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Monday, 8 June, 2026
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भूटान ने पूछा—‘क्या हमारे पब्लिक टॉयलेट साफ थे?’ यह सवाल भारत पर्यटकों से पूछने की हिम्मत नहीं करेगा

अब वक्त आ गया है कि हम सिर्फ अपनी पर्यटन क्षमता का ढिंढोरा पीटना बंद करें और एक सच्ची पर्यटन संस्कृति विकसित करें. ऐसी संस्कृति, जो सिर्फ ‘अतिथि देवो भव’ जैसे नारों तक सीमित न हो.

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जब आप किसी नए देश की यात्रा करते हैं, तो उड़ान में सवार होने से कुछ मिनट पहले हवाई अड्डे के प्रस्थान लाउंज में जो कुछ होता है, वह शायद ही ऐसी चीज़ हो जो आपको सबसे ज़्यादा प्रभावित करे. तब तक आप उस देश के बारे में अपनी राय बना चुके होते हैं—क्या अच्छा लगा, क्या बुरा लगा, सब तय हो चुका होता है. फिर भी पारो अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर एक ऐसी घटना हुई, जिसने मुझे भूटान का प्रशंसक बना दिया.

उन्होंने बस मुझसे एक सवाल पूछा. लेकिन उसी सवाल में भूटान सरकार की एक बड़ी उपलब्धि, उसके सांस्कृतिक आत्मविश्वास और विनम्रता की कहानी छिपी हुई थी.

मैं और मेरी मित्र लाउंज में बैठे ही थे कि हाथों में टैबलेट लिए दो युवा महिलाएं हमारे पास आईं. उन्होंने अपना परिचय पर्यटन विभाग की कर्मचारियों के रूप में दिया और पूछा कि क्या हम उनके कुछ सवालों का जवाब देना चाहेंगे.

उनके सर्वेक्षण में एक दर्जन से अधिक प्रश्न थे. लेकिन एक सवाल ऐसा था जिसने मुझे चौंका दिया: क्या आपको भूटान के सार्वजनिक शौचालय साफ-सुथरे लगे?

किसी पर्यटक से, वह भी उसके देश छोड़कर जाने से ठीक पहले, ऐसा सवाल पूछने के लिए किसी देश और समाज में असाधारण आत्मविश्वास होना चाहिए. भारत तो ऐसे सवाल की कल्पना भी नहीं कर सकता—विदेशी पर्यटक से पूछना तो दूर, अपने नागरिकों से भी नहीं क्योंकि हम पहले से जानते हैं कि जवाब क्या होगा.

वे सवाल जो हम पूछ ही नहीं सकते

यही वे सवाल हैं जिनसे किसी देश की पर्यटन संस्कृति बनती है. यहां ‘पर्यटन संस्कृति’ को ‘सांस्कृतिक पर्यटन’ समझने की भूल नहीं करनी चाहिए. पर्यटन संस्कृति का संबंध हजारों वर्षों के इतिहास, स्मारकों, प्राकृतिक पगडंडियों या अभयारण्यों से नहीं है. इसका मतलब है—पर्यटकों के प्रति अनुकूल सामाजिक और नैतिक व्यवहार, बेहतर बुनियादी ढांचा, यात्रा की सहजता और विदेशी यात्रियों की आलोचना व सुझावों को खुले मन से स्वीकार करने की क्षमता. इसकी बुनियाद इस बात पर टिकी होती है कि हम कोई अप्रिय बात सुनते ही बुरा मानकर बिखर न जाएं.

भूटान बेहद साफ-सुथरा देश है. यह पहली चीज़ है जो आपकी नज़र में आती है. वहां बचपन से लोगों को सिखाया जाता है कि वे जो कचरा पैदा करते हैं, उसकी जिम्मेदारी उनकी अपनी है, किसी और की नहीं. यह बात उनके व्यवहार में इतनी गहराई से रची-बसी है कि हमारे गाइड ने पारो छू नदी में तैरते हुए एक काले प्लास्टिक के रैपर को देखकर असहजता महसूस की. उनकी नज़रें इतनी तेज़ थीं कि वह कचरा उन्हें तुरंत दिख गया. उन्हें यह देखकर झटका लगा कि वह रैपर वहां था, जहां उसे नहीं होना चाहिए था. मैंने आसपास देखा तो नदी किनारे कुछ भारतीय पर्यटक मस्ती कर रहे थे. कचरा उन्होंने ही फैलाया था.

सर्वेक्षण में शौचालयों के अलावा भी कई सवाल थे. क्या आपको सार्वजनिक स्थानों पर कचरा दिखाई दिया? क्या लोगों का व्यवहार विनम्र था? क्या हमने अपने पर्यावरण को सुरक्षित रखने का अच्छा काम किया है? क्या गाइड मददगार थे? क्या होटल में आपका चेक-इन सहज और तेज़ी से हुआ? क्या आपको यह देश सुरक्षित लगा?

आप कह सकते हैं कि प्रस्थान के समय होने वाले ऐसे सर्वेक्षणों में अक्सर इसी तरह के सवाल पूछे जाते हैं. और यह भी सही है कि सवाल पूछ लेना अपने-आप में खुलेपन या सुधारात्मक कार्रवाई की गारंटी नहीं होता.

लेकिन मेरे मन में एक विचार आया.

पांच हजार वर्षों के गौरवशाली इतिहास, ताजमहल जैसी धरोहर, चकित कर देने वाली सांस्कृतिक विविधता और सरकार के प्रमुख स्वच्छता अभियान स्वच्छ भारत अभियान के बारह साल बाद भी कोई भारतीय यह पूछने का साहस नहीं कर सकता कि क्या देश के शौचालय साफ थे.

पहला कारण, हमारे पास पर्याप्त सार्वजनिक शौचालय ही नहीं हैं. दूसरा, जो हैं, उनकी हालत अक्सर शर्मनाक है. और तीसरा, अगर भारतीय ऐसा सवाल किसी विदेशी पर्यटक से पूछें, तो संभव है कि वह अतिरिक्त उत्तर-पत्र मांग बैठे और जवाब लिखते-लिखते उसकी उड़ान ही छूट जाए. वह शायद आंखें घुमाकर बस इतना कहे—“शुरुआत कहां से करूं?”

कुछ राजनेताओं ने एक दिन के लिए झाड़ू उठाकर तस्वीरें खिंचवाईं और स्वच्छता अभियान धीरे-धीरे सड़क सफ़ाई अभियान से शौचालय निर्माण अभियान में बदल गया. लेकिन वह भी कोई अभूतपूर्व सफलता नहीं बन पाया, हालांकि आंकड़े पिछली सरकार के निर्मल भारत मिशन की तुलना में बेहतर ज़रूर दिखते हैं.

हम विदेशी पर्यटकों से अपने पर्यावरण के बारे में सवाल नहीं पूछ सकते—ज़रा हमारी हवा की गुणवत्ता पर नज़र डालिए. हम यह भी नहीं पूछ सकते कि क्या उन्हें भारत सुरक्षित लगा. सचमुच? या यह कि क्या सड़कें साफ थीं, क्या गाइड विनम्र और मददगार थे.

भूटान ये सवाल इसलिए पूछता है क्योंकि उसने इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए गंभीरता से काम किया है. हम नहीं पूछ सकते क्योंकि हमें पता है कि हम अभी वहां तक नहीं पहुंचे हैं और आलोचना के मामले में हमारी त्वचा बहुत पतली है. स्वयंभू ‘विश्वगुरु’ में कोई कमी निकालने की हिम्मत कैसे कर सकता है?

अब समय आ गया है कि हम अपनी पर्यटन क्षमता का ढिंढोरा पीटना बंद करें और एक वास्तविक पर्यटन संस्कृति का निर्माण शुरू करें—ऐसी संस्कृति, जो ‘अतिथि देवो भव’ जैसे घिसे-पिटे नारों से आगे बढ़कर व्यवहार और व्यवस्था में दिखाई दे.

ये लेखिका के निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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