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Tuesday, 12 May, 2026
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चुनाव आयोग मैच फिक्सिंग करके बच निकला. यह भारत की असली पहचान नहीं है

इंदिरा गांधी के समय में भी राज्यपालों के व्यवहार को लेकर इतनी नाराज़गी थी, लेकिन कुछ नहीं बदला, क्योंकि हर सरकार राजभवन में अपने वफादार लोग चाहती है.

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अब जबकि तमिलनाडु के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर के पास देरी करने के सारे तरीके खत्म हो गए और उन्होंने आखिरकार विजय को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी, तो शायद अब इस चुनावी मौसम से मिली सीखों को गिनाने का समय आ गया है.

पहली बात साफ है. राज्यपालों के संविधान को कुचलकर केंद्र में बैठी सरकार के हितों के लिए काम करने का एक लंबा और शर्मनाक इतिहास रहा है. पिछले एक दशक के उदाहरणों को देखकर हम शर्म और गुस्सा महसूस करते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि यह परंपरा कई दशक पुरानी है. 1980 के दशक में एन. टी. रामा राव को आंध्र प्रदेश में एक ऐसे राज्यपाल ने हटा दिया था जो इंदिरा गांधी के निर्देशों पर काम कर रहे थे.

जम्मू-कश्मीर में फारूक अब्दुल्लाह के साथ भी ऐसा ही हुआ, जिसके पीछे इंदिरा गांधी और अरुण नेहरू थे.

तब और अब में फर्क सिर्फ इतना है कि पक्षपात अब कहीं ज्यादा खुलकर दिखने लगा है. ममता बनर्जी की पश्चिम बंगाल में राज्यपाल जगदीप धनखड़ के साथ लगातार टकराव रहा. धनखड़ ने तो देशभर में घूमकर मुख्यमंत्री की आलोचना करने जैसा अभूतपूर्व कदम भी उठाया. इसके बदले उन्हें उपराष्ट्रपति का पद मिला. (हालांकि, वह ज्यादा समय तक नहीं चला और इसकी वजह कोई ठीक से नहीं बता पाया.)

इस विधानसभा चुनाव से पहले केंद्र ने आर. एन. रवि को तमिलनाडु से बंगाल भेज दिया. वह पूर्व पुलिस अधिकारी हैं और अपने आकाओं के प्रति वफादारी के अलावा उनकी कोई खास पहचान नहीं रही. उन्हें इसलिए भेजा गया ताकि अगर चुनाव का नतीजा उलझा हुआ आए तो केंद्र का भरोसेमंद व्यक्ति वहां मौजूद रहे.

लेकिन जैसा नतीजा आया, उससे लगता है कि केंद्र को रवि को तमिलनाडु में ही रखना चाहिए था, जहां वह लगातार चुनी हुई सरकार से टकराते रहे थे. चुनाव में त्रिशंकु विधानसभा बनी और ऐसे समय में रवि जैसे व्यक्ति की ज़रूरत थी. इसकी जगह राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर को भेजा गया, जो लंबे समय से आरएसएस से जुड़े रहे हैं और जिन्होंने विजय के शपथ ग्रहण में देरी करने की कोशिश की.

इस देरी की वजह से खरीद-फरोख्त की कोशिशें शुरू हो गईं क्योंकि नेताओं को लगा कि राज्यपाल को विजय के अलावा किसी और को शपथ दिलाने के निर्देश दिए गए हैं.

विजय का मुख्यमंत्री बनना तभी तय हुआ जब राज्यपाल के पास कोई और विकल्प नहीं बचा, लेकिन कम से कम अर्लेकर ने तमिलनाडु में शपथ ग्रहण को तब तक टाल दिया, जब तक बंगाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी वाला बड़ा सरकार गठन समारोह खत्म नहीं हो गया. इससे उनके वरिष्ठों को विजय और राहुल गांधी की साथ बैठी तस्वीरों से मुकाबला नहीं करना पड़ा.

यह सब चौंकाने वाला लगता है, लेकिन नया नहीं है. इंदिरा गांधी के समय में भी राज्यपालों के व्यवहार को लेकर इतनी नाराज़गी थी कि इस पद को खत्म करने या कम से कम राज्यपालों की नियुक्ति का तरीका बदलने की बात हुई थी, लेकिन कुछ नहीं बदला क्योंकि हर सरकार राजभवनों में अपने वफादार लोग चाहती है.

अब यह मुद्दा फिर उठ रहा है. हालांकि, बीजेपी नहीं चाहती कि इस पर ज्यादा चर्चा हो, लेकिन अब इसमें कोई शक नहीं कि देशभर में इस पर गंभीर बहस की ज़रूरत है. भारत यह बर्दाश्त नहीं कर सकता कि हर चुनाव के बाद जनता के फैसले को केंद्र के भरोसेमंद लोगों के हाथ में दे दिया जाए, जो फिर उसे राजनीतिक फायदे के लिए मोड़ें और बिगाड़ें.

चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर संकट

चुनावी मौसम से मिली दूसरी बड़ी सीख, जो एक संवैधानिक पद से जुड़ी है, वह चुनाव आयोग को सीमित रखने की ज़रूरत है. मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार भी राज्यपालों की तरह ही काम करते हैं — यानी केंद्र सरकार के आदमी की तरह. उनसे पहले भी चुनाव आयुक्तों पर गलत काम करने के आरोप लगे हैं, लेकिन यह कहना गलत नहीं होगा कि आधुनिक भारत के इतिहास में इससे पहले कभी इतना कम सम्मान पाने वाला व्यक्ति लोकतंत्र की सबसे अहम जिम्मेदारियों में से एक नहीं संभाल रहा था.

सम्मान नज़रिए की बात हो सकती है, लेकिन अब यह साफ होता जा रहा है कि SIR प्रक्रिया का मकसद मुस्लिम मतदाताओं को वोट के अधिकार से दूर करना था. यह प्रक्रिया और ऐसी दूसरी कोशिशें आगे चलकर गहरी नाराज़गी और अलगाव पैदा करेंगी. भारतीय लोकतंत्र इसलिए काम करता है क्योंकि हम सबकी इसमें हिस्सेदारी है. अगर मुसलमानों को यह महसूस कराया जाए कि सरकार चुनने में उनकी अहमियत हिंदुओं से कम है, तो यह भारत की मूल भावना के साथ धोखा होगा.

बीजेपी के लिए अच्छी बात यह रही कि कई आकलनों के मुताबिक वह SIR में नाम हटाने की प्रक्रिया के बिना भी बंगाल चुनाव जीत सकती थी, लेकिन यह संभव है कि SIR के बिना उसे इतनी बड़ी बहुमत नहीं मिलती और उसके कई जीते हुए उम्मीदवार, जिनमें नए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी भी शामिल हैं — हार जाते.

मेरी चिंता बंगाल चुनाव से ज्यादा उस मिसाल को लेकर है जो इससे बन रही है. अगर चुनाव आयोग इस बार इस तरह की मैच फिक्सिंग करके बच निकलता है और सच कहें तो ईसी के खिलाफ कोई खास कार्रवाई भी नहीं हुई, तो फिर क्या होगा जब वह चुनाव को पूरी तरह से फिक्स करना शुरू कर दे और नतीजे को लेकर कोई शक ही न बचे?

फिर भी इसका कोई आसान समाधान नजर नहीं आता. मौजूदा व्यवस्था में सरकार को अपने वफादार लोगों को चुनाव कराने की जिम्मेदारी देने से रोकने का कोई तरीका नहीं है और सुप्रीम कोर्ट भी SIR में नाम हटाने जैसे अहम मुद्दों में दखल देने के लिए तैयार नहीं दिखता.

हम अभी वहां तक नहीं पहुंचे हैं, लेकिन अगर यह रुझान जारी रहा, तो हम ऐसी स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं जहां चुनाव निष्पक्ष तरीके से नहीं होंगे और चुनावी जनादेश लागू कराने की जिम्मेदारी संभालने वाले राज्यपाल पूरी तरह किसी न किसी राजनीतिक दल के प्रभाव में होंगे.

कोई भी अजेय नहीं होता

भारतीय लोकतंत्र में कई कमियां हैं, लेकिन कम से कम यह मतदाताओं को हर पांच साल में दो मौके देता है — विधानसभा और लोकसभा चुनावों में, ताकि वे अपनी पसंद के नेताओं को चुन सकें. भारत के कई नेताओं की राजनीति को देखते हुए, उन्हें कुछ हद तक नियंत्रित रखने वाली सबसे बड़ी चीज सत्ता से बाहर होने का डर है. अगर चुनावी व्यवस्था में गड़बड़ी की गई, तो भारत के एक कमजोर और अस्थिर लोकतंत्र में बदलने का खतरा पैदा हो जाएगा.

सभी सरकारें यह बात जानती हैं, लेकिन वे हमेशा यह मानकर चलती हैं कि संविधान को कमजोर करने की चिंता उन्हें नहीं करनी चाहिए क्योंकि वे हमेशा सत्ता में रहेंगी. इंदिरा गांधी भी यही मानती थीं और मौजूदा सरकार भी यही मानती है.

लेकिन कुछ भी हमेशा नहीं चलता. आखिर में हर कोई हारता है. किसी न किसी समय, हर सरकार जो संस्थागत और संवैधानिक नुकसान अपने फायदे के लिए करती है, उसका फायदा बाद में सत्ता में आने वाले लोगों को मिलता है. इंदिरा गांधी ने जिन लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर किया था, वही बाद की सरकारों के लिए संवैधानिक सुरक्षा उपायों को दरकिनार करने का रास्ता बन गईं. यह फिर होगा.

राजनेता हारने की संभावना पर सोचते तक नहीं हैं. हाल ही में खत्म हुए विधानसभा चुनावों को ही देख लीजिए. जिस दिन नतीजे आ रहे थे, द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) अपनी जीत का जश्न मनाने की तैयारी कर रही थी, बिना यह समझे कि आगे क्या होने वाला है. आखिरी समय तक ममता बनर्जी को भरोसा था कि तृणमूल कांग्रेस भारी बहुमत से जीतने जा रही है.

लेकिन सच यह है कि वे हारते हैं और दुख की बात यह है कि भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं को जो नुकसान वे पहुंचाते हैं, वह उनके भुला दिए जाने के बाद भी लंबे समय तक बना रहता है.

वीर सांघवी एक प्रिंट और टेलीविजन पत्रकार हैं और टॉक शो होस्ट हैं. उनका एक्स हैंडल @virsanghvi है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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