज्यादा बड़ा है. और बाद में पता चला कि दर्द सहने की उनकी सीमा—मार खाना, आंसू गैस का सामना करना और पैलेट गन से गोली लगना—उनकी कल्पना से भी ज्यादा थी.
प्रदर्शन क्यों सफल रहा
युवा प्रदर्शनकारियों के लिए तीन और चीज़ों ने काम किया: अहिंसा, महिलाओं की भागीदारी और धार्मिक बहुसंख्यक समुदाय के लोगों की भागीदारी.
अहिंसक प्रदर्शन: शीत युद्ध खत्म होने के बाद से अहिंसक प्रदर्शन हथियारबंद विरोध की तुलना में काफी ज्यादा आम हो गए हैं. 2010 से 2019 के बीच अहिंसक प्रदर्शनों के अपने लक्ष्य हासिल करने की संभावना हिंसक या हथियारबंद प्रदर्शनों की तुलना में चार गुना ज्यादा थी. कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का प्रदर्शन हिंसा की ओर बढ़ने की संभावना वाला नहीं था, लेकिन इसके गांधीवादी तरीके ने बड़ा फर्क पैदा किया.
महिलाओं की भागीदारी: प्रदर्शन में महिलाओं की बड़ी संख्या में भागीदारी रही. इसमें भूख हड़ताल कर रही कार्यकर्ताओं से लेकर सबसे ज्यादा वायरल हुई रील्स बनाने वाली महिलाओं तक, सभी शामिल थीं. प्रदर्शन की जगह काफी हद तक महिलाओं के लिए सुरक्षित थी और पूरे आंदोलन का माहौल महिलाओं के लिए अनुकूल बना रहा. जिन अहिंसक आंदोलनों में महिलाओं की बड़ी भागीदारी होती है, उनके अपने लक्ष्य हासिल करने की संभावना ज्यादा होती है. साथ ही, ऐसे आंदोलनों से सत्ताधारी सरकार के अंदर इस बात को लेकर मतभेद भी पैदा होने की संभावना ज्यादा होती है कि प्रदर्शन पर सख्ती से कार्रवाई की जाए या नहीं.
बहुसंख्यक समुदाय: हालांकि, इस नियम का एक बड़ा अपवाद भी है: नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ शाहीन बाग जैसी जगहों पर प्रदर्शन कर रही मुस्लिम महिलाओं के साथ किया गया व्यवहार. महिलाओं की साफ मौजूदगी के बावजूद, ये प्रदर्शन मुस्लिमों और उनके उदारवादी समर्थकों तक ही सीमित रहे. तत्कालीन केंद्रीय राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को “देश के गद्दारों को, गोली मारो सालों को” नारे के साथ बदनाम किया, जबकि अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि वह दो घंटे में शाहीन बाग खाली करा देते. कपिल मिश्रा, जिन्होंने 2020 के दिल्ली दंगों से कुछ घंटे पहले शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हिंसा की धमकी दी थी, को 2025 में दिल्ली का कानून और न्याय मंत्री बनाया गया.
रिसर्च से पता चलता है कि अगर आप अमेरिका में अफ्रीकी-अमेरिकी हैं या इजरायल में अरब नागरिक हैं, तो आपके अहिंसक प्रदर्शन को बहुसंख्यक समुदाय के एक बड़े हिस्से की नजर में खतरे के रूप में देखा जाएगा. शाहीन बाग में भी ऐसा ही हुआ. हालांकि, यह आंदोलन देखने में भले ही असफल रहा हो, लेकिन इसने सीएए लागू होने में कई साल की देरी ज़रूर कर दी.
आखिरी धक्का
20 जुलाई को संसद मार्च पर हुई कार्रवाई के बाद घटनाएं तेज़ी से बदलीं. केंद्र सरकार ने पहले प्रदर्शन को नज़रअंदाज़ किया, फिर मोदी की थोड़ी अजीब तरीके से बनाई गई रील्स के जरिए इसे स्वीकार किया और इसके बाद कुछ कमजोर रियायतें देने की पेशकश की. धीरे-धीरे सरकार पीछे हटती गई और आखिरकार 25 जुलाई की सुबह उसने प्रधान को बलि का बकरा बना दिया.
इसका एक कारण कांग्रेस पार्टी और INDIA गठबंधन का सीधे छात्रों के प्रदर्शन में शामिल होना था. इसकी शुरुआत 21 जुलाई को प्रधानमंत्री आवास के बाहर हुए धरने से हुई. सोशल मीडिया के जरिए लोगों को जोड़ने का दूसरा पहलू कमजोर संगठन होता है, जिसकी वजह से शुरुआती तेजी के बाद कई प्रदर्शन बिखर जाते हैं, लेकिन जेन ज़ी के बीच लोकप्रिय नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में एक औपचारिक राजनीतिक पार्टी के प्रदर्शन में शामिल होने से स्थिति बदल गई. प्रदर्शन दूसरे शहरों तक फैलने से भी फर्क पड़ा और जैसा कि आज तक के कुछ मीडिया कर्मियों ने एक पॉडकास्ट में बताया, प्रधान का इस्तीफा सरकार को यह पता चलने के कुछ घंटे बाद आया कि गांधी शायद जंतर-मंतर जा सकते हैं और प्रदर्शन को फिर से बड़ा रूप दे सकते हैं.
एक और साफ वजह यह डर था कि बीजेपी का मुख्य हिंदू मध्यम वर्ग का वोट बैंक उसके खिलाफ जा रहा था. बाद में बांकीपुर (बिहार) और दतिया (मध्य प्रदेश) में उपचुनाव में मिली हार ने भी साबित कर दिया कि बीजेपी अपने समर्थकों को हमेशा अपने साथ मानकर नहीं चल सकती. जब उसके मुख्य वोट बैंक के बच्चों के खिलाफ हिंसा का इस्तेमाल हुआ, तो स्थिति पूरी तरह बदल गई. बीजेपी एक पूरी पीढ़ी के मतदाताओं को खोने का जोखिम नहीं उठा सकती. उसके समर्थक नेटवर्क की ओर से डराने-धमकाने, निजी जानकारी सार्वजनिक करने (डॉक्सिंग) और महिलाओं को उनके चरित्र को लेकर अपमानित करने की कोशिशों ने भी उसकी स्थिति बेहतर नहीं की.
जाहिर है, कोई भी पीढ़ी एक ही राजनीतिक समूह नहीं होती. युवा सामाजिक स्थिति और राजनीतिक विचारों के आधार पर अलग-अलग समूहों में बंटे होते हैं, लेकिन किसी मतदाता की किशोरावस्था और शुरुआती युवावस्था में होने वाली यादगार राजनीतिक घटनाएं आने वाले कई दशकों तक उसकी राजनीतिक पसंद को प्रभावित करती हैं. दुनिया के अनुभव से पता चलता है कि एक आंदोलन से जुड़े युवा कार्यकर्ता अक्सर अगले आंदोलन की शुरुआत करते हैं.
अमिताभ दुबे कांग्रेस के सदस्य हैं. उनका एक्स हैंडल @dubeyamitabh है. यह लेखक के निजी विचार हैं.
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