हाल में तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना के सांसदों के अपनी पार्टियां छोड़ने को लेकर जो चर्चा हो रही है, वह एकतरफा लगती है—जैसे कि ये सांसद अपने आप ही कोई गलत काम कर रहे हों, लेकिन दूसरी तरफ से भी देखना ज़रूरी है: आखिर एक सांसद को, जो बाकी नागरिकों की तरह ही है, स्वतंत्र रूप से सोचने और अपनी पसंद का अधिकार क्यों नहीं होना चाहिए?
और भी इसलिए, क्योंकि मूल संविधान में उसे यह आज़ादी पूरी तरह मिली हुई थी. पश्चिमी देशों के सांसदों को आज भी यह स्वतंत्रता प्राप्त है. कोई सवाल नहीं उठाया जाता. इसलिए अब यह देखने का समय है कि 1985 में 52वें संविधान संशोधन के जरिए भारतीय सांसदों से यह आज़ादी छीन लेने के क्या परिणाम हुए.
इस संशोधन ने संसद की गरिमा से ऊपर राजनीतिक दलों, बल्कि उनके नेताओं के हितों को रख दिया, जबकि भारत के संविधान निर्माताओं ने संविधान में राजनीतिक दलों का उल्लेख तक नहीं किया था. वे सांसद की पार्टी सदस्यता को उसकी व्यक्तिगत पसंद और समझ का विषय मानते थे. संसद सबसे ऊपर थी, बाकी सब उसके बाद. इतने महत्वपूर्ण मुद्दे को हल्के-फुल्के और फौरी तर्कों से नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता.
ब्रिटिश भारत में भी 1920 से चुने हुए प्रतिनिधियों को किसी भी विधायी या प्रशासनिक निकाय में अपनी पार्टी में रहने या उसे छोड़ने की पूरी आज़ादी थी. यह अधिकार छह दशक से अधिक समय तक बिना किसी रुकावट के बना रहा. वजह साफ थी—चुने हुए प्रतिनिधि जनता के प्रतिनिधि होते हैं, किसी पार्टी के नहीं.
इसी कारण किसी भी पश्चिमी लोकतंत्र में दलबदल विरोधी कानून नहीं है. यह लोकतंत्र के एक मूल मूल्य—स्वतंत्रता के अनुरूप है. किसी पार्टी से जुड़ना व्यक्ति की सोच और काम करने की आज़ादी से जुड़ा विषय है. इसलिए यूरोप और अमेरिका के सांसदों को अपनी पार्टी छोड़ने या बदलने का पूरा अधिकार है.
यही अधिकार भारत के मूल संविधान में भी था, जिसे 1985 में खत्म कर दिया गया. इससे राजनीतिक व्यवस्था में कई तरह की विकृतियां पैदा हुईं. यह एक अच्छे कानून से ज्यादा एक राजनीतिक चाल साबित हुआ. इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि आज विधायिका और कार्यपालिका के शीर्ष पदों पर बैठे लोग ही दलबदल करवाने में मदद करते दिखाई देते हैं.
दूसरी ओर, अगर कोई मुख्यमंत्री लगातार गलत फैसले ले रहा हो, तब भी उसकी पार्टी का विधायक चुप रहता है या पार्टी नहीं छोड़ता, क्योंकि उसे अपना पद खोने का डर होता है. इस तरह व्यवहार में वह जनता का नहीं, सिर्फ पार्टी का प्रतिनिधि बनकर रह जाता है. यह संविधान की भावना के खिलाफ है और लोकतंत्र की आत्मा के भी विरुद्ध है. विडंबना यह है कि जिन्हें “जनप्रतिनिधि” कहा जाता है, वे अपनी बात तक खुलकर नहीं कह सकते, जनता की बात कहना तो और भी दूर की बात है.
इस तरह दलबदल विरोधी कानून ने विधायकों और सांसदों को अपनी पार्टी का मात्र कार्यकर्ता बना दिया है. इससे कई समस्याएं पैदा हुई हैं. उदाहरण के लिए अगर किसी सत्तारूढ़ दल का सर्वोच्च नेता वर्षों तक नाटकीय, निष्प्रभावी या यहां तक कि नुकसानदायक कदम उठाता रहे, तो 1985 से पहले सांसदों के पास उसे रोकने या अपनी असहमति जताने की स्वतंत्रता थी. तब वह नेता बार-बार ऐसा करने से पहले सोचता.
लेकिन अब सांसदों की राय लगभग महत्वहीन हो गई है. पार्टी प्रमुख जो भी करे, उसके सांसद कुछ नहीं कर सकते, सिवाय चुपचाप तमाशा देखने के. नतीजा यह हुआ है कि स्वतंत्र चर्चा, आलोचना और देश के लिए सही रास्ता खोजने का जो मंच संसद हुआ करती थी, वह धीरे-धीरे बंजर बनती जा रही है.
यह तर्क कि “किसी सांसद को पार्टी का टिकट मिला था, इसलिए उसे पार्टी छोड़ने का अधिकार नहीं है”, मूल रूप से गलत है. पहला कारण यह है कि संविधान निर्माताओं को पार्टी टिकट की व्यवस्था की पूरी जानकारी थी. फिर भी उन्होंने जो संविधान और चुनाव प्रणाली बनाई, उसमें व्यक्ति को पार्टी से ऊपर रखा गया.
दूसरी बात, संसद एक संवैधानिक और सर्वोच्च संस्था है, जबकि राजनीतिक पार्टी एक स्वैच्छिक संगठन है और समाज के अनेक संगठनों में से सिर्फ एक है. अगर कोई पार्टी खुद को भंग भी कर दे, तब भी उसके सांसद अपनी सीट नहीं खोते. सांसद की सदस्यता पार्टी के अस्तित्व से स्वतंत्र होती है और उसका दर्जा भी उससे ऊंचा होता है. इसलिए उसे पार्टी सदस्यता के अधीन नहीं माना जा सकता.
कोई उम्मीदवार बिना किसी पार्टी टिकट के भी चुनाव लड़कर सांसद बन सकता है. इसलिए टिकट सहायक चीज़ है, जबकि उम्मीदवार मुख्य है. पार्टी टिकट को ही सबसे महत्वपूर्ण मान लेना और सांसद के व्यक्तित्व को गौण समझना गलत है.
गौर करने वाली बात है कि भारतीय संविधान ने जिम्मेदारी व्यक्तियों पर डाली थी—जैसे सांसद, स्पीकर, मंत्री आदि. यानी जवाबदेही का आधार व्यक्ति था. किसी पार्टी और उसके सांसदों के बीच का संबंध विधायिका के दायरे से बाहर था.
52वें संविधान संशोधन ने इस मुद्दे पर संविधान की मूल सोच को धुंधला कर दिया, लेकिन वास्तविकता आज भी वही है—संसद की सदस्यता कहीं अधिक महत्वपूर्ण है और पार्टी सदस्यता उससे कहीं कम महत्व की चीज़ है. इसलिए लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों और दुनिया के बड़े लोकतंत्रों की सर्वोत्तम परंपराओं को देखते हुए, केवल पार्टी छोड़ने के कारण किसी सांसद की सदस्यता खत्म कर देना हर दृष्टि से गलत है. यह उसे एक तरह से पार्टी के पिंजरे में बंद कर देता है, जबकि संसद स्वतंत्र विचार-विमर्श का सर्वोच्च मंच है.
इसी कारण यूरोप और अमेरिका में ऐसा कोई कानून नहीं है. भारतीय संविधान की भावना भी यही थी. उसमें राजनीतिक दलों को सामान्य स्वैच्छिक संगठन माना गया था. लेकिन इस कानून के बाद राजनीतिक दलों ने पूरी संसदीय प्रक्रिया पर नियंत्रण स्थापित कर लिया. यह संविधान और लोकतंत्र, दोनों के साथ विश्वासघात है.
इसके अलावा, दलबदल विरोधी कानून सिद्धांतहीन भी है क्योंकि सांसद अगर समूह में पार्टी छोड़ें तो यह स्वीकार्य है, लेकिन अकेले छोड़ें तो दंडनीय है. यह ऐसा है मानो अकेले धोखाधड़ी करना अपराध हो, लेकिन गिरोह बनाकर करना वैध हो.
ध्यान दीजिए, आधुनिक कानून व्यक्ति को जिम्मेदार मानता है. अगर दलबदल वास्तव में गलत होता, तो सामूहिक रूप से किया गया दलबदल भी गलत ही माना जाता. लेकिन चूंकि पार्टी छोड़ना अपने आप में कोई गलत काम नहीं है, इसलिए यह कानून मूल रूप से सिद्धांतहीन है.
यह स्पष्ट रहना चाहिए कि नेताओं की परेशानी दूर करना संसद या कार्यपालिका का कर्तव्य नहीं है. अपने पार्टी सदस्यों को संतुष्ट रखना पार्टी नेता की जिम्मेदारी है. केवल उसकी सुविधा के लिए सांसद की सदस्यता को उसके नियंत्रण में कर देना, अप्रत्यक्ष रूप से संसद का अपमान है.
किसी व्यक्ति और राजनीतिक पार्टी के बीच का संबंध उनका निजी मामला है. संसद का उससे कोई लेना-देना नहीं होना चाहिए. यही बात यूरोप और अमेरिका में भी दिखाई देती है. वहां सांसद अपनी पार्टी में उसकी प्रतिष्ठा और विचारों के कारण बने रहते हैं, किसी दबाव की वजह से नहीं. वहां पार्टी छोड़ना या बदलना हर सांसद का अधिकार है. इस अधिकार के होने से सांसद बार-बार पार्टी नहीं बदलते. उल्टा, वहां की पार्टी व्यवस्था अधिक स्थिर और जिम्मेदार है.
इसलिए असली सवाल यह है कि 1985 के बाद सांसदों की स्वतंत्रता सीमित करने से कितना नुकसान हुआ है. विधायिका और कार्यपालिका के बीच का अंतर धुंधला पड़ गया है. कभी लोकसभा अध्यक्ष (स्पीकर) को जो सम्मान और स्वतंत्रता प्राप्त थी, वह लगभग समाप्त हो गई है. आज स्पीकर अपने दल के सर्वोच्च नेता के सहयोगी भर बनकर रह गए हैं.
पश्चिमी लोकतंत्रों में, जहां सांसदों पर ऐसी पाबंदियां नहीं हैं, पार्टी नेता अधिक सावधानी से काम करते हैं. तुलना करके यह साफ देखा जा सकता है. वहां के पार्टी प्रमुख नाटकीयता, डींग मारने या अजीबोगरीब घोषणाओं में नहीं पड़ते. वे मनमाने फैसले भी नहीं लेते.
भारत में दलबदल विरोधी कानून पार्टी नेताओं की सुविधा के लिए बनाया गया था. तब से सत्तारूढ़ दलों के नेता अपने सांसदों और विधायकों को गुलाम की तरह और दूसरे दलों के विधायकों को शिकार की तरह देखने लगे हैं.
पहले पार्टी प्रमुख अपने सांसदों के साथ अधिक सम्मानजनक व्यवहार करते थे. उनके संबंध सहयोग और बराबरी पर आधारित होते थे, न कि मालिक और नौकर जैसी मानसिकता पर. पार्टी की प्रतिष्ठा उसके सांसदों से जुड़ी होती थी और सांसदों की प्रतिष्ठा पार्टी नेता से.
दलबदल विरोधी कानून ने इस बराबरी की भावना को खत्म कर दिया और पार्टी नेताओं को बहुत ज्यादा शक्ति दे दी. इसने कई खराब प्रवृत्तियों को बढ़ावा दिया. असहमति की आवाज दबाकर यह चालाक पार्टी नेताओं की तानाशाही और मनमानी को बढ़ाने का साधन बन गया. इसने सांसदों की गरिमा को कम किया और उन पर्दे के पीछे काम करने वाले राजनीतिक प्रबंधकों का महत्व बढ़ा दिया, जो दिखाई तो नहीं देते लेकिन पूरी संसदीय प्रक्रिया को अपने नियंत्रण में रखते हैं. वे सरकारें बनाते और गिराते हैं, लेकिन खुद किसी के प्रति जवाबदेह नहीं होते.
यह सब देखकर सत्तारूढ़ दलों के कई विचारशील सांसद अक्सर असहाय नजर आते हैं. उन्हें पता होता है कि उनके हाथ में कुछ भी नहीं है—यहां तक कि अपनी बात कहने की आजादी भी नहीं.
जिस देश के जन-प्रतिनिधि ऐसे बेबस हों, वह देश दुर्भाग्यशाली ही कहा जाएगा.
(लेखक हिंदी के कॉलमनिस्ट और पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर हैं. व्यक्त विचार निजी हैं.)
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