नई दिल्ली: नेपाल के सुनसरी जिले में इस हफ्ते की शुरुआत में हुई सांप्रदायिक हिंसा गुरुवार को देश के मधेस क्षेत्र तक फैल गई. देशभर में कर्फ्यू के बीच हिंसा में मरने वालों की संख्या तीन हो गई है. वहीं प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने पहली बार देश को संबोधित किया, लेकिन उनकी प्रतिक्रिया में देरी को लेकर सवाल उठ रहे हैं. प्रधानमंत्री शाह मधेस क्षेत्र से आते हैं. यह देश का सबसे छोटा और सबसे ज्यादा आबादी वाला दक्षिण-पूर्वी प्रांत है, जिसकी दक्षिणी सीमा भारत के बिहार से लगती है. अब तेज़ी से बिगड़ती स्थिति पर उनकी देर से आई प्रतिक्रिया को लेकर उनकी आलोचना हो रही है.
कोशी के सुनसरी जिले में रविवार रात शुरू हुई हिंसा गुरुवार तक मधेस क्षेत्र में फैल गई. मधेस के उत्तर और पूर्व में स्थित कोशी प्रांत की सीमा भी बिहार से लगती है.
रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह तनाव तब शुरू हुआ जब कोशी प्रांत के एक जिले सुनसरी में हिंदू लोग भारत की कांवड़ यात्रा की तरह नेपाल में होने वाली बोलबम यात्रा के तहत पवित्र जल लेकर कोशी बैराज की ओर जा रहे थे. यात्रा में तेज़ भक्ति संगीत बज रहा था, जिस पर स्थानीय मुस्लिम समुदाय ने आपत्ति जताई. जो बात पहले सिर्फ बहस तक सीमित थी, वह हिंसक झड़प में बदल गई. दोनों समुदायों के लोग लाठी, पत्थर और बांस के डंडे लेकर एक-दूसरे का सामना करने लगे.
रिपोर्ट्स के अनुसार, ऑनलाइन फैली गलत जानकारी के कारण क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया. स्थिति को नियंत्रित करने के लिए नेपाल पुलिस और सशस्त्र पुलिस बल के जवानों को तैनात किया गया. चेतावनी के तौर पर गोली चलाने और आंसू गैस छोड़ने के बाद भी भीड़ नहीं हटी तो सुरक्षा बलों ने असली गोलियां चला दीं. इसमें 30 साल के ओम प्रकाश मेहता की गोली लगने से मौत हो गई.
जल्द ही यह हिंसा सुनसरी से बाहर भी फैल गई. गुरुवार तक सिराहा जिले के गोलबाजार और लहान में प्रदर्शन और झड़पें शुरू हो गईं, जहां गणेश यादव नाम के एक किशोर की मौत हो गई.
इसके बाद ओम प्रकाश मेहता के परिवार ने अस्पताल से उनका शव लेने से इनकार कर दिया. परिवार की मांग थी कि उन्हें शहीद घोषित किया जाए, सरकार मुआवजा दे और अंतिम संस्कार से पहले गोली चलाने के जिम्मेदार लोगों के खिलाफ मुकदमा चलाया जाए.
हिंसा बढ़ने के बीच शाह ने गुरुवार शाम देश को संबोधित किया. उन्होंने स्थिति को “बहुत संवेदनशील और नाजुक समय” बताया और सरकार की कार्रवाई पर भरोसा दिखाने की कोशिश की. उन्होंने कहा कि गृह मंत्रालय के आदेश पर शुरू की गई जांच ‘पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी’ होगी और जो भी जिम्मेदार पाया जाएगा, उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी.
शाह ने कहा, “सरकार दोषी पाए जाने वाले किसी भी व्यक्ति को न्याय के कटघरे तक पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध है.”
प्रधानमंत्री ने कहा कि सरकार ने सभी दलों की बैठक बुलाई है और आगे की हिंसा को रोकने के लिए चुने हुए प्रतिनिधियों, सिविल सोसायटी के नेताओं, धार्मिक लोगों और स्थानीय समुदाय के बुजुर्गों से बातचीत शुरू की है. उन्होंने कहा कि गृह मंत्री सुदन गुरुंग वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारियों के साथ प्रभावित जिलों में गए हैं, जबकि राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद ने बिगड़ती सुरक्षा स्थिति की समीक्षा की है.
शाह के संबोधन का बड़ा हिस्सा लोगों से संयम बरतने की अपील पर केंद्रित रहा क्योंकि ऑनलाइन अफवाहें और भड़काऊ सामग्री लगातार फैल रही थी. उन्होंने इस हिंसा को नेपाल की लंबे समय से चली आ रही धार्मिक सह-अस्तित्व की परंपरा के लिए खतरा भी बताया.
अपने सबसे साफ राजनीतिक संदेश में शाह ने सामूहिक रूप से किसी समुदाय को दोष देने के खिलाफ भी चेतावनी दी. उन्होंने कहा, “देश के किसी एक हिस्से में हुई दुखद घटना के लिए पूरे समुदाय को जिम्मेदार ठहराना और देश के दूसरे हिस्सों में बदले की कार्रवाई फैलाना कभी सही नहीं ठहराया जा सकता.”
नेपाल के राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने भी गुरुवार को हिंसा पर गहरी चिंता जताई. उन्होंने लोगों से सामाजिक और धार्मिक सद्भाव, सांप्रदायिक शांति और राष्ट्रीय एकता बनाए रखने की अपील की. उन्होंने एक बयान में कहा, “हमारे बहुसांस्कृतिक, बहुजातीय और अलग-अलग नस्लों वाले समाज में सद्भावना, मेल-मिलाप और भाईचारा नेपाली लोगों की पहचान हैं.”
शाह की चुप्पी पर सवाल उठ रहे हैं. स्थानीय रिपोर्टों में कहा गया कि उनकी टिप्पणी गृह मंत्री के हिंसा शुरू होने के कई दिन बाद प्रभावित इलाके में पहुंचने और सत्तारूढ़ पार्टी के अध्यक्ष रबी लामिछाने के उन बैठकों को बुलाना शुरू करने के बाद आई, जिन्हें प्रधानमंत्री कार्यालय ने टाल दिया था. हालांकि, पहली मौतों के अगले दिन ही सुनसरी में प्रतिबंध लगाए गए थे, लेकिन गृह मंत्री कई दिन बाद तक जिले में नहीं गए और शाह ने हिंसा के दो दिन बाद फेसबुक पर बयान जारी किया.
पूर्व सांसद सुमन श्रेष्ठ जैसी पूर्व सांसदों ने सेना की तैनाती की आलोचना की है और प्रधानमंत्री से प्रांतीय सांसदों को भी साथ लेकर चलने को कहा है. उन्होंने एक्स पर लिखा, “इस मामले में सेना की तैनाती समाधान नहीं है. संघीय सांसद, प्रांतीय सांसद और स्थानीय प्रतिनिधि इस समय शांति के संदेशवाहक हैं—उनसे मदद मांगिए!”
पूर्व प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टराई ने कहा, “जैसा कि कहा जाता है, ‘जब भाई आपस में लड़ते हैं, तो मूर्ख लोग लूटते हैं.’ इसलिए इस समय बिना किसी बहाने के, सरकार, राजनीतिक दलों और सभी जातियों, धर्मों और समुदायों के देशभक्त नागरिकों को एकजुट होकर इस सामने खड़े संकट को तुरंत टालना होगा—इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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