बांग्लादेश की राजनीति, नागरिक समाज और शिक्षा जगत पर लंबे समय से पड़ रहा इस्लामवाद का असर अब बांग्लादेश की सेना तक भी पहुंच गया है. पिछले महीने बांग्लादेश मिलिट्री अकादमी में एक कार्यक्रम के दौरान सेना प्रमुख जनरल वकार-उज-जमान ने सैन्य जीवन में धार्मिक मूल्यों और नैतिक सिद्धांतों का पालन करने के महत्व पर जोर दिया.
बांग्लादेश सेना ने एक नई यूनिट भी बनाई है, जिसकी चार कंपनियों के नाम इस्लाम के पहले चार खलीफाओं उमर, अबू बक्र, अली और उस्मान के नाम पर रखे हैं. खुद को धर्मनिरपेक्ष और राजनीति से दूर मानने वाली सेना के लिए यह बदलाव देश और विदेश, दोनों जगह लोगों का ध्यान खींच रहा है. हालांकि सेना का यह धार्मिक रुख कोई नया घटनाक्रम नहीं है.
साल 1973 में ही क्यूबा के पूर्व राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो ने ऐसी स्थिति की भविष्यवाणी की थी और शेख मुजीबुर रहमान को इसके बारे में चेतावनी भी दी थी.
पहले धर्म?
पिछले साल 16 अगस्त को जन्माष्टमी के मौके पर जनरल वकार-उज-जमान ने बांग्लादेश की धर्मनिरपेक्ष नींव को दोहराया था. उन्होंने कहा था कि बांग्लादेश के लोग भगवान कृष्ण के आदर्शों का पालन करेंगे और आपसी सद्भाव से रहेंगे. उस समय देश में सांप्रदायिक तनाव था और मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार सत्ता में थी.
वकार ने तब कहा था, “यह देश सभी का है. धर्म, जाति या समुदाय के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होगा. आप बिना डर के इस देश में रहेंगे. हम हमेशा आपके साथ खड़े रहेंगे.”
उन्होंने बांग्लादेश की धर्मनिरपेक्ष पहचान की रक्षा करने का भी वादा किया था. उन्होंने कहा था, “हिंदू, मुस्लिम, बौद्ध, ईसाई, पहाड़ी और बंगाली, हम सभी सदियों से शांति से साथ रहते आए हैं. आपको हमसे जिस भी तरह की मदद चाहिए होगी, इंशाअल्लाह, हम देंगे.”
लेकिन इस साल 18 जून को बांग्लादेश मिलिट्री अकादमी में 90वें लॉन्ग कोर्स के कैडेट्स की पासिंग आउट परेड के दौरान उनका रुख बदला हुआ दिखा. इस बार उन्होंने सैन्य जीवन में धार्मिक मूल्यों और नैतिक सिद्धांतों का पालन करने के महत्व पर जोर दिया.
जनरल वकार के इस बदले रुख पर बांग्लादेश के बाहर भी ध्यान गया. पाकिस्तानी पत्रकार और सुरक्षा मामलों के जानकार अली के. चिश्ती ने एक्स पर लिखा, “बांग्लादेश सेना प्रमुख जनरल वकार-उज-जमान में दिलचस्प बदलाव आया है. पहले वह क्लीन शेव रहते थे, अब उन्होंने पूरी दाढ़ी रख ली है. पिछले दो भाषणों में उन्होंने सेना से इस्लामी मूल्यों को अपनाने की अपील की है.”
ऐसा लगता है कि यह बदलाव सिर्फ सेना प्रमुख तक सीमित नहीं है. सेना ने पहली बार अपनी चार इन्फैंट्री कंपनियों के नाम इस्लाम के पहले चार खलीफाओं के नाम पर रखे हैं.
एक रिपोर्ट के मुताबिक, “अब तक बांग्लादेश सेना की यूनिटों के नाम आमतौर पर भौगोलिक, संख्या या प्रशासनिक आधार पर रखे जाते थे. ऐसे में धार्मिक नाम रखना एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है. इस बटालियन का गठन 18 जून को बांग्लादेश मिलिट्री अकादमी भाटियारी में सेना प्रमुख जनरल वकार-उज-जमान ने किया. यह उनके हज यात्रा से लौटने के तुरंत बाद हुआ.”
भारतीय सुरक्षा बलों को बांग्लादेश सेना में बढ़ते कट्टरपंथ को लेकर सतर्क रहने की सलाह देते हुए भारतीय सेना के पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल एम.के. दास ने ऑर्गेनाइज़र में लिखे एक लेख में कहा कि इसका संबंध बांग्लादेश और पाकिस्तान की सेनाओं के बीच फिर से बढ़ते रिश्तों से है. दास ने कहा कि बांग्लादेश सेना की इन नई बटालियनों का युद्ध नारा “जय बांग्ला” से बदलकर “अल्लाहु अकबर” कर दिया गया है.
जनरल दास ने कहा, “पहले भी बांग्लादेश सेना में कट्टरपंथ और इस्लामी प्रभाव बढ़ने की खबरें आती रही हैं. शेख हसीना सरकार के दौरान ऐसे प्रयास सीमित थे. लेकिन अगस्त 2024 में उनके सत्ता से हटने के बाद बांग्लादेश सेना ने इस्लामी परंपराओं और इसी तरह की भर्ती की सोच को अपनाने में ज्यादा रुचि दिखाई है.”
उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI का बांग्लादेश में जमात-ए-इस्लामी के जरिए हमेशा गहरा प्रभाव रहा है, जो अब देश की मुख्य विपक्षी पार्टी है.
और पाकिस्तान से आए इसी इस्लामी प्रभाव को लेकर क्यूबा के पूर्व राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो ने 1973 में बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान को चेतावनी दी थी.
कास्त्रो की चेतावनी
सितंबर 1973 में अल्जीरिया के अल्जीयर्स में हुए गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) शिखर सम्मेलन के दौरान हुई एक ऐतिहासिक मुलाकात में फिदेल कास्त्रो ने शेख मुजीब की जमकर तारीफ की थी. उन्होंने कहा था कि उन्होंने हिमालय नहीं देखा, लेकिन “शेख मुजीब को देखा है.” लेकिन इस जोशीले क्रांतिकारी नेता ने बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान को एक गंभीर चेतावनी भी दी थी. उन्होंने कहा था कि अगर वह अपने राजनीतिक विरोधियों के प्रति ज्यादा उदारता दिखाएंगे, तो इसे नैतिकता नहीं बल्कि उनकी कमजोरी माना जाएगा.
वरिष्ठ पत्रकार और बांग्लादेश मामलों के जानकार मानश घोष ने अपनी किताब ‘Mujib’s Blunders: The Power and the Plot Behind His Killing’ में इस मुलाकात का ज़िक्र किया है. उन्होंने लिखा कि कास्त्रो वह खतरा देख रहे थे, जो मुजीब नहीं देख पाए. मुजीब का मानना था कि पाकिस्तान से लौटे लोगों को सरकार के अहम पद देने से उनका नज़रिया बदल जाएगा, लेकिन कास्त्रो ने उन्हें चेतावनी दी थी कि इससे भविष्य में बड़ा खतरा पैदा होगा.
मानश घोष ने कास्त्रो के हवाले से लिखा, “आप अपने देश को जवाबी क्रांति (काउंटर-रिवोल्यूशन) की ओर धकेल रहे हैं. जब मैंने क्यूबा में बतिस्ता को सत्ता से हटाया था, तब मैंने उसके भरोसेमंद लोगों को भी हटा दिया था और उनकी जगह अपने लोगों को रखा था.”
घोष ने लिखा कि मुजीब ने पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी के पूर्व प्रमुख को अपना विजिलेंस कमिश्नर तक बना दिया. इसका नतीजा यह हुआ कि वह मुजीब की जासूसी कर सका और अहम जानकारियां अपने पुराने पाकिस्तानी अधिकारियों तक पहुंचाता रहा.
मुजीब की इसी गलती की वजह से बांग्लादेश के प्रशासन और सेना में पाकिस्तान समर्थक और इस्लामी सोच वाले लोग फिर से मजबूत हुए. आखिरकार यही घटनाएं 15 अगस्त 1975 को उनकी हत्या की वजह बनीं.
कई दशक बाद, 19 जनवरी 2012 को बीबीसी ने खबर दी कि बांग्लादेश सेना ने इस्लामी सोच रखने वाले कुछ सैन्य अधिकारियों की तख्तापलट की साजिश को नाकाम कर दिया था. उनका मकसद उस समय की प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार को हटाना था.
बीबीसी के मुताबिक, ब्रिगेडियर जनरल रज्जाक ने कहा था, “कट्टरपंथी अधिकारियों का एक समूह लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार को हटाने की कोशिश कर रहा था. उनकी कोशिश नाकाम कर दी गई.” रज्जाक ने कहा था कि उन्हें पक्की जानकारी मिली है कि सेना में काम कर रहे कुछ अधिकारी दिसंबर में हुई इस साजिश में शामिल थे. इस समूह में करीब 16 कट्टर इस्लामी सोच वाले सैन्य अधिकारी थे, जिनमें कम से कम दो रिटायर्ड अधिकारी भी शामिल थे.
उस नाकाम सैन्य तख्तापलट की कोशिश के 14 साल बाद, जब शेख हसीना बांग्लादेश लौटने की तैयारी कर रही हैं, उसी समय बांग्लादेश सेना फिर से धार्मिक रुख अपनाती दिख रही है. साथ ही वह पाकिस्तान के साथ भी अपने रिश्ते मजबूत करने की कोशिश कर रही है.
दीप हलदर एक लेखक और दिप्रिंट में कंट्रीब्यूटिंग एडिटर हैं. उनका एक्स हैंडल @deepscribble है. यह लेख लेखक के निजी विचार हैं.
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