मानवाधिकारों में जितना महत्त्व राजनीतिक अधिकारों का है, उतना ही आर्थिक अधिकारों का भी है. लेकिन यह अत्यंत खेदजनक है कि अनेक लोकतांत्रिक देशों में राजनीतिक अधिकारों पर तो पर्याप्त ध्यान दिया जाता है, जबकि आर्थिक अधिकारों की उपेक्षा कर दी जाती है. परिणामस्वरूप लोगों के मन में यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि लोकतंत्र केवल राजनीतिक अधिकार दे सकता है, आर्थिक अधिकार नहीं. यह सोच लोकतंत्र के अस्तित्व और उसके विकास—दोनों के लिए घातक है.
विकसित लोकतांत्रिक देशों में नागरिक आज राजनीतिक और आर्थिक—दोनों प्रकार के अधिकारों का लाभ उठाते हैं. लेकिन जिन विकासशील देशों ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनाया है, वहाँ स्थिति बिल्कुल अलग है. वहाँ लोगों को मतदान का अधिकार है, अभिव्यक्ति और प्रेस की स्वतंत्रता भी प्राप्त है, लेकिन उन्हें काम पाने का अधिकार या जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं की गारंटी नहीं है. जब लोगों को रोटी, रोजगार और जीवन की बुनियादी सुविधाएँ ही उपलब्ध न हों, तो स्वाभाविक है कि वे राजनीतिक अधिकारों की अपेक्षा आर्थिक अधिकारों को अधिक महत्त्व देंगे. वे आशा करते हैं कि राजनीतिक अधिकारों के माध्यम से उन्हें आर्थिक सुरक्षा मिलेगी, लेकिन जब यह आशा पूरी नहीं होती, तो लोकतंत्र के प्रति उनका विश्वास भी कमजोर पड़ने लगता है. ऐसी मानसिकता में लोकतंत्र किसी समाज में गहरी जड़ें नहीं जमा सकता.
इसी कारण जून 1975 में भारत में लोकतंत्र को बिना किसी विशेष कठिनाई के कुचल दिया गया. यद्यपि उन्नीस महीने बाद लोकतंत्र की पुनर्स्थापना हो गई, लेकिन जब तक आर्थिक अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए जाते, तब तक लोकतंत्र असुरक्षित और अस्थिर बना रहेगा.
अधिकारों से वंचित समाज
जीवन का अधिकार और जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं का अधिकार मानवाधिकारों में सबसे बुनियादी अधिकार है. इन आवश्यकताओं में भोजन, वस्त्र और आवास शामिल हैं. लेकिन कोई भी समाज यदि आदिम अवस्था में नहीं है, तो इन आवश्यकताओं का दायरा केवल इतना ही नहीं रहता. इसमें पर्याप्त पोषण, स्वास्थ्य सेवाएं और शिक्षा भी शामिल हो जाती हैं. विश्व बैंक के तत्कालीन अध्यक्ष रॉबर्ट मैकनमारा ने अप्रैल 1975 में न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए एक साक्षात्कार में इस मूलभूत मानवाधिकार की अपनी परिभाषा देते हुए कहा था— “मानवाधिकारों में सबसे बुनियादी अधिकारों में वे अधिकार शामिल हैं जो प्रत्येक व्यक्ति को न्यूनतम स्वीकार्य स्तर का पोषण, स्वास्थ्य और शिक्षा उपलब्ध कराएं.” उन्होंने यह भी खेद व्यक्त किया था— “विकासशील देशों में करोड़ों लोग, बिना किसी व्यक्तिगत दोष के, आज भी इन अधिकारों से वंचित हैं.”
भारत भी उन्हीं विकासशील देशों में शामिल है जहां बड़ी आबादी आज भी इन बुनियादी मानवाधिकारों से वंचित है. और विडंबना यह है कि आर्थिक विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति के बावजूद भारत में ऐसे लोगों की संख्या घटने के बजाय बढ़ती ही जा रही है. योजना आयोग के एक अनुमान के अनुसार, वर्ष 1977–78 में ग्रामीण भारत की लगभग 48 प्रतिशत और शहरी भारत की 41 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रही थी. कुछ अन्य आकलन तो इससे भी अधिक गंभीर स्थिति बताते हैं. लेकिन यदि सबसे कम अनुमान को भी सही मान लिया जाए, तब भी लगभग 29 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन बिता रहे थे. यह संख्या किसी भी दृष्टि से भयावह है. आखिर ऐसी व्यवस्था में, जो करोड़ों लोगों को निरंतर घोर गरीबी में जीने के लिए विवश रखती हो, उन लोगों की क्या आस्था हो सकती है?
गरीबी जितनी चिंताजनक है, उससे कम गंभीर समस्या बेरोज़गारी और अल्प-रोज़गार की नहीं है. दुर्भाग्य से देश में बेरोज़गार और अल्प-रोज़गार लोगों का कोई समग्र पंजीकरण तंत्र नहीं है, इसलिए उनके संबंध में निश्चित आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं. उपलब्ध अनुमान राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षणों (National Sample Surveys) से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर तैयार किए जाते हैं. योजना आयोग के अनुसार मार्च 1978 तक देश में बेरोज़गारी का स्तर 2 करोड़ 6 लाख व्यक्ति-वर्ष (20.6 million person-years) तक पहुंच चुका था. आयोग ने स्वयं इसे “अत्यंत भयावह” बताते हुए कहा कि उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर यह संख्या दुनिया के किसी भी अन्य देश की तुलना में अधिक है.
समस्या केवल बेरोज़गारी तक सीमित नहीं है. उससे भी बड़ी चुनौती व्यापक अल्प-रोज़गार (Underemployment) की है. देश में व्याप्त भीषण गरीबी का सबसे बड़ा कारण यही है कि बड़ी संख्या में लोगों के पास या तो काम नहीं है, या इतना काम नहीं है जिससे वे सम्मानजनक जीवन जी सकें. जो लोग इस स्थिति के शिकार हैं, उनके मन में उस सामाजिक व्यवस्था के प्रति सम्मान और विश्वास कैसे पैदा हो सकता है, जो उन्हें अभाव, अपमान और निरर्थक जीवन जीने के लिए छोड़ देती है?
इस पूरी स्थिति का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि बेरोज़गारों की इस विशाल संख्या में शिक्षित युवाओं का भी एक बड़ा वर्ग शामिल है. वे केवल अपनी दुर्दशा को समझते ही नहीं, बल्कि उसके विरुद्ध संगठित होकर संघर्ष करने की क्षमता भी रखते हैं. उनका आंदोलन वामपंथी विचारधारा से प्रेरित हो सकता है या दक्षिणपंथी विचारधारा से—यह महत्त्वपूर्ण नहीं है. महत्त्वपूर्ण यह है कि उसका लक्ष्य वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था को चुनौती देना और उसे अस्थिर करना होगा. आज का भारतीय समाज इसी गंभीर खतरे का सामना कर रहा है.
केवल राजनीतिक अधिकार पर्याप्त नहीं
इसलिए यह स्पष्ट होना चाहिए कि केवल राजनीतिक अधिकार प्रदान कर देना पर्याप्त नहीं है. यदि लोकतंत्र को स्थायी और सार्थक बनाना है, तो उसके साथ आर्थिक अधिकारों की भी गारंटी देनी होगी. राज्य की संरचना ऐसी होनी चाहिए कि वह गरीबी तथा आर्थिक और सामाजिक असमानताओं को समाप्त करने के लिए तत्काल और प्रभावी कदम उठा सके. भारतीय संविधान के प्रमुख निर्माताओं में से एक डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर इस आवश्यकता को भली-भाँति समझते थे. मार्च 1947 में संविधान सभा के समक्ष प्रस्तुत अपने एक ज्ञापन में उन्होंने लिखा था, “पुराने समय के संवैधानिक विधिवेत्ताओं का यह विश्वास था कि संविधान का कार्य केवल समाज की राजनीतिक संरचना का स्वरूप निर्धारित करना है. वे कभी यह नहीं समझ पाए कि यदि लोकतंत्र को ‘एक व्यक्ति, एक मूल्य’ के अपने सिद्धांत को साकार करना है, तो समाज की आर्थिक संरचना का स्वरूप निर्धारित करना भी उतना ही आवश्यक है. संविधान निर्माण के क्षेत्र में जो देश बाद में आए हैं, उन्हें अपने पूर्ववर्तियों की भूलों की नकल नहीं करनी चाहिए, बल्कि उनके अनुभवों से सीख लेनी चाहिए.”
दुर्भाग्यवश डॉ. आंबेडकर संविधान सभा को इस अनुभव से सीख लेने के लिए तैयार नहीं कर सके. संविधान सभा तब भी उन “पुराने संवैधानिक विधिवेत्ताओं” की सोच से प्रभावित थी. परिणामस्वरूप संविधान ने केवल देश की राजनीतिक संरचना का निर्धारण किया, जबकि आर्थिक संरचना को अपने आप विकसित होने के लिए छोड़ दिया.
संविधान सभा द्वारा अपने सुझाव को अस्वीकार किए जाने के परिणामों को डॉ. आंबेडकर भली-भाँति समझते थे. इसलिए उन्होंने समय रहते चेतावनी भी दी थी, “राजनीतिक लोकतंत्र तब तक टिक नहीं सकता, जब तक उसकी नींव सामाजिक लोकतंत्र पर न रखी जाए.” उन्होंने यह भी कहा था कि 26 जनवरी 1950 को भारत एक ऐसे जीवन में प्रवेश करेगा, जो गहरे अंतर्विरोधों से भरा होगा. उनके शब्दों में, “राजनीति के क्षेत्र में हमारे पास समानता होगी, लेकिन सामाजिक और आर्थिक जीवन में असमानता बनी रहेगी.” इसके बाद उन्होंने एक गंभीर प्रश्न उठाया, “हम अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में इस असमानता को आखिर कब तक बनाए रखेंगे?” और फिर स्वयं ही उसका उत्तर देते हुए चेताया— “हमें इस विरोधाभास को जितनी जल्दी हो सके समाप्त करना होगा. यदि ऐसा नहीं किया गया, तो जो लोग इस असमानता का शिकार हैं, वे उस राजनीतिक लोकतंत्र की पूरी संरचना को ध्वस्त कर देंगे, जिसे इस संविधान सभा ने इतनी मेहनत से खड़ा किया है.”
नए चिंतन की आवश्यकता
डॉ. आंबेडकर की इस चेतावनी को दिए हुए अब तीस वर्ष बीत चुके हैं. लेकिन जिन “विरोधाभासों” की ओर उन्होंने संकेत किया था, उन्हें दूर करने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया. डॉ. आंबेडकर ने देश की आर्थिक संरचना के लिए “राज्य समाजवाद” का सुझाव दिया था. लेकिन इन तीस वर्षों के अनुभव ने उस व्यवस्था की अनेक कमियों और सीमाओं को उजागर कर दिया है. संविधान लागू होने के कुछ वर्षों बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी लगभग इसी दिशा को अपनाया. किंतु उनके नेतृत्व में यह व्यवस्था धीरे-धीरे राज्य पूंजीवाद में बदल गई, जिसके परिणामस्वरूप आर्थिक असमानताएं और बढ़ती चली गईं. सामान्य धारणा यही बन गई कि अमीर और अमीर होते गए, जबकि गरीब और गरीब. इसलिए अब आवश्यकता है कि हम किसी ऐसी वैकल्पिक व्यवस्था पर विचार करें, जो अधिक उपयुक्त और प्रभावी हो. लेकिन इस बात से कोई इनकार नहीं किया जा सकता कि बेरोज़गारी समाप्त करना, गरीबी कम करना और समाज में समानता स्थापित करना आज भी उतना ही आवश्यक है जितना पहले था.
स्थिति इसलिए और भी गंभीर हो गई है क्योंकि देश में एक नया राजनीतिक माहौल बन रहा है. अधिनायकवादी प्रवृत्तियां फिर से सिर उठा रही हैं और वे जनता की गरीबी तथा अशिक्षा का लाभ उठाकर अपने प्रभाव को बढ़ाने का प्रयास कर रही हैं. जनता पार्टी के नेताओं ने समय-समय पर बेरोज़गारी समाप्त करने और गरीबी मिटाने के अनेक बड़े-बड़े दावे किए हैं. लेकिन व्यवहारिक स्तर पर अब तक ऐसा कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है जिससे आम लोगों की आर्थिक स्थिति में वास्तविक सुधार आया हो. यह सही है कि राजनीतिक अधिकार फिर से बहाल कर दिए गए हैं, लेकिन आर्थिक अधिकार आज भी उतने ही दूर हैं, जितने पहले थे. जब तक लोकतांत्रिक व्यवस्था करोड़ों लोगों को गरीबी, शोषण और अभाव के बीच जीवन बिताने के लिए मजबूर करती रहेगी, तब तक वे स्वयं को इस व्यवस्था का भागीदार नहीं मानेंगे. मानवाधिकार और लोकतांत्रिक स्वतंत्रताएं उनके लिए तब तक अर्थहीन रहेंगी, जब तक उनका रूपांतरण रोज़गार और रोटी में नहीं होता. नए वर्ष में भारत के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती है.
यह लेख सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी की इंडियन लिबरल्स परियोजना नामक इंडियन लिबरल्स आर्काइव की सीरीज़ का हिस्सा है. इसे “फ्रीडम फर्स्ट” किताब से लिया गया है जिसका शीर्षक “राजनीतिक और आर्थिक अधिकार” था और इसका प्रकाशन मूलरुप से जनवरी 1979 में हुआ था. मूल संस्करण को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.
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