नई दिल्ली: भारत के सैन्य थिंक टैंकों (नीति और रणनीति पर काम करने वाले संस्थानों) को ज्यादा बौद्धिक स्वायत्तता मिलनी चाहिए, लेकिन बुनियादी नियमों से समझौता नहीं होना चाहिए. साथ ही, उन्हें उद्योग या विदेशी स्रोतों से फंड लेने की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए. यह बात पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान (रिटायर्ड) ने कही.
शनिवार को दिप्रिंट के ‘ऑफ द कफ’ कार्यक्रम में बोलते हुए जनरल चौहान ने कहा कि मई के आखिर में अपने कार्यकाल के पूरा होने के बाद रिटायर होने से पहले उन्होंने CDS के तौर पर एक पहल की थी. इसके तहत सरकार से मंजूरी लेकर सेना, नौसेना, वायुसेना और तीनों सेनाओं से जुड़े थिंक टैंकों के लिए 5 करोड़ रुपये की अतिरिक्त फंडिंग सुनिश्चित की गई. उन्होंने कहा कि यह पहल अब पूरी होने के करीब है.
जनरल चौहान ने कहा, “मैं हमेशा मानता था कि हमारी सशस्त्र सेनाओं की असली ताकत हम सभी में रणनीतिक सोच विकसित करने में है. इसलिए हम चाहते थे कि हमारे थिंक टैंकों को स्वायत्तता मिले और उनके पास अपना सरकारी फंड हो. उन्हें फंड के लिए उद्योग या विदेशी स्रोतों की तरफ नहीं देखना चाहिए.”
पूर्व CDS ने भारत की सैन्य शिक्षा व्यवस्था में आम नागरिकों की ज्यादा भागीदारी की भी वकालत की. उन्होंने कहा कि अभी नेशनल डिफेंस कॉलेज, वॉर कॉलेज और स्टाफ कॉलेज जैसे संस्थानों में पढ़ाने का काम पूरी तरह सेना के अधिकारी करते हैं. वे अपने अनुभव के आधार पर पढ़ाते हैं, जबकि रणनीतिक अध्ययन के विशेषज्ञ शिक्षाविदों की इसमें कोई भूमिका नहीं होती. उन्होंने कहा कि अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में सैन्य शिक्षा में पेशेवर शिक्षाविदों की बड़ी भूमिका होती है.
उन्होंने कहा, “इस समय हमारे सभी वॉर कॉलेज, स्टाफ कॉलेज और CDM में शिक्षक पूरी तरह सशस्त्र सेनाओं से आते हैं. हम बहुत कम समय के लिए वहां रहते हैं और भविष्य के सैन्य नेतृत्व को वही सिखाते हैं, जो हमने अपने अनुभव से सीखा है. इसमें अकादमिक आधार की कमी है. मैं चाहता था कि वॉर कॉलेज और CDM में आम नागरिकों के विशेषज्ञ शिक्षक भी शामिल हों. ऐसा भी होना चाहिए.”
जब उनसे पूछा गया कि क्या सरकारी फंड मिलने से थिंक टैंकों की स्वतंत्रता पर असर पड़ सकता है, तो चौहान ने आर्थिक मदद और बौद्धिक स्वतंत्रता के बीच अंतर बताया.
उन्होंने कहा कि थिंक टैंकों की बौद्धिक स्वायत्तता बनी रहनी चाहिए, लेकिन उन्हें संस्थागत व्यवस्था के तहत काम करना होगा. हालांकि, शोधकर्ताओं को कुछ बुनियादी नियमों का पालन करना होगा, जैसे किसी बाहरी कार्यक्रम में शामिल होने या सार्वजनिक कार्यक्रम में भाग लेने से पहले अपने वरिष्ठ अधिकारियों को जानकारी देना.
जब उनसे आगे पूछा गया कि इस स्वायत्तता की सीमा क्या होगी. उदाहरण के लिए, अगर नौसेना से जुड़े किसी थिंक टैंक का शोधकर्ता यह लिखे कि अब एयरक्राफ्ट कैरियर की जरूरत नहीं है, तो क्या होगा? इस पर चौहान ने व्यक्तिगत राय और संस्थान की आधिकारिक रिपोर्ट के बीच फर्क बताया.
उन्होंने कहा, “आप जो सोचते हैं, उसे कहने का आपको अधिकार होना चाहिए. यह अलग बात है. लेकिन अगर वही बात थिंक टैंक की आधिकारिक रिपोर्ट के रूप में जारी की जाती है, तो वह अलग मामला होगा.”
उन्होंने सेंटर फॉर एयर पावर स्टडीज का उदाहरण देते हुए कहा कि इस संस्थान ने कई बार अलग सोच वाले विचार भी प्रकाशित किए हैं और इसके लिए उसे किसी तरह की संस्थागत परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा.
जनरल चौहान ने अपनी दूसरी पहल के बारे में भी बताया. उन्होंने कहा कि भारतीय सेना के लिए एक स्वतंत्र जियोस्पेशियल डेटा एजेंसी बनाने की योजना पर काम किया गया. उन्होंने बताया कि सर्वे ऑफ इंडिया के साथ सहयोग खत्म होने के बाद सेना के जो अधिकारी वहां काम कर रहे थे, वे अपनी-अपनी सेवाओं में लौट गए. इसके बाद सशस्त्र सेनाओं के लिए अपनी खुद की जियोस्पेशियल क्षमता विकसित करना जरूरी हो गया.
उन्होंने तीसरी पहल का भी ज़िक्र किया, जिसका उद्देश्य बदलते युद्ध के स्वरूप के लिए सेना को तैयार करना है. जनरल चौहान ने कहा कि उन्होंने भविष्य के युद्ध पर एक कोर्स शुरू किया था. शुरुआत में यह बिना आधिकारिक मंजूरी के चल रहा था, लेकिन अब सरकार की औपचारिक मंजूरी मिलने के बाद यह साल में तीन बार आयोजित किया जाता है.
उन्होंने कहा कि इस पहल के तहत सेना मुख्यालय में एक छोटी विश्लेषण टीम भी बनाई गई है. यह टीम इस बात का अध्ययन करती है कि भविष्य के युद्ध कैसे लड़े जाएंगे और उनसे निपटने के लिए सेना को किस तरह के बदलाव करने होंगे.
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