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Friday, 17 July, 2026
होमदेशअवैध कंस्ट्रक्शन पर सुप्रीम कोर्ट का 'नो-टॉलरेंस' वाला रवैया—‘समय बीतने से अवैध काम ठीक नहीं होगा’

अवैध कंस्ट्रक्शन पर सुप्रीम कोर्ट का ‘नो-टॉलरेंस’ वाला रवैया—‘समय बीतने से अवैध काम ठीक नहीं होगा’

SC ने मेरठ में 44 प्रॉपर्टी को गिराने का आदेश दिया है, जो असल में रेजिडेंशियल के तौर पर बनी थीं, लेकिन अब पूरी तरह या कुछ हद तक कमर्शियल स्ट्रक्चर हैं.

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नई दिल्ली: अवैध निर्माण और रिहायशी मकानों के गलत इस्तेमाल पर सख्त रुख अपनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मेरठ के शास्त्री नगर सेंट्रल मार्केट इलाके में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के मकानों के अवैध हिस्सों को नियमित (कंपाउंड) करने के उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद के प्रस्ताव को खारिज कर दिया.

14 जुलाई को जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने मौजूदा रिहायशी इमारतों में किए गए सभी अवैध निर्माण को तुरंत गिराने का आदेश दिया.

इसके साथ ही बेंच ने बिना मंजूरी के निर्माण के खिलाफ सख्त संदेश दिया और साफ किया कि जो सरकारी संस्थाएं भवन निर्माण नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करतीं, उनके प्रति भी अदालत कोई नरमी नहीं दिखाएगी. कोर्ट ने कहा कि कानून सबके लिए बराबर है और किसी की भी अवहेलना को माफ नहीं किया जा सकता.

इसके अलावा बेंच ने उन 44 इमारतों को भी गिराने का आदेश दिया, जिन्हें मूल रूप से रहने के लिए बनाया गया था, लेकिन अब उनका पूरा या कुछ हिस्सा व्यावसायिक इस्तेमाल में है. कोर्ट ने कहा कि अगर पूरी इमारत व्यावसायिक रूप से इस्तेमाल हो रही है, तो उसे जल्द से जल्द गिराया जाए.

अगर किसी रिहायशी इमारत में व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए अतिरिक्त निर्माण किया गया है, तो परिषद उस हिस्से की पहचान करे और मालिक को 15 दिन के भीतर उसे गिराने का नोटिस दे.

अगर मालिक नोटिस के बाद भी कार्रवाई नहीं करता, तो स्थानीय निकाय खुद अवैध निर्माण गिराए और उस पर आने वाला पूरा खर्च मालिक से वसूले. कोर्ट ने कहा कि यह रकम भू-राजस्व बकाया की तरह वसूली जाएगी.

अहम बात यह है कि बेंच ने इस मामले का दायरा भी बढ़ा दिया. यह मामला 2024 में कोर्ट के उस आदेश का पालन न होने से जुड़ा था, जिसमें रिहायशी इमारतों में व्यावसायिक गतिविधियां रोकने को कहा गया था. 14 जुलाई का यह आदेश अवमानना याचिका पर आया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि स्थानीय निकाय ने अतिक्रमण करने वालों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की.

कोर्ट ने सेंट्रल मार्केट से आगे बढ़ते हुए परिषद के अध्यक्ष पी. गुरु प्रसाद को मेरठ के दूसरे इलाकों में भी अवैध निर्माण और रिहायशी भवनों के व्यावसायिक इस्तेमाल की जांच करने का आदेश दिया.

बेंच ने कहा, “ऐसे कई इलाके हो सकते हैं जहां लोग रिहायशी मकानों का व्यावसायिक इस्तेमाल कर रहे हों. हम चाहते हैं कि अध्यक्ष जल्द से जल्द इसकी नई जांच कराएं और अगली सुनवाई तक अपनी रिपोर्ट पेश करें.”

कोर्ट ने अध्यक्ष को अलग-अलग टीमें बनाकर व्यापक जांच कराने और यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि तोड़फोड़ की कार्रवाई में किसी तरह का भेदभाव न हो.

बेंच ने मेरठ के बाहरी इलाके, खासकर उल्देपुर में भी अवैध निर्माण की जांच का विशेष निर्देश दिया. कोर्ट ने याचिकाकर्ता के वकील तुषार जैन को भी इस मामले में मदद करने और चाहें तो खुद जांच करने की अनुमति दी.

अपने आदेश में बेंच ने हाल के दिनों में अलग-अलग शहरों में अवैध इमारतों के गिरने और आग लगने की घटनाओं का भी जिक्र किया, जिनमें कई बेगुनाह बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों की मौत हुई.

कोर्ट ने कहा, “हम चाहते हैं कि अधिकारी यह सुनिश्चित करें कि ऐसी घटनाएं दोबारा न हों और लोगों की जान बचाने के लिए सभी जरूरी कदम उठाए जाएं. हम राज्य और उसके सभी अधिकारियों से फिर कहते हैं कि अगर आज कार्रवाई नहीं हुई, तो बाद में कानून के अनुसार कदम उठाने में बहुत देर हो जाएगी.”

कोर्ट ने आगे कहा, “लोगों में यह संदेश नहीं जाना चाहिए कि सिर्फ मांग करने या आवेदन देने से उनके अवैध निर्माण बच जाएंगे या नियमित कर दिए जाएंगे. सही समय पर सही कार्रवाई ही कानून का राज कायम रख सकती है.”

44 इमारतों के बारे में कोर्ट ने कहा कि मूल नक्शे के अनुसार वे रिहायशी थीं, लेकिन समय के साथ उनमें स्कूल, मैटरनिटी क्लीनिक, अस्पताल, डायग्नोस्टिक सेंटर, बैंक और दूसरे व्यावसायिक संस्थान चलने लगे.

कोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि पहले के एक आदेश में इसी इलाके की 128 इमारतों का जिक्र किया गया था, जिनमें लोगों ने अपने मकानों के सेटबैक (खाली छोड़ी जाने वाली जगह) को भी ढक लिया था. परिषद ने बताया कि ऐसे निर्माण हटाए जा चुके हैं, लेकिन कोर्ट ने आखिरी मौका देते हुए कहा कि अगर कहीं और ऐसा अतिरिक्त निर्माण बचा है तो उसे भी गिराया जाए.

बेंच ने अवैध निर्माण को बाद में नियमित (कंपाउंड) करने के विचार का सख्त विरोध किया. कोर्ट ने कहा कि मौजूदा कानून इसकी अनुमति नहीं देता और किसी सरकारी संस्था की लापरवाही अवैध काम को कानूनी नहीं बना सकती.

परिषद के सुझाव पर नाराजगी जताते हुए कोर्ट ने कहा, **”हम साफ कर देना चाहते हैं कि सिर्फ समय बीत जाने या अधिकारियों की लापरवाही से कोई अवैध निर्माण कानूनी नहीं हो जाता. समय बीतना कभी भी अवैध निर्माण को नियमित करने का आधार नहीं बन सकता. जो अवैध है, वह हमेशा अवैध ही रहेगा और समय बीतने से उसे वैध नहीं माना जा सकता.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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