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Wednesday, 30 September, 2026
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सोहराबुद्दीन केस फिर चर्चा में: अमित शाह का बरी होना, जज लोया की मौत और 92 गवाहों का मुकरना

सुप्रीम कोर्ट ने सोहराबुद्दीन केस में 22 आरोपियों की बरी होने की जांच करने पर सहमति जताई है, लेकिन साफ किया है कि अमित शाह को 2014 में मिली केस से छुट्टी को दोबारा नहीं खोला जाएगा.

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने 2005 में गैंगस्टर सोहराबुद्दीन शेख की कथित फर्जी मुठभेड़ में 22 आरोपियों के बरी होने की जांच करने पर सहमति जताई है. हालांकि, कोर्ट ने साफ किया कि गृह मंत्री अमित शाह को 2014 में इस मामले से मिली छुट्टी को दोबारा नहीं खोला जाएगा.

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली और जस्टिस जे. बागची और वी. मोहना की पीठ ने शेख के भाई रुबाबुद्दीन की याचिका पर नोटिस जारी किया. इस याचिका में बॉम्बे हाई कोर्ट के 7 मई के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसमें आरोपियों की बरी होने को बरकरार रखा गया था.

CJI कांत ने कहा कि अदालत को सुनवाई की “निष्पक्षता” और बरी किए गए आरोपियों से जुड़े गवाहों के बयानों में दिलचस्पी है.

अदालत ने इस बात पर गंभीर चिंता जताई कि 210 में से 92 गवाह सुनवाई के दौरान अपने बयानों से मुकर गए. इसके बाद ट्रायल कोर्ट ने दिसंबर 2018 में बचे हुए 22 आरोपियों को बरी कर दिया था.

जस्टिस बागची ने शेख की ओर से पेश वरिष्ठ वकील डी.एस. नायडू से कहा कि अदालत को उम्मीद है कि याचिका में बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले के पैरा 43 को दोबारा खोलने की मांग नहीं की गई है. इस पैराग्राफ में शाह को केस से मिली छुट्टी को दोबारा नहीं खोलने के मुद्दे पर बात की गई थी.

CJI कांत ने कहा कि इसे दोबारा खोलने का “कोई सवाल ही नहीं है”.

जब यह हत्या हुई थी उस समय अमित शाह गुजरात के गृह मंत्री थे. शुरुआत में उन्हें आरोपियों में शामिल किया गया था और बाद में 30 दिसंबर 2014 को उन्हें इस मामले से छुट्टी दे दी गई. मुंबई के विशेष CBI जज ब्रिजगोपाल हरिकिशन लोया की 1 दिसंबर 2014 को मौत हो गई थी.

सोहराबुद्दीन शेख, उनकी पत्नी कौसर बी और उनके सहयोगी तुलसीराम प्रजापति की 2005 और 2006 में राजस्थान और गुजरात पुलिस के साथ कथित फर्जी मुठभेड़ में हत्या कर दी गई थी. 2018 में CBI कोर्ट ने मामले के सभी 22 आरोपियों को बरी कर दिया था. इनमें तीन राज्यों के 21 पुलिस अधिकारी शामिल थे. इस साल मई में बॉम्बे हाई कोर्ट ने 2018 के CBI कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा.

मई में बरी करने का आदेश देने वाले हाई कोर्ट के जजों में से एक, जस्टिस श्री चंद्रशेखर को बाद में सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत किया गया. ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि मौतें हुई थीं, लेकिन अभियोजन पक्ष यह साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा कि इसके लिए आपराधिक रूप से कौन जिम्मेदार था.

ट्रायल कोर्ट में आरोप तय होने से पहले शाह को इस आधार पर केस से छुट्टी दी गई थी कि उन्हें “मुठभेड़” की साजिश से जोड़ने वाला पर्याप्त सबूत नहीं था. बाद में हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी उनकी छुट्टी को बरकरार रखा.

सोहराबुद्दीन के परिवार की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 2010 में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को गुजरात CID से जांच अपने हाथ में लेने का आदेश दिया था.

दिप्रिंट इस मामले में 2005 की “फर्जी मुठभेड़”, CBI की भूमिका, अमित शाह पर लगे आरोपों, जज लोया की मौत और 2018 में ट्रायल कोर्ट से आरोपियों के बरी होने तक पूरे मामले में आए उतार-चढ़ाव के बारे में बता रहा है.

हत्याएं

CBI ने आरोप लगाया था कि सोहराबुद्दीन शेख, उनकी पत्नी कौसर बी और उनके सहयोगी तुलसीराम प्रजापति को 22 नवंबर 2005 की रात गुजरात और राजस्थान की पुलिस टीम ने अगवा कर लिया था. उस समय वे कौसर बी के इलाज और ईद मनाने के लिए हैदराबाद से सांगली जा रही एक लग्जरी बस में सफर कर रहे थे.

आरोप है कि उन्हें जाहिराबाद के पास रोका गया, अहमदाबाद के कई फार्महाउस में ले जाया गया और बाद में उनकी हत्या कर दी गई.

26 नवंबर 2005 को विशाल सर्किल के पास सोहराबुद्दीन को गोली मार दी गई. पुलिस ने इस घटना को “मुठभेड़” बताया था. कौसर बी का शव कभी नहीं मिला. हालांकि, CBI ने दावा किया था कि उनकी हत्या कर दी गई थी और उनके शव के अवशेष नर्मदा नदी में फेंक दिए गए थे.

एक साल से ज्यादा समय बाद, 28 दिसंबर 2006 को तुलसीराम प्रजापति की भी हत्या कर दी गई. पुलिस का दावा था कि हिम्‍मतनगर के पास हिरासत से भागने की कोशिश के बाद हुई “मुठभेड़” में उनकी मौत हुई.

शुरुआत में गुजरात की एंटी-टेररिज्म स्क्वॉड और CID (क्राइम) इस मामले की जांच कर रही थी. इसके बाद जनवरी 2010 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जांच CBI को सौंप दी गई. इसके बाद मामले दर्ज किए गए और चार्जशीट दाखिल की गईं.

परिवार की बार-बार मांग के बाद केस को गुजरात से मुंबई ट्रांसफर कर दिया गया.

CBI ने तीन साल की जांच के बाद 2013 में 22,000 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की. इसमें आरोप लगाया गया कि अमित शाह, जब गुजरात में गृह राज्य मंत्री थे, ने अपने राज्य, पड़ोसी राजस्थान और अविभाजित आंध्र प्रदेश के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के साथ मिलकर तीनों की हत्या की साजिश रची.

उस समय राजस्थान के गृह मंत्री गुलाब चंद कटारिया का नाम भी चार्जशीट में था. CBI ने कहा था कि ये हत्याएं “राजनेता-पुलिस गठजोड़” का नतीजा थीं. एजेंसी का आरोप था कि राजनेता सोहराबुद्दीन को खत्म करना चाहते थे क्योंकि वह “राजस्थान के मार्बल कारोबारियों” से जबरन पैसे वसूल रहा था.

इसके अलावा, सुनवाई के दौरान 1996 से चली आ रही गांव की गहरी राजनीतिक दुश्मनी और गैंगवार की बात भी सामने आई.

हालांकि, इनमें से कोई भी बात अदालत में साबित नहीं हो सकी. 210 गवाहों में से 92 अपने बयान से मुकर गए, एक शिकायतकर्ता ने अपना बयान बदल दिया, एक गवाह को कई बार समन भेजने के बावजूद वह अदालत में पेश नहीं हुआ और दो गवाहों ने ट्रायल कोर्ट के फैसले से एक दिन पहले दोबारा गवाही देने की मांग की. उनका कहना था कि पहले उन पर दबाव था.

बरी किए गए 22 आरोपियों में से 21 गुजरात, राजस्थान और आंध्र प्रदेश के पुलिस अधिकारी थे. 22वां आरोपी गुजरात के उस फार्महाउस का मालिक था, जहां सोहराबुद्दीन और उनकी पत्नी कौसर बी को कथित तौर पर अवैध तरीके से रखा गया था.

सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बावजूद कि पूरी सुनवाई एक ही जज के सामने होनी चाहिए, मामले की सुनवाई चार जजों ने की: जे.टी. उत्पत, जिनका ट्रांसफर हो गया; बी.एच. लोया, जिनकी दिसंबर 2014 में कथित तौर पर विवादित परिस्थितियों में मौत हो गई; एम.बी. गोसावी, जिन्होंने फरवरी 2017 में ट्रांसफर होने तक मामले की सुनवाई की; और एस.जे. शर्मा, जिन्होंने आखिरकार 2018 में फैसला सुनाया.

शाह की गिरफ्तारी और केस से छुट्टी, और जज लोया की मौत

जुलाई 2010 में CBI ने चार्जशीट दाखिल की. इसके एक दिन बाद शाह अहमदाबाद में सार्वजनिक रूप से सामने आए और अपनी बेगुनाही की बात कही. उन्होंने आरोपों को राजनीतिक वजहों से लगाए गए आरोप बताया. इसके बाद वह गांधीनगर स्थित CBI कार्यालय गए और सरेंडर कर दिया.

उन्हें न्यायिक हिरासत में अहमदाबाद की साबरमती सेंट्रल जेल भेज दिया गया. गुजरात हाई कोर्ट ने 29 अक्टूबर 2010 को उन्हें जमानत देने से पहले उन्होंने तीन महीने से ज्यादा समय जेल में बिताया.

30 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें गुजरात में प्रवेश करने से रोक दिया. कोर्ट ने कहा कि यह चल रही जांच की “ईमानदारी बनाए रखने” और “सबूतों से छेड़छाड़” रोकने के लिए जरूरी है.

सितंबर 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने CBI की जमानत पूरी तरह रद्द करने की मांग खारिज कर दी और आखिरकार शाह को गुजरात लौटने की अनुमति दे दी.

हालांकि, उनके गृह राज्य से बाहर निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए कोर्ट ने पूरे सोहराबुद्दीन शेख केस को मुंबई की विशेष CBI अदालत में ट्रांसफर करने का आदेश दिया. यह आदेश जस्टिस आफताब आलम और जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की पीठ ने दिया था.

दो साल बाद मुंबई में इस मामले की सुनवाई कर रहे विशेष CBI जज बी.एच. लोया की 1 दिसंबर 2014 को दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई.

जज लोया एक सहयोगी की बेटी की शादी में शामिल होने नागपुर गए थे. आधिकारिक मेडिकल और संस्थागत रिकॉर्ड के मुताबिक, सुबह के समय एक सरकारी गेस्ट हाउस में उन्हें अचानक सीने में दर्द हुआ और 48 साल की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से उनकी मौत हो गई.

जज लोया के परिवार ने उनकी मौत की जांच के लिए जांच आयोग बनाने की मांग की थी, लेकिन ऐसा कोई आयोग नहीं बनाया गया. परिवार ने आरोप लगाया था कि जज लोया को अनुकूल फैसला देने के लिए एक वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी ने 100 करोड़ रुपये की रिश्वत की पेशकश की थी.

बाद में मीडिया रिपोर्ट और याचिकाएं सामने आईं, जिनमें उनकी मौत के समय और परिस्थितियों को लेकर सवाल उठाए गए, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 19 अप्रैल 2018 को स्वतंत्र जांच की मांग वाली सभी जनहित याचिकाएं खारिज कर दीं. कोर्ट ने मौत को पूरी तरह प्राकृतिक बताया. यह फैसला तत्कालीन CJI दीपक मिश्रा, जस्टिस ए.एम. खानविलकर और जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ की तीन जजों की पीठ ने दिया था.

जज लोया की मौत के बाद दिसंबर 2014 में जज एम.बी. गोसावी को मामले की सुनवाई की जिम्मेदारी दी गई. जज गोसावी ने दलीलें सुनीं और 30 दिसंबर 2014 को अमित शाह को मामले से छुट्टी दे दी.

अपने फैसले में विशेष CBI जज ने कहा कि शाह के खिलाफ कोई पक्का सबूत नहीं था. उन्होंने यह भी कहा कि आरोपों में राजनीतिक रंग दिखाई देता है और निष्कर्ष निकाला कि CBI ने राजनीतिक वजहों से उन्हें मामले में शामिल किया था.

बाद में इस आदेश को चुनौती देने वाली कानूनी याचिकाएं ऊंची अदालतों ने खारिज कर दीं. आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने भी साफ किया कि वह शाह को केस से मिली छुट्टी को दोबारा नहीं खोलेगा.

2018 में ट्रायल कोर्ट का बरी करने का फैसला

विशेष सत्र अदालत ने दिसंबर 2018 में सबूतों और भरोसेमंद गवाहों की कमी के कारण 22 आरोपियों को बरी कर दिया. जांच किए गए 210 गवाहों में से 92 अपने बयान से मुकर गए. इनमें लग्जरी बस के कुछ अहम यात्री और ड्राइवर भी शामिल थे. उन्होंने बस से किसी के अपहरण की बात से पूरी तरह इनकार किया. CBI के पूरे मामले की शुरुआत इसी अपहरण के दावे से हुई थी.

ट्रायल जज ने कहा कि राजनेता-पुलिस गठजोड़ साबित करने के लिए “एक भी सबूत नहीं” था. उन्होंने यह भी कहा कि जब्त किए गए हथियार वास्तव में मुठभेड़ में इस्तेमाल हुए थे, यह भी साबित नहीं हुआ. फोरेंसिक जांच में भी कई कमियां थीं. आरोपियों से बरामद कारतूस उनकी सर्विस पिस्टल से मेल नहीं खाते थे.

इसके अलावा, मेडिकल सबूत भी अभियोजन पक्ष के इस दावे के खिलाफ थे कि एक पुलिस अधिकारी, जो इस मामले में आरोपी भी था, को लगी चोट मुठभेड़ को असली दिखाने के लिए खुद से लगाई गई थी. मेडिकल सबूतों से इसके बजाय यह संकेत मिला कि वह चोट वास्तव में मुठभेड़ के दौरान लगी थी.

अंत में ट्रायल कोर्ट ने कहा कि आरोपियों में से ज्यादातर सरकारी कर्मचारी थे. इसलिए उनके खिलाफ मुकदमा चलाने से पहले CrPC की धारा 197 के तहत राज्य सरकार की मंजूरी जरूरी थी क्योंकि वे अपने सरकारी काम के तहत काम कर रहे थे.

2026 में हाई कोर्ट का फैसला, आरोपियों की बरी बरकरार

इस साल 7 मई को बॉम्बे हाई कोर्ट की तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रशेखर और जस्टिस गौतम ए. अंखड की पीठ ने कहा कि बरी किए जाने का फैसला “आरोपी की बेगुनाही की धारणा को और मजबूत करता है”. ऐसे फैसले को पलटने के लिए “स्पष्ट गैरकानूनी या बहुत गलत” होने का ऊंचा स्तर साबित करना जरूरी है. अदालत के मुताबिक, अभियोजन पक्ष ऐसा करने में नाकाम रहा.

इसलिए अदालत ने ट्रायल कोर्ट के फैसले में दखल देने का कोई आधार नहीं पाया.

50 पन्नों के अपने फैसले में अदालत ने मुंबई के गोरेगांव (ईस्ट) के रहने वाले हर्ष मंदर की एक अंतरिम याचिका पर भी फैसला किया. मंदर ने दिसंबर 2014 में ट्रायल कोर्ट द्वारा अमित शाह को केस से छुट्टी दिए जाने को चुनौती दी थी.

हालांकि, बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट 2016 में ही 2014 के ट्रायल कोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील खारिज कर चुका है. साथ ही मंदर को अपराध दर्ज किए जाने से जोड़ने वाला कोई सबूत नहीं था. इसलिए हाई कोर्ट ने कहा कि उसे यह कहने में “कोई झिझक नहीं” है कि यह याचिका “छिपे हुए मकसद और अमित शाह के किसी राजनीतिक विरोधी के कहने पर” दायर की गई थी.

आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले को बरकरार रखते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि वह सिर्फ इसलिए ट्रायल कोर्ट के फैसले में दखल नहीं दे सकता क्योंकि “एक दूसरा नजरिया भी संभव है”.

अदालत ने 2024 में सुप्रीम कोर्ट के Mallappa & Ors v. State of Karnataka मामले में बताए गए “दो नजरिए के सिद्धांत” को लागू किया. अदालत ने कहा कि जब सबूतों से दो समान रूप से संभव निष्कर्ष निकल सकते हैं, तो “आरोपी की बेगुनाही के पक्ष में जाने वाला निष्कर्ष सबसे सुरक्षित रास्ता है”.

हाई कोर्ट ने कहा कि परिस्थितिजन्य सबूतों की कड़ी कई जगह टूट गई थी. अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि आरोपियों का कोई मकसद था या वे घटनास्थल पर मौजूद भी थे.

CBI के इस आरोप के बारे में कि हत्याएं “राजनेता-पुलिस गठजोड़” का नतीजा थीं, हाई कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष का सिद्धांत कई बार “एक खास कहानी से मेल खाता था, जिसमें राजनीतिक रंग बहुत ज्यादा था”. अदालत के मुताबिक, पर्याप्त सबूत के बिना कुछ खास राजनीतिक लोगों पर जिम्मेदारी डालने की कोशिश की गई.

अदालत ने खास तौर पर कहा कि “मार्बल लॉबी से जबरन पैसे वसूलने की बात साबित करने के लिए तो दूर, इसके शुरुआती सबूत के बारे में भी कुछ नहीं था”.

आखिर में अदालत ने कहा कि सार्वजनिक न्याय के हित में दखल देने की जरूरत नहीं थी, क्योंकि अभियोजन पक्ष का मामला ऐसी बातों पर आधारित था जो सुनी-सुनाई थीं और ऐसे अविश्वसनीय गवाहों के “तोते की तरह दोहराए गए” बयानों पर आधारित था, जिनका आपराधिक रिकॉर्ड था.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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