अब तक Aichi-Nagoya Asian Games 2026 में भारत का प्रदर्शन ठीक-ठाक रहा है. भारत ने कुल 38 मेडल जीते हैं: चार गोल्ड, 16 सिल्वर और 18 ब्रॉन्ज. भारत ने एक बार फिर साबित किया है कि हमारे अंदर अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी तैयार करने की क्षमता है. हमारे खिलाड़ियों ने कम चर्चित खेलों में भी अच्छा प्रदर्शन किया और लोगों को प्रभावित किया है. इससे भारतीय खिलाड़ियों के लिए खेलों में नए रास्ते खुले हैं.
जय मीना ने पुरुषों की सॉफ्टबॉल में ब्रॉन्ज मेडल जीता. इस खेल में यह भारत का अब तक का पहला मेडल है. सुचिका तारियाल ने भी अंडर-50 किलो वर्ग में मिक्स्ड मार्शल आर्ट्स में भारत के लिए ब्रॉन्ज मेडल जीता. चूंकि MMA ने Aichi-Nagoya में पहली बार एशियन गेम्स में जगह बनाई है, इसलिए यह भी इस खेल में भारत का पहला मेडल है.
जापान में भारत के लिए कुछ और महत्वपूर्ण उपलब्धियां भी हुईं. मीराबाई चानू ने एशियन गेम्स में पहली बार पोडियम पर जगह बनाई. 32 साल की इस वेटलिफ्टर ने 49 किलो वर्ग में सिल्वर मेडल जीता. शूटिंग स्टार इलावेनिल वलारिवन ने 10 मीटर एयर राइफल वर्ग में सिल्वर जीता और निश्चित तौर पर महिला क्रिकेट में गोल्ड मेडल एक बहुत खास उपलब्धि है. टैकबॉल के सेमीफाइनल में क्विम्सी डी’सूजा की शानदार कोशिश ने भी खेलों की दुनिया में भारत की मजबूत स्थिति को और पक्का किया.
भारत धीरे-धीरे दौड़ को भी एक खेल के तौर पर अपना रहा है. मुझे अक्सर मैराथन की शुरुआत कराने के लिए बुलाया जाता है. हालांकि, मैं खुद एक मैराथन पूरी नहीं कर पाई हूं, फिर भी मुझे इसमें काफी दिलचस्पी है और मैं अक्सर मैराथन में दौड़ने वाले खिलाड़ियों का उत्साह बढ़ाती हूं. इसलिए यह हैरानी की बात नहीं है कि सावन बरवाल के मैराथन में सिल्वर मेडल के साथ भारत 44 साल बाद फिर पोडियम पर पहुंचा. भारत में मैराथन दौड़ना लोकप्रिय हो रहा है. मुझे उम्मीद है कि जल्द ही अंतरराष्ट्रीय मैराथन प्रतियोगिताओं में भारत के लिए और भी बहुत सारे मेडल देखने को मिलेंगे.
जब मैंने इन विजेताओं को उनकी शानदार उपलब्धियों के लिए बधाई दी, तो एक बार फिर मैं ट्रोल करने वालों के निशाने पर आ गई. हमेशा की तरह ये लोग अपने घरों में आराम से बैठकर मेहनती खिलाड़ियों की उपलब्धियों को कम बताने में लगे थे. ये खिलाड़ी किसी खेल में पहले क्वालिफाई करने और फिर पोडियम तक पहुंचने के लिए लगातार मेहनत करते रहे. यह किसी भी तरह छोटी उपलब्धि नहीं है, लेकिन जिस देश की मेडल सूची बढ़ रही हो, उसे अपने खिलाड़ियों को साफ और बिना किसी शर्त के समर्थन देना चाहिए.
एक ट्रोल ने सवाल किया कि बीजेपी सरकार ने, जिसका मुझे भी एक हिस्सा माना जाता है, देश में खेलों की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए क्या किया है. इसी सवाल ने मुझे आलोचकों को जवाब देने के लिए मजबूर किया.
2014 से खेलों को देखने के तरीके में काफी बड़ा बदलाव आया है. अब खेलों को सिर्फ बड़े स्तर की प्रतियोगिता के तौर पर नहीं, बल्कि आम लोगों की भागीदारी वाले क्षेत्र के तौर पर भी देखा जा रहा है.
खेलों को बड़े शहरों से बाहर ले जाना
खेलो इंडिया की शुरुआत शायद मोदी सरकार की ओर से किया गया खेलों के क्षेत्र में सबसे बड़ा ढांचागत बदलाव है. इसे मौजूदा रूप में 2017 में शुरू किया गया था. इस कार्यक्रम ने ज़मीनी स्तर पर खेलों के बुनियादी ढांचे और प्रतिभाओं की पहचान के लिए पूरे देश में एक व्यवस्था तैयार की है. 17 साल और उससे कम उम्र के खिलाड़ियों की पहचान प्रतियोगिताओं के जरिए की जाती है और खेलो इंडिया केंद्रों के माध्यम से उन्हें आगे बढ़ाया जाता है. सितंबर 2026 तक यह योजना अपने तीसरे और बड़े बदले हुए चरण में पहुंच गई है, जो खेलो भारत नीति 2025 के मुताबिक तैयार किया गया है. केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 2026-27 से 2030-31 के पांच साल के चरण के लिए अब तक का सबसे बड़ा बजट भी मंजूर किया है. इसके तहत कुल 36,441 करोड़ रुपये का वित्तीय प्रावधान किया गया है.
सरकार ने खेल सुविधाओं को संभालने के तरीके में भी बड़ा बदलाव किया है. नई खेलो इंडिया ट्रेनिंग सुविधाओं के तहत सरकारी, राज्य और निजी संस्थाओं को एक साथ लाया गया है. खेलो इंडिया के तहत इन केंद्रों में खेल, स्पोर्ट्स साइंस और तकनीक को आधुनिक बनाने पर खास ध्यान दिया जा रहा है. देशभर में खेलों के नए बुनियादी ढांचे से जुड़े करीब 349 प्रोजेक्ट मंजूर किए गए हैं. इनमें कुल 3,176 करोड़ रुपये का निवेश किया जा रहा है. इन 349 प्रोजेक्ट में से 274 पूरी तरह तैयार हो चुके हैं, 58 पर अभी काम चल रहा है और 17 में योजनाओं को अंतिम रूप दिया जा रहा है. जिलों में 1,067 खेलो इंडिया केंद्र शुरू किए जा चुके हैं. इन केंद्रों का मकसद शुरुआती स्तर पर ही युवाओं की खेल प्रतिभा की पहचान करना है. खेलों के बुनियादी ढांचे, खेल तकनीक और खिलाड़ियों की सुविधाओं को पांच साल में आधुनिक बनाने के लिए 10,568 करोड़ रुपये दिए गए हैं.
खेल सुविधाओं को अलग-अलग जगहों तक पहुंचाना भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार की ओर से जमीनी स्तर पर खेलों को बढ़ावा देने की एक कोशिश है. दिल्ली, बेंगलुरु, हैदराबाद जैसे बड़े शहरों में ही खेल सुविधाओं और कोचिंग संस्थानों को सीमित रखने के बजाय सरकार जिला स्तर पर खेलो इंडिया केंद्र बना रही है. इनमें अक्सर पहले से मौजूद खेल सुविधाओं का इस्तेमाल किया जा रहा है और पूर्व खिलाड़ियों को कोच बनाया जा रहा है.
इसका मकसद छोटे शहर या कस्बे में मौजूद किसी प्रतिभाशाली बच्चे की पहचान करना और उसके घर के पास ही कोच, मैदान और प्रतियोगिताओं तक पहुंच का रास्ता उपलब्ध कराना है.
हाल ही में 47 साल की रमाबाई रामवीर का साड़ी पहनकर नंगे पैर दौड़ते हुए वीडियो वायरल हुआ था. 1.3 अरब लोगों के देश में रमाबाई रामवीर जैसी सैकड़ों महिलाएं होंगी, जिन्हें प्रतियोगी स्तर पर खेलने के लिए सही ट्रेनिंग और खेल सुविधाएं मिलने से फायदा हो सकता है.
टैलेंट हंटिंग
युवा मामले और खेल मंत्रालय की प्रमुख योजना टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम (TOPS) बेहतरीन खिलाड़ियों पर किया जाने वाला एक गंभीर निवेश है. यह योजना 2014 से पहले भी मौजूद थी, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में इसका काफी विस्तार किया गया है. इसके तहत उन चुने हुए बेहतरीन खिलाड़ियों को आर्थिक मदद दी जाती है, जिनके पास ओलंपिक स्तर पर खेलने का मौका है. इसके साथ ही उन्हें अंतरराष्ट्रीय ट्रेनिंग, विदेश में अनुभव, खेल का सामान, विशेषज्ञ कोच, खेल विज्ञान से जुड़ी सुविधाएं और प्रतियोगिताओं का खर्च भी दिया जाता है.
इस योजना से फायदा पाने वाले प्रमुख खिलाड़ियों में भाला फेंक के स्टार नीरज चोपड़ा, शूटिंग स्टार मनु भाकर, बैडमिंटन खिलाड़ी पीवी सिंधु और मीराबाई चानू शामिल हैं. इस मदद की वजह से खिलाड़ियों ने पिछले कुछ वर्षों में ओलंपिक खेलों के साथ-साथ चल रहे एशियन गेम्स में भी शानदार प्रदर्शन किया है और मेडल जीते हैं. केंद्रीय मंत्री मनसुख मांडविया ने जुलाई 2026 में लोकसभा को बताया था कि आने वाले लॉस एंजिल्स समर ओलंपिक की तैयारी के लिए सरकार की TOPS योजना के तहत 369 बेहतरीन खिलाड़ियों को मदद दी जा रही है.
प्रतिभाओं के बड़े दायरे के अलावा, खेलों में स्पोर्ट्स मेडिसिन, फिजियोथेरेपी, चोट से उबरने, प्रदर्शन का विश्लेषण और खेल मनोविज्ञान के लिए भी ज्यादा फंड और निवेश किया गया है. इससे खेलों के ऐसे क्षेत्रों पर भी ध्यान दिया जा रहा है, जिन्हें अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता था.
इसका हाल का उदाहरण NS NIS पटियाला का इंटीग्रेटेड स्पोर्ट्स साइंस सेंटर और कंडीशनिंग हॉल है. इसे 2026 में 38 करोड़ रुपये के खिलाड़ी सहायता निवेश के तहत शुरू किया गया. मैंने खेलों से जुड़े पेशों की ओर बढ़ता रुझान भी देखा है. स्पोर्ट्स इंजरी विशेषज्ञ, स्पोर्ट्स मैनेजर और स्पोर्ट्स साइकोलॉजिस्ट जैसे पेशे आज काफी लोकप्रिय हैं और इनके जरिए कमाई के मौके भी बढ़ रहे हैं. मेरे अपने क्षेत्र में भी कई युवा वकील स्पोर्ट्स लॉ में विशेषज्ञता हासिल कर रहे हैं. यह एक ऐसा क्षेत्र है, जिसमें कई अलग-अलग विषय जुड़े हुए हैं और जो अभी विकसित हो रहा है.
स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया के हाई परफॉर्मेंस सेंटर भी अब खिलाड़ियों के हृदय और रक्त वाहिकाओं से जुड़े स्वास्थ्य, सहनशक्ति, गति और शरीर की गतिविधियों को समझने के लिए AI और आधुनिक डेटा विश्लेषण पर निर्भर करना शुरू कर रहे हैं.
नेशनल सेंटर ऑफ स्पोर्ट्स साइंसेज एंड रिसर्च जिला स्तर के स्पोर्ट्स साइंस सेंटरों का अपना नेटवर्क बढ़ा रहा है. इसका मकसद बेहतरीन खिलाड़ियों और जमीनी स्तर से आगे बढ़कर मेडल की दौड़ में पहुंचने वाले खिलाड़ियों को शरीर से जुड़े आंकड़ों की निगरानी, चोट से उबरने की प्रक्रियाएं और चोट से बचाव की सुविधाएं देना है.
राष्ट्रीय महत्व का जन आंदोलन
2019 में सरकार ने फिट इंडिया मूवमेंट शुरू किया. इसका मकसद लोगों की सोच को इस बात से बदलना था कि “खेल सिर्फ पेशेवर खिलाड़ी खेलते हैं” से लेकर “शारीरिक गतिविधि और फिटनेस आम भारतीयों को भी अपनानी चाहिए” तक लाया जाए.
प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में फिट इंडिया एक राष्ट्रीय आंदोलन बना. इसमें स्कूलों, कार्यस्थलों, फिटनेस अभियानों और सामुदायिक गतिविधियों को शामिल किया गया. सांसद के तौर पर मैंने नई दिल्ली के अपने पूरे संसदीय क्षेत्र में कई खुले जिम बनवाने के लिए फंड दिया. इनमें मेरा पसंदीदा चाणक्यपुरी के नेहरू पार्क में बना खुला व्यायाम क्षेत्र है. 2019 में मेरी टीम ने फिट इंडिया स्पोर्ट्स कार्निवल आयोजित किया था. इसमें पूरे संसदीय क्षेत्र के लोगों ने हिस्सा लिया और कई तरह के खेल शामिल थे.
इस सरकार ने पिछली सरकारों से अलग जो काम किया है, वह यह है कि कबड्डी, खो-खो, योग, मल्लखंब और दूसरे पारंपरिक भारतीय खेलों को ज्यादा आधिकारिक पहचान दी गई है. हमने देखा है कि 2026 एशियन गेम्स में पुरुष और महिला दोनों कबड्डी टीमों ने देश के लिए उपलब्धियां और मेडल हासिल किए हैं.
“यह मत पूछो कि आपका देश आपके लिए क्या कर सकता है, यह पूछो कि आप अपने देश के लिए क्या कर सकते हैं.” अमेरिका के राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी के ये मशहूर शब्द मेरे दिल के बहुत करीब हैं. अगर हम 2028 के लॉस एंजिल्स ओलंपिक में भारत को पोडियम पर देखना चाहते हैं, तो यह काम सिर्फ हमारे खिलाड़ियों और सरकार पर नहीं छोड़ा जा सकता. नागरिक होने के नाते हमारी भी एक भूमिका है.
प्रतियोगिताएं देखें, अपने खिलाड़ियों का समर्थन करें. स्थानीय मैचों और प्रतियोगिताओं के टिकट खरीदें. अपनी टीमों का उत्साह बढ़ाएं. सबसे जरूरी बात, अपने बच्चों को सोफे से उठाकर खेल के मैदान और खेलों की पोशाक तक लेकर जाएं.
क्रिकेट हमेशा हमारे लिए खास रहेगा, लेकिन हमें एथलेटिक्स, शूटिंग, कुश्ती, बॉक्सिंग, बैडमिंटन, हॉकी, तैराकी, जिम्नास्टिक्स और हर उस खेल का जश्न मनाना और समर्थन करना सीखना होगा, जिसमें कोई भारतीय खिलाड़ी मुकाबला करने की कोशिश कर रहा है.
हमारे देश में हिमालय है. इसलिए स्कीइंग जैसे विंटर ओलंपिक खेल को अपनाया जा सकता है. इसी तरह ल्यूज भी एक ऐसा खेल है, जिसमें मनाली के रहने वाले शिवा केशवन के प्रयासों की वजह से भारत का प्रतिनिधित्व हुआ है.
जब भी हम किसी खेल को देखते हैं, उसमें हिस्सा लेते हैं, खिलाड़ियों का हौसला बढ़ाते हैं और उनका समर्थन करते हैं, तो हम उस खेल के लिए मांग, अवसर और खेल की संस्कृति बनाने में मदद करते हैं. अगर हम 2028 के लॉस एंजिल्स ओलंपिक में पोडियम पर ज्यादा भारतीय खिलाड़ियों को देखना चाहते हैं, तो इसकी शुरुआत हमें ऐसा देश बनने से करनी होगी जो सिर्फ क्रिकेट न देखे, बल्कि हर खेल को देखे, खेले और अपने खिलाड़ियों का समर्थन करे.
हमारे खिलाड़ी दिखा रहे हैं कि भारत की खेलों से जुड़ी महत्वाकांक्षाएं सिर्फ एक या दो खेलों तक सीमित नहीं रह सकतीं. हर मेडल के पीछे कई वर्षों की मेहनत, त्याग और दृढ़ संकल्प होता है. खेलों में हर नई सफलता किसी दूसरे युवा भारतीय को रैकेट उठाने, ट्रैक पर उतरने, स्विमिंग पूल में जाने या मैदान में कदम रखने के लिए प्रेरित करती है.
आइए, इन प्रतिभाओं को देखें, उनका हौसला बढ़ाएं, उनका समर्थन करें और उन्हें आगे बढ़ने का मौका दें. क्योंकि एक खेल प्रेमी देश सिर्फ सरकार से नहीं बनता, बल्कि उसके खिलाड़ी और नागरिक मिलकर इसे बनाते हैं, जो अपने खिलाड़ियों की क्षमता पर भरोसा करते हैं.
मीनाक्षी लेखी बीजेपी लीडर, वकील और सोशल एक्टिविस्ट हैं. उनका एक्स हैंडल @M_Lekhi है. विचार व्यक्तिगत हैं.
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