गुरुग्राम: पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को पलट दिया है, जिसमें जमानत की शर्त के तौर पर जमा किए गए पासपोर्ट को रिन्यू करने की अनुमति देने से इनकार किया गया था. हाई कोर्ट ने कहा कि अदालत के आदेश का पालन करते हुए पासपोर्ट जमा करने का मतलब यह नहीं है कि उसे हमेशा के लिए रिन्यू नहीं कराया जा सकता.
17 सितंबर को दिए गए मौखिक आदेश में जस्टिस वीरिंद्र अग्रवाल ने कहा कि पासपोर्ट रखने और विदेश यात्रा करने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाली व्यक्तिगत आज़ादी का हिस्सा है. हालांकि, इस पर कानून और सक्षम अदालत के आदेश के तहत उचित पाबंदियां लगाई जा सकती हैं.
यह आदेश उस समस्या से जुड़ा है जो अक्सर ज़मानत मिलने के बाद सामने आती है. अदालतें आरोपी लोगों को देश से बाहर जाने से रोकने के लिए उनका पासपोर्ट जमा करने को कहती हैं, लेकिन पासपोर्ट की एक तय वैधता अवधि होती है, इसलिए उसे रिन्यू कराने की कोई जगह नहीं बचती.
अदालत जगतार सिंह की याचिका पर सुनवाई कर रही थी. सिंह ने 2023 में जमानत की शर्त के तौर पर अपना पासपोर्ट जमा किया था, जिसके बाद उसका पासपोर्ट एक्सपायर हो गया. सिंह का नाम पंजाब के बरनाला सिटी पुलिस थाने में 24 फरवरी 2022 को दर्ज एफआईआर में आया था. उन पर आईपीसी की धारा 406 (आपराधिक विश्वासघात), 409 (सरकारी कर्मचारी, बैंकर, व्यापारी या एजेंट की ओर से आपराधिक विश्वासघात), 419 (किसी और की पहचान बताकर धोखाधड़ी), 420 (धोखाधड़ी और बेईमानी से संपत्ति देने के लिए मजबूर करना), 467 (कीमती दस्तावेज, वसीयत आदि की जालसाजी), 468 (धोखाधड़ी के लिए जालसाजी), 471 (जाली दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को असली बताकर इस्तेमाल करना), 201 (सबूत मिटाना या आरोपी को बचाने के लिए गलत जानकारी देना) और 120-बी (आपराधिक साजिश) के तहत मामले दर्ज किए गए थे.
हाई कोर्ट ने 1 फरवरी 2023 को उन्हें जमानत दी थी. इसके बाद उन्होंने अदालत के आदेश का पालन करते हुए अपना पासपोर्ट जमा कर दिया.
सिंह ने सबसे पहले बरनाला के एडिशनल चीफ जुडिशियल मजिस्ट्रेट की अदालत में आवेदन दिया. उन्होंने सिर्फ पासपोर्ट वापस लेने की मांग की थी, ताकि उसे रिन्यू कराया जा सके. मजिस्ट्रेट ने पिछले साल 6 नवंबर को उनका आवेदन खारिज कर दिया. मजिस्ट्रेट ने कहा कि पासपोर्ट जमानत की शर्त के तहत जमा किया गया था.
इसके बाद उन्होंने मजिस्ट्रेट के आदेश को रद्द कराने के लिए हाई कोर्ट का रुख किया.
सिंह के वकील पी.एस. ढिल्लों ने अदालत को बताया कि उनके मुवक्किल का नाम एफआईआर में मुख्य रूप से एक सह-आरोपी के बयान के आधार पर आया था. उन्होंने कहा कि सोसायटी के कामकाज में कथित गड़बड़ियों से सिंह को सीधे जोड़ने वाला कोई ठोस सबूत नहीं है.
ढिल्लों ने कहा कि सिंह जमानत की शर्तों में कोई बदलाव नहीं चाहते हैं. वह सिर्फ अपना पासपोर्ट रिन्यू कराने की सीमित अनुमति चाहते हैं, ताकि वह ऑस्ट्रेलिया में अपने परिवार से मिलने जा सकें. उन्होंने कहा कि मजिस्ट्रेट ने सिर्फ इस आधार पर आवेदन खारिज कर दिया कि पासपोर्ट जमानत के आदेश के तहत जमा किया गया था.
राज्य ने याचिका का विरोध किया. एडिशनल एडवोकेट जनरल हेमंत अग्रवाल ने कहा कि सिंह ने हाई कोर्ट की ओर से लगाई गई शर्तों के तहत अपनी इच्छा से पासपोर्ट जमा किया था. उन्होंने कहा कि शर्तों में ढील देने के लिए सिंह ने कोई जरूरी या असाधारण वजह नहीं बताई है. राज्य ने कहा कि मजिस्ट्रेट का आदेश सही कारणों पर आधारित था और उसमें कोई गैरकानूनी बात नहीं थी.
हालांकि, जस्टिस अग्रवाल ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह एक्सपायर हो चुका पासपोर्ट सिंह को वापस करे, ताकि वह इसे रीजनल पासपोर्ट ऑफिस में जमा करके रिन्यू कराने के लिए आवेदन कर सकें.
जज ने कहा कि अदालत के आदेश का पालन करते हुए पासपोर्ट जमा करने का मतलब अपने आप उसके रिन्यूअल पर हमेशा के लिए रोक लगना नहीं है. खासकर तब, जब याचिकाकर्ता मामले की कार्रवाई से बचने या अपनी जमानत की शर्तों को कमजोर करने की कोशिश नहीं कर रहा हो.
जज ने साफ किया कि वह आपराधिक मामले के गुण-दोष पर कोई राय नहीं दे रहे हैं.
जज ने आदेश दिया कि नया पासपोर्ट जारी होने के बाद सिंह को उसे “तुरंत” ट्रायल कोर्ट में जमा करना होगा. इसके बाद रिन्यू किया गया पासपोर्ट भी उन्हीं आदेशों और शर्तों के अधीन रहेगा, जो मामले की सुनवाई लंबित रहने तक सिंह पर लागू हैं.
इस आदेश में सिंह के विदेश जाने के सवाल पर कोई फैसला नहीं दिया गया है, क्योंकि हाई कोर्ट में उनका आवेदन सिर्फ पासपोर्ट रिन्यू कराने तक सीमित था.
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