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Saturday, 22 August, 2026
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जिस पैलेट के खिलाफ राहुल का प्रदर्शन वह UPA के दौर में आई थी; इस्तेमाल से कई लोगों की आंखों की रोशनी गई

UPA सरकार ने इन्हें हथियारों के मुकाबले भीड़ को नियंत्रित करने के लिए ‘कम घातक’ विकल्प के तौर पर लाया था. बड़े प्रदर्शनों के दौरान इन पैलेट गनों का इस्तेमाल किया गया है, जिस पर आलोचना और निंदा भी हुई है.

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नई दिल्ली: शुक्रवार को दिल्ली के एक पुलिस थाने के बाहर लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के धरने के बाद जंतर-मंतर पर जेन ज़ी प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पैलेट गन के कथित इस्तेमाल को लेकर एफआईआर दर्ज की गई. इस बीच, उनके प्रदर्शन के केंद्र में रही इस गन का इतिहास कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के समय से जुड़ा हुआ है.

भारत में भीड़ को नियंत्रित करने के हथियारों में पैलेट गन करीब 2009-10 के दौरान शामिल हुई थी. उस समय मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री और पी. चिदंबरम केंद्रीय गृह मंत्री थे.

गांधी ने शुक्रवार को दिल्ली पुलिस के नई दिल्ली जिला कार्यालय के बाहर पैलेट गन के एक कथित पीड़ित के साथ धरना दिया. उन्होंने बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार से सवाल किया कि छात्र प्रदर्शन को खत्म करने के लिए कथित तौर पर ऐसे हथियारों का इस्तेमाल क्यों किया गया.

हालांकि, करीब 16 साल पहले पैलेट गन को जम्मू-कश्मीर में भीड़ को नियंत्रित करने के लिए ‘कम घातक’ विकल्प के तौर पर लाया गया था. इसका मकसद उन गोलियों पर निर्भरता कम करना था, जिनके इस्तेमाल से लोगों की मौत हो जाती थी.

सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े सूत्रों के अनुसार, इसका मकसद लाठी और आंसू गैस जैसे सामान्य भीड़ नियंत्रण के तरीकों और बंदूकों के बीच का एक विकल्प लाना था, ताकि गोलियां चलाए बिना भीड़ को हटाया जा सके.

हालांकि, इनके इस्तेमाल से होने वाली गंभीर चोटों के कारण ये जल्द ही विवादों में आ गईं.

पैलेट गन लाए जाने से पहले तत्कालीन गृह मंत्री चिदंबरम ने 4 अगस्त 2010 को संसद में कहा था कि 11 जून से राज्य में सुरक्षा बलों की ओर से बल प्रयोग के कारण 39 नागरिकों की मौत हो चुकी थी, क्योंकि उनके पास कोई और विकल्प नहीं था.

उन्होंने कहा था, “कानून-व्यवस्था बनाए रखने की अपनी ड्यूटी के दौरान सुरक्षा बल स्थिति के कारण लाठीचार्ज करने के लिए मजबूर हुए और अगर लाठीचार्ज से कोई नतीजा नहीं निकला, तो आंसू गैस का इस्तेमाल करना पड़ा. जब भीड़ को नियंत्रित करने की सभी कोशिशें नाकाम हो गईं और भीड़ के पुलिस स्टेशन या पुलिस चौकी पर कब्जा करने का खतरा पैदा हो गया, तो सुरक्षा बलों को गोली चलाने के लिए मजबूर होना पड़ा.

उन्होंने कहा था कि सुरक्षा बलों को भीड़ से संयम के साथ निपटने की सलाह दी गई थी, लेकिन लगातार पत्थरबाजी और पुलिस स्टेशनों व पुलिस चौकियों पर भीड़ के कब्जा करने के खतरे के कारण सुरक्षा बलों को खुद की सुरक्षा और सरकारी संपत्ति की रक्षा के लिए बल का इस्तेमाल करना पड़ा.

उन्होंने संसद में कहा था, “11 जून 2010 से 39 नागरिकों की मौत हुई है. इनमें से 22 मौतें 30 जुलाई 2010 के बाद हुई हैं.” उन्होंने संसद को बताया था कि जून और जुलाई में पत्थरबाजी की 872 घटनाएं हुई थीं और इनमें 1,266 सुरक्षाकर्मी घायल हुए थे.

2016 में हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान, जब पैलेट गन के इस्तेमाल को छह साल हो चुके थे, तत्कालीन गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में बताया था कि पैलेट गन के इस्तेमाल से एक व्यक्ति की मौत हुई थी और 53 लोगों की आंखों में चोट आई थी.

हालांकि, श्रीनगर के श्री महाराजा हरि सिंह अस्पताल ने दावा किया था कि उसने आंखों में चोट वाले 100 से ज्यादा लोगों का ऑपरेशन किया था. सिंह ने संसद को बताया था कि सरकार ने 26 जुलाई 2016 को पैलेट गन के गैर-घातक हथियार के तौर पर इस्तेमाल के दूसरे संभावित विकल्पों की तलाश के लिए एक विशेषज्ञ समिति बनाई थी.

उन्होंने कहा था, “समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी है और सरकार ने उचित तरीके से इसे लागू करने के लिए उसकी सिफारिशों को ध्यान में रखा है.”

इसके बाद गृह मंत्रालय ने फैसला किया कि सुरक्षा बल दंगाइयों को हटाने के लिए PAVA Chilli (शेल और ग्रेनेड), STUN LAC (शेल और ग्रेनेड) और आंसू गैस के शेल जैसे कई दूसरे तरीकों का इस्तेमाल करेंगे. मंत्रालय ने कहा था, “हालांकि, अगर ये उपाय दंगाइयों को हटाने में नाकाम रहते हैं, तो पैलेट गन का इस्तेमाल किया जा सकता है.”

पैलेट गन एक ऐसे कारतूस को फायर करती है, जिसमें सीसे के मिश्रण से बने सैकड़ों छोटे गोल प्रोजेक्टाइल या पैलेट होते हैं. 12 बोर बैरल का माप है. फायर करने पर कारतूस सैकड़ों छोटे पैलेट को बाहर निकालता है, जो फैलकर 100 से 150 मीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से जाते हैं और एक ही गोली में कई लोगों को घायल कर सकते हैं.

राहुल गांधी और साहिल लोचब FIR की कॉपी दिखाते हुए | फोटो: एएनआई
राहुल गांधी और साहिल लोचब FIR की कॉपी दिखाते हुए | फोटो: एएनआई

इन पैलेट का निर्माण पश्चिम बंगाल के इशापुर स्थित ऑर्डिनेंस फैक्ट्री में होता है. ये रैपिड एक्शन फोर्स के हथियारों का हिस्सा हैं और 100 से 120 जवानों वाली हर कंपनी को इनमें से दो या उससे ज्यादा गन दी जाती हैं.

पैलेट गन क्यों लाई गईं

दिप्रिंट से बात करते हुए जम्मू-कश्मीर के पूर्व DGP कुलदीप खोडा ने कहा कि 2010 में पैलेट गन इसलिए लाई गई थी क्योंकि सरकार भीड़ को नियंत्रित करने के लिए आखिरी विकल्प के तौर पर बंदूकों के इस्तेमाल से होने वाली मौतों की संख्या कम करना चाहती थी.

उन्होंने कहा, “J&K में कई ऐसी घटनाएं हुई थीं, जहां भीड़ में शामिल लोगों के पास बंदूकें थीं और ऐसी भीड़ को हटाने के लिए लाठीचार्ज और आंसू गैस पर्याप्त नहीं थे. इसलिए सरकार ने ऐसा गैर-घातक हथियार पेश किया, जिससे भीड़ को हटाने के लिए केवल ऊपर से होने वाली चोट और दर्द हो.”

हालांकि, उन्होंने कहा कि इसे सख्ती से “आखिरी विकल्प का हथियार” बताया गया था.

उन्होंने कहा, “बलों को बंदूक नीचे की ओर रखने की ट्रेनिंग दी गई थी, ताकि पैलेट शरीर के ऊपरी हिस्से से ऊपर न लगें.” हालांकि, उन्होंने कहा कि भीड़ से निपटते समय ट्रेनिंग के बावजूद अधिकारी हमेशा बंदूक नीचे की ओर नहीं रख पाते थे. “ये ऐसी जगहें नहीं थीं, जहां अधिकारियों के पास सही तरीके से निशाना लगाने या अपनी पोजिशन लेने का विकल्प हो.”

उन्होंने कहा कि भीड़ को नियंत्रित करने की व्यवस्था के हिस्से के रूप में इस हथियार के इस्तेमाल से घाटी में क्रॉस फायरिंग के दौरान होने वाली मौतों की संख्या कम हुई. हालांकि, उन्होंने कहा कि इससे दिमाग, रीढ़ और आंखों में चोटें भी आईं.

घटनाक्रम

भारत में पैलेट गन का पहली बार इस्तेमाल 2010 में जम्मू-कश्मीर में तनाव के एक दौर के दौरान हुआ था. 29 अप्रैल 2010 को कुपवाड़ा जिले के माछिल सेक्टर में हुए फर्जी एनकाउंटर के बाद राज्य में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए थे. इस एनकाउंटर में शहजाद अहमद खान, मोहम्मद शफी अहमद लोन और रियाज अहमद लोन मारे गए थे. इसके बाद किशोर तुफैल मट्टू की मौत हो गई थी.

प्रदर्शन कर रही भीड़ की पत्थरबाजी का मुकाबला करने के लिए पुलिस ने बंदूकों का इस्तेमाल किया, जिससे कई नागरिकों की मौत हो गई. बंदूकों के इस्तेमाल को लेकर पुलिस की काफी आलोचना हुई. इसके बाद उन्होंने 12-बोर पंप-एक्शन शॉटगन पेश की, जिन्हें पैलेट गन के नाम से जाना जाता है.

2016 में हिज्बुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी के एनकाउंटर में मारे जाने के बाद पैलेट गन का अगला बड़े स्तर पर इस्तेमाल देखा गया. राज्य में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए और सुरक्षा बलों तथा नागरिकों के बीच हिंसक झड़पें हुईं.

रिपोर्टों के अनुसार, सुरक्षा बलों ने हिंसक भीड़ को हटाने के लिए पैलेट गन का इस्तेमाल किया. छह महीने तक चले हिंसक आंदोलन के दौरान 100 से ज्यादा नागरिक मारे गए और हजारों लोग घायल हुए. इनमें विवादित पैलेट गन से घायल हुए लोग भी शामिल थे.

अप्रैल 2018 में भी पैलेट गन का इस्तेमाल किया गया था. श्रीनगर लोकसभा सीट के उपचुनाव के दौरान अनंतनाग और शोपियां में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए थे. इन प्रदर्शनों में आतंकवाद विरोधी अभियानों के दौरान हुई बड़ी संख्या में नागरिकों की मौत के लिए जवाबदेही की मांग की गई थी.

इसके बाद विरोध प्रदर्शनों को रोकने के लिए सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन का इस्तेमाल किया. 2018 में पैलेट गन के इस्तेमाल को लेकर नरेंद्र मोदी सरकार की काफी आलोचना हुई थी. यह उस समय के गृह मंत्री राजनाथ सिंह के इस बयान के दो साल बाद हुआ था कि सरकार दूसरे गैर-घातक विकल्पों की तलाश करेगी.

कुछ महीने बाद कश्मीर में सुरक्षा बलों की ओर से पैलेट गन के इस्तेमाल से 19 महीने की बच्ची हिबा जान की आंखों में गंभीर चोट आई. घाटी में पैलेट गन की सबसे कम उम्र की पीड़ितों में से एक बच्ची हिबा उस समय घायल हुई, जब शोपियां में भीड़ को हटाने के लिए सुरक्षा बलों ने पैलेट चलाए.

इस घटना के बाद बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए और इस हथियार की वजह से नागरिकों पर जिंदगी बदल देने वाला असर पड़ने को लेकर सरकार की कड़ी आलोचना हुई.

हालिया विवाद

भीड़ को नियंत्रित करने के उपाय के तौर पर पैलेट गन लाए जाने के 16 साल बाद एक बार फिर ये चर्चा में हैं. कई Gen Z प्रदर्शनकारियों ने दावा किया कि 20 जुलाई को परीक्षा पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान जब प्रदर्शनकारी संसद की ओर मार्च करने की कोशिश कर रहे थे, तब सुरक्षा बलों की ओर से चलाई गई पैलेट से वे घायल हुए.

TMC के राष्ट्रीय प्रवक्ता और राज्यसभा सांसद साकेत गोखले की ओर से दाखिल RTI से पता चला कि दिल्ली के लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज और राम मनोहर लोहिया अस्पताल में 20 जुलाई के प्रदर्शन के बाद कम से कम 10 लोगों का “पैलेट, शॉट या प्रोजेक्टाइल से लगी चोटों” के लिए इलाज किया गया.

इस बीच, 20 जुलाई के ‘संसद चलो मार्च’ के बाद के दिनों में एम्स और सफदरजंग अस्पताल से भी पैलेट से लगी चोटों के कई अन्य संभावित मामले सामने आए.

इन कथित पीड़ितों में दिल्ली के नजफगढ़ के रहने वाले साहिल लोचब भी हैं. लोचब की दाहिनी आंख में कथित तौर पर पैलेट लगी, जिससे कॉर्निया में छेद हो गया और आंखों की रोशनी हमेशा के लिए जाने की काफी संभावना है. उनका एम्स में इलाज हुआ.

राहुल गांधी गुरुवार को लोचब के साथ पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन पहुंचे. इससे पहले पुलिस ने कथित तौर पर एफआईआर दर्ज नहीं की थी और शिकायत देने के बाद जांच अधिकारी (IO) की संपर्क जानकारी भी साझा नहीं की थी.

सूत्रों के अनुसार, लोचब ने 14 अगस्त को अपनी शिकायत दी थी. उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस ने उनकी शिकायत ले ली, लेकिन अभी तक कोई IO नियुक्त नहीं किया है और न ही एफआईआर दर्ज की है.

दिप्रिंट से बात करते हुए DCP (नई दिल्ली) सचिन शर्मा ने कहा कि पुलिस को शिकायत मिली है और अदालतों में कार्रवाई जारी है. उन्होंने कहा, “20 जुलाई से जुड़े सभी मामलों की जांच क्राइम ब्रांच कर रही है.”

बाद में गुरुवार को दिप्रिंट को पता चला कि अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ “जानबूझकर चोट पहुंचाने” और “जान को खतरे में डालने वाले कृत्यों” के आरोप में एफआईआर दर्ज की गई है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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