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Monday, 12 October, 2026
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‘धक्का-मुक्की की, घसीटा और सड़क पर छोड़ा’: जॉन ब्रिटास ने राष्ट्रपति और CJI को लिखा पत्र

CPI(M) के सांसद ने आरोप लगाया है कि दिल्ली में विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने उन पर बल प्रयोग किया; उन्होंने इसे 'संवैधानिक स्वतंत्रता और संसदीय गरिमा का गंभीर उल्लंघन' बताया है.

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नई दिल्ली: कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) के केरलम से राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास ने राष्ट्रपति, राज्यसभा के सभापति और भारत के चीफ जस्टिस को पत्र लिखा है. उन्होंने शनिवार और रविवार को राजधानी में विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुई घटनाओं में तुरंत दखल देने की मांग की है.

उन्होंने दावा किया कि उन्हें पुलिस की गाड़ी के अंदर “धक्का दिया गया, घसीटा गया, पीटा गया” और उनके साथ “बदसलूकी की गई”. इसके बाद उन्हें “सिर्फ मीडिया से बात करने के जुर्म में सड़क किनारे छोड़ दिया गया”. बाद में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट में ब्रिटास ने साफ किया कि उन्हें हिरासत में नहीं लिया गया था, जबकि कुछ अन्य जगहों पर ऐसी खबरें आई थीं.

ब्रिटास और हजारों अन्य लोगों ने सप्ताहांत में राजधानी के कई इलाकों में विरोध प्रदर्शन किया था. वे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे थे. यह मांग मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर लगाए गए आरोपों के चलते की गई थी.

दिल्ली पुलिस ने किसी भी विरोध प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी थी. इसके बाद कई लोगों को हिरासत में लेकर हिरासत केंद्रों में रखा गया. ब्रिटास ने कहा, “यह सब सुप्रीम कोर्ट की ओर से शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के निर्देश जारी करने के कुछ ही घंटों के भीतर हुआ.”

‘पुलिस ने बेरहमी से हमला किया’

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को लिखे पत्र में सांसद ने बताया कि दिल्ली में मीडिया से शांतिपूर्ण बातचीत के दौरान पुलिस ने उन पर किस तरह “बेरहमी से हमला” किया. उन्होंने इसे “संविधान से मिले अधिकारों और संसद की गरिमा का गंभीर उल्लंघन” बताया.

उन्होंने अपने पत्र में तुरंत दखल देने और मामले की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की.

ब्रिटास ने अपने पत्र में लिखा, “मुख्य चुनाव आयुक्त श्री ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर चल रहे लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शनों के संबंध में जब मैं शांतिपूर्वक पत्रकारों से बात कर रहा था, तब पुलिसकर्मियों ने मुझे जबरन घसीटा, उठाकर ले गए, पुलिस की गाड़ी के अंदर बेरहमी से पीटा और फिर सड़क किनारे छोड़ दिया. इस पूरी घटना से कानून के राज, लोकतांत्रिक तरीके से असहमति जताने के अधिकार और कानून लागू करने की जिम्मेदारी निभाने वालों की जवाबदेही पर गंभीर सवाल उठते हैं.”

उन्होंने आगे कहा, “इस घटना को और भी चौंकाने वाली बात यह बनाती है कि यह सब सुप्रीम कोर्ट की ओर से शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को गैरकानूनी हिरासत से बचाने, इंटरनेट सेवाएं बिना रुकावट जारी रखने, मेट्रो और रेलवे सेवाओं को सामान्य बनाए रखने और लोगों की आवाजाही की आजादी की रक्षा करने के स्पष्ट निर्देश जारी करने के कुछ ही घंटों के भीतर हुआ.”

ब्रिटास ने बताया कि वह रविवार को दोपहर करीब 12.30 बजे कनॉट प्लेस पहुंचे थे और पत्रकारों से बात कर रहे थे. तभी उन्हें पता चला कि कुछ युवा कार्यकर्ताओं को पीटा जा रहा है और हिरासत में लिया जा रहा है.

उन्होंने कहा, “मैं सिर्फ प्रेस से बात करने के अपने लोकतांत्रिक अधिकार का इस्तेमाल कर रहा था. इसके बावजूद दिल्ली पुलिस और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के जवानों ने मुझे जबरन पकड़ा और करीब 50 मीटर तक घसीटा. मैंने और वहां मौजूद पत्रकारों ने बार-बार बताया कि मैं मौजूदा सांसद हूं, लेकिन उन्होंने हमारी बात नहीं मानी.”

ब्रिटास ने कहा कि कुछ पुलिसकर्मियों ने उन्हें हवा में उठाया और पुलिस की गाड़ी की ओर ले गए. उन्होंने कहा, “उन्होंने एक मौजूदा सांसद के साथ ऐसा बर्ताव किया, जैसे मैं कोई सामान हूं जिसे उठाकर कहीं ले जाना है. ऐसा सख्त और मनमाना कदम उठाने की कोई वजह ही नहीं थी.”

ब्रिटास ने कहा कि पुलिस की गाड़ी में बैठाने के बाद उनके साथ और ज्यादा ज्यादती की गई.

उन्होंने कहा, “पुलिसकर्मियों ने मुझे पीटा और सीट पर दबाकर रखा. मैंने खुद को सांसद बताया, उसके बाद भी मारपीट जारी रही. जिन हालात में मेरे साथ यह सब हुआ, उनमें मेरे खिलाफ शारीरिक हिंसा को सही ठहराने की कोई वजह नहीं है. इस घटना को चल रहे विरोध प्रदर्शनों के बड़े संदर्भ से अलग करके नहीं देखा जा सकता.”

उन्होंने आगे कहा, “अधिकारी इन मांगों से सहमत हो सकते हैं या असहमत, लेकिन वे इनका जवाब शारीरिक हिंसा से नहीं दे सकते. सरकार लोकतंत्र को डराकर चुप नहीं करा सकती. वह पुलिस का इस्तेमाल राजनीतिक बदले के साधन के रूप में नहीं कर सकती.”

ब्रिटास ने मांग की कि केंद्र सरकार और दिल्ली की राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की सरकार से इस मामले पर पूरी रिपोर्ट मांगी जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच शुरू हो.

उन्होंने कहा कि मामले से जुड़े सभी सबूत तुरंत सुरक्षित रखे जाने चाहिए. इनमें वीडियो की पूरी और बिना किसी बदलाव वाली रिकॉर्डिंग, गाड़ियों की पहचान और उनकी आवाजाही का रिकॉर्ड, ड्यूटी रोस्टर, तैनाती के आदेश, वायरलेस पर हुई बातचीत, कंट्रोल रूम के लॉग और “मुझे हिरासत में लेने और छोड़ने से जुड़े रिकॉर्ड” शामिल हैं.

उन्होंने कहा कि इस घटना में शामिल पुलिसकर्मियों की पहचान बिना किसी देरी के की जानी चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि पुलिस उपायुक्त और किसी भी अन्य वरिष्ठ अधिकारी की भूमिका की जांच होनी चाहिए, जिन्हें हमले की जानकारी दी गई थी.

उन्होंने जोर देकर कहा कि जिन लोगों को जिम्मेदार पाया जाता है, उनके खिलाफ उचित विभागीय और आपराधिक कार्रवाई की जानी चाहिए. इसमें वे वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल होने चाहिए, जिनकी मिलीभगत या लापरवाही सामने आती है.

CPI(M) के महासचिव एम.ए. बेबी ने X पर बताया कि उन्होंने ब्रिटास से राम मनोहर लोहिया (RML) अस्पताल में मुलाकात की, जहां उन्हें भर्ती कराया गया था.

दिप्रिंट ने दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता और अतिरिक्त आयुक्त राजीव रंजन से संपर्क किया, लेकिन उन्होंने इस मामले पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.

हिरासत केंद्रों में रात के समय अफरा-तफरी

इसके अलावा, रविवार को कई लोगों को हिरासत में लिए जाने से भी चिंता बढ़ गई.

X यूजर दिशा वर्मा ने दावा किया कि उनकी एक दोस्त को पुलिस ने हिरासत में लेकर पंडवालन खुर्द के एक सामुदायिक केंद्र में पहुंचाया था. उन्होंने पोस्ट में बताया कि शाम करीब 6.40 बजे कनॉट प्लेस से प्रदर्शनकारियों को उठाया गया, उनके फोन छीन लिए गए और विरोध प्रदर्शन के सभी वीडियो डिलीट कर दिए गए.

उन्होंने लिखा, “उन्हें हिरासत में लिया गया और पुलिसवालों ने बस के अंदर बेरहमी से पीटा. उन्हें पूरी तरह कुचल दिया गया. इनमें नाबालिग भी शामिल थे.”

शाम 8 बजे बस पंडवालन खुर्द के एक सामुदायिक केंद्र पर रुकी. दिशा ने कहा कि हिरासत में लिए गए लोगों को फ्रैक्चर की चोटें आई थीं और वहां चार नाबालिग भी मौजूद थे. उन्होंने X पर लिखा कि सभी को बर्बर तरीके से पीटा गया और किसी भी वकील को अंदर जाने की अनुमति नहीं दी गई.

उन्होंने कहा, “शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को कनॉट प्लेस से हिरासत में लेकर भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) की इमारत वाले इलाके में ले जाया गया. वहां ऐसी जगह पर रखा गया, जहां वकीलों, पत्रकारों और लोगों की भीड़ को आने नहीं दिया जा रहा था.”

उन्होंने आगे लिखा, “उन्हें एक कतार में घुटनों के बल बैठाया गया. पुलिसवालों ने उनकी तलाशी ली और जबरन उनके सारे फोन छीन लिए.”

दिशा के मुताबिक, बस करीब एक घंटे तक कापसहेड़ा और नजफगढ़ के आसपास घूमती रही. उन्होंने कहा कि पुलिस को पता था कि वकील कापसहेड़ा और छावला पुलिस थानों में प्रदर्शनकारियों का इंतजार कर रहे थे.

उन्होंने बताया कि बस शाम 6.53 बजे तक छावला पुलिस थाने पहुंच गई थी, लेकिन वहां से तुरंत आगे निकल गई. शाम 7.30 बजे तक बस पंडवालन गांव पहुंच गई. दिशा ने कहा कि रात 8 बजे प्रदर्शनकारियों को वहां के एक सामुदायिक केंद्र में जबरन ले जाया गया.

उन्होंने कहा कि हिरासत में लिए गए किसी भी व्यक्ति के पास फोन नहीं था, इसलिए किसी को भी पता नहीं था कि बाहर क्या हो रहा है.

दिशा ने यह दावा भी किया कि दिल्ली पुलिस ने सामुदायिक केंद्र की बिजली काट दी थी.

रात करीब 9.49 बजे दिशा ने जानकारी दी कि कई घंटों तक “बिना कानूनी अधिकार के यातना देने और हिरासत में रखने” के बाद लोगों को छोड़ा जा रहा था. दिशा ने कहा कि वहां करीब 50-60 प्रदर्शनकारियों को रखा गया था.

उन्होंने दिप्रिंट को बताया कि प्रदर्शनकारियों को कथित तौर पर लातें मारी गईं और पीटा गया, जिससे उनके शरीर पर चोटें आईं.

द्वारका जिले के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया, “इन आरोपों की पुष्टि नहीं हुई है. उस बस में न तो कोई महिला मिली और न ही कोई नाबालिग. उन्हें एक घंटे बाद जाने दिया गया. उन्हें छोड़ने के लिए पुलिस की एक बस भी उपलब्ध कराई गई थी.”

अधिकारी ने आगे बताया कि करीब 56 लोगों को हिरासत केंद्र लाया गया था. जरूरी औपचारिकताएं पूरी होने के तुरंत बाद सभी को छोड़ दिया गया. उन्होंने कहा कि लोगों को बैठने के लिए पानी, खाना और कालीन भी दिए गए थे.

लापता छात्रों की तलाश

छात्रों और राजनीतिक संगठनों के कई समूह सोशल मीडिया पर उन छात्रों को ढूंढने की कोशिश कर रहे हैं, जिनके बारे में उनका कहना है कि पुलिस की हिरासत में लिए जाने के बाद से उनका पता नहीं चल रहा है.

यूथ फॉर स्वराज के अध्यक्ष संदीप यादव ने कहा कि अरण्या नाम की एक छात्रा रविवार शाम करीब 4.30 बजे कनॉट प्लेस के पास दिल्ली पुलिस की हिरासत में लिए जाने के बाद से लापता थी.

उन्होंने कहा, “साथ में प्रदर्शन कर रहे लोगों के मुताबिक, पुलिस की हिरासत वाली गाड़ी के अंदर उसे पीटा गया और उसे सांस लेने में परेशानी हो रही थी. पुलिस उसे इलाज के लिए ले गई, लेकिन उसके बाद से न तो वह दिखाई दी है और न ही उसके बारे में कोई खबर मिली है.”

उन्होंने आगे कहा, “उसका फोन बंद है. आसपास के अस्पतालों में भी उसका पता नहीं चला है और संसद मार्ग पुलिस थाने के मेडिकल-लीगल रजिस्टर में भी उसका नाम नहीं है.”

यादव ने कहा, “हमारे कुछ साथी अरण्या को ढूंढने के लिए RML अस्पताल जा रहे हैं. हमें पूरी उम्मीद है कि वह वहां सुरक्षित होगी और उसे इलाज मिल रहा होगा.”

इस बीच, नई दिल्ली के DCP सचिन शर्मा ने एक बयान जारी कर स्पष्ट किया कि दिल्ली पुलिस की हिरासत में लिए जाने के बाद छात्रा अरण्या के लापता होने की खबरें गलत थीं.

उन्होंने कहा, “कनॉट प्लेस में विरोध प्रदर्शन के दौरान उसे हिरासत में लिया गया था. उसने एक पुलिस अधिकारी के हाथ पर काट लिया था. तय प्रक्रिया के अनुसार, उसे जरूरी मेडिकल जांच के लिए ले जाया गया है और जांच पूरी होने के तुरंत बाद उसे छोड़ दिया जाएगा. बिना पुष्टि की गई जानकारी को फैलाने से पहले तथ्यों की जांच कर लें.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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