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Tuesday, 1 September, 2026
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पंजाब और हरियाणा HC के मुख्य न्यायाधीश के लिए अश्विनी मिश्रा के नाम पर पंजाब की AAP सरकार मौन

दिप्रिंट को जानकारी मिली है कि केंद्र सरकार पंजाब सरकार को पत्र लिखकर प्रक्रिया जल्दी पूरी करने के लिए कह सकती है, लेकिन वह इसके बावजूद नियुक्ति की प्रक्रिया आगे बढ़ा सकती है.

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नई दिल्ली: आम आदमी पार्टी (AAP) की अगुवाई वाली पंजाब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के उस प्रस्ताव पर अभी तक केंद्र सरकार को अपनी राय नहीं दी है, जिसमें कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश अश्विनी कुमार मिश्रा को पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट का स्थायी मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करने की सिफारिश की गई है. दिप्रिंट को इस बारे में जानकारी मिली है.

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अगुवाई वाले सुप्रीम कोर्ट के पांच सबसे वरिष्ठ जजों के कॉलेजियम ने दो हफ्ते से ज्यादा पहले जस्टिस मिश्रा के नाम की सिफारिश की थी. 6 अगस्त को कॉलेजियम ने अलग-अलग हाई कोर्ट के लिए चार मुख्य न्यायाधीशों के नाम मंजूर किए थे.

दिल्ली हाई कोर्ट के जज वी. कामेश्वर राव को पटना हाई कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाने की सिफारिश की गई थी. बॉम्बे हाई कोर्ट के जज रवींद्र वी. घुगे को कलकत्ता हाई कोर्ट के लिए, इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज एम.सी. त्रिपाठी को बॉम्बे हाई कोर्ट के लिए मंजूरी दी गई थी. वहीं, जस्टिस मिश्रा, जो इलाहाबाद हाई कोर्ट से भी आते हैं, को पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट की अगुवाई करने के लिए चुना गया था.

जस्टिस मिश्रा जुलाई 2025 में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में आए थे. जस्टिस शील नागू के सुप्रीम कोर्ट के जज बनने के बाद उन्होंने इस साल 1 जून को कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश का पद संभाला था.

संविधान के अनुच्छेद 217 (1) के तहत, राष्ट्रपति किसी हाई कोर्ट के जज की नियुक्ति भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और उस राज्य के राज्यपाल से सलाह लेने के बाद करते हैं, जहां नियुक्ति की जा रही होती है. चूंकि इस अनुच्छेद में नियुक्ति से पहले राज्यपाल से सलाह लेने की बात कही गई है, इसलिए किसी मुख्य न्यायाधीश या जज की नियुक्ति को अंतिम रूप देने वाली कॉलेजियम की फाइल हमेशा राज्य सरकार को राय के लिए भेजी जाती है.

जजों की नियुक्ति के नियमों की किताब माने जाने वाले मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर (MoP) में हाई कोर्ट के जज की नियुक्ति पर अपनी राय देने के लिए राज्य को छह हफ्ते का समय दिया गया है. लेकिन मुख्य न्यायाधीश के मामले में ऐसी कोई समयसीमा नहीं है.

मामले की जानकारी रखने वाले सूत्रों ने कहा कि हाई कोर्ट के जज की नियुक्ति के मामले में राज्य की राय को महत्व दिया जाता है, क्योंकि उम्मीदवार के बैकग्राउंड से जुड़ी जानकारी राज्य पुलिस देती है, लेकिन मुख्य न्यायाधीश के पद के मामले में राज्य की राय का ज्यादा महत्व नहीं होता, क्योंकि जिस जज की सिफारिश की जाती है, वह पद के हिसाब से वरिष्ठ होता है और उसके बैकग्राउंड की जांच की ज़रूरत नहीं होती.

सूत्रों ने आगे कहा कि केंद्र सरकार पंजाब सरकार की तरफ से हो रही देरी के बारे में CJI को पहले ही बता चुकी है. उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार पंजाब सरकार को पत्र लिखकर प्रक्रिया जल्दी पूरी करने के लिए कह सकती है.

मामले की जानकारी रखने वाले एक सूत्र ने यह भी बताया कि चूंकि राज्य की राय मानना ज़रूरी नहीं है, इसलिए केंद्र सरकार नियुक्ति की प्रक्रिया आगे बढ़ा सकती है.

एक अन्य सूत्र ने कहा, “पंजाब सरकार कानून को गलत समझ रही है. समयसीमा न होने का मतलब यह नहीं है कि राज्य सरकार फाइल को अनिश्चित समय तक अपने पास रख सकती है.”

वह जज, जिन्होंने AAP सरकार को डीए का बकाया देने का आदेश दिया था

कॉलेजियम की सिफारिश के बाद दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और AAP प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने जस्टिस मिश्रा को पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाए जाने पर अपनी आपत्ति जताई थी.

9 अगस्त को एक्स पर एक पोस्ट में केजरीवाल ने दावा किया था कि इस नियुक्ति में “वरिष्ठता को नज़रअंदाज़ किया गया है.”

केजरीवाल ने लिखा था, “ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट जाने की बहुत जल्दी है. क्या जजों को वरिष्ठता को दरकिनार करके, अपनी बारी से पहले सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत होने की इजाजत दी जानी चाहिए? इससे वह लेन-देन के बदले फायदा पहुंचाने के लिए कमजोर स्थिति में आ जाते हैं.”

उन्होंने यह भी सवाल उठाया था कि किसी जज को सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत करने से पहले किन बातों की जांच की जाती है और पूछा था कि क्या यह “सम्राट के प्रति वफादारी” है.

कॉलेजियम की सिफारिश से दो दिन पहले, जस्टिस मिश्रा की अगुवाई वाली दो जजों की बेंच ने पंजाब सरकार को कर्मचारियों और पेंशनरों का लंबित महंगाई भत्ता (DA) का बकाया दो हफ्ते के भीतर देने का आदेश दिया था.

बेंच ने पंजाब सरकार और पंजाब स्टेट पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (PSPCL) की उन अपीलों को खारिज कर दिया था, जिनमें एक जज की बेंच के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें बकाया रकम जारी करने का निर्देश दिया गया था.

जस्टिस मिश्रा की बेंच ने राज्य सरकार को बड़े स्तर पर सोशल मीडिया या प्रिंट विज्ञापनों जैसे “गैर-जरूरी खर्चों” से भी रोक दिया था. बेंच ने कहा था कि कर्मचारियों का बकाया देने से इनकार करते हुए ऐसे खर्चों को सही नहीं ठहराया जा सकता.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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