2018 में अपनी फिल्म सरकार के ऑडियो लॉन्च पर विजय से पूछा गया था कि क्या वह असल ज़िंदगी में मुख्यमंत्री बनेंगे. इस पर उन्होंने कथित तौर पर कहा था, “अगर मैं मुख्यमंत्री बना, तो सिर्फ अभिनय नहीं करूंगा. मैं ईमानदारी से अपना काम करूंगा.”
फिल्म में विजय एक सख्त एनआरआई बिजनेसमैन का किरदार निभाते हैं, जो अमेरिका से लौटकर पता लगाता है कि उसका वोट कोई और डाल चुका है. चुनावी धांधली के खिलाफ उसकी लड़ाई उसे पूरी राजनीतिक व्यवस्था से टकराव तक ले जाती है. संयोग से 2018 में ज्ञानेश कुमार अभी केंद्रीय गृह मंत्रालय में थे. वरना कौन जानता है—शायद उस फिल्म में विजय अपने नाम को SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) से हटाए जाने के खिलाफ लड़ते दिखते.
फिल्म सरकार में विजय कहते हैं, “अगर सरकार बदलनी है, तो किसी नेता का इंतज़ार मत करो. खुद नेता बनो.” सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों मिलकर उन्हें हराने की कोशिश करते हैं, लेकिन जीत किसकी होती है, यह बताने की ज़रूरत नहीं. विजय चुनाव जीत जाते हैं, लेकिन खुद मुख्यमंत्री बनने के बजाय एक ईमानदार आईएएस अधिकारी को सीएम बना देते हैं. असल जिंदगी में सी. जोसेफ विजय ने यह जिम्मेदारी खुद लेने का फैसला किया. रविवार को जब उन्होंने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तो शायद उनके मन में वही बात रही होगी जो उन्होंने साढ़े सात साल पहले सरकार के ऑडियो लॉन्च पर कही थी—ईमानदारी से काम करने की.
लेकिन क्या वह ऐसा कर पाएंगे? यह पूछना शायद अभी जल्दी होगा. या फिर शायद इतना जल्दी भी नहीं.
विजय का कमज़ोर गठबंधन
ज़रा देखिए कि उन्होंने विधानसभा में बहुमत कैसे जुटाया है—ऐसे दलों के साथ जो अब भी उनके राजनीतिक दुश्मन कहे जाने वाले द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) के प्रति वफादारी जताते हैं. विजय की पार्टी तमिलात्रा वेत्री कषगम (टीवीके) के पास उनकी दूसरी सीट त्रिची ईस्ट से इस्तीफे के बाद 107 विधायक हैं.
फिलहाल विजय को कांग्रेस के पांच विधायकों का समर्थन मिल रहा है. अगर आपने रविवार को चेन्नई में उनके शपथ ग्रहण समारोह में राहुल गांधी को देखा हो, तो लगा होगा जैसे दोनों पुराने दोस्त हों.
2009 में विजय और उनके पिता नई दिल्ली में राहुल गांधी से मिले थे. बताया जाता है कि गांधी चाहते थे कि विजय यूथ कांग्रेस से जुड़ें, लेकिन अभिनेता की अपनी अलग योजनाएं थीं.
सत्रह साल बाद, रविवार को चेन्नई में विजय के बगल में बैठे गांधी काफी खुश नज़र आ रहे थे.
पांच कांग्रेस विधायकों की जीत का श्रेय एम. के. स्टालिन की डीएमके को जाता है, न कि राहुल गांधी को. जब तक डीएमके विपक्ष में बैठकर सही समय का इंतज़ार कर रही है, तब तक विजय इन विधायकों पर भरोसा कर सकते हैं.
इसके अलावा दो वामपंथी दलों के चार विधायक भी हैं, जिन्होंने बाहर से समर्थन दिया है. उन्होंने साफ कहा है कि राज्य के हितों की रक्षा के लिए वे डीएमके के साथ काम जारी रखेंगे.
बाकी चार विधायक दो पार्टियों से आते हैं—दो इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के और दो विदुथलाई चिरुथैगल काची के. इन दोनों पार्टियों ने भी विजय को समर्थन दिया है, लेकिन वे अब भी डीएमके गठबंधन में हैं. कांग्रेस को छोड़कर, जिसने डीएमके से रिश्ता तोड़ लिया है, बाकी सभी दल सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे हैं.
असल में, अभी जिस तरह की स्थिति है, उसमें विजय सरकार का टिके रहना उनके “राजनीतिक दुश्मन” एम. के. स्टालिन की इच्छा पर निर्भर करता है.
तो फिर डीएमके अपने सहयोगियों के जरिए विजय को समर्थन क्यों दे रही है? क्योंकि वह राष्ट्रपति शासन लागू होने की संभावना को रोकना चाहती थी और एक विधायक वाली बीजेपी को परोक्ष रूप से तमिलनाडु पर शासन करने का मौका नहीं देना चाहती थी.
तो फिर अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम (एआईएडीएमके) के साथ समझौता क्यों नहीं किया गया? दरअसल, फिल्म सरकार में भी सत्ता पक्ष और विपक्ष विजय के किरदार के खिलाफ साथ आए थे, लेकिन अंत में विजय ही भारी पड़े थे. असल ज़िंदगी में डीएमके और एआईएडीएमके, जो पिछले पांच दशकों से कट्टर प्रतिद्वंद्वी हैं, अगर विजय को सत्ता से दूर रखने के लिए साथ आते, तो इससे उनकी छवि खराब होती. पार्टी कार्यकर्ता और आम लोग इसे सिर्फ स्वार्थी गठबंधन मानते.
वैसे भी, एडप्पादी के. पलानीस्वामी को नया राजनीतिक जीवन क्यों दिया जाए, जबकि हालिया चुनावी हार के बाद एआईएडीएमके पर उनकी पकड़ कमजोर पड़ने वाली है? अब सिर्फ समय की बात है कि एआईएडीएमके अंदर से टूटने लगे. एम. के. स्टालिन उम्मीद कर सकते हैं कि वह एआईएडीएमके को धीरे-धीरे कमजोर कर देंगे.
और जब ईपीएस कमजोर पड़ेंगे और (एआईएडीएमके) , जयजलिलता की लोकप्रियता के बिना संघर्ष करती दिखेगी, तब स्टालिन यह भी सोच सकते हैं कि वह उस पार्टी को फिर अपने से विलय कर लें, जो कभी डीएमके से अलग होकर बनी थी.
कहा जाता है कि एआईएडीएमके विजय को समर्थन देने के लिए तैयार थी, लेकिन विजय ने उसके प्रस्तावों में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई. फिलहाल ऐसा लगता है कि सारे मजबूत पत्ते स्टालिन के हाथ में हैं.
DMK अपना खेल कैसे खेल सकती है
एम. के. स्टालिन को कोई जल्दबाज़ी नहीं है. अगर विजय को सरकार बनाने से रोका जाता, तो इसका उल्टा असर पड़ सकता था. दोबारा चुनाव होने पर विजय बड़ी बहुमत के साथ लौट सकते थे. जैसा कि डीएमके प्रमुख ने नतीजों के बाद एक इंटरव्यू में कहा था, वह छह महीने तक विजय को परेशान नहीं करेंगे. अपने सहयोगी दलों से विजय को बहुमत दिलवाकर स्टालिन खुद को ऐसा नेता दिखा रहे हैं जिसने जनता के फैसले का सम्मान किया है. वह शायद विजय को असफल होते देखना ज्यादा पसंद करेंगे.
टीवीके ने बहुत बड़े-बड़े वादे किए हैं—लगभग हर वर्ग को नकद मदद और मुफ्त योजनाएं, महिलाओं की सुरक्षा को लेकर बड़े दावे, ईमानदार प्रशासन को अपनी विचारधारा बताना आदि, लेकिन यह कहना जितना आसान है, करना उतना नहीं, खासकर ऐसे व्यक्ति के लिए जो राजनीति और शासन में नया हो, लेकिन जनता असल ज़िंदगी में भी फिल्म सरकार वाले विजय से वैसी ही उम्मीद करेगी.
नतीजों के बाद पहले तीन-चार दिनों तक विजय ऐसे दिखे जैसे अचानक मुश्किल में फंस गए हों. राज्यपाल से पहली मुलाकात के बाद, जहां उनसे बहुमत साबित करने के लिए समर्थन पत्र लाने को कहा गया—उन्हें समझ जाना चाहिए था कि उनका “वैचारिक दुश्मन” बीजेपी उनकी राजनीतिक क्षमता की परीक्षा लेने के लिए तैयार बैठा है.
उन्होंने संभावित सहयोगियों से खुद जाकर मिलने की कोशिश भी नहीं की. उन्होंने टीवीके नेताओं से व्हाट्सऐप मैसेज के जरिए बात करवायी. आखिर एक “सुपरहीरो” किसी से मदद या समर्थन कैसे मांग सकता था?
इस बीच विजय दो बार राज्यपाल से मिलने गए, शायद उम्मीद कर रहे थे कि राज्यपाल अपना रुख बदल देंगे. शनिवार को भी, ज़रूरी संख्या जुटाने के बाद विजय चौथी बार राजभवन पहुंचे, लेकिन उन्हें बताया गया कि मुलाकात की पुष्टि अभी नहीं हुई है. आखिरकार मुलाकात हुई, लेकिन यह तमिलनाडु के इस सुपरस्टार के लिए हकीकत से सामना जैसा रहा होगा.
उनके कम से कम एक-चौथाई विधायक दूसरे दलों से आए हैं, जिन्होंने विजय की लोकप्रियता का फायदा उठाकर टीवीके से टिकट लिया और चुनाव जीता. अगर हालात मुश्किल हुए तो क्या विजय उनके समर्थन पर भरोसा कर पाएंगे?
उदाहरण के लिए, उनके करीबी सहयोगी आधव अर्जुना पहले डीएमके और विदुथलाई चिरुथैगल काची में रह चुके हैं. रविवार को उन्हें मंत्री पद की शपथ दिलाई गई. वह “लॉटरी किंग” सैंटियागो मार्टिन के दामाद हैं, जो डीएमके के सबसे बड़े डोनर्स में रहे हैं. अर्जुना की सास लीमा रोज़ मार्टिन एआईएडीएमके विधायक हैं. शपथ लेने वाले कई दूसरे नेताओं की जड़ें भी अन्य पार्टियों में रही हैं. विजय अपने ज्यादातर विधायकों को ठीक से पहचानते तक नहीं हैं. चुनाव में फैन क्लब काम आ गए, लेकिन वे एक मजबूत राजनीतिक संगठन की जगह नहीं ले सकते.
एम. के. स्टालिन शायद विजय के हर कदम पर नज़र रखे हुए हैं. उन्हें जल्दी करने की ज़रूरत नहीं है. वह सिर्फ अगले छह महीनों में फिल्म स्टार को शासन चलाने में लड़खड़ाते देखना चाहेंगे—शायद थोड़ा कम समय, शायद थोड़ा ज्यादा. अगर मतदाता दो बड़े द्रविड़ दलों के करीब छह दशक लंबे शासन से थक चुके थे, तो स्टालिन चाहेंगे कि लोग समझें कि अभिनेता से नेता बने विजय कोई असली विकल्प नहीं हैं.
जब स्टालिन को भरोसा हो जाएगा कि बदलाव चाहने वाले लोगों तक यह संदेश पहुंच गया है, तब वह विजय सरकार को समर्थन दे रहे अपने सहयोगी दलों से समर्थन वापस लेने को कह सकते हैं. इस बीच वह एआईएडीएमके में क्या होता है, यह भी देखना चाहेंगे. दोबारा चुनाव कब कराना है, इसका फैसला डीएमके ही करेगी.
लेकिन स्टालिन को इस संभावना का भी ध्यान रखना होगा कि यह “सुपरहीरो” पारंपरिक नेताओं को चौंका दे—ठीक वैसे ही जैसे उसने सरकार में किया था.
विजय के विकल्प—एक रास्ता केजरीवाल वाला भी
अगर सी. जोसेफ विजय 13 मई को विधानसभा में बहुमत साबित कर देते हैं, तो उन्हें खुद को साबित करने के लिए कम से कम छह महीने का समय मिल जाएगा. क्या वह डीएमके या एआईएडीएमके से और विधायक लाकर अपना बहुमत मजबूत कर सकते हैं?
डीएमके के पास विधानसभा में 59 और एआईएडीएमके के पास 47 विधायक हैं. दल-बदल कानून के तहत अयोग्यता से बचने के लिए इन पार्टियों के दो-तिहाई विधायकों के विजय के साथ आने की उम्मीद करना आसान नहीं होगा.
बीजेपी ने कई राज्यों में रास्ता दिखाया है—दूसरी पार्टी के कुछ विधायकों से इस्तीफा दिलवाओ और फिर उन्हें दोबारा चुनाव जितवाओ, लेकिन टीवीके, बीजेपी नहीं है और विजय की टीम में ऐसा कोई नहीं है जो दूर-दूर तक अमित शाह जैसा हो.
टीवीके के पास इतने संसाधन भी नहीं हैं कि संभावित दलबदलुओं को अयोग्यता का जोखिम उठाने के लिए तैयार कर सके. हालांकि, अगर एआईएडीएमके में ईपीएस के लिए हालात खराब होने लगे, तो विजय को उनसे समर्थन मिलने की उम्मीद हो सकती है.
पहले से ही संकेत मिलने लगे थे कि एडप्पादी के. पलानीस्वामी पर उनकी पार्टी के कुछ नेता विजय सरकार को समर्थन देने का दबाव बना रहे हैं. रविवार को एआईएडीएमके के दो वरिष्ठ नेताओं सी. वी. शनमुगम और एस. पी. वेलुमणि ने पार्टी विधायकों के साथ बैठक की, ताकि सरकार को समर्थन देने के विकल्प पर चर्चा की जा सके. दूसरी तरफ ईपीएस ने पार्टी के जिला सचिवों के साथ अलग बैठक की.
एआईएडीएमके खेमे में हो रही इन गतिविधियों से विजय को कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन अगर उन्हें डीएमके के सहयोगियों और एआईएडीएमके के सहारे सरकार चलानी पड़ी, तो खुद को द्रविड़ राजनीति के दो बड़े दलों के “तीसरे विकल्प” के रूप में पेश करने का उनका पूरा नारा कमजोर पड़ जाएगा.
हालात तब बदल सकते हैं अगर विजय अगले छह महीनों में शासन चलाते हुए कोई बड़ा चौंकाने वाला कदम उठा दें—ऐसा कुछ, जिससे उनके राजनीतिक विरोधियों को उन्हें गिराने और फिर चुनाव का सामना करने के फैसले पर दोबारा सोचना पड़े. फिलहाल यह संभावना काफी दूर की लगती है.
एक और रास्ता वह हो सकता है जो अरविंद केजरीवाल ने 2014 में दिल्ली में अपनाया था—कम समय (49 दिन) तक सरकार चलाने के बाद इस्तीफा दे देना और यह कहना कि मुख्यधारा की पार्टियां उन्हें काम नहीं करने दे रही हैं. उस समय कांग्रेस और बीजेपी द्वारा केजरीवाल सरकार के जन लोकपाल बिल का विरोध इसका बहाना बना था.
विजय भी जनता से साफ बहुमत मांग सकते हैं, ताकि वह लोगों की उम्मीदों पर खरे उतर सकें, लेकिन टीवीके, AAP नहीं है और विजय, अरविंद केजरीवाल नहीं हैं. तमिलनाडु की राजनीति भी दिल्ली जैसी नहीं है.
फिलहाल तो हालात नए तमिलनाडु मुख्यमंत्री के खिलाफ जाते दिख रहे हैं. अब सिर्फ यही देखा जा सकता है कि क्या विजय बिना टोपी पहने भी उसमें से कोई “खरगोश” निकाल पाते हैं.
डीके सिंह दिप्रिंट के पॉलिटिकल एडिटर हैं. उनका एक्स हैंडल @dksingh73 है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
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