9 मई को पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने ‘जागत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) अधिनियम, 2026’ के पास होने पर निकाली गई अपनी शुक्राना यात्रा खत्म की और साफ संदेश दिया.
श्री अकाल तख्त साहिब के कार्यवाहक जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गर्गज द्वारा दिए गए 15 दिन के अल्टीमेटम के जवाब में मुख्यमंत्री ने स्पष्ट कहा कि बेअदबी रोधी कानून न तो वापस लिया जाएगा, न उसमें बदलाव होगा और न ही उसे रद्द किया जाएगा.
इस जवाब का तरीका उतना ही महत्वपूर्ण है जितना उसका मतलब.
श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार पहले ही भगवंत मान की शुक्राना यात्रा को “अहंकार यात्रा” बता चुके थे. उनका कहना था कि यह धन्यवाद यात्रा नहीं, बल्कि घमंड दिखाने वाली यात्रा है. यह बहुत बड़े स्तर का संभावित टकराव बन सकता है और यह तब शुरू हुआ है, जब पांच सिंह साहिबान अभी औपचारिक रूप से बैठक करके कोई फैसला भी नहीं कर पाए हैं.
स्पीकर वाला विवाद
इससे पहले जो घटना हुई, वह भी काफी अहम है.
सरकार द्वारा कानून पास करने से पहले श्री अकाल तख्त साहिब या शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) से सलाह नहीं ली गई थी. इसके बाद जत्थेदार ने पंजाब विधानसभा स्पीकर कुलतार सिंह संधवां को श्री अकाल तख्त साहिब सचिवालय में बुलाया. स्पीकर ने वहां सिर झुकाया और भरोसा दिया कि वह जत्थेदार की चिंताओं को सरकार तक पहुंचाएंगे.
जत्थेदार की आपत्तियां पूरे कानून पर नहीं थीं, बल्कि कुछ खास बिंदुओं पर थीं. उन्होंने कहा कि श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के स्वरूपों पर कोई यूनिक सीरियल नंबर नहीं है. साथ ही, पवित्र बीड़ों को रखने वालों की पहचान सार्वजनिक करने का प्रावधान भी गलत है. उनका कहना था कि इससे श्रद्धालु सिख एंटी-सिख ताकतों के निशाने पर आ सकते हैं.
कानून का ड्राफ्ट 11 अप्रैल की रात तैयार हुआ और सिर्फ दो दिन बाद 13 अप्रैल को पास भी कर दिया गया. न तो इसकी कॉपी श्री अकाल तख्त साहिब को भेजी गई और न ही SGPC को. सिर्फ अखबार में विज्ञापन देना ऐसे मामलों में सलाह-मशविरा का विकल्प नहीं हो सकता, जो पंथ के धार्मिक मामलों से जुड़े हों.
इंसाफ का एक दशक लंबा इंतज़ार
असल मुद्दा नया कानून नहीं है. कोई भी आस्थावान सिख और सच कहें तो किसी भी धर्म का व्यक्ति—बेअदबी के लिए सख्त सज़ा का विरोध नहीं कर सकता. जब यह कानून पहली बार पास हुआ था, तब SGPC ने आधिकारिक रूप से इसका स्वागत भी किया था, लेकिन अब मौजूदा विवाद के बीच यह बात दब गई है.
श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की बेअदबी का मुद्दा पंजाब की हर बड़ी पार्टी—अकाली दल, कांग्रेस, BJP और अब AAP ने राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल किया. सभी ने विपक्ष में रहते हुए पंथ की भावनाओं की बात की, लेकिन सत्ता में आने के बाद बहुत कम काम किया. सबसे बड़ा सवाल, जो आज भी लोगों को परेशान करता है, यह है कि 2015 की घटनाओं के इतने साल बाद भी इंसाफ कहां है?
जून 2015 में फरीदकोट के गुरुद्वारा बुर्ज जवाहर सिंह वाला से श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के स्वरूप चोरी हो गए थे. 12 अक्टूबर को बरगाड़ी गांव के पास फटे हुए पन्ने मिले थे. इसके बाद हुए विरोध प्रदर्शन में कोटकपूरा और बहबल कलां में पुलिस फायरिंग हुई, जिसमें दो प्रदर्शनकारी गुरजीत सिंह और कृष्ण भगवान सिंह मारे गए.
एक दशक से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी ये मामले अब तक सुलझ नहीं पाए हैं. पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के आदेश के बाद ये केस अब चंडीगढ़ की सेशंस कोर्ट में चल रहे हैं. नया कानून भविष्य में होने वाले मामलों पर लागू होगा. संविधान का अनुच्छेद 20(1) पुराने मामलों पर नए कानून के तहत सजा देने की अनुमति नहीं देता.
जैसा कि लेखक ने The KBS Chronicle में लिखा था, इस कानून के तहत बढ़ाई गई सजा 2015 की घटनाओं पर लागू नहीं हो सकती. उन मामलों का फैसला उसी समय के कानूनों के हिसाब से होगा. इसलिए चंडीगढ़ की अदालतों में चल रहे मामलों में अभियोजन की गुणवत्ता सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है. लेखक ने केंद्रीय गृह मंत्री को पत्र लिखकर मांग की है कि इन मामलों के लिए एक ईमानदार, अनुभवी और पूरी तरह समर्पित स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर नियुक्त किया जाए, न कि ऐसा अधिकारी जो पहले से कई मामलों में व्यस्त हो.
इसी तरह की एक याचिका पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में भी दायर की जा रही है. लेखक का कहना है कि पंथ का ध्यान मौजूदा संस्थागत टकराव जितना ही इन मामलों में इंसाफ सुनिश्चित कराने पर भी होना चाहिए.
अधिकार, वैधता और एक ढांचागत समस्या
अब बात इस टकराव और उससे जुड़ी गहरी जटिलताओं की. श्री अकाल तख्त साहिब की संस्था और ‘मीरी-पीरी’ का सिद्धांत, जिसकी स्थापना 17वीं सदी की शुरुआत में श्री गुरु हरगोबिंद साहिब ने की थी, ब्रिटिश दौर और 1925 के सिख गुरुद्वारा एक्ट से भी करीब तीन सदियां पुराना है. श्री अकाल तख्त साहिब का अधिकार किसी कानून से पैदा नहीं हुआ है. हर विचारधारा के सिख उसकी धार्मिक और सांसारिक सर्वोच्चता को मानते हैं. जब पांच सिंह साहिबान ने मिलकर कोई फैसला सुनाया है, तब पंजाब के सबसे बड़े राजनीतिक नेताओं ने भी सिर झुकाया है. यह इतिहास सच है.
लेकिन एक ढांचागत समस्या भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. SGPC में 2011 के बाद से चुनाव नहीं हुए हैं. यानी सिखों की एक पूरी नई पीढ़ी ने कभी अपनी प्रतिनिधि संस्था के लिए वोट ही नहीं डाला. हर नवंबर में उसकी जनरल हाउस बैठक होती है और लगभग हर बार वही कार्यकारी समिति दोबारा चुन ली जाती है. इससे नियुक्तियों की ताकत प्रभावी रूप से SAD अध्यक्ष के हाथों में केंद्रित हो गई है. केंद्र सरकार ने भी इस स्थिति को सुधारने में कोई तेज़ी नहीं दिखाई. पिछले मुख्य गुरुद्वारा चुनाव आयुक्त का कार्यकाल खत्म होने के बाद नया नियुक्त नहीं किया गया.
इसी वजह से कार्यवाहक जत्थेदारों को लेकर यह धारणा बनी है—और बिना वजह नहीं बनी—कि वे SAD के इशारे पर काम कर रहे हैं.
एक राजनीतिक दांव, जिस पर सवाल उठ रहे हैं
मौजूदा संकट शायद इसी राजनीतिक तरीके पर सवाल उठा रहा है, जिसका इस्तेमाल शिरोमणि अकाली दल कई बार करता रहा है. दिसंबर 2024 में पांच सिंह साहिबान ने श्री अकाल तख्त साहिब में सामूहिक बैठक के दौरान एक हुक्मनामा जारी किया था. इसमें सुखबीर सिंह बादल और SAD के दूसरे वरिष्ठ नेताओं को “तनखैया” घोषित किया गया था, यानी धार्मिक गलती का दोषी.
उन पर बेअदबी की घटनाओं, कोटकपूरा और बहबल कलां फायरिंग और डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को माफी देने के मामलों में जिम्मेदारी तय की गई थी. इसके बाद श्री दरबार साहिब में सार्वजनिक रूप से सेवा के रूप में प्रायश्चित भी किया गया, लेकिन उस हुक्मनामे की असली मांग—यानी सच्ची जवाबदेही और इंसाफ—पूरी नहीं की गई.
अब वही नेता सबसे ज्यादा जोर से श्री अकाल तख्त साहिब की ताकत और अधिकार की बात कर रहे हैं. 15 दिन का अल्टीमेटम लगभग 23 मई तक है, लेकिन पंजाब के लोग—सिख और गैर-सिख दोनों—सिर्फ इस संस्थागत टकराव के खत्म होने का इंतज़ार नहीं कर रहे. वे इंसाफ का इंतज़ार कर रहे हैं—बरगाड़ी के लिए, बुर्ज जवाहर सिंह वाला के लिए, और बहबल कलां में मारे गए गुरजीत सिंह और कृष्ण भगवान सिंह के लिए.
अब तक वह इंसाफ नहीं मिला है.
जिस भी राजनीतिक दल या नेता ने श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की पवित्रता का मुद्दा उठाया है, उसे आखिर में सिर्फ एक ही कसौटी पर परखा जाना चाहिए—क्या उसने इंसाफ दिलाया या नहीं. अब यह समय ही बताएगा कि समझदारी जीतती है या नहीं.
लेकिन पिछले एक दशक का रिकॉर्ड देखें, तो यह सवाल अब भी दर्दनाक तरीके से खुला हुआ है.
डिस्क्लेमर: लेखक श्री अकाल तख्त साहिब की धार्मिक और सांसारिक सत्ता का सर्वोच्च सम्मान करते हैं और उसके आदेशों को पूरी तरह मानने योग्य मानते हैं. एक अमृतधारी पगड़ीधारी सिख के रूप में उन्होंने कभी भी सीधे या परोक्ष रूप से इसके विपरीत कुछ कहने या संकेत देने की कोशिश नहीं की है और न कभी करेंगे. ऊपर दिया गया विश्लेषण भी उसी भावना के साथ लिखा गया है.
लेखक पंजाब कैडर के रिटायर्ड IAS अधिकारी और पंजाब सरकार के पूर्व स्पेशल चीफ सेक्रेटरी हैं. वह गवर्नेंस, पब्लिक पॉलिसी और संवैधानिक मामलों पर लिखते हैं. विचार निजी हैं.
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