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Saturday, 29 August, 2026
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तृणमूल नेताओं के बढ़ते असर से बंगाल BJP को 2029 में हो सकता है नुकसान

अगर BJP भ्रष्टाचार पर काबू पाने और बंगाल में उद्योगों को वापस लाने के अपने मुख्य चुनावी वादे को पूरा करने में सफल हो जाती है, तो इससे पार्टी को पूरे भारत के सामने पेश करने और तारीफ़ पाने के लिए एक 'बंगाल मॉडल' बनाने में मदद मिल सकती है.

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गुजरात ने 2014 में नरेंद्र मोदी और बीजेपी को भारत में जीत हासिल करने में मदद की थी. हर दो साल में होने वाले वाइब्रेंट गुजरात ग्लोबल समिट का सफल तरीके से प्रचार किया गया था. इसका इस्तेमाल मोदी के मुख्यमंत्री रहते हुए गुजरात सरकार को कारोबार के लिए बेहतर और तेजी से काम करने वाली सरकार के तौर पर दिखाने के लिए किया गया. इसके मुकाबले केंद्र में मनमोहन सिंह की सरकार को कथित भ्रष्टाचार और नीतिगत फैसले लेने में असमर्थ सरकार के तौर पर पेश किया गया.

12 साल बाद, जब मोदी पद पर ऐतिहासिक चौथी बार कार्यकाल की तैयारी कर रहे हैं, अगर बंगाल के उभरते मॉडल को उसी तरह देश के बाकी हिस्सों में सफलतापूर्वक पेश किया जाए, जैसे कभी गुजरात मॉडल को किया गया था, तो इससे 2029 में पार्टी को काफी फायदा हो सकता है.

लेकिन पश्चिम बंगाल में बीजेपी का ‘तृणमूलकरण’ पार्टी के लिए मददगार नहीं है. राज्य में पहली बार इतिहास में बीजेपी को सत्ता में लाने के लिए उत्साह से वोट देने वाले मतदाता अब सवाल पूछने लगे हैं: क्या जमीन पर वास्तव में कुछ बदला है?

ऐतिहासिक जनादेश, शुरुआत में ही निराशा?

2011 में ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में सत्ता हासिल की थी. उनका नारा था ‘पोरिबोर्तन (बदलाव)’. उन्होंने CPI(M) के नेतृत्व वाली लेफ्ट फ्रंट सरकार के 34 साल के शासन को खत्म कर दिया था. बनर्जी ने वादा किया था कि वह लेफ्ट के पार्टी-राज्य मॉडल के साथ-साथ राजनीतिक हिंसा और उद्योग लगाने के लिए जबरन जमीन अधिग्रहण को खत्म करेंगी. लेफ्ट फ्रंट सरकार ने सिंगूर और नंदीग्राम में ऐसा करने की कोशिश की थी.

हालांकि, मई 2026 में सत्ता से हटने तक उन्होंने न सिर्फ लेफ्ट फ्रंट सरकार की कुछ गलतियों को दोहराया, बल्कि अपनी कुछ गलतियां भी जोड़ दीं. उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं पर एक बड़ा आरोप सरकारी कल्याण योजनाओं से ‘कट मनी’ यानी अवैध कमीशन लेने, कारोबारियों, ट्रांसपोर्टरों और दुकानदारों से ‘तोलाबाजी’ यानी जबरन वसूली करने और जमीन पर कब्जा करने का था.

बीजेपी के लिए, जो कभी पश्चिम बंगाल में सत्ता में नहीं रही थी, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस को सत्ता से हटाना एक ऐतिहासिक मौका था. यह सिर्फ पिछली सरकारों की गलतियों को ठीक करने का मौका नहीं था, बल्कि पहली हिंदू राइट सरकार के तौर पर अपनी पहचान बनाने का भी मौका था.

इसके बजाय, राज्य में बीजेपी के विरोधियों के साथ-साथ पार्टी को वोट देकर सत्ता में लाने वाले कुछ लोगों में भी निराशा की बातें सुनाई देने लगी हैं. 6 अगस्त की द टेलीग्राफ की एक नई रिपोर्ट में कहा गया कि “बंगाल में 15 साल पुरानी तृणमूल कांग्रेस सरकार को गिराने वाले तीन कारण”—जबरन वसूली, मनमानी और जमीन पर कब्जा—बीजेपी की “भ्रष्टाचार के खिलाफ घोषित जीरो टॉलरेंस नीति” के बावजूद वापस लौट रहे हैं.

बीजेपी के सूत्रों ने द टेलीग्राफ को बताया कि पार्टी के वरिष्ठ राज्य नेतृत्व के पास पहले ही दर्जनों शिकायतें पहुंच चुकी हैं. इनमें “कलकत्ता और आसपास के इलाकों और कई जिलों के कुछ विधायकों समेत कुछ नेताओं पर पूर्व तृणमूल सरकार की सिंडिकेट संस्कृति को दोहराने” का आरोप लगाया गया है.

रिपोर्ट में आगे कहा गया कि मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने कट मनी, सिंडिकेट के जरिए जबरन वसूली और अवैध टोल वसूली से जुड़ी शिकायतों के लिए तीन टोल-फ्री हेल्पलाइन शुरू की हैं और लोगों से ऐसे अपराधों की शिकायत करने को कहा है.

तीन वरिष्ठ IPS अधिकारियों को एंटी-करप्शन ब्रांच में ट्रांसफर किया गया है. एक सूत्र ने अखबार को बताया कि बंगाल सरकार अपने नेताओं और अधिकारियों, दोनों की गतिविधियों पर 24 घंटे नजर रखेगी. रिपोर्ट के मुताबिक, पार्टी ने जबरन वसूली और भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर करीब 50 बीजेपी नेताओं को पहले ही निकाल दिया है और 100 से ज्यादा अन्य नेताओं को उनके पदों से हटा दिया है. इनमें पूर्व तृणमूल नेताओं के साथ मिलकर काम करने के आरोप भी शामिल हैं.

यह सिर्फ एक अखबार की रिपोर्ट नहीं है, जिसने नई बंगाल सरकार की भ्रष्टाचार और जबरन वसूली की राजनीतिक संस्कृति को खत्म करने में असमर्थता सामने रखी है. 20 अगस्त को स्क्रॉल के पॉलिटिकल एडिटर शोएब दानियाल ने ट्वीट किया: “बंगाल बीजेपी ने शायद चुनाव जीतने के बाद सबसे छोटे हनीमून पीरियड में से एक देखा है. कुछ ही हफ्तों में सोशल मीडिया पर गुस्सा शुरू हो गया और अब ABP आनंदा भी बीजेपी पर ‘सिर्फ 100 दिनों में तृणमूल से भी बदतर बनने’ को लेकर हमला कर रहा है.”

पार्टी के समर्थक और अंदर के लोग भी इस बात को लेकर चिंतित हैं कि बंगाल में बीजेपी को लेकर लोगों की धारणा कितनी तेजी से बदल गई है. कलकत्ता हाई कोर्ट के वरिष्ठ वकील और RSS स्वयंसेवक जॉयदीप सेन ने द प्रिंट से कहा कि बंगाल का ऐतिहासिक जनादेश सिर्फ बीजेपी के लिए नहीं था, बल्कि तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ भी था.

“बीजेपी को अपने कैडर के बीच TMC की समस्या की जरा सी भी नकल को लेकर बहुत सावधान रहना होगा. हालांकि नई सरकार में भ्रष्टाचार को लेकर कुछ रिपोर्ट और सोशल मीडिया पोस्ट बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए हैं, लेकिन वे पूरी तरह झूठे नहीं हैं. सरकार को भ्रष्टाचार और जबरन वसूली के मुद्दों पर तुरंत ध्यान देना चाहिए,” सेन ने कहा.

लोगों की नजर में स्थिति और खराब इसलिए हुई है क्योंकि चुनाव के बाद बीजेपी तृणमूल कांग्रेस के प्रति नरम हो गई है. फ्रंटलाइन की एक रिपोर्ट में कहा गया कि लोगों को इस बात से नाराजगी हुई है कि “राजनीतिक फायदे के लिए कई बड़े तृणमूल नेताओं को NDA में जिस तेजी से शामिल किया गया है.”

“राज्य स्तर पर बीजेपी सरकार को उन तृणमूल विधायकों के साथ अच्छे संबंध रखने वाली सरकार के तौर पर देखा जा रहा है, जिन्होंने रिताब्रत बनर्जी के नेतृत्व में पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से अलग होकर विधानसभा में मुख्य विपक्ष होने का दावा किया था,” रिपोर्ट में कहा गया.

उभरते बंगाल का वादा

बंगाल में अपनी छवि को संभालने में असफल रहना अगले लोकसभा चुनाव में बीजेपी के लिए अच्छा संकेत नहीं हो सकता. इसके उलट, अगर बीजेपी भ्रष्टाचार पर काबू पाने और बंगाल में उद्योगों को वापस लाने का अपना प्रमुख चुनावी वादा पूरा करने में सफल रहती है, तो इससे पार्टी को पूरे भारत के सामने एक बंगाल मॉडल पेश करने और उसकी तारीफ करवाने में मदद मिल सकती है.

अर्थशास्त्री और आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सान्याल ने कहा है कि “विकसित भारत” के लिए “विकसित बंगाल” जरूरी है. सान्याल ने कहा है, “अगर आपको विकसित भारत बनाना है, तो विकसित पूर्वी भारत और विकसित बंगाल की जरूरत है. विकसित कोलकाता भी इसके लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि पूर्वी भारत में एक बड़े शहरी केंद्र को तेजी से आगे बढ़ाना और शहरी केंद्रों का तेज विकास वाला नेटवर्क बनाना जरूरी है.”

दिल्ली के चित्तरंजन भवन में एक बातचीत के दौरान पश्चिम बंगाल के वित्त मंत्री स्वपन दासगुप्ता ने कहा कि राज्य ने करीब पांच दशक “स्थायी निराशा के माहौल” में बिताए हैं. लोगों में यह भावना बढ़ती गई कि भारत की आर्थिक विकास की कहानी में अब राज्य की कोई खास भूमिका नहीं रही.

दासगुप्ता ने कहा कि चुनौती सिर्फ पूंजी आकर्षित करने की नहीं है, बल्कि बंगाली उद्यमियों की सोच बदलने और स्थानीय कारोबारों को छोटे और मध्यम स्तर के कारोबार से “बड़ी लीग” में जाने में सक्षम बनाने की भी है.

अगर नई राज्य सरकार इस चुनौती को पूरा कर पाती है, तो उभरता हुआ बंगाल 2029 के लिए बीजेपी का बड़ा दांव बन सकता है.

दीप हल्दर एक लेखक और दिप्रिंट में कॉन्ट्रिब्यूटिंग एडिटर हैं. वे @deepscribble पर ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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