बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने 22 जून को मलेशिया की अपनी पहली विदेश यात्रा की. कुआलालंपुर की यह यात्रा उनके सत्ता संभालने के 100 दिनों से अधिक समय बाद हुई है, जिसे नए बांग्लादेश की विदेश नीति की दिशा तय करने और रणनीति बनाने के लिए पर्याप्त समय माना जा सकता है.
भारत के लिए यह कदम ढाका की उस पुरानी कूटनीतिक परंपरा से अलग माना जा रहा है, जिसमें नए बांग्लादेशी नेताओं की पहली विदेश यात्रा अक्सर नई दिल्ली होती थी. हालांकि, पिछले तीन वर्षों में दोनों देशों के बीच बढ़े तनाव, खासकर पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद, इसे पूरी तरह अप्रत्याशित भी नहीं माना जा रहा.
कई लोग इस यात्रा को ढाका की एक महत्वपूर्ण रणनीतिक चाल के रूप में देख रहे हैं. उनका मानना है कि यह बांग्लादेश की विदेश नीति को भारत-केंद्रित दृष्टिकोण से आगे बढ़ाकर अधिक संतुलित बनाने की घरेलू जनभावना को दर्शाती है और भविष्य के लिए एक नई मिसाल स्थापित करती है. लेकिन क्या यही इस यात्रा का एकमात्र संदेश है, या इसके पीछे कुछ और भी संकेत छिपे हैं?
रहमान की मलेशिया यात्रा पहली नज़र से कहीं अधिक महत्वपूर्ण मानी जा रही है और इसमें चीन का पहलू भी जुड़ा हुआ है. मलेशिया यात्रा उनके दो देशों के दौरे का पहला चरण थी. 24 जून तक रहमान चीन में हैं, जहां वे अपने समकक्ष शि जिनपिंग के निमंत्रण पर गए हैं.
निस्संदेह, एक लंबे समय के मित्र और सबसे करीबी पड़ोसी होने के नाते नई दिल्ली चाहती कि रहमान पहले भारत आते, लेकिन यह फैसला पूरी तरह ढाका का था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फरवरी 2026 में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के ज़रिए से नव-निर्वाचित प्रधानमंत्री को भारत आने का निमंत्रण भेजा था. बिरला रहमान के शपथ ग्रहण समारोह में भी शामिल हुए थे.
हालांकि, भारत के साथ शुरुआती कूटनीतिक संपर्क सकारात्मक दिखने के बावजूद, रहमान यह भी आकलन कर रहे हैं कि भारत न जाकर वे अपने राजनीतिक भविष्य को अधिक सुरक्षित रख सकते हैं और घरेलू विवादों से बच सकते हैं. बांग्लादेश में अब भी कई लोग मानते हैं कि शेख हसीना की दिल्ली में मौजूदगी दोनों देशों के संबंधों में एक बड़ी बाधा है. साथ ही, मलेशिया को पहली विदेश यात्रा के लिए चुनकर रहमान ने मीडिया की अत्यधिक चर्चा से भी बचने की कोशिश की है, लेकिन भारत से पहले चीन की यात्रा को नई दिल्ली में निश्चित रूप से एक रणनीतिक संकेत के रूप में देखा जाएगा.
बांग्लादेश-मलेशिया के बीच आपसी रिश्ते
मलेशिया के पॉलिटिकल मैसेजिंग के दौरे से हटकर, कुआलालंपुर के साथ दोनों देशों के रिश्ते बांग्लादेश के लिए बहुत मायने रखते हैं. खास बात यह है कि मलेशिया उन पहले देशों में से था जिन्होंने 1971 में बांग्लादेश की आज़ादी के तुरंत बाद, 1972 में बांग्लादेश के साथ डिप्लोमैटिक रिश्ते बनाए थे. ज़्यादातर मुस्लिम आबादी वाले एक नए बने देश के तौर पर, मलेशिया ने बांग्लादेश की आज़ादी को जल्दी अपना लिया, जिससे लोगों के बीच आपसी रिश्तों के ज़्यादा मौके खुले और 1976 तक, बांग्लादेशी नौकरी की तलाश में मलेशिया जाने लगे.
आज, लगभग सात मिलियन बांग्लादेशी विदेश में रहने वाले माइग्रेंट वर्कर के लिए, मलेशिया सबसे पसंदीदा जगह है, जहां लगभग दस लाख लोग रहते हैं. मलेशिया में गैर-कानूनी बांग्लादेशी माइग्रेंट वर्कर भी बड़ी संख्या में रहते हैं, जिससे दोनों सरकारों के लिए इसे सुलझाना एक बड़ी चुनौती बन गई है. दौरे के दौरान, रहमान ने होस्ट के साथ बातचीत में लेबर माइग्रेशन को एक अहम मुद्दा बनाया, जो जॉइंट स्टेटमेंट में साफ तौर पर दिखता है.
लेबर माइग्रेशन के अलावा, एजुकेशन, टूरिज्म, पॉलिटिकल कोऑपरेशन, ट्रेड और इन्वेस्टमेंट कोऑपरेशन, हलाल इंडस्ट्री, डिजिटल इकॉनमी, AI के साथ-साथ सेमीकंडक्टर, एनर्जी, डिफेंस और सिक्योरिटी कोऑपरेशन मुख्य थीम थे. शेयर्ड इस्लामिक वैल्यूज़ के एलिमेंट्स भी बहुत साफ तौर पर सामने आए.
रहमान के मलेशिया दौरे का दूसरा मैसेज इमिग्रेंट्स के परिवारों के लिए यह हो सकता है कि वे यह पक्का करें कि सरकार विदेश में उनकी और उनके अपनों की देखभाल करे.
ढाका पहला नहीं जिसने नई दिल्ली से दूरी बनाने की कोशिश की
रहमान अपनी दो देशों की यात्रा के ज़रिए जो राजनीतिक संदेश देना चाहते हैं, खासकर चीन के साथ संबंधों को और मजबूत करने पर जो जोर दिया जा रहा है, वह कोई नई बात नहीं है.
नई दिल्ली में क्षेत्रीय मामलों पर नज़र रखने वाले विशेषज्ञ मानेंगे कि पिछले एक दशक में भारतीय उपमहाद्वीप के कई देशों ने अपनी विदेश नीति की दिशा बदलने की कोशिश की है. उदाहरण के लिए 2008 में नेपाल में लोकतंत्र आने के तुरंत बाद, पहले लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल बीजिंग पहुंचे थे. उन्हें 2008 ओलंपिक खेलों के समापन समारोह में विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था.
हालांकि, प्रचंड की चीन यात्रा को औपचारिक राजकीय यात्रा नहीं माना गया था, फिर भी इसने भारत में चिंता बढ़ा दी थी क्योंकि इसने एक पुरानी कूटनीतिक परंपरा को तोड़ दिया था. गौरतलब है कि पड़ोसी देशों के नए चुने गए या नियुक्त नेताओं की पहली यात्रा नई दिल्ली को क्षेत्रीय स्थिरता और भारत के साथ ऐतिहासिक संबंधों की पुनर्पुष्टि के रूप में देखा जाता रहा है. अब यह स्थिति बदलती नज़र आ रही है.
इसी तरह, 2017 में मालदीव के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन ने अपनी पहली विदेश यात्रा भारत नहीं, बल्कि चीन की की थी. राष्ट्रपति यामीन ने मालदीव की विदेश नीति में “चाइना फर्स्ट” सोच को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. वहीं बीजिंग के लिए यह हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी मजबूत पकड़ बनाने और द्वीपीय देश में रणनीतिक निवेश करने का अवसर था.
यामीन के नक्शेकदम पर चलते हुए मालदीव के मौजूदा राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज़्ज़ू ने भी ऐसी विदेश नीति के संकेत दिए, जिसमें भारत केंद्र में न हो. शुरू से ही मोहम्मद मुइज़्ज़ू भारत से मालदीव में मौजूद भारतीय तकनीकी कर्मचारियों को वापस बुलाने की मांग करते रहे. ये कर्मचारी मालदीव के अनुरोध पर वहां आपातकालीन और बचाव अभियानों के लिए उन्नत हल्के हेलीकॉप्टरों के संचालन में मदद कर रहे थे.
2023 के राष्ट्रपति चुनाव के दौरान मोहम्मद मुइज़्ज़ू के कथित “इंडिया आउट” अभियान पर भी नई दिल्ली की करीबी नज़र थी. सत्ता संभालने के बाद मोहम्मद मुइज़्ज़ू अपनी पहली विदेश यात्रा पर पहले तुर्की और फिर सऊदी अरब गए. इससे यह संकेत मिला कि उनकी प्राथमिकता इस्लामी देशों के साथ संबंध मजबूत करना है.
हालांकि, साझा धार्मिक संबंधों ने भारत को प्राथमिकता देने की पुरानी परंपरा से हटने के लिए एक सहज रास्ता दिया, लेकिन मोहम्मद मुइज़्ज़ू ने चीन की यात्रा को कुछ समय के लिए टालकर तत्काल विवाद से भी बचने की कोशिश की. बांग्लादेश के रहमान ने भी कुछ हद तक यही रणनीति अपनाई है. नेपाल, मालदीव और अब बांग्लादेश जैसे देश क्षेत्रीय शक्तियों—मुख्य रूप से भारत और चीन के बीच संतुलन बनाने के नए प्रयोग कर रहे हैं.
लेकिन नई दिल्ली में क्षेत्रीय मामलों के जानकारों के सामने अब जवाबों से ज्यादा सवाल हैं. सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्षेत्रीय संतुलन आगे किस दिशा में जाएगा और क्या दिल्ली इस बढ़ती दूरी को रोक पाएगी?
एक संभावित जवाब यह है कि पड़ोसी देशों का यह झुकाव आगे और बढ़ सकता है, खासकर तब जब नई पीढ़ी के नेता सत्ता में आ रहे हैं. यह पीढ़ी न तो भारत के साथ पुराने ऐतिहासिक रिश्तों का बोझ महसूस करती है और न ही चीन को स्वाभाविक प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखती है.
नई दिल्ली के लिए ऑप्शन
बहुत समय से, पड़ोसी देशों के बीच ‘छोटे देश’ वाला सिंड्रोम भारत की थ्योरेटिकल पोजीशन और भारतीय सबकॉन्टिनेंट में उसकी चुनौतियों को बताता रहा है और यह यहीं रहने वाला है. हालांकि, नई दिल्ली यह साफ तौर पर समझती है कि पड़ोसी देश जो भी डिप्लोमैटिक एक्सपेरिमेंट कर रहे हैं, उनके प्रति रिएक्शनरी अप्रोच शायद एक काम की स्ट्रैटेजी न हो; ‘सावधान आशावाद’ जैसी स्ट्रैटेजी वैल्यू रखती हैं और पड़ोसी देशों के साथ पार्टनरशिप जारी रखने के लिए एक आगे की सोच वाला अप्रोच दिखाती हैं.
अच्छी खबर यह है कि नई दिल्ली इस बदलाव को पहचानती है और नए पार्टनर्स के साथ जुड़ना चाहती है, भले ही उनका रिस्पॉन्स धीमा हो.
ऋषि गुप्ता ग्लोबल स्ट्रैटेजिक अफेयर्स के एक्सपर्ट हैं. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
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