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Monday, 3 August, 2026
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भारत में आम नागरिक हर तरह के शोषण का शिकार है: केएच सुब्रमण्यम

1979 में केएच सुब्रमण्यम ने लिखा था, टैक्स के लिए लालची सरकार ने एकाधिकार वाले उत्पादकों को टैरिफ और संरक्षण दिया है.

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‘उपभोक्तावाद’ का अर्थ है संगठित उत्पादकों के मुकाबले व्यक्तिगत उपभोक्ता के अधिकारों की रक्षा और उन्हें सशक्त बनाना. यदि इस शब्द का प्रयोग खरीदार और विक्रेता के संदर्भ में किया जाए, तो इसका पक्ष खरीदार के साथ होता है; राज्य और नागरिक के बीच यह नागरिक के पक्ष में खड़ा होता है; और डॉक्टर तथा रोगी के संबंध में यह रोगी का समर्थन करता है. संक्षेप में कहें तो मेरे विचार में उपभोक्तावाद का अर्थ है—वस्तुओं और सेवाओं पर खर्च किए गए धन का उचित मूल्य प्राप्त करना.

यह तो स्पष्ट है कि हम सभी उपभोक्ता हैं. लेकिन जिस बात पर अक्सर ध्यान नहीं जाता, वह यह है कि हम अपने जीवन में उत्पादक से कहीं अधिक बार उपभोक्ता की भूमिका निभाते हैं. साथ ही, उपभोक्ताओं के रूप में हम समाज का सबसे बड़ा हित समूह भी हैं. दुर्भाग्य से यह समूह न तो संगठित है और न ही प्रभावशाली. दूसरे संगठित हित समूहों के बीच इसकी आवाज़ दबकर रह जाती है. मेरे विचार से यही भारतीय उपभोक्ता की सबसे बड़ी समस्या है. हम स्वयं को पहले चार्टर्ड अकाउंटेंट, डॉक्टर या इंजीनियर मानते हैं और उसके बाद उपभोक्ता. यही कारण है कि जब दो हित समूहों के बीच टकराव होता है, तो उपभोक्ता के हितों पर सबसे कम ध्यान दिया जाता है.

जब भी कोई हमारे देश की किसी कंपनी की जन्म से मृत्यु तक चलने वाली कल्याणकारी नीतियों की प्रशंसा करता है, तो मुझे हमेशा यह संदेह होता है कि इसकी कीमत अंततः उपभोक्ता ही चुका रहा होगा. अक्सर ऐसी कंपनियों के उत्पाद बाज़ार में एकाधिकार की स्थिति में होते हैं. उदाहरण के लिए कृत्रिम धागे (सिंथेटिक यार्न) के उद्योग को ही लें. हम जानते हैं कि इस उद्योग ने देश में सबसे अधिक कॉरपोरेट मुनाफा कमाया और कई बड़े उद्योग समूहों ने नायलॉन खरीदने वाले उपभोक्ताओं की जेब से निकले पैसे के सहारे जहाज़रानी और विमानन जैसे नए क्षेत्रों में कदम रखा.

हमारे देश में स्थिति यह है कि उत्पादकों को एक बंद बाज़ार मिला हुआ है. सरकार, अधिक कर वसूलने की लालसा में, एकाधिकार वाले उत्पादकों को आयात शुल्क और अन्य प्रकार का संरक्षण देती है. मज़दूर संघ अपनी ताकत के बल पर ऊँचे वेतन और अतिरिक्त सुविधाओं के रूप में इस व्यवस्था का बड़ा हिस्सा अपने पक्ष में कर लेते हैं. दूसरी ओर, शेयरधारकों की उपेक्षा होती है और उपभोक्ता की तो उससे भी अधिक. इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं कि इस पूरी व्यवस्था में सबसे अधिक नुकसान उपभोक्ता का होता है. ऐसे असंख्य उदाहरण दिए जा सकते हैं जहाँ उत्पादक, सरकार और मज़दूर संघ मिलकर गुणवत्ता और कीमत—दोनों मामलों में उपभोक्ता के साथ अन्याय करते हैं.

भारतीय मोटर कार उद्योग इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है. यहाँ आज भी ऐसी कारें बनाई जाती हैं जिनकी बनावट और डिज़ाइन पचास के दशक की याद दिलाते हैं. इससे स्पष्ट होता है कि उत्पादन और वितरण की पूरी प्रक्रिया में उपभोक्ता की राय और उसके हितों को सबसे निचले स्थान पर रखा गया है.

मैं जिस प्रक्रिया की बात कर रहा हूं, वह सामान्यतः इस प्रकार मानी जाती है. अर्थशास्त्री जे. के. गैलब्रेथ के शब्दों में, आर्थिक विश्लेषण और शिक्षा में यह मान लिया जाता है कि पहल हमेशा उपभोक्ता की ओर से होती है. व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं और इच्छाओं के आधार पर बाज़ार से वस्तुएं और सेवाएं खरीदता है. उपभोक्ताओं की यही मांग उत्पादकों को यह संकेत देती है कि किन वस्तुओं का उत्पादन लाभदायक होगा. इस प्रकार निर्णय का प्रवाह एक ही दिशा में चलता है—उपभोक्ता से बाज़ार तक और बाज़ार से उत्पादक तक. इसी सिद्धांत को ‘उपभोक्ता की संप्रभुता’ कहा जाता है.

लेकिन भारत की परिस्थितियों में यह व्यवस्था बहुत पहले समाप्त हो चुकी है. नियंत्रणों और सरकारी विनियमन वाली अर्थव्यवस्था में उत्पादकों को प्रतिस्पर्धा से सुरक्षा मिली हुई है और उन्हें ऐसा बाज़ार भी मिला है जहां उपभोक्ता के पास कोई वास्तविक विकल्प नहीं है. परिणाम यह है कि उपभोक्ता को उत्पादक द्वारा तय की गई कीमत चुकानी पड़ती है और जो गुणवत्ता उसे दी जाती है, उसे बिना किसी प्रश्न के स्वीकार करना पड़ता है. हममें से बहुतों का अनुभव है कि देश में बनी किसी वस्तु की कीमत कई बार उसी आयातित वस्तु के बराबर, बल्कि उससे भी अधिक होती है, जबकि आयातित वस्तु पर 50 से 120 प्रतिशत तक सीमा शुल्क लगाया जाता है. इसके अनेक कारण बताए जा सकते हैं, लेकिन मेरा उद्देश्य केवल यह दिखाना है कि ऐसी स्थिति में भारतीय उपभोक्ता को अपने पैसे का उचित मूल्य नहीं मिलता. यही कारण है कि उपभोक्ता वस्तुओं की तस्करी भी बड़े पैमाने पर होती है.

स्थिति को और भी गंभीर बनाने वाली बात यह है कि लोगों के मन में जानबूझकर यह धारणा बनाई जाती है कि तथाकथित विलासिता की वस्तुओं के मामले में यदि कोई उपभोक्ता अपने पैसे का उचित मूल्य मांगे, तो यह गलत है. मानो फ्रिज, टेलीविज़न या कार खरीदने वाले व्यक्ति से उस वस्तु के वास्तविक मूल्य से दो-तीन गुना अधिक कीमत वसूलना पूरी तरह उचित हो. निस्संदेह, उत्पाद शुल्क सरकार के हाथ में राजस्व जुटाने का एक स्वीकृत साधन है. लेकिन जब यह कर केवल अपेक्षाकृत संपन्न उपभोक्ताओं से अधिक धन वसूलने का माध्यम बन जाता है, तब उसका औचित्य समाप्त हो जाता है. तब वह कर नहीं, बल्कि कानूनी रूप से वैध बना दिया गया शोषण बन जाता है. उत्पादक भी इसी रास्ते पर चलते हैं और अपने उत्पादों की कीमत तय करते समय इसी मानसिकता को अपनाते हैं.

क्या यह विडंबना नहीं है कि भारत में बना एक प्रसिद्ध रेफ्रिजरेटर मॉस्को में भारत की तुलना में लगभग एक-तिहाई कीमत पर बिकता है? मुझसे अधिक जानकारी रखने वाले लोगों का कहना है कि भारत में बनने वाले एक रेफ्रिजरेटर की लागत में, उत्पादन के विभिन्न चरणों पर लगाए गए उत्पाद शुल्क और पुर्ज़ों पर लगने वाले बिक्री कर सहित, करों का हिस्सा लगभग 800 प्रतिशत तक पहुँच जाता है. पेट्रोल इसका एक और उदाहरण है, जहां कर का हिस्सा उत्पादन लागत का लगभग 300 प्रतिशत है. चाहे हवाई टिकट हो या कार की कीमत, इस देश में मूल्य का निर्धारण वस्तु या सेवा के वास्तविक मूल्य से नहीं, बल्कि खरीदार की भुगतान क्षमता के अनुमान से किया जाता है. मुझे हमेशा लगा है कि मूल्य निर्धारण का यह तरीका भेदभावपूर्ण है और उपभोक्ता के साथ पूरी तरह अन्याय करता है. इस अनुचित व्यवस्था के लिए सबसे अधिक दोषी हमारी सरकार है.

पश्चिम के औद्योगिक देशों में तथाकथित बाज़ार अर्थव्यवस्था के अंतर्गत लंबे समय तक उपभोक्ता–बाज़ार–उत्पादक का यही क्रम चलता रहा. लेकिन बाद में विक्रेताओं ने उपभोक्ताओं को प्रभावित और नियंत्रित करके इस क्रम को उलट दिया. परिणाम यह हुआ कि वस्तुओं की खरीद का निर्णय उपभोक्ता के हाथ से निकलकर कंपनियों के हाथ में चला गया, जहाँ उसे नियंत्रित किया जा सकता था.

मानवीय आवश्यकताओं और इच्छाओं में जिस प्रकार तेज़ी से वृद्धि और विविधता आई है, उसके कारण उपभोक्ता के लिए समझदारी से चुनाव करना पहले की तुलना में कहीं अधिक कठिन हो गया है. इसलिए आवश्यक है कि उसे सही निर्णय लेने में सहायता दी जाए और अधूरी या भ्रामक जानकारी के कारण होने वाले नुकसान से बचाया जाए. लेकिन यह काम केवल व्यापार जगत की स्वैच्छिक व्यवस्था पर नहीं छोड़ा जा सकता. उपभोक्ता संगठनों और सरकार को मिलकर उत्पादकों की गतिविधियों पर लगातार निगरानी रखनी चाहिए, ताकि उपभोक्ता को धोखाधड़ी, छल-कपट और उत्पादों या सेवाओं के उपयोग से होने वाले संभावित जोखिमों से बचाया जा सके. साथ ही, ऐसी सभी आवश्यक जानकारियाँ लगातार उपलब्ध कराई जानी चाहिए जिनकी मदद से उपभोक्ता सोच-समझकर निर्णय ले सके.

दुर्भाग्य से हमारे देश में उपभोक्ता संगठनों और कार्यकर्ताओं का ध्यान मुख्यतः मिलावट और कम तौल जैसी प्रत्यक्ष समस्याओं तक ही सीमित है. उपभोक्ता के शोषण के उन कम दिखाई देने वाले, लेकिन अधिक गंभीर रूपों पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जाता.

उपभोक्ता के साथ होने वाला एक और स्पष्ट अन्याय यह है कि उत्पादक अपनी वारंटी संबंधी ज़िम्मेदारियों की खुलेआम अनदेखी करते हैं. किसी एक उपभोक्ता के पास न तो इतने संसाधन होते हैं और न ही इतनी शक्ति कि वह किसी हठी निर्माता को वारंटी का पालन करने के लिए बाध्य कर सके. परिणाम यह होता है कि निर्माता बिना किसी डर के वारंटी को केवल कागज़ी वादा बनाकर छोड़ देते हैं. यदि एक मज़बूत उपभोक्ता संगठन हो, तो वह सरकार पर ऐसा कानून बनाने का दबाव डाल सकता है जिसमें वारंटी का पालन न करना दंडनीय अपराध माना जाए और उसके लिए इतनी कठोर सज़ा हो कि निर्माता अपने दायित्वों की उपेक्षा न कर सकें.

भारतीय उपभोक्ता की स्थिति की एक और विशेषता यह है कि उत्पादों के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर और भ्रामक दावे किए जाते हैं.

विज्ञापनों की दुनिया में ऐसे दावों की कोई कमी नहीं है. कभी किसी विशेष ब्रांड के मक्खन को खाने से स्वस्थ और समृद्ध बनने का भरोसा दिया जाता है, तो कभी कोई दवा जीवन भर जवानी बनाए रखने का दावा करती है. पश्चिम के कुछ देशों में ऐसे कानून हैं जो विज्ञापनों में सत्यता को अनिवार्य बनाते हैं. लेकिन भारत में विज्ञापन जगत के तथाकथित विशेषज्ञ उत्पादों की बिक्री बढ़ाने के लिए आधे-अधूरे सच और भ्रामक दावे गढ़ने में एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश करते हैं. यहाँ भी आम आदमी के हितों की रक्षा करने का सरकार का दावा अभी तक उपभोक्ता की सुरक्षा के लिए किसी ठोस कार्रवाई में दिखाई नहीं देता.

उत्तर-औद्योगिक समाजों में उपभोक्ता का केवल अपनी समझ पर निर्भर रहना अब लगभग अप्रासंगिक हो चुका है. कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व और कानूनी जवाबदेही अब व्यापक रूप से स्वीकार किए गए सिद्धांत हैं. अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में व्यक्तिगत उपभोक्ता के अलावा अन्य खरीदारों को लंबे समय से स्पष्ट अनुबंधों और स्थापित व्यावसायिक प्रथाओं के माध्यम से पर्याप्त सुरक्षा मिलती रही है. अब यही सुरक्षा व्यक्तिगत उपभोक्ताओं तक भी पहुँचाई जा रही है, और व्यापारिक व्यवहारों में भी उपभोक्ता के हित में महत्वपूर्ण बदलाव आए हैं.

अमेरिका में एक राष्ट्रपति आयोग ने उपभोक्ता के निम्नलिखित मूल अधिकारों को मान्यता दी है—

1. सुरक्षा का अधिकार — ऐसे उत्पादों के विपणन से सुरक्षा, जो जीवन या स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हों.

2. जानकारी पाने का अधिकार — भ्रामक, धोखाधड़ीपूर्ण या गुमराह करने वाले विज्ञापनों, लेबलों और अन्य तरीकों से सुरक्षा, तथा सही निर्णय लेने के लिए आवश्यक सभी तथ्यों की जानकारी प्राप्त करने का अधिकार.

3. चयन का अधिकार — जहां संभव हो, प्रतिस्पर्धी कीमतों पर विभिन्न वस्तुओं और सेवाओं तक पहुंच का अधिकार. और जहाँ प्रतिस्पर्धा संभव न हो तथा उसकी जगह सरकारी नियंत्रण हो, वहाँ उचित मूल्य पर अच्छी गुणवत्ता की वस्तुएं और सेवाएँ प्राप्त करने का अधिकार.

उपभोक्ता संरक्षण केवल इन्हीं अधिकारों तक सीमित नहीं है. इसमें मूल्य निर्धारण की नीतियाँ, बिक्री की प्रक्रियाएं, ऋण संबंधी व्यवस्थाएँ, प्रोत्साहन योजनाएं, वारंटी और बिक्री के बाद की सेवाएं, उत्पादों की सुरक्षा, स्वास्थ्य, उत्पादकों की कानूनी ज़िम्मेदारी और इससे जुड़े अनेक अन्य विषय भी शामिल हैं. इसके साथ ही वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, तापीय प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, विकिरण, ठोस कचरे, दृश्य प्रदूषण तथा वन्यजीवन और प्राकृतिक पर्यावरण के संरक्षण की माँग भी उपभोक्ता अधिकारों का हिस्सा है. इस प्रकार उपभोक्ता अधिकारों की व्यापक अवधारणा केवल वस्तुओं और सेवाओं तक सीमित नहीं रहती, बल्कि जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करने वाले पर्यावरणीय पहलुओं को भी अपने दायरे में शामिल करती है.

दुर्भाग्य से हमारे देश में, जहाँ हम चाँद पर यान उतारने के सपने देखते हैं, वहीं उपभोक्ता के हितों के प्रति हमारी चिंता अभी भी बहुत प्रारंभिक स्तर पर है. इस अर्थ में हमारी सामाजिक सोच आधुनिक तकनीकी प्रगति के साथ कदम नहीं मिला सकी है. जिस प्रकार देश एक नील आर्मस्ट्रॉन्ग की प्रतीक्षा करता है, उसी प्रकार अमेरिका के प्रसिद्ध उपभोक्ता अधिकार कार्यकर्ता राल्फ नेडर जैसा कोई व्यक्ति तैयार करने की दिशा में अभी तक कोई गंभीर प्रयास नहीं हुआ है.

वास्तव में हमारे देश को अनेक राल्फ नेडरों की आवश्यकता है. यहां सामान्य नागरिक व्यापारिक संस्थाओं, वैधानिक निकायों और सरकार—सभी के हाथों विभिन्न प्रकार के शोषण का शिकार होता है. इसके साथ ही वर्षों से चली आ रही भाग्यवाद की मानसिकता उपभोक्ता चेतना के विकास में भी बाधा बनती है. यदि उपभोक्तावाद की इन प्रारंभिक चेतनाओं को संगठित और संस्थागत रूप दिया जाए, तो वे भविष्य में व्यापार और राजनीति—दोनों क्षेत्रों में एक महत्वपूर्ण सामाजिक शक्ति बन सकती हैं.

यह लेख सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी की इंडियन लिबरल्स परियोजना नामक इंडियन लिबरल्स आर्काइव की सीरीज़ का हिस्सा है. इसे “फ्रीडम फर्स्ट” पुस्तिका से लिया गया है जिसका शीर्षक “उपभोक्ता का शोषण” था और इसका प्रकाशन मूलरुप से सितंबर 1979 में हुआ था. मूल संस्करण को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.


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