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Monday, 19 October, 2026
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BJP नेता की चिट्ठी और सरकार की मंजूरी: PGIMS रोहतक प्रमुख के एक्सटेंशन पर HC ने क्यों लगाई रोक

दस्तावेज़ के अनुसार: हाई कोर्ट द्वारा रोके गए तीन साल के विस्तार का फ़ैसला पूर्व मंत्री मनीष ग्रोवर के मुख्यमंत्री कार्यालय को भेजे गए पत्र के बाद लिया गया था.

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गुरुग्राम: रोहतक के पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (PGIMS) के मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डॉ. कुंदन मित्तल को 30 जून को रिटायर होना था. लेकिन वह रिटायर नहीं हुए.

उनकी रिटायरमेंट से दो महीने पहले हरियाणा के मुख्यमंत्री कार्यालय में एक चिट्ठी पहुंची. यह चिट्ठी रोहतक के वरिष्ठ बीजेपी नेता और पूर्व सहकारिता मंत्री मनीष कुमार ग्रोवर ने लिखी थी. इसमें डॉ. मित्तल को तीन साल का सेवा विस्तार देने की सिफारिश की गई थी.

PGIMS, रोहतक, हरियाणा यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज (UHS) के तहत काम करता है.

चिट्ठी में डॉ. मित्तल की मेडिकल योग्यता के बारे में ज्यादा बात नहीं की गई थी. इसमें उनकी राजनीतिक भूमिका की तारीफ की गई थी. ग्रोवर ने लिखा, “डॉ. मित्तल एक बेहद कुशल प्रशासक और बहुत अच्छे डॉक्टर हैं. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि वह हमारी पार्टी के कार्यकर्ताओं और जमीनी स्तर के स्वयंसेवकों के लिए मजबूत सहारा रहे हैं. उन्होंने हमारे कार्यकर्ताओं की हर संभव मदद करने के लिए हमेशा अपनी ओर से पूरा प्रयास किया है. इससे यह सुनिश्चित हुआ है कि हमारी सरकार की जनहित वाली नीतियों का असर PGIMS रोहतक में जमीन पर दिखाई दे. विश्वविद्यालय और क्षेत्र में पार्टी के हितों की सुरक्षा और उन्हें आगे बढ़ाने के लिए इस पद पर उनका बने रहना बेहद जरूरी है.”

ग्रोवर ने चिट्ठी के अंत में व्यक्तिगत अपील करते हुए लिखा, “मैं व्यक्तिगत रूप से अनुरोध करता हूं कि जनहित में 30.06.2026 को रिटायरमेंट के बाद उन्हें तीन साल का सेवा विस्तार दिया जाए.”

ग्रोवर की यह कोशिश काम कर गई. मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव की ओर से मुख्यमंत्री के अतिरिक्त मुख्य सचिव, मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च को भेजे गए एक हस्तलिखित नोट में मुख्यमंत्री की प्रतिक्रिया दर्ज है. यह नोट 15 मई का है. इसमें लिखा था, “मुख्यमंत्री ने इच्छा जताई है कि इस आवेदन की जांच की जाए और 15 दिनों के भीतर उनके आदेश के लिए इसे पेश किया जाए.” मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव ने यह नोट ACS (MER) को भेजा था.

इसके तीन महीने बाद UHS की कार्यकारी परिषद ने 6 अगस्त के प्रस्ताव के जरिए सेवा विस्तार को मंजूरी दे दी.

हाई कोर्ट ने दखल दिया

अब यह सेवा विस्तार मुश्किल में पड़ गया है. इस पद के दूसरे दावेदार डॉ. अनिल पन्निकर ने पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में इसे चुनौती दी. 16 सितंबर को जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ की पीठ ने सेवा विस्तार पर रोक लगा दी.

अदालत के आदेश में सिफारिश वाली चिट्ठी में लिखी बातों पर साफ टिप्पणी की गई. अदालत ने कहा, “अनुलग्नक P-3 को देखने से साफ पता चलता है कि प्रतिवादी नंबर 5 के दोबारा नियुक्त किए जाने की सिफारिश करते समय यह बताया गया था कि प्रतिवादी नंबर 5 ने पार्टी कार्यकर्ताओं और जमीनी स्तर के स्वयंसेवकों की मदद की है. इस तरह की बातें किसी वैधानिक पद पर नियुक्ति के लिए प्रासंगिक नहीं हैं.”

अदालत ने एक ऐसे नियम की ओर भी ध्यान दिलाया, जिसे सेवा विस्तार देते समय पूरी तरह नजरअंदाज किया गया लगता है. अदालत ने कहा, “यूनिवर्सिटी के क़ानून के रूल (2)(d) में साफ तौर पर कहा गया है कि 58 साल से ज्यादा उम्र के किसी व्यक्ति को मेडिकल सुपरिंटेंडेंट के पद पर नियुक्त नहीं किया जा सकता.” अदालत ने यह भी कहा कि कार्यकारी परिषद ने दोबारा नियुक्ति को मंजूरी दी, जबकि उसके पास वैधानिक उम्र की शर्त में छूट देने का अधिकार नहीं था.

अदालत ने 3 अगस्त के आदेश और 6 अगस्त के प्रस्ताव पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है. अगली सुनवाई 4 मार्च अगले साल तय की गई है. हालांकि, अदालत ने विश्वविद्यालय को उचित प्रक्रिया का पालन करते हुए नए मेडिकल सुपरिंटेंडेंट की नियुक्ति करने की अनुमति दी है.

‘इसमें गलत क्या है?’

चिट्ठी ऑनलाइन सामने आने के बाद वायरल हो गई. इससे उस सरकार के लिए असहज स्थिति पैदा हो गई है, जो बार-बार खुद को “बिना खर्ची बिना पर्ची” वाली सरकार बताती रही है. सरकार का दावा है कि अब ट्रांसफर, पोस्टिंग और दूसरे फायदे राजनीतिक सिफारिश के आधार पर तय नहीं होते.

विपक्षी नेताओं ने इस विरोधाभास को तुरंत उठाया. जननायक जनता पार्टी के नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला और हरियाणा कांग्रेस के प्रवक्ता तरुण तेवतिया ने X पर चिट्ठी को लेकर पोस्ट किया. दोनों ने सरकार के सिफारिश मुक्त प्रशासन के दावों पर सवाल उठाए.

दिप्रिंट से बात करते हुए ग्रोवर ने चिट्ठी लिखने से इनकार नहीं किया. उन्होंने कहा, “मैं जनता का प्रतिनिधि हूं. लोग सिफारिश के लिए मेरे पास आते रहते हैं. अगर मेरी सिफारिश से किसी को फायदा होता है, तो इसमें गलत क्या है?”

ग्रोवर ने कहा कि यह सेवा विस्तार सरकार की मौजूदा नीति के मुताबिक था. इस नीति के तहत सरकारी डॉक्टरों को 70 साल की उम्र तक दोबारा नौकरी पर रखा जा सकता है. उन्होंने कहा कि डॉ. मित्तल की उम्र सिर्फ 58 साल थी. ग्रोवर ने कहा, “अगर वह दोबारा नियुक्ति के लिए योग्य नहीं होते, तो सरकार उनका दावा खारिज कर देती.”

उन्होंने डॉ. मित्तल को पार्टी कार्यकर्ताओं और जमीनी स्तर के स्वयंसेवकों के लिए “मजबूत सहारा” बताए जाने की बात का भी बचाव किया. उन्होंने कहा कि सबसे पहले डॉ. मित्तल एक पार्टी कार्यकर्ता थे और पार्टी का समर्थन करने वाले लोगों के हितों का ध्यान रखना उनका कर्तव्य था.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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