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Tuesday, 21 April, 2026
होमदेशएक पिता का इंतिजार, एक दुल्हन के अधूरे ख्वाब—पहलगाम निर्वासन से बिखरी 3 परिवारों की कहानियां

एक पिता का इंतिजार, एक दुल्हन के अधूरे ख्वाब—पहलगाम निर्वासन से बिखरी 3 परिवारों की कहानियां

पहलगाम आतंकी हमले के बाद, आसिम, शीना और रक्षंदा जैसे पाकिस्तानी नागरिकता वाले लोगों को भारत छोड़ने के लिए कहा गया था. अदालत के दखल के बाद केवल रक्षंदा ही वापस लौटी हैं.

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नई दिल्ली: 2025 में 19 साल के आसिम ने कक्षा 12वीं की बोर्ड परीक्षा देने और जम्मू में नेशनल एलिजिबिलिटी-कम-एंट्रेंस टेस्ट (NEET) की तैयारी करने की योजना बनाई थी. सब कुछ तय लग रहा था. परिवार ने आसिम की आगे की पढ़ाई के लिए पैसे भी जमा कर लिए थे.

तभी पहलगाम आतंकी हमला हुआ और पाकिस्तान में जन्मे इस लड़के का सपना टूट गया, जिसका पिता जम्मू-कश्मीर के राजौरी में रहता है. उसे वापस जाना पड़ा. आसिम ने, उसके पिता सज्जाद अहमद के मुताबिक, पढ़ाई छोड़ दी है.

डिपोर्ट होने के बाद वह गुजरांवाला में एक छोटे कमरे में रहता है. “जब भी मैं अपने बेटे से बात कर पाता हूं और उसकी आवाज सुनता हूं, तो मैं उसे बस यही उम्मीद देता हूं कि मैं उसे अपने पास वापस लाने के लिए सब कुछ करूंगा. मेरा बेटा है वो,” सरकारी स्कूल के शिक्षक सज्जाद ने दिप्रिंट से कहा. “आसिम बहुत रोता है. उसे अकेलापन लगता है. मैंने उसका चेहरा नहीं देखा है. वह बस इतना कहता है, ‘पापा, मुझे वापस ले आओ’.”

आसिम उन लोगों में है जिनके पास पाकिस्तानी नागरिकता थी और जिन्हें 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में 26 लोगों की हत्या के बाद भारत छोड़ने को कहा गया. द रेजिस्टेंस फ्रंट (TRF), जो पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तैयबा (LeT) का एक हिस्सा है, ने बैसरन घाटी में हुए इस हमले की जिम्मेदारी ली.

तुरंत प्रतिक्रिया में भारत ने पाकिस्तानी नागरिकों को देश छोड़ने का आदेश दिया और अप्रैल के आखिर में अटारी-वाघा बॉर्डर पर वापसी प्रक्रिया शुरू की. जिनके पास वैध कागज थे, उन्हें 1 मई 2025 से पहले लौटने को कहा गया. SAARC वीजा छूट योजना के तहत पाकिस्तानी नागरिकों को भारत आने की अनुमति नहीं थी. ऐसे किसी भी पाकिस्तानी नागरिक को 48 घंटे में देश छोड़ने को कहा गया.

कई लोग अपने परिवार से ठीक से विदा भी नहीं ले पाए. कुछ ने अपने परिवार के लोगों को वापस लाने के लिए अदालत का सहारा लिया. आसिम के लिए अभी भी उम्मीद है, क्योंकि जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट ने पिछले हफ्ते मार्च में गृह मंत्रालय को उसके लंबे समय के वीजा और भारतीय नागरिकता के आवेदन पर विचार करने को कहा.

एक पिता की लड़ाई

सज्जाद अहमद की अपने बेटे और दिवंगत पत्नी की नागरिकता के लिए लड़ाई बहुत पहले शुरू हो गई थी. 21 साल पहले वह पाकिस्तान में रिश्तेदारों से मिलने गए थे और 11 दिसंबर 2005 को गुजरांवाला की रहने वाली शबनम कौसर से शादी की.

कौसर ने 26 अक्टूबर 2006 को गुजरांवाला में एक बेटे को जन्म दिया, जिसका नाम फर्दीन सज्जाद उर्फ आसिम सज्जाद है. वह और बच्चा 9 अक्टूबर 2007 को 90 दिनों के लिए भारत आए. वीजा खत्म होने पर उन्होंने शादी के आधार पर एक साल का विस्तार मांगा और उन्हें बच्चे के साथ रहने की अनुमति मिल गई.

यह सिलसिला जून 2013 तक चलता रहा, जब राजौरी में बीमारी से कौसर की मौत हो गई. इसके बाद सज्जाद ने अपने नाबालिग बेटे के वीजा विस्तार के लिए आवेदन किया और उसे 20 अप्रैल 2015 तक अनुमति मिली.

इसके बाद सज्जाद ने कई बार आवेदन देकर अपने बेटे को भारतीय नागरिक घोषित करने और मानवीय आधार पर वीजा बढ़ाने की मांग की. लेकिन कोई भी आवेदन मंजूर नहीं हुआ. पहलगाम हमले के बाद स्थिति और कठिन हो गई.

भयानक रात

राजौरी के इस परिवार के लिए 29 अप्रैल 2005 की सुबह बहुत डरावनी थी. सुबह करीब 4 बजे जम्मू-कश्मीर पुलिस ने उनके घर पर छापा मारा और बिना डिपोर्टेशन आदेश की कॉपी दिए आसिम को ले गई, ऐसा सज्जाद का कहना है.

“हम घर में सो रहे थे. मैं, मेरी बीमार मां, और मेरे बेटे आसिम और हनान. अचानक पुलिस बिना किसी नोटिस या कागज के अंदर आ गई. उन्होंने बस कहा कि वे मेरे बेटे को पाकिस्तान भेज देंगे,” उन्होंने कहा. आसिम को जबरदस्ती पुलिस वैन में बैठाकर वाघा बॉर्डर ले जाया गया.

“मैं अपने बेटे से बात भी नहीं कर पाया, उसे आखिरी बार छू भी नहीं पाया, उसे गले भी नहीं लगा पाया. उस समय मुझे लगा जैसे मेरा एक हिस्सा मुझसे छीन लिया गया.”

इसके बाद सज्जाद ने अदालत जाने और कानूनी लड़ाई लड़ने का फैसला किया.

“पहले मैंने कई बार ऑनलाइन और ऑफलाइन नागरिकता के लिए आवेदन किया था. लेकिन प्रक्रिया में देरी होती रही. सरकारी अधिकारियों ने कहा था कि जब आसिम 18 साल का हो जाएगा तो आसान होगा. लेकिन जब उसे ले जाया गया तो कुछ समझ नहीं आया. मुझे पता था कि मुझे अपने बेटे को वापस लाना है.”

उन्होंने सितंबर 2015, मई 2015 और जनवरी 2019 में तीन बार आवेदन किया था. मई 2024 में गृह मंत्रालय के पोर्टल पर भी आवेदन किया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ.

अब कुछ उम्मीद है क्योंकि जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट ने मार्च में गृह मंत्रालय को आसिम को वापस लाने के लिए कहा.

अदालत ने कहा कि गृह मंत्रालय आसिम को वापस लाए ताकि वह लंबे समय के वीजा और नागरिकता के अपने आवेदन को आगे बढ़ा सके. यह प्रक्रिया जल्द से जल्द, और मानवीय पहलू को ध्यान में रखते हुए, बेहतर होगा कि आठ हफ्तों में पूरी की जाए.

सज्जाद को नहीं पता कि इस आदेश से उनका बेटा वापस आ पाएगा या नहीं. “मुझे समझ नहीं आया कि खुश होऊं या दुखी. मैंने फोन पर अपने बेटे को रोते हुए सुना, वह बस कह रहा था कि मुझे वापस ले आओ. उस दिन के इंतजार में मैं दीवार पर लगे कैलेंडर में दिन गिनता हूं.”

अब सज्जाद कभी-कभी अपने बेटे से फोन पर बात कर लेते हैं. “जब हम केस लड़ रहे थे, तब मुझे नहीं पता था कि मैं उसे कैसे भरोसा दिलाऊं कि मैं उसे वापस लाऊंगा. मैं उसे दुख नहीं देना चाहता था. मैं बस कहता था कि मैं कोशिश कर रहा हूं. अपने बेटे को हर दिन टूटते देखना बहुत दर्दनाक था.”

आसिम फिलहाल गुजरांवाला में अपनी मौसी के घर रहता है. मौसी विधवा हैं और उनकी कोई आमदनी नहीं है.

“पाकिस्तान एक अलग देश है. मेरे बेटे की पूरी जिंदगी भारत में थी.”

राजौरी में आसिम का कमरा वैसे ही रखा है. उसकी किताबें और कपड़े अलमारी में बंद हैं. “जब मेरा बेटा वापस आएगा, मैं उसे गले लगाऊंगा. मैं भगवान का शुक्रिया करूंगा कि हमने यह लड़ाई लड़ी और मैं उसे वापस ला पाया,” सज्जाद ने कहा.

‘देखभाल करने वाला कोई नहीं’

सज्जाद की तरह जम्मू के शेख जहीर अहमद भी अपनी पत्नी रक्षंदा राशिद के लिए भारतीय नागरिकता पाने की कोशिश कर रहे हैं. रक्षंदा पाकिस्तान के इस्लामाबाद की रहने वाली हैं. जहीर की स्थिति थोड़ी बेहतर है, क्योंकि हाई कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद रक्षंदा पिछले आठ महीनों से उनके साथ हैं.

रक्षंदा करीब 40 साल से जम्मू में लंबे समय के वीजा पर रह रही थीं, जिसे हर साल बढ़ाया जाता था. उनके चार बच्चे हैं.

जून 2025 में हाई कोर्ट ने कहा कि रक्षंदा कई बीमारियों से पीड़ित हैं और पाकिस्तान में उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं है. अदालत ने कहा कि मानव अधिकार सबसे महत्वपूर्ण हैं.

अदालत ने कहा कि उस समय उनके पास लंबी अवधि का वीजा था, इसलिए सीधे डिपोर्ट करना सही नहीं था और बिना ठीक से जांच किए उन्हें भेज दिया गया.

विशेष परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने गृह मंत्रालय को उन्हें वापस जम्मू लाने का निर्देश दिया.

जहीर ने बताया कि रक्षंदा आठ महीने पहले वापस आ गई थीं, लेकिन उनकी नागरिकता का मामला अभी भी लंबित है. अभी वह वीजा एक्सटेंशन पर हैं.

‘अब कहीं जाने की जगह नहीं’

जम्मू के दो मामलों से अलग, जहां हाई कोर्ट ने दखल दिया, कराची की रहने वाली शीना नाज़ को दिल्ली हाई कोर्ट से कोई राहत नहीं मिली. इससे भी बुरा यह कि अप्रैल 2025 में दिल्ली के एक व्यक्ति से शादी करने के लिए आते समय उसने अपने परिवार से संबंध तोड़ लिए थे, ऐसा उसके देवर आई.ए. हाशमी ने बताया.

हाशमी ने कहा कि शीना 5 अप्रैल को छोटे समय के वीजा पर अपने छोटे भाई से प्रेम विवाह करने के लिए आई थी.

“जब उसने मेरे भाई से शादी करने का फैसला किया, तो कराची में उसके परिवार ने उससे रिश्ता तोड़ लिया. उसने भारत में रहने का फैसला किया. यहां आने के बाद उसने 8 अप्रैल को शादी कर ली,” उन्होंने कहा.

पाकिस्तानी नागरिक ने 23 अप्रैल को गृह मंत्रालय के ब्यूरो ऑफ इमिग्रेशन में लंबे समय के वीजा के लिए आवेदन किया, लेकिन तब तक विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर दिया था कि पहलगाम आतंकी हमले के बाद पड़ोसी देश के नागरिकों को तुरंत वापस जाना होगा.

“26 अप्रैल को पुलिस हमारे दरवाजे पर आई और बताया कि उसे 24 घंटे के अंदर पाकिस्तान लौटना होगा, नहीं तो कार्रवाई होगी,” हाशमी ने कहा.

परिवार ने उसी दिन दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की, लेकिन जज ने कहा कि सरकार के फैसले को चुनौती नहीं दी जा सकती, क्योंकि यह “गंभीर राष्ट्रीय सुरक्षा कारणों” से लिया गया है.

अदालत ने कहा कि इन परिस्थितियों में वह इस याचिका पर सुनवाई नहीं करना चाहती. इसके बाद याचिकाकर्ता के वकील ने निर्देश पर याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी. याचिका को वापस लिया हुआ मानकर खारिज कर दिया गया. बाकी आवेदन भी खत्म माने गए.

हाशमी ने कहा कि शीना के पास जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था. “उस समय कुछ समझ नहीं आ रहा था. याचिका खारिज हो गई. हमें नहीं पता था क्या करें, और हम सब वाघा बॉर्डर चले गए. मैं वह दृश्य कभी नहीं भूल सकता. परिवार रो रहे थे. यह सब इन आतंकियों की वजह से हुआ. परिवारों को अलग कर दिया गया.”

उन्होंने बताया कि शीना कराची में अपने मायके से अलग रहती है और उसका परिवार अब उससे बात नहीं करता.

“हम उसके गुजारे के लिए पैसे भेजते हैं. सब कुछ बहुत महंगा है. हमें नहीं पता कि हम उसे कैसे और कब वापस ला पाएंगे. मुझे नहीं पता शीना कितने समय तक ऐसे रह पाएगी. उसने दिल्ली में घर बसाने का सपना लेकर शादी की थी. वह भारत में हम सबके साथ रहना चाहती थी. आतंकियों ने हमारी जिंदगी बर्बाद कर दी. अब सिर्फ अल्लाह, वाहेगुरु और भगवान ही हमें बचा सकते हैं,” हाशमी ने दुख जताया.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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