नई दिल्ली: अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) की वाइस-चांसलर (V-C) नईमा खातून के बेटे अली फरान गुलरेज़ की यूनिवर्सिटी के कानून विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर हाल ही में हुई नियुक्ति पर सवाल उठ रहे हैं. आरोप है कि इसमें शिक्षा मंत्रालय के उन दिशानिर्देशों का उल्लंघन हुआ है, जो V-C के करीबी रिश्तेदार की नियुक्ति से जुड़े हैं.
दिप्रिंट को जानकारी मिली है कि केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय को पूर्व छात्रों की ओर से नियुक्ति को चुनौती देने वाली शिकायतें भी मिली हैं और उसने यूनिवर्सिटी से जवाब मांगा है.
गुलरेज को डॉ. बी. आर. आंबेडकर चेयर के तहत असिस्टेंट प्रोफेसर नियुक्त किया गया है. यह एक अकादमिक पद है, जिसमें आंबेडकर के जीवन और विचारों के साथ-साथ सामाजिक न्याय, समानता और वंचित समुदायों के सशक्तीकरण से जुड़े मुद्दों पर पढ़ाई और रिसर्च की जाती है. उनकी नियुक्ति पांच साल के लिए या चेयर के खत्म होने तक है, इनमें से जो भी पहले हो.
नियुक्ति की जानकारी 16 जुलाई के एक पत्र के जरिए दी गई थी, जिसकी एक कॉपी दिप्रिंट ने देखी है. नियुक्ति के लिए जनरल सिलेक्शन कमेटी की बैठक 24 जून को हुई थी.
AMU के कुछ शिक्षकों ने आरोप लगाया कि शिक्षा मंत्रालय की ओर से 2018 में बनाए गए दिशानिर्देश, जिसे पहले मानव संसाधन विकास मंत्रालय (MHRD) के नाम से जाना जाता था, खास तौर पर V-C या किसी संस्थान के दूसरे प्रमुख के करीबी रिश्तेदार की भर्ती से जुड़े मामलों पर लागू होते हैं. यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) ने 1 फरवरी 2019 को इन दिशानिर्देशों को सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों और संस्थानों के साथ साझा किया था.
दिशानिर्देशों में कहा गया है कि अगर ऐसा कोई रिश्तेदार किसी पद के लिए आवेदन करता है, तो संस्थान के प्रमुख को पहले से इस रिश्ते की जानकारी देनी चाहिए और भर्ती की प्रक्रिया से खुद को अलग कर लेना चाहिए.
हालांकि, दिशानिर्देश सिर्फ खुद को भर्ती प्रक्रिया से अलग कर लेने को ही पर्याप्त सुरक्षा नहीं मानते. इनमें माना गया है कि संस्थान के प्रमुख के पद पर होने के कारण चयन प्रक्रिया पर उनका संभावित प्रभाव पड़ सकता है, भले ही वह अधिकारी खुद को प्रक्रिया से अलग कर ले.
इस चिंता को दूर करने के लिए दिशानिर्देशों में कहा गया है कि संस्थान को पहले से मंत्रालय को इसकी जानकारी देनी चाहिए और ऐसे मामलों में मंत्रालय की ओर से सिलेक्शन कमेटी में दो अतिरिक्त विशेषज्ञ दिए जाएंगे.
दिप्रिंट को जवाब देते हुए V-C के कार्यालय ने एक बयान में कहा कि जिस पद की बात हो रही है, वह “UGC के नियमों के तहत नहीं आता” और इस पद के चयन में शिक्षा मंत्रालय की “कोई भूमिका नहीं है.”
कार्यालय ने कहा कि यह नियुक्ति इसके बजाय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के तहत डॉ. आंबेडकर फाउंडेशन और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के बीच हुए एक समझौता ज्ञापन के तहत होती है.
डॉ. आंबेडकर चेयर सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की ओर से यूनिवर्सिटी और संस्थानों में ‘डॉ. आंबेडकर चेयर बनाने की योजना’ के तहत स्थापित की जाती हैं. इस योजना को सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के तहत एक स्वायत्त संस्था डॉ. आंबेडकर फाउंडेशन चलाता है.
हालांकि, सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की 2021-22 की डॉ. आंबेडकर चेयर स्थापित करने की योजना से जुड़ी गाइडलाइंस में खास तौर पर कहा गया है कि चेयर के तहत असिस्टेंट प्रोफेसर की भर्ती और नियुक्ति “UGC के समय-समय पर जारी नियमों के अनुसार असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर भर्ती के लिए लागू उसी प्रक्रिया के तहत की जाएगी, जिसे संबंधित यूनिवर्सिटी/संस्थान ने समय-समय पर अपनाया हो.”
शिक्षा मंत्रालय को जवाब के लिए एक विस्तृत सवाल भेजा गया है और अगर मंत्रालय की ओर से जवाब मिलता है तो इस रिपोर्ट को अपडेट किया जाएगा.
मंत्रालय के एक सूत्र ने भी पुष्टि की कि यूनिवर्सिटी ने अतिरिक्त बाहरी विशेषज्ञों की नियुक्ति की मांग नहीं की थी. सूत्र ने कहा, “मंत्रालय को V-C के बेटे की फैकल्टी के तौर पर नियुक्ति को लेकर शिकायतें मिली हैं, जिसके लिए यूनिवर्सिटी से जवाब मांगा गया है.”
दिप्रिंट ने गुलरेज से भी ईमेल के जरिए टिप्पणी मांगी है. उनका जवाब अभी नहीं मिला है.
भर्ती को लेकर सवाल
AMU के कुछ शिक्षकों और पूर्व छात्रों ने आरोप लगाया है कि यूनिवर्सिटी ने मंत्रालय को पहले से यह जानकारी नहीं दी कि वाइस-चांसलर नईमा खातून का बेटा उम्मीदवार है. इसके चलते 2018 के MHRD के दिशानिर्देशों के तहत मंत्रालय की ओर से दिए जाने वाले दो अतिरिक्त विशेषज्ञों को नामित नहीं किया गया.
हालांकि, दिप्रिंट को दिए अपने जवाब में यूनिवर्सिटी ने कहा कि “उसके नियमों या MoU के तहत विशेषज्ञों के नामांकन के बारे में शिक्षा मंत्रालय को जानकारी देने की कोई जरूरत नहीं थी.” यूनिवर्सिटी ने कहा कि दोनों लोगों को MoU की धारा 6 के तहत डॉ. आंबेडकर फाउंडेशन ने नामित किया था और उन्होंने 24 जून को हुई चयन बैठक में हिस्सा लिया था.
AMU के पूर्व कानून छात्र सैयद कैफ हसन ने 15 जुलाई को, यानी नियुक्ति पत्र जारी होने से एक दिन पहले, एक शिकायत भी दी थी. इसमें भर्ती प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों को उठाया गया था.
राष्ट्रपति, शिक्षा मंत्रालय, UGC और AMU को भेजी गई इस शिकायत में दिप्रिंट द्वारा देखे गए RTI के जवाब का हवाला देते हुए वाइस-चांसलर की ओर से विज्ञापन को मंजूरी देने की भूमिका पर सवाल उठाया गया था. इसमें आरोप लगाया गया कि प्रक्रिया में शिक्षा मंत्रालय और UGC को पहले से कोई जानकारी नहीं दी गई और स्वतंत्र जांच की मांग की गई.
अपनी शिकायत में उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि V-C ने इस पद के विज्ञापन को मंजूरी दी थी, जिससे खुद को भर्ती प्रक्रिया से “अलग करने” की जरूरत पर सवाल उठते हैं.
हालांकि, दिप्रिंट को दिए जवाब में यूनिवर्सिटी ने कहा कि वाइस-चांसलर की “इस चयन समिति में कोई भूमिका नहीं है” और उन्होंने भर्ती प्रक्रिया से खुद को अलग कर लिया था.
यूनिवर्सिटी ने कहा कि खातून ने औपचारिक रूप से रजिस्ट्रार को अपने खुद को प्रक्रिया से अलग करने की जानकारी दी थी, भर्ती से जुड़ी कोई फाइल उनके सामने नहीं रखी गई थी और चयन समिति की बैठक वाले दिन वह छुट्टी पर थीं.
चयन समिति के गठन को लेकर सवाल
कई शिक्षकों ने इस पद के लिए चयन समिति किस अधिकार के तहत बनाई गई, इस पर भी सवाल उठाए हैं.
AMU के नियमों के तहत ऐसी समितियों के लिए विशेषज्ञों के चयन की प्रक्रिया में बोर्ड ऑफ स्टडीज, एकेडमिक काउंसिल और एग्जीक्यूटिव काउंसिल (EC) शामिल होते हैं. हालांकि, समिति के लिए दो बाहरी विशेषज्ञों को अंतिम रूप से EC ही नामित करती है.
वहीं, यूनिवर्सिटी ने दिप्रिंट को दिए जवाब में कहा, “प्रो-वाइस-चांसलर ने यूनिवर्सिटी के नियमों के नियम 27 के अनुसार चयन समिति का गठन और उसे मंजूरी दी थी.” यूनिवर्सिटी ने कहा कि बाद में इसकी जानकारी EC को दी गई थी. यूनिवर्सिटी के अनुसार, प्रो-V-C ने ही समिति की अध्यक्षता भी की थी.
यूनिवर्सिटी ने अपने जवाब में दावा किया कि दो बाहरी विशेषज्ञों को ईसी ने नामित किया था. लेकिन शिक्षकों ने सवाल उठाया कि फरवरी में विज्ञापित असिस्टेंट प्रोफेसर के पद के लिए चयन समिति में विशेषज्ञों को कैसे नामित किया जा सकता था, जबकि इस साल EC की कोई बैठक ही नहीं हुई थी.
एक अन्य शिक्षक ने कहा, “AMU एक्ट की धारा 19(3), जो वैधानिक संस्थाओं की ओर से जरूरी फैसले लेने से जुड़ी है, यह अधिकार सिर्फ V-C को देती है. अगर V-C ने बाहरी विशेषज्ञों का चयन नहीं किया था, तो फिर उन्हें किसने चुना? किसी भी स्थिति में PVC के पास ऐसा अधिकार नहीं है. इस मामले में यह काम सिर्फ एग्जीक्यूटिव काउंसिल को करना चाहिए था.”
उन्होंने यह भी सवाल उठाया है कि क्या प्रो-वाइस-चांसलर ने पहले भी ऐसी ही भर्ती प्रक्रियाओं में इन अधिकारों का इस्तेमाल किया है और अगर किया है, तो किस वैधानिक प्रावधान के तहत किया है.
दिप्रिंट ने इन सवालों पर यूनिवर्सिटी से जवाब मांगा है, जो अभी नहीं मिला है.
अप्रैल 2024 में खातून की AMU की वाइस-चांसलर के तौर पर नियुक्ति को भी कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ा था. याचिकाकर्ताओं ने उस प्रक्रिया में उनके पति प्रो. मोहम्मद गुलरेज की भूमिका पर सवाल उठाया था, जिसमें उनके नाम की सिफारिश की गई थी.
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मई 2025 में इन याचिकाओं को खारिज कर दिया था और कहा था कि उनके पति की भागीदारी से उनकी नियुक्ति अमान्य नहीं होती. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी हाई कोर्ट के आदेश में दखल देने से इनकार कर दिया था.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)