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Tuesday, 23 June, 2026
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प्रियांक खड़गे RSS की पारदर्शिता को लेकर सही हैं, यही सवाल राजनीतिक दलों से भी पूछे जाने चाहिए

ज़रा सोचिए कि राजनीतिक पार्टियां चुनावों में कितना पैसा खर्च करती हैं. क्या संवैधानिक संस्थाओं को भी यह जानने की ज़रूरत नहीं है कि यह पैसा कहां से आता है.

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कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खड़गे ने 13 जून 2026 को आर.एस.एस. (संघ) प्रमुख मोहन भागवत को एक खुला पत्र लिखा. संघ की विविध गतिविधियों का भारी-भरकम आंकड़ा देकर सवाल उठाया कि इतने बड़े पैमाने पर, नियमित रूप से सार्वजनिक गतिविधियां कोई प्राइवेट या अनौपचारिक काम नहीं कही जा सकता. चूंकि संघ राजकीय जानकारी में कहीं रजिस्टर्ड नहीं है, आखिरकार उस की वैधानिक स्थिति, वित्तीय पारदर्शिता, टैक्स जबावदेही, तथा कानूनों के पालन से संबंधित प्रश्न उठते हैं.

इस तरह, खड़गे ने संघ से उस के आय, व्यय, नैतिक जिम्मेदारी, आदि स्थाई रूप से अंधेरे में रहने पर सवाल उठाया है. उन की बातें ध्यान देने योग्य हैं. उन के ही शब्दों में, संघ की:

“विशालता, प्रभाव और पहुंच के कारण संघ को पारदर्शिता, जवाबदेही और संवैधानिक अनुपालन के सर्वोच्च मानकों पर खरा उतरना चाहिए… लोकतंत्र में कोई भी संगठन चाहे वह कितना ही पुराना, बड़ा या प्रभावशाली क्यों न हो, हिसाब किए जाने से बाहर नहीं हो सकता.

इस संदर्भ में यह उचित व आवश्यक है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ निम्न सूचनाएं सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराए: चंदे, योगदान और आय के स्रोत; खर्च और संपत्ति का ब्योरा; और क्या कानून के मुताबिक लागू टैक्स चुकाए गए हैं.

एक ऐसा संगठन, जो राष्ट्रवाद, अनुशासन और कर्तव्य का नियमित आह्वान करता रहता है, उसे स्वयं पारदर्शिता, कानून और संविधान के प्रति सम्मान के रूप में उन मूल्यों को अपने व्यवहार में दिखाना चाहिए…. सामान्य भारतीयों से उन नियमों के पालन करने की अपेक्षा करते हुए संघ अपने को उन्हीं मानकों से मुक्त नहीं रख सकता. अगर श्रमिकों, छोटे संगठनों, धार्मिक संस्थाओं, गैर-सरकारी संगठनों, न्यासों, कंपनियों और नागरिकों से रजिस्ट्रेशन कराने, बुनियादी सूचनाएं देने, आय-व्यय का ऑडिट कराने, तथा नियमानुसार टैक्स जमा करने की अनिवार्यता है, तो संघ को भी देश के कानूनों का पालन कर उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए.”

राजनीतिक पार्टियों का क्या?

उक्त सभी सवाल खड़गे ने सही उठाए हैं, जिनका उत्तर मिलना चाहिए. पर रोचक यह है कि ये अधिकांश सवाल राजनीतिक दलों पर भी लागू होते हैं. एक ओर मामूली दुकानदार से भी सारी आमदनी का हिसाब लेने की दृढ़ता है. तब उसी व्यवस्था में राजनीतिक दलों को अदृश्य देशी-विदेशी धन लेते रहने की ऐसी छूट कैसे है जिस का कभी, कहीं हिसाब नहीं देना हो? यह बड़ा गंभीर सवाल है.

जॉर्ज ऑर्वेल की भाषा में कहें तो भारत में कानून के समक्ष सभी बराबर हैं, पर राजनीतिक दल और संघ ज्यादा बराबर हैं. जब किसी साधारण व्यक्ति के बैंक खाते में भी बड़ी रकम आने पर यहां निगरानी है. तब कैसा मजाक कि राजनीतिक दलों द्वारा करोड़ों अरबों रूपयों के लेन-देन की कोई हिसाबदारी न हो.

स्थानीय से ऊपर तक के चुनावों में एक-एक सीट पर कई पार्टियां जो खर्चा करती हैं, उस से एक ही चुनाव में सैकड़ों करोड़ रूपये लगाती हैं. स्वयं देश की वित्त मंत्री ने कहा है कि चुनाव में उम्मीदवार जो खर्च करते हैं ‘वैसा पैसा उन के पास नहीं’ है.‌ यानी, वे जानती हैं कि ‘कैसा पैसा’ उसमें लग रहा है. तब जो राजनीतिक दल सैकड़ों, दर्जनों सीटों पर और नियमित चुनाव लड़ते रहते हैं—उस धन का पैमाना कितना विशाल है. वह कहां से आया, यह संवैधानिक संस्थाओं को भी जानने की जरूरत नहीं है.

हैरत है कि हमारे सत्ताधारी यही मानते हैं. वह भी खुल कर. सुप्रीम कोर्ट में 11 अप्रैल 2019 को केंद्र की ओर से आधिकारिक रूप से कहा, “लोगों को जानने की जरूरत नहीं कि राजनीतिक दलों को कहां से चंदा मिल रहा है.” आगे कहा गया, “समय की सच्चाई को देखते हुए विचार करना चाहिए.” “पारदर्शिता को कोई मंत्र नहीं बनाना चाहिए.” यह तीनों भारत सरकार की कार्यपालिका की ऑफिशियल दलील है.

बेहिसाब भ्रष्टाचार का रास्ता

सरकार की इन तीनों बातों का क्या अर्थ है. यही कि राजनीतिक दलों को अपनी वित्तीय व्यवस्था अंधेरे में रखने की छूट होनी चाहिए. वे गोपनीय, बेहिसाब लेन-देन‌ करके देश-विदेश के अज्ञात लोगों, एजेंसियों आदि के लिए भी कुछ करते रहें, तो इस से लोगों को क्या मतलब. क्या ऐसी छूट के परिणाम समझने के लिए रॉकेट साइंटिस्ट होने की जरूरत है?

इस पर आपत्ति भी हुई है, स्वयं भारत के चुनाव आयोग द्वारा. उस ने 25 मार्च 2019 को सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर कहा था कि यहां राजनीतिक दलों को मिलने वाले देशी-विदेशी चंदे में पारदर्शिता घटी है. उस ने यह भी कहा था कि 2018 में वित्तीय कानून में किए बदलावों के कारण विदेशी कंपनियों द्वारा भारतीय राजनीति प्रभावित हो सकती है. यह कितना बड़ा संकेत है, जरा सोचिए. चुनाव आयोग ने चालू चुनावी बॉन्ड व्यवस्था को भी त्रुटिपूर्ण बताया था. क्योंकि दलों को वैसे चंदे का विवरण न देने की छूट दे दी गई है. फलत: यह जानना असंभव है कि उन्होंने जन-प्रतिनिधित्व कानून के अनुच्छेद 29-B का उल्लंघन किया या नहीं.

यह सब चुनाव आयोग ने कोर्ट से पहले कानून मंत्रालय को भी बताया था. आयोग ने 2016 के वित्तीय कानून में लाए बदलाव को भी अनुचित माना, जिस से उन विदेशी कंपनियों द्वारा यहां राजनीतिक दलों को चंदा देने का रास्ता खोला गया, जो भारतीय कंपनियों में बड़ी साझेदारी रखती हैं. आयोग के अनुसार, इस से यहां राजनीतिक दलों को अबाध विदेशी धन लेने की अनुमति मिल गई है.

यदि इन सब के बाद भी किसी को हिसाब नहीं देना है. तब यह व्यवस्थित रूप से राजनीतिक दलों को अंतहीन भ्रष्टाचार का रास्ता, समेत एकाधिकार देने जैसा है. वे किसी भी तरह की वित्तीय पारदर्शिता से मुक्त लगते हैं.

CIA से KGB तक

यह कोई आकस्मिक रूप से नहीं हुआ है. स्वतंत्रता के तुरंत बाद ही यह प्रवृत्ति बढ़ने लगी. भारतीय संसद में 1956 में ही चर्चा हुई थी कि एक राजनीतिक पार्टी को तब एक महत्वपूर्ण देश से अवैध धन मिल रहा था. सत्ताधारियों को मालूम था, पर वे निष्क्रिय रहे. फलत: रोग बढ़ता गया है. 1970 के दशक में ही देश के बड़े नेताओं को सूटकेस में करेंसी नोट भर-भर पहुंचने का जिक्र इंदर मल्होत्रा और राज थापर जैसे बड़े पत्रकारों ने किया है.

बल्कि भारत में अमेरिकी राजदूत रहे डैनियल पैट्रिक मोइनिहन की पुस्तक ‘ए डैंजरस प्लेस’ (1978) में सआईए द्वारा बड़े भारतीय नेताओं में एक को पैसे देने की बात लिखी मिलती है. मजा यह कि यह बात खुद मोइनिहन द्वारा ही जांच करवाने पर सामने आई, जब सीआईए पर यहां विरोधी दलों को पैसे देने का आरोप लग रहा था. 1990 में सोवियत संघ से समाचार छपे कि वहां की सत्ता दुनिया में कई राजनीतिक दलों को नियमित रूप से सालाना धन देती थी. उस में एक भारतीय दल का नाम भी था. तब यहां जांच की बात उठी तो उस दल के महासचिव ने बयान दिया कि ‘सभी दलों की आय की जांच हो, तभी हमारी भी’. सो, फिर कुछ नहीं हुआ.

यहां के राजनीतिक दलों को गोपनीय विदेशी धन के चलन की पुष्टि “मित्रोखिन आर्काइव्स: दि केजीबी एंड दि वर्ल्ड” (2005) से भी हुई. एक पूर्व रूसी केजीबी अधिकारी की लिखी यह दस्तावेजी किताब भारत के मुंह पर तमाचे जैसी थी. इस में भारतीय राजनीतिक तंत्र में के.जी.बी. की गहरी पैठ पर दो अध्याय (पृ. 312-40) हैं. उन विवरणों के अनुसार यहाँ अनेक राजनीतिक दलों के लोग उस की सेवा में थे.

नोट करें कि हमारे सत्ताधारियों ने कभी कोई जांच नहीं कराई. न किसी दल ने उसकी मांग की. क्यों? इसी का उत्तर वह आधिकारिक दलील है, जो 11 अप्रैल 2019 में सुप्रीम कोर्ट में दी गई थी कि ‘लोगों को यह जानने की क्या जरूरत है कि दलों को पैसा कहाँ से मिल रहा है’

तब क्या आश्चर्य कि कई दल ऐसी गतिविधियों में लिप्त रहे हैं, जिस कारण वे दूसरों की भी गतिविधियों पर चुप ही रहते हैं. या फिर दिखावटी, हल्की आवाज उठाते हैं. सभी राजनीतिक दल इस बुनियादी गड़बड़ी पर चुप हैं. क्या वे सभी एक मौन सहमति रखते हैं कि अपनी विशेषाधिकारी व्यवस्था चलाते रहना है? चाहे किसी भी दल की सत्ता हो.

भारत को क्या करना चाहिए

सभी बातें साफ कर देती हैं कि यहां राजनीतिक दल किसी वित्तीय जबावदेही, आय पर टैक्स, और पारदर्शिता: तीनों से मुक्त हैं. यह कैसी व्यवस्था है. प्रायः, छिपाई वही चीज जाती है, जिसे उचित न ठहराया जा सके. चाहे संघ छिपाए, या भाजपा, या कांग्रेस.

आखिर में, जबावदेही, टैक्स, और पारदर्शिता को महत्व देना है तब वास्तव में सब से पहले राजनीतिक दलों को ही यह दिखाना चाहिए. क्यों कि वही देश की संपूर्ण व्यवस्था के ऊपर बैठे हैं. संसद और कार्यपालिका तो सीधे-सीधे राजनीतिक दलों की मुट्ठी में हैं.

यह सब सुधारना संभव है. सबसे पहला, सभी प्रतिष्ठित लोकतंत्रों के श्रेष्ठ चलन का आकलन करके यहां भी पार्टी और राज्य को बिलकुल अलग रखने की पक्की व्यवस्था करनी चाहिए. अभी यहां कम्युनिस्ट व्यवस्थाओं जैसा पार्टी-स्टेट का घालमेल किया हुआ है. दूसरा, राजनीतिक दल भी अन्य संस्थाओं की तरह अपने आय-व्यय के लिए समान रूप से पारदर्शी उत्तरदायी बनाए जाएं. तीसरा, संसद में सदस्यों को सचमुच जनप्रतिनिधि के रूप में स्वविवेक से बोलने, और संसदीय कार्रवाइयों में भाग लेने की स्वतंत्रता सुनिश्चित की जाए. न कि पार्टी अनुशासन के नाम पर उन पर सेंसरशिप हो, जैसा कम्युनिस्ट देशों में था. याद रहे, हमारे संविधान की स्पष्ट भावना संसद सदस्यों को पूरी वैचारिक स्वतंत्रता रहने की थी. संविधान में पार्टी का उल्लेख तक नहीं था.

आज वही पार्टी, राजनीतिक दल, आज सब के ऊपर, सभी उत्तरदायित्व, वित्तीय हिसाब से परे, सांसदों के मालिक जैसे हो गये हैं. नतीजतन: यहां का राज्य-तंत्र किसी पार्टी या उस के मैनेजरों, एक्टिविस्टों का बंधक बनता जा रहा है. इसका परिणाम क्या हो सकता है, यह सोवियत अनुभवों से भी समझ सकते हैं.

आखिरकार, प्रियांक खड़गे के सवाल केवल संघ तक सीमित नहीं रखे जाने चाहिए. हमारे राजनीतिक दलों ने भी ऐसे अनुत्तरदायी अधिकार ले लिये हैं, जो यूरोप अमेरिका में कोई सोच भी नहीं सकता. क्या यह भी विचारणीय नहीं है?

शंकर शरण कॉलमिस्ट और पॉलिटिकल साइंस के प्रोफ़ेसर हैं. वे @hesivh पर ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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