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Friday, 7 August, 2026
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सिर्फ Gen Z नहीं, दो अलग मंच: जानिए झारखंड का आंदोलन जंतर-मंतर से कैसे है अलग

दिल्ली का आंदोलन एकजुट और तय मांगों वाला था, जबकि झारखंड का आंदोलन कई अलग-अलग मांगों के साथ बंटा हुआ है. रांची में प्रदर्शन कर रहे लोग उम्र में भी बड़े हैं और गाली-गलौज से बचते हैं.

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रांची: मंगलवार रात रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में ब्लिंकिट का एक ऑर्डर पहुंचा. इसमें उन सैकड़ों प्रदर्शनकारियों के लिए ज़रूरी सामान था, जो 29 जुलाई से यहां डेरा डाले हुए हैं. डिलीवरी बॉय ने प्रदर्शनकारियों से कहा, “यह सामान भारत के बाहर से, थाईलैंड से किसी ने भेजा है.”

एक कार्टन में मूंगफली, बादाम और दूसरे स्नैक्स के पैकेट, ओडोमॉस और एनर्जी ड्रिंक के सैशे थे. दूसरे कार्टन में महिला प्रदर्शनकारियों के लिए सैनिटरी नैपकिन रखे थे.

प्रदर्शन स्थल पर इस तरह लोगों का मिलकर सामान भेजना पिछले महीने दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए नीट परीक्षा पेपर लीक विरोध प्रदर्शन की याद दिलाता है. वहां भी देशभर से खाने-पीने का सामान और दूसरी ज़रूरी चीज़ें पहुंची थीं.

नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के आंदोलन से प्रेरित होकर झारखंड के अलग-अलग हिस्सों से आए सैकड़ों छात्र जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में धरना दे रहे हैं. उनका आरोप है कि झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (जेएसएससी) की भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक और दूसरी गड़बड़ियां हुई हैं. यह आंदोलन अप्रैल में हुई 14वीं झारखंड लोक सेवा आयोग संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा (जेपीएससी सीएसई) में अनियमितताओं के आरोपों के बाद शुरू हुआ.

अब इस आंदोलन में उन एस्पिरेंट्स को भी साथ लाया गया है, जिन्होंने पिछले कई वर्षों में JPSC और JSSC की अलग-अलग भर्ती परीक्षाएं दी हैं.

झारखंड में भर्ती परीक्षाओं के खिलाफ छात्रों के प्रदर्शन शुरू होने के बाद से रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम और दिल्ली के जंतर-मंतर के आंदोलनों की तुलना की जा रही है. हालांकि, दिल्ली का आंदोलन झारखंड के छात्रों के लिए प्रेरणा ज़रूर बना, लेकिन दोनों आंदोलनों में पांच बड़े अंतर हैं.

बंटा हुआ आंदोलन

पहला बड़ा फर्क यह है कि सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक और कॉकरोच जनता पार्टी एकजुट होकर आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे. इससे सभी प्रदर्शनकारी अपनी साझा मांगों, जिनमें तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग भी शामिल थी, पर एक साथ टिके रहे.

लेकिन रांची का आंदोलन काफी बंटा हुआ है. यहां प्रदर्शन स्थल पर दो अलग-अलग मंच हैं और कई अलग-अलग समूह हैं, जिनकी मांगें भी अलग हैं.

छात्रों का एक समूह 14वीं JPSC संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा (JPSC CSE) रद्द करने, CBI जांच और भर्ती व्यवस्था में बड़े सुधार की मांग कर रहा है.

वहीं दूसरा समूह फास्ट-ट्रैक कोर्ट, राज्य के शिक्षा मंत्री के इस्तीफे, भर्ती परीक्षा घोटालों के दोषियों के लिए सख्त सजा और आरोपियों को आसानी से जमानत न मिलने जैसी मांगें कर रहा है. इसके अलावा दो पन्नों का एक मांग पत्र भी जारी किया गया है, जिसमें कई पुरानी परीक्षाओं को रद्द करने, उनकी सीबीआई/ईडी जांच कराने और दूसरी कई मांगें शामिल हैं.

उम्रदराज़ प्रदर्शनकारी

दूसरा बड़ा फर्क यह है कि जंतर-मंतर का आंदोलन ज्यादातर जेन ज़ी के युवाओं का था और उसी पीढ़ी ने उसकी अगुवाई की थी. इससे सीधे प्रभावित लोगों की औसत उम्र 14 से 29 साल के बीच थी. लेकिन रांची में 20 साल की शुरुआत से लेकर 30 के आखिर और यहां तक कि 40 साल की शुरुआत तक के लोग भी भर्ती परीक्षा व्यवस्था से जुड़ी अपनी परेशानियां बता रहे हैं.

JPSC और JSSC परीक्षाओं की अधिकतम आयु सीमा अलग-अलग है, लेकिन आमतौर पर 35 से 40 साल के बीच रहती है.

उदाहरण के लिए गिरिडीह जिले के प्रदर्शनकारी किशोर मंडल की उम्र 35 साल है.

उन्होंने दिप्रिंट को बताया कि अब तक वह चार भर्ती प्रक्रियाओं में शामिल हो चुके हैं—7वीं से 10वीं JPSC संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा (CSE), 11वीं से 13वीं झारखंड संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा, 14वीं JPSC CSE, बैकलॉग परीक्षा और फॉरेस्ट रेंजर परीक्षा. आखिरी परीक्षा में उन्हें अदालत के आदेश से आयु सीमा में छूट मिली थी.

उन्होंने कहा, “मैं इस आंदोलन की शुरुआत से ही लड़ाई लड़ रहा हूं.”

उन्होंने आगे कहा, “मैं सिर्फ अपने भविष्य के लिए नहीं लड़ रहा हूं. मैं अपनी पांच साल की छोटी बेटी के लिए भी लड़ रहा हूं क्योंकि वह एक दिन मुझसे पूछेगी—’पापा, जब सिस्टम में इतने बड़े अपराध हो रहे थे, तब आप कहां थे?'”

अलग-अलग मांगें

तीसरा बड़ा फर्क मांगों में है, जहां दिल्ली का आंदोलन मुख्य रूप से नीट पेपर लीक पर केंद्रित था, वहीं झारखंड का आंदोलन सिर्फ एक परीक्षा या एक कथित गड़बड़ी तक सीमित नहीं है.

छात्रों ने पेपर लीक, बैकडोर भर्ती, कट-ऑफ अंक सार्वजनिक न करने और ओएमआर शीट में गड़बड़ी जैसे कई आरोप लगाए हैं.

उनका कहना है कि भर्ती परीक्षाएं अक्सर JPSC और JSSC के तय परीक्षा कैलेंडर के मुताबिक नहीं होतीं और जब होती भी हैं, तो कथित गड़बड़ियों और पेपर लीक की वजह से या तो रद्द हो जाती हैं या फिर मामला अदालत पहुंच जाता है.

पारंपरिक पोस्टर

चौथा फर्क पोस्टर और बैनरों में है क्योंकि जेन ज़ी मीम्स के दौर में बड़ी हुई है, इसलिए जंतर-मंतर पर लगे पोस्टर और तख्तियां भी मीम्स वाली भाषा में थीं.

प्रदर्शनकारी वहां रील्स बनाते थे, यहां तक कि पुलिस कार्रवाई की आशंका के बीच भी “रेट माई आउटफिट” वीडियो, लिप-सिंक और डांस रील्स रिकॉर्ड करते थे. वहीं रांची के आंदोलन में पोस्टर और तख्तियां ज्यादा पारंपरिक हैं.

मुख्य मंच के पास हाथ से लिखे पोस्टर लगे हैं, जिन पर लिखा है—”न्याय नहीं तो आंदोलन जारी रहेगा” और “पेपर लीक धांधली बर्दाश्त नहीं! युवा जगा है, अब आर-पार होगा.”

एक पोस्टर में मामले के मुख्य आरोपी और झारखंड सरकार के कर्मचारी अभय तिवारी को “वीर सूरमा भोपाली” और सबसे बड़ा “खिलाड़ी” बताया गया है.

सीआईडी ने अभय तिवारी को इस मामले का मुख्य साजिशकर्ताओं में से एक बताया है. एजेंसी के मुताबिक, उसने पहले भी कई प्रतियोगी परीक्षाएं पास की हैं.

इनमें 2018 पुलिस सब-इंस्पेक्टर लिखित परीक्षा, 2013 नौसेना भर्ती परीक्षा, 2014 भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) में सहायक पद की परीक्षा, 2018 CRPF हेड कांस्टेबल (लिखित और टाइपिंग) परीक्षा, 2014 नॉर्दर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (NCL) परीक्षा, JSSC की PGT और CGL परीक्षाएं, JPSC की विभिन्न परीक्षाएं और झारखंड संयुक्त सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा शामिल हैं.

चैटजीपीटी से बनाया गया यह पोस्टर, जिसमें अभय तिवारी की तस्वीर भी है, प्रदर्शन स्थल पर साफ दिखाई देता है.

प्रदर्शन की भाषा

आखिरी बड़ा फर्क प्रदर्शन की भाषा है.

झारखंड के प्रदर्शनकारी और राजनीतिक नेता दोनों इस बात पर जोर देते हैं कि उनके आंदोलन में किसी के खिलाफ गाली-गलौज या अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल नहीं किया गया है. वे यह भी सुनिश्चित कर रहे हैं कि प्रदर्शन स्थल पर कोई अभद्र भाषा का इस्तेमाल न करे.

बुधवार को तिरंगा मार्च से पहले आंदोलन की कोर टीम ने भी सभी लोगों से मार्च के दौरान शालीन भाषा इस्तेमाल करने की अपील की.

दूसरी ओर, जंतर-मंतर के आंदोलन में इस्तेमाल हुई भाषा पूरे आंदोलन के दौरान और उसके बाद भी चर्चा का विषय बनी रही. झारखंड के प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उनके आंदोलन की भाषा ही उसे दिल्ली के आंदोलन से अलग बनाती है.

कोर कमेटी के सदस्य पवन कुमार गोस्वामी ने दिप्रिंट से कहा, “छात्र पूरे देश में झारखंड की अच्छी छवि बना रहे हैं. हम किसी का नाम नहीं ले रहे और न ही ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ जैसे नारे लगा रहे हैं.”

उन्होंने आगे कहा, “हमने गाली-गलौज नहीं की है. हम किसी के इस्तीफे की भी मांग नहीं कर रहे. हम सिर्फ सही मांगें उठा रहे हैं और व्यवस्था में सुधार चाहते हैं.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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