नई दिल्ली: तहलका के पूर्व संपादक तरुण तेजपाल को 2013 में अपनी पूर्व जूनियर महिला सहकर्मी के साथ रेप, यौन उत्पीड़न और यौन हमले के मामले में गुरुवार को बॉम्बे हाईकोर्ट ने 10 साल के कठोर कारावास (सश्रम जेल) की सज़ा सुनाई.
अदालत ने तरुण तेजपाल को दो हफ्ते के भीतर आत्मसमर्पण (सरेंडर) करने का आदेश दिया है.
अदालत में तेजपाल ने खुद को निर्दोष बताया और कहा कि वह इस फैसले को ऊपरी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगा. उसने खुद को राजनीतिक साजिश का शिकार बताते हुए कहा कि वह 62 साल का है, शादीशुदा है और दो बेटियों का पिता है.
गुरुवार सुबह दोषी ठहराए जाने के बाद बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा बेंच ने तेजपाल की सजा पर दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं.
तेजपाल की ओर से पेश वरिष्ठ वकील आबाद पोंडा ने अदालत से कहा कि उनके खिलाफ कोई दूसरा आपराधिक मामला लंबित नहीं है और यह उनका पहला अपराध है. उन्होंने कहा कि 2013 की घटना और 2022 में गोवा सरकार द्वारा अपील दायर किए जाने के बाद से तेजपाल ने अदालत की किसी भी शर्त का उल्लंघन नहीं किया है.
उन्होंने यह भी बताया कि तेजपाल अपना पासपोर्ट पहले ही जमा कर चुका है. इसलिए उन्होंने अदालत से न्यूनतम सजा देने और फैसले के खिलाफ अपील करने के लिए आठ हफ्ते का समय देने की मांग की.
गोवा सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत से कहा कि तेजपाल शिकायतकर्ता के पिता को अच्छी तरह जानते थे और उनकी उम्र भी लगभग शिकायतकर्ता के पिता के बराबर है. उन्होंने कहा कि तेजपाल ने “अगले दिन फिर वही अपराध दोहराया”, जिससे साफ है कि उसे अपने किए पर कोई पछतावा नहीं था.
फैसला सुनाते हुए जस्टिस नीला गोखले और जस्टिस अमित जमसंडेकर की बेंच ने कहा कि यह घटना 13 साल पुरानी है और 2021 में बरी होने के बाद से तेजपाल के खिलाफ किसी गलत व्यवहार की कोई शिकायत सामने नहीं आई.
अदालत ने पुराने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376(2)(f) के तहत दोषी ठहराते हुए 10 साल के कठोर कारावास और 5 लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई. यह धारा महिला के भरोसे या अधिकार की स्थिति में रहकर रेप करने से संबंधित है.
IPC की धारा 376(2)(k), जो महिला पर नियंत्रण या प्रभुत्व की स्थिति में रहकर रेप करने से जुड़ी है, उसके तहत भी तेजपाल को 10 साल के कठोर कारावास और 5 लाख रुपये जुर्माने की सजा दी गई.
इसी तरह IPC की धारा 354 के तहत, जो किसी महिला की गरिमा भंग करने की नीयत से हमला या बल प्रयोग करने से जुड़ी है, तेजपाल को एक साल के कठोर कारावास और 10,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई.
धारा 354B, जो किसी महिला के कपड़े उतारने की नीयत से हमला या बल प्रयोग करने से जुड़ी है, उसके तहत उसे तीन साल के कठोर कारावास और 10,000 रुपये जुर्माने की सजा दी गई.
अदालत ने आदेश दिया कि सभी सजाएं एक साथ चलेंगी (Concurrent). यानी तेजपाल को सभी मामलों की सजा एक साथ काटनी होगी, एक के बाद एक नहीं. अदालत ने गोवा पुलिस को तीन महीने के भीतर अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का भी निर्देश दिया.
मामला क्या है
गुरुवार सुबह बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा बेंच ने 2021 में ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए बरी करने के फैसले को पलट दिया था. गोवा की ट्रायल कोर्ट ने यह कहते हुए तेजपाल को सभी आरोपों से बरी कर दिया था कि शिकायतकर्ता ने ऐसा कोई “सामान्य व्यवहार” नहीं दिखाया, जैसा किसी यौन उत्पीड़न की पीड़िता से उम्मीद की जा सकती है.
गोवा सरकार ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी.
नवंबर 2013 में गिरफ्तार किए गए तेजपाल ने गोवा जेल में छह महीने बिताए थे. इसके बाद 2014 में उसे सुप्रीम कोर्ट ने जमानत दे दी थी.
तेजपाल ने अदालत से कहा था कि BJP की गोवा सरकार ने उसकी आलोचना की वजह से राजनीतिक बदले की भावना से उसके खिलाफ झूठा मामला बनाया है.
हाईकोर्ट में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि किसी भी यौन उत्पीड़न पीड़िता की प्रतिक्रिया का कोई एक तय पैमाना नहीं होता. हर व्यक्ति की शिक्षा, व्यक्तित्व, सामाजिक पृष्ठभूमि और परिस्थितियों के अनुसार उसकी प्रतिक्रिया अलग हो सकती है.
उन्होंने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट ने शिकायतकर्ता के बयानों में छोटी-छोटी असंगतियों को ज़रूरत से ज्यादा महत्व दिया, जबकि यह देखना चाहिए था कि उसके मुख्य आरोप लगातार एक जैसे रहे या नहीं.
मेहता ने कथित घटना के बाद तरुण तेजपाल द्वारा शिकायतकर्ता को भेजे गए ईमेल का भी ज़िक्र किया. उन्होंने कहा कि उस ईमेल में तेजपाल ने अपने “गलत फैसले” के लिए माफी मांगी थी, शर्म जताई थी और लिखा था कि उसे लगा था कि दोनों की सहमति से यह मुलाकात हुई थी. मेहता ने कहा कि इससे यह साबित होता है कि दोनों के बीच कोई घटना हुई थी.
बचाव पक्ष की ओर से वकील आबाद पोंडा ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने माफी वाले ईमेल का गलत मतलब निकाला है. उन्होंने कहा कि किसी भी ईमेल में यह स्वीकार नहीं किया गया कि दोनों के बीच सहमति से कोई शारीरिक या यौन संबंध हुआ था. अदालत को बताया गया कि ईमेल में सिर्फ सहमति से हुई यौन विषय पर बातचीत का जिक्र था.
उन्होंने शिकायतकर्ता की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए. उनका कहना था कि कथित घटना से पहले और बाद में शिकायतकर्ता का व्यवहार, उसके ईमेल, व्हाट्सऐप संदेश और दूसरे दस्तावेज अभियोजन पक्ष की कहानी से मेल नहीं खाते.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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