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Thursday, 6 August, 2026
होमफीचरगुरुग्राम का 'OC घोटाला'—कैसे एक सरकारी सर्टिफिकेट खरीदारों को अधूरे घरों में फंसा देता है

गुरुग्राम का ‘OC घोटाला’—कैसे एक सरकारी सर्टिफिकेट खरीदारों को अधूरे घरों में फंसा देता है

गुरुग्राम में घर खरीदने वालों को नए मिले घरों को देखकर ज़ोरदार झटका लग रहा है—ये घर असल में नहीं, बल्कि सिर्फ़ कागज़ों पर ही तैयार हैं. अब हरियाणा प्रशासन इस मामले में सख़्त कार्रवाई कर रहा है.

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करीब पांच साल के इंतिज़ार के बाद जब 40 वर्षीय कॉरपोरेट कर्मचारी सुब्रतो बिस्वास को आखिरकार गुरुग्राम में अपने सपनों के घर की चाबियां मिलीं, तो उनके सामने निराशाजनक तस्वीर थी. सेक्टर-102 में जिस आधुनिक 3BHK फ्लैट को उन्हें वर्ल्ड-क्लास सुविधाओं—जैसे क्लबहाउस, स्विमिंग पूल, हरियाली, निर्धारित पार्किंग, 24×7 सुरक्षा और निर्बाध बिजली-पानी की आपूर्ति—के साथ बेचने का वादा किया गया था, वहां बुनियादी सुविधाएं भी पूरी तरह उपलब्ध नहीं थीं. हालात ऐसे हैं कि सोसाइटी में आज तक प्रवेश द्वार और चालू लिफ्ट तक नहीं हैं. मजबूरन बिस्वास आज भी द्वारका में किराए के फ्लैट में रह रहे हैं.

बिस्वास ने 2019 में यह फ्लैट बुक किया था और 2024 में उन्हें इसका कब्जा मिला. नई शुरुआत की उम्मीद में वह कुछ समय के लिए परिवार के साथ वहां रहने भी पहुंचे, लेकिन जल्द ही उन्हें एहसास हो गया कि लेआउट प्लान में दिखाए गए दो एंट्री गेट कहीं नहीं हैं. इतना ही नहीं, क्लबहाउस, ड्रेनेज सिस्टम, पावर बैकअप, चारदीवारी और साझा उपयोग की कई दूसरी सुविधाएं भी अब तक अधूरी पड़ी हैं.

बिस्वास कहते हैं, “कागजों में और ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट (OC) में सब कुछ बिल्कुल सही दिखता है, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि हमें बुनियादी सुविधाओं के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है.”

इन दिनों गुरुग्राम के कई निवासियों की चिंता के केंद्र में ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट है, जिसे हरियाणा में आधिकारिक तौर पर ऑक्युपेशन सर्टिफिकेट भी कहा जाता है. ‘ओसी’ अब लोगों के गुस्से और अधिकारियों की परेशानी का बड़ा कारण बन गया है. कई इमारतों को रहने के लिए तैयार घोषित कर दिया जाता है, जबकि उनका निर्माण अब भी अधूरा होता है. लिफ्ट, ग्रीन बेल्ट, सीवेज सिस्टम और पावर बैकअप जैसी कई सुविधाएं सिर्फ ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट (OC) और कंप्लीशन सर्टिफिकेट (CC) के कागजों तक ही सीमित रहती हैं.

बिस्वास का आरोप है, “गुरुग्राम में OC और CC का खेल अब आम हो गया है. जिन परियोजनाओं में तय मानकों का पालन तक नहीं हुआ, उन्हें भी ये प्रमाणपत्र मिल जाते हैं. ऐसा लगता है कि प्रमाणपत्र जारी करने से पहले कोई भी ज़मीनी स्थिति की जांच नहीं करता.”

अब हरियाणा सरकार ने इस पर सख्ती शुरू कर दी है.

अप्रैल में मुख्यमंत्री की ‘फ्लाइंग स्क्वॉड’ और टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग (DTCP) ने गुरुग्राम की 22 आवासीय इमारतों का औचक निरीक्षण किया. जांच में पाया गया कि इनमें से 14 इमारतों को ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट मिलने के बावजूद उनका निर्माण जारी था. कुछ इमारतें तो केवल ढांचे के रूप में खड़ी थीं, जहां न प्लास्टर हुआ था, न फर्श तैयार था और न ही रसोई व बाथरूम इस्तेमाल के लायक थे.

“ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट तभी जारी होना चाहिए, जब परियोजना का हर काम पूरी तरह खत्म हो जाए, जिसमें पेंटिंग जैसी फिनिशिंग भी शामिल है. लेकिन औचक निरीक्षण के दौरान पता चला कि कुछ आर्किटेक्ट अधूरी परियोजनाओं के लिए भी OC जारी कर रहे थे.”

— प्रवीण चौहान, जिला नगर योजनाकार (योजना), गुरुग्राम 

इस पूरे मामले की बड़ी वजह नवंबर 2022 में हरियाणा के DTCP द्वारा शुरू की गई सेल्फ-ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट व्यवस्था को माना जा रहा है. इस व्यवस्था के तहत लाइसेंस प्राप्त आवासीय कॉलोनी में किसी व्यक्तिगत प्लॉट पर बने पात्र मकान का नक्शा तैयार करने या निर्माण की निगरानी करने वाला पंजीकृत आर्किटेक्ट ही सक्षम प्राधिकारी के रूप में बिना विभाग के अनिवार्य भौतिक निरीक्षण के ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट जारी कर सकता है.

फ्लाइंग स्क्वॉड की जांच के बाद अधिकारियों ने 1 जुलाई 2025 से 15 मार्च 2026 के बीच सेल्फ-सर्टिफिकेशन नीति के तहत जारी किए गए ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट की जांच शुरू की. प्रवीण चौहान के मुताबिक, अब तक की जांच में करीब 2,000 ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट अवैध तरीके से जारी किए जाने का पता चला है.

चौहान ने दोहराया, “ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट तभी जारी होना चाहिए, जब परियोजना का हर हिस्सा पूरी तरह तैयार हो, जिसमें पेंटिंग जैसी फिनिशिंग भी शामिल है. लेकिन औचक निरीक्षण में पाया गया कि कुछ आर्किटेक्ट अधूरी इमारतों के लिए भी OC जारी कर रहे थे.”

पिछले महीने DTCP अधिकारियों ने सेल्फ-सर्टिफिकेशन नीति के तहत अधूरी इमारतों को ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट जारी करने के आरोप में 15 आर्किटेक्ट्स को ब्लैकलिस्ट करने की सिफारिश की. जांच में यह भी सामने आया कि कई मामलों में स्वीकृत फ्लोर एरिया रेशियो (FAR) से अधिक निर्माण किया गया, बिना अनुमति अतिरिक्त मंजिलें या आवासीय इकाइयां बनाई गईं और स्टिल्ट या बेसमेंट पार्किंग को आवासीय या व्यावसायिक उपयोग में बदल दिया गया.

चौहान ने कहा, “ऑक्यूपेशन सर्टिफिकेट जारी करने की प्रक्रिया में किसी भी तरह की अनियमितता रोकने के लिए विभाग लगातार औचक निरीक्षण कर रहा है और परियोजनाओं की प्रगति पर नजर रख रहा है.”

OC ऐसे बांटे जा रहे हैं जैसे पैकेटबंद खाना

गुरुग्राम की एम्बिएंस लैगून सोसाइटी के निवासी और वकील संजय लाल का कहना है कि उनकी अपनी हाउसिंग सोसाइटी ही ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट (OC) जारी करने की प्रक्रिया की खामियों का सबसे बड़ा उदाहरण है. उनका आरोप है कि जिस जमीन पर यह परियोजना बनी, वह अदालत में विवाद का विषय थी, इसके बावजूद इसे ऑक्यूपेंसी और कंप्लीशन सर्टिफिकेट जारी कर दिए गए.

इस परियोजना को 1993 में 18.98 एकड़ में आवासीय विकास के लिए लाइसेंस मिला था. लेकिन 2001 में हरियाणा सरकार ने इसमें से 8 एकड़ जमीन को आवासीय परियोजना से अलग (डी-लाइसेंस) कर व्यावसायिक इस्तेमाल की अनुमति दे दी. इसी जमीन पर आज एम्बिएंस मॉल बना हुआ है. इसके बाद 2010 में 3.9 एकड़ और जमीन को भी इसी तरह डी-लाइसेंस कर दिया गया. आवासीय भूमि के इस बदलाव को लेकर वर्षों तक कानूनी लड़ाई चलती रही.

गुरुग्राम के रहने वाले वकील संजय लाल ने कहा, “अधिकारी बिना ठीक से ज़मीनी जांच किए ही ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट ऐसे बांटते हैं जैसे पैक्ड फ़ूड हो।” | फ़ोटो: अलमिना खातून | दिप्रिंट

2020 में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने डी-लाइसेंसिंग की मंजूरी रद्द करते हुए मामले की CBI जांच के आदेश दिए थे. लेकिन इस कानूनी विवाद के दौरान ही परियोजना को ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट (OC) और कंप्लीशन सर्टिफिकेट (CC) मिल गए और लोग वहां रहने भी लगे.

लाल कहते हैं, “लोगों के यहां रहने आने के बाद ही उन्हें रोजमर्रा की समस्याओं का सामना करना पड़ा.” उनके मुताबिक, इस परियोजना को 2001 में 12 आवासीय टावरों के लिए पहला ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट मिला था, जबकि 2007 में दो और टावरों के लिए दूसरा OC जारी किया गया.

सेक्टर 24, गुरुग्राम में एंबिएंस लैगून. निवासी संजय लाल ने आरोप लगाया कि मूल रूप से परियोजना के लिए निर्धारित हरित क्षेत्रों का उपयोग बाद में आंतरिक सड़कों और अतिरिक्त ब्लॉक विकसित करने के लिए किया गया था फोटो: अलमिना खातून | दिप्रिंट

वह सवाल उठाते हैं, “एक ही हाउसिंग सोसाइटी के लिए दो अलग-अलग ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट नहीं होने चाहिए. लेकिन इन्हें जारी करने से पहले इन बातों की जांच करने वाला आखिर है कौन?”

जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट का फैसला रद्द कर दिया. शीर्ष अदालत ने कहा कि हाई कोर्ट का आदेश “अप्रमाणित और निष्कर्षहीन सामग्री” पर आधारित था और CBI जांच के निर्देश उचित नहीं थे. हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट किया कि यदि किसी फ्लैट खरीदार को लगता है कि उसके साथ धोखा हुआ है, तो वह अलग से कानूनी कार्रवाई कर सकता है.

लाल का दावा है कि परियोजना में जिन हरित क्षेत्रों (ग्रीन एरिया) को मूल रूप से चिह्नित किया गया था, उन्हें बाद में व्यावसायिक उपयोग में बदल दिया गया. उनका यह भी आरोप है कि सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP), जिसे शुरुआत में केवल 12 आवासीय टावरों की जरूरतों को पूरा करने के लिए बनाया गया था, अब पूरे परिसर, जिसमें व्यावसायिक प्रतिष्ठान भी शामिल हैं, का भार उठा रहा है. इससे बुनियादी ढांचे पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है.

गुरुग्राम के एम्बिएंस लैगून का एक नज़ारा, जहाँ प्रोजेक्ट के कानूनी विवाद में होने के बावजूद ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट जारी किए गए थे | फोटो: अलमिना खातून | दिप्रिंट

उन्होंने यह भी कहा कि सोसाइटी के बेसमेंट अग्नि सुरक्षा के बुनियादी मानकों पर भी खरे नहीं उतरते. वहां पर्याप्त स्प्रिंकलर सिस्टम और आपातकालीन निकास जैसी जरूरी सुविधाएं नहीं हैं. उनका आरोप है कि प्रमाणपत्र जारी करने से पहले इनकी कभी ठीक से जांच भी नहीं की गई.

लाल का आरोप है, “अधिकारियों ने ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट ऐसे बांटे हैं जैसे पैकेटबंद खाना बांटा जाता है. ज़मीन पर जाकर सही तरीके से निरीक्षण तक नहीं किया गया.”

उन्होंने कहा, “इसी तरह लोगों के साथ धोखा होता है. उनकी शिकायत सुनने के लिए भी कोई प्रभावी व्यवस्था नहीं है. जब भी हम अधिकारियों के पास जाते हैं, वे कह देते हैं कि परियोजना के पास OC और CC दोनों हैं. लेकिन असली सवाल यह है कि ज़मीनी हकीकत देखे बिना ये प्रमाणपत्र आखिर किसने जारी कर दिए?”

मुश्किलों से जूझते निवासी

द्वारका स्थित अपने किराए के घर में लौट चुके सुब्रतो बिस्वास अब इस कड़वी हकीकत को स्वीकार करने लगे हैं कि गुरुग्राम की 12वीं मंजिल पर स्थित उनका नया फ्लैट, जिसे उन्होंने अपने सपनों का घर समझकर खरीदा था, उनकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा.

हाउसिंग कॉम्प्लेक्स में जिस पावर बैकअप का वादा किया गया था, उसके लिए 66 केवी की लोड क्षमता होने की बात कही गई थी. लेकिन वास्तविक स्वीकृत लोड उस वादे के अनुरूप नहीं है. वहीं, सोसाइटी का सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) पूरे परिसर के गंदे पानी का भार संभालने में सक्षम नहीं है. नतीजतन, शोधन के बाद निकलने वाले पानी से बदबू आती है. इसके अलावा, सोसाइटी की चारदीवारी भी अब तक पूरी नहीं हुई है, जिससे सुरक्षा को लेकर चिंता बनी रहती है.

एक बहुराष्ट्रीय कंपनी (MNC) में कार्यरत बिस्वास कहते हैं, “हम इन समस्याओं और अनियमितताओं की शिकायत लगातार अधिकारियों से करते हैं, लेकिन उसके बाद सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो जाता है.”

हम शांति से रहने के लिए और किए गए वादों पर अच्छी तरह विचार करने के बाद घर खरीदते हैं. लेकिन जब ज़मीनी स्तर पर बुनियादी सुविधाएं ही नहीं होतीं और हमारी शिकायतों पर कोई ध्यान नहीं देता, तो ऐसा लगता है कि हमारा पैसा और मन की शांति, दोनों ही फंस गए हैं.

— सुब्रतो बिस्वास, गुरुग्राम में घर खरीदने वाले

वह बताते हैं कि जब भी वह सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट या पावर बैकअप का मुद्दा उठाते हैं, तो अधिकारी और बिल्डर एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालने लगते हैं. उन्होंने कई बार शिकायतें दर्ज कराईं, लेकिन या तो कोई जवाब नहीं मिला या फिर सिर्फ यह आश्वासन दिया गया कि मामले की जांच की जाएगी.

बिल्डर और सोसाइटी प्रबंधन समिति से कोई संतोषजनक समाधान नहीं मिलने पर बिस्वास ने आखिरकार वापस द्वारका लौटने का फैसला किया, जहां वह पहले रहते थे. उनका कहना है कि लिफ्ट, पानी और बिजली जैसी रोजमर्रा की समस्याओं से जूझना अब संभव नहीं रह गया था.

बिस्वास कहते हैं, “हम घर इसलिए खरीदते हैं कि सुकून से रह सकें और खरीदने से पहले बिल्डर के हर वादे को ध्यान से देखते हैं. लेकिन जब ज़मीन पर बुनियादी ढांचा ही मौजूद न हो और हमारी शिकायत सुनने वाला कोई न हो, तो लगता है कि सिर्फ हमारा पैसा ही नहीं, हमारा सुकून भी फंस गया है.”

निर्माण पूरा होने से पहले ही मिल गया OC

गुरुग्राम की कई दूसरी आवासीय परियोजनाओं में भी ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट (OC) जारी करने की प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं सामने आई हैं. सेक्टर-61 की एक हाउसिंग परियोजना को 2024 में ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट मिल गया, जबकि उसे कंप्लीशन सर्टिफिकेट (CC) नहीं मिला था. जिला नगर योजनाकार (डीटीपी) ने कंप्लीशन सर्टिफिकेट एक साल बाद, 2025 में जारी किया.

इस घटनाक्रम ने सवाल खड़े कर दिए हैं कि जब निर्माण पूरा होने का आधिकारिक प्रमाण ही नहीं था, तो लोगों को वहां रहने की अनुमति कैसे दे दी गई. नियमों के मुताबिक, ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट तभी जारी किया जा सकता है, जब निर्माण कार्य पूरी तरह समाप्त हो जाए, उससे जुड़े सभी जरूरी दस्तावेज जमा कर दिए जाएं और सक्षम प्राधिकारी यह सुनिश्चित कर ले कि इमारत स्वीकृत नक्शे और लागू भवन नियमों के अनुरूप बनी है.

गुरुग्राम में एक ऊंची रिहायशी इमारत। अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने अब तक शहर में गलत तरीके से जारी किए गए लगभग 2,000 ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट की पहचान की है | फोटो: अलमिना खातून | दिप्रिंट

हालांकि, स्थानीय निवासियों का आरोप है कि कई बिल्डर जानबूझकर कंप्लीशन सर्टिफिकेट लेने से बचते हैं, क्योंकि उसके बाद वे परियोजना में अतिरिक्त मंजिलें या नए ब्लॉक नहीं जोड़ सकते. इसके बावजूद वे ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट हासिल कर फ्लैटों की बिक्री शुरू कर देते हैं.

पहचान उजागर न करने की शर्त पर सेक्टर-61 के एक निवासी ने कहा, “हम कंप्लीशन सर्टिफिकेट के बिना ही इस सोसाइटी में रह रहे थे, जिससे यहां रहने की वैधता पर सवाल उठता है. किसी को भी निवासियों की सुरक्षा की चिंता नहीं है. बिल्डर और अधिकारी मिलकर काम करते हैं.”

कुछ निवासी हितों के टकराव (कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट) का मुद्दा भी उठाते हैं. उनका कहना है कि निर्माण नियमों के पालन का प्रमाण देने वाला आर्किटेक्ट अक्सर उसी बिल्डर द्वारा नियुक्त किया जाता है, जिसकी परियोजना का मूल्यांकन किया जा रहा होता है.

सेक्टर-61 की इसी परियोजना के एक अन्य निवासी दिवस कहते हैं, “जिस प्राधिकरण पर निरीक्षण की जिम्मेदारी है, वह कई बार मौके पर जाकर जांच ही नहीं करता. ऐसे में जिस आर्किटेक्ट को बिल्डर या डेवलपर भुगतान कर रहा है, उससे यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वह पूरी तरह निष्पक्ष होकर निर्माण की जांच करेगा और उसके बाद प्रमाणपत्र जारी करेगा?”

सिर्फ गुरुग्राम की नहीं है समस्या

ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट से जुड़ी यह समस्या केवल गुरुग्राम तक सीमित नहीं है. देश के दूसरे शहरों में भी अलग-अलग रूपों में ऐसी शिकायतें सामने आ रही हैं.

बेंगलुरु में इस साल अप्रैल में ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी से ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट मिलने के महज तीन महीने बाद ही एक 18 मंजिला इमारत झुकने लगी. अब उसे गिराने की तैयारी की जा रही है. बताया जाता है कि इस इमारत के फ्लैटों की कीमत एक करोड़ से पांच करोड़ रुपये के बीच थी, लेकिन अब उन्हें रहने के लिए सुरक्षित नहीं माना जा रहा है.

वहीं, नोएडा के सेक्टर-150 स्थित एक हाउसिंग सोसाइटी के निवासी बताते हैं कि वे पिछले तीन वर्षों से ‘डीम्ड’ या अस्थायी ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट के आधार पर रह रहे हैं.

सोसाइटी के निवासी सुमित कहते हैं, “हमें डीम्ड OC के आधार पर फ्लैटों का कब्जा दे दिया गया था और कहा गया था कि कुछ ही हफ्तों में सभी कमियां दूर कर दी जाएंगी. लेकिन अब तीन साल बीत चुके हैं.”

उनका कहना है कि कब्जा मिलने के तीन साल बाद भी ग्रीन एरिया, क्लबहाउस और कई लिफ्ट जैसी सुविधाएं अब तक अधूरी हैं.

सुमित कहते हैं, “बिल्डरों और अधिकारियों को पता है कि निवासी लंबे समय तक कानूनी लड़ाई नहीं लड़ सकते. उन्हें लगता है कि आखिरकार जीत उनकी ही होगी और वे अपनी मर्जी से सोसाइटी चलाते रहेंगे. सरकार हो या प्रशासन, कोई भी निवासियों के साथ खड़ा नजर नहीं आता.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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