नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने इस हफ्ते उन याचिकाओं पर केंद्र सरकार और भारत निर्वाचन आयोग (ECI) को नोटिस जारी किया है, जिनमें मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कामकाज से जुड़े फैसलों और कार्यों के लिए दीवानी और आपराधिक मुकदमों से सुरक्षा देने वाले कानून को चुनौती दी गई है.
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना की पीठ ने चार हफ्ते के भीतर जवाब मांगा है. राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के सांसद मनोज झा और सामाजिक कार्यकर्ता अरुण अग्रवाल ने ये याचिकाएं दायर की हैं. इन्हें इस प्रावधान को चुनौती देने वाली पहले की एक याचिका के साथ जोड़ दिया गया है. अब इन पर 18 दिसंबर को सुनवाई होगी.
यह मामला इसलिए भी खास है क्योंकि चुनाव आयोग इस समय सार्वजनिक सवालों के घेरे में है. मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों को लेकर विपक्ष, कॉकरोच जनता पार्टी और नागरिक समाज के अन्य सदस्यों ने विरोध प्रदर्शन किए हैं.
कोर्ट में चुनौती का मुख्य मुद्दा मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की धारा 16 है. इसमें कहा गया है कि कोई भी कोर्ट ऐसे व्यक्ति के खिलाफ दीवानी या आपराधिक मुकदमे पर सुनवाई नहीं करेगा और न ही उसे जारी रखेगा, जो मुख्य चुनाव आयुक्त या चुनाव आयुक्त है या रह चुका है. यह सुरक्षा उस व्यक्ति को उसके आधिकारिक कर्तव्यों को निभाते हुए या निभाने का दावा करते हुए किए गए किसी काम, कार्रवाई या कही गई बात के लिए दी गई है.
यह धारा चुनाव आयुक्तों को सिर्फ उनके कार्यकाल के दौरान सुरक्षा नहीं देती. इसमें “हैं या रह चुके हैं” शब्दों का इस्तेमाल किया गया है, इसलिए यह सुरक्षा पूर्व चुनाव आयुक्तों को भी मिलती रहती है. यह उनके आधिकारिक कामकाज से जुड़े कार्यों के लिए दीवानी और आपराधिक, दोनों तरह के मुकदमों पर रोक लगाती है. इसमें यह शर्त भी साफ तौर पर नहीं रखी गई है कि ऐसे काम अच्छे इरादे से किए गए हों.
चुनाव आयोग ऐसे फैसले लेता है जिनका राजनीति पर बड़ा असर पड़ सकता है. इनमें चुनाव की तारीखें तय करना, आदर्श आचार संहिता लागू करना और राजनीतिक दलों तथा उम्मीदवारों के खिलाफ शिकायतों पर कार्रवाई करना शामिल है. इस सुरक्षा के पक्ष में तर्क दिया जाता है कि चुनाव आयुक्त बिना इस डर के अपने काम कर सकें कि उनके किसी फैसले से नाराज राजनीतिक दल या उम्मीदवार उनके खिलाफ बदले की भावना से मुकदमा दायर कर देंगे.
हालांकि, याचिकाओं में इस सुरक्षा के दायरे पर सवाल उठाए गए हैं. इनमें पूछा गया है कि क्या यह कानून उन मामलों में भी कानूनी कार्रवाई रोक सकता है, जिनमें किसी अधिकारी के फैसले पर भ्रष्टाचार, सत्ता के दुरुपयोग या गलत इरादे से काम करने का आरोप हो. धारा 16 में ऐसे आरोपों को सुरक्षा के दायरे से बाहर नहीं रखा गया है.
अब सुप्रीम कोर्ट को यह देखना होगा कि क्या इस प्रावधान की इतनी व्यापक व्याख्या की जा सकती है और क्या संविधान के तहत ऐसी सुरक्षा देना सही है.
जजों और संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों की सुरक्षा कितनी अलग है
जजों को भी उनके न्यायिक कामकाज से जुड़े कार्यों के लिए जज (सुरक्षा) अधिनियम, 1985 के तहत सुरक्षा मिलती है. इस कानून की धारा 3 के तहत कोई कोर्ट ऐसे व्यक्ति के खिलाफ दीवानी या आपराधिक मुकदमे पर सुनवाई नहीं कर सकता और न ही उसे जारी रख सकता है, जो जज है या रह चुका है. यह सुरक्षा उसे आधिकारिक या न्यायिक कर्तव्य निभाते हुए या निभाने का दावा करते हुए किए गए किसी काम या कही गई बात के लिए मिलती है.
लेकिन इस कानून की धारा 3(2) केंद्र सरकार, राज्य सरकारों, सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट और अन्य सक्षम अधिकारियों के अधिकार को बरकरार रखती है. ये अधिकारी किसी मौजूदा या पूर्व जज के खिलाफ आपराधिक या विभागीय कार्रवाई समेत उचित कदम उठा सकते हैं.
साल 1991 में के. वीरास्वामी बनाम भारत सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि उच्च न्यायपालिका के जजों पर भ्रष्टाचार समेत आपराधिक मामलों में मुकदमा चलाया जा सकता है. हालांकि, ऐसे मामले शुरू करने के लिए कुछ सुरक्षा उपाय भी तय किए गए थे.
राष्ट्रपति और राज्यपालों को संविधान के अनुच्छेद 361 के तहत अलग तरह की सुरक्षा मिली हुई है. इसके खंड (1) में कहा गया है कि अपने आधिकारिक अधिकारों और कर्तव्यों का इस्तेमाल करने या उन्हें निभाने के दौरान किए गए कामों के लिए राष्ट्रपति और राज्यपाल अदालतों के प्रति जवाबदेह नहीं होंगे. आपराधिक मुकदमों से जुड़े प्रावधानों के उलट, इस खंड में यह साफ नहीं कहा गया है कि यह सुरक्षा सिर्फ उनके कार्यकाल तक सीमित है.
दूसरी ओर, खंड (2) और (3) राष्ट्रपति या राज्यपाल को आपराधिक मुकदमे, गिरफ्तारी या जेल भेजे जाने से सिर्फ उनके पद पर रहने के दौरान सुरक्षा देते हैं.
2006 में रमेश्वर प्रसाद बनाम भारत सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि गलत इरादे से काम करने के आरोप लगाए जाने पर भी किसी राज्यपाल को व्यक्तिगत रूप से जवाब देने के लिए अदालत में नहीं बुलाया जा सकता. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि सरकार के फैसलों को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती. राज्यपाल को व्यक्तिगत सुरक्षा मिलती है, लेकिन सरकार के फैसलों की न्यायिक समीक्षा हो सकती है.
मंत्रियों और विधायकों को आपराधिक कानून से छूट नहीं
प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और दूसरे मंत्रियों को अनुच्छेद 361 जैसी सुरक्षा नहीं मिलती. पद पर रहते हुए या पद छोड़ने के बाद उनके खिलाफ आपराधिक मामलों की जांच और मुकदमा चलाया जा सकता है. लेकिन यह कहना भी सही नहीं होगा कि हर मामले में बिना किसी कानूनी प्रक्रिया का पालन किए मुकदमा चलाया जा सकता है.
आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 197, जिसकी जगह अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 218 ने ले ली है, के तहत किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ कथित अपराध का संज्ञान लेने से पहले मंजूरी लेना जरूरी हो सकता है. इसके लिए जरूरी है कि उस अपराध का उसके आधिकारिक कर्तव्य से पर्याप्त संबंध हो. 1995 में आर. बालकृष्ण पिल्लई बनाम केरल राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि अगर किसी मंत्री पर आरोपित काम उसके आधिकारिक कर्तव्यों से जुड़ा है, तो वह भी इस सुरक्षा का दावा कर सकता है.
सांसदों और विधायकों को अलग और सीमित विशेषाधिकार मिले हैं. संविधान के अनुच्छेद 105(2) और 194(2) के तहत संसद या राज्य विधानमंडल और उनकी समितियों में कही गई किसी बात या दिए गए वोट के लिए उनके खिलाफ अदालत में कार्रवाई नहीं की जा सकती. सदन छोड़ने के बाद भी यह सुरक्षा जारी रहती है. लेकिन यह सिर्फ सदन में कही गई बातों और वोट देने पर लागू होती है, दूसरे आपराधिक कामों पर नहीं.
2024 में सीता सोरेन बनाम भारत सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की संविधान पीठ ने कहा था कि विधायक किसी भाषण या वोट से जुड़े रिश्वत के मामले में मुकदमे से बचने के लिए संसदीय विशेषाधिकार का इस्तेमाल नहीं कर सकते. कोर्ट ने 1998 के पी.वी. नरसिम्हा राव बनाम राज्य (CBI) मामले में दिए गए इसके उलट फैसले को पलट दिया था.
इसके अलावा, सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 135A के तहत सांसदों और विधायकों को कुछ तय संसदीय बैठकों के दौरान और उनसे 40 दिन पहले तथा 40 दिन बाद तक दीवानी मामलों में गिरफ्तारी या हिरासत से सीमित सुरक्षा मिलती है. यह प्रावधान दीवानी मुकदमों पर रोक नहीं लगाता और न ही आपराधिक मामलों में गिरफ्तारी से सुरक्षा देता है.
CVC को अच्छे इरादे से किए गए कामों के लिए सुरक्षा
केंद्रीय सतर्कता आयुक्त और सतर्कता आयुक्तों को केंद्रीय सतर्कता आयोग अधिनियम, 2003 की धारा 15 के तहत सुरक्षा मिली हुई है. यह धारा कानून के तहत अच्छे इरादे से किए गए या किए जाने वाले किसी काम के लिए मुकदमे, अभियोजन या दूसरी कानूनी कार्रवाई पर रोक लगाती है.
चुनाव आयुक्त अधिनियम की धारा 16 से अलग, CVC कानून में साफ कहा गया है कि यह सुरक्षा सिर्फ अच्छे इरादे से किए गए कामों पर लागू होती है.
इन कानूनों में अलग-अलग सरकारी अधिकारियों को अलग स्तर की सुरक्षा दी गई है. कुछ अधिकारियों को पद पर रहते हुए लिए गए फैसलों के लिए सुरक्षा मिलती है, जबकि कुछ को उनकी भूमिका या किए गए काम की प्रकृति के आधार पर सीमित सुरक्षा दी जाती है.
धारा 16 पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला यह साफ करेगा कि चुनाव आयुक्तों की जवाबदेही पर असर डाले बिना उन्हें कितनी सुरक्षा दी जा सकती है.
आदित्य इदरा दिप्रिंट स्कूल ऑफ जर्नलिज्म के पूर्व छात्र हैं और फिलहाल दिप्रिंट में इंटर्नशिप कर रहे हैं.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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