नई दिल्ली: जब अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस स्वर्णा कांता शर्मा को मामले से अलग करने की मांग करते हुए आवेदन दायर किया, यह कहते हुए कि उन्होंने अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद (ABAP) के कार्यक्रमों में हिस्सा लिया था, तब इस RSS से जुड़े वकीलों के संगठन पर ध्यान गया. यह संगठन कई वर्षों से देश के कई वरिष्ठ जजों को अपने कार्यक्रमों में बुलाता रहा है.
ABAP की स्थापना 1992 में RSS कार्यकर्ता दत्तोपंत ठेंगड़ी ने की थी. इसका घोषित उद्देश्य कानूनी पेशे में “भारतीय मूल्यों” को फिर से स्थापित करना था. संगठन का कहना है कि उसका लक्ष्य सामाजिक न्याय और “भारतीय सोच” पर आधारित कानूनी व्यवस्था के जरिए लोगों को न्याय दिलाना है.
सोसायटी के रूप में रजिस्टर्ड ABAP देश के सबसे बड़े वकील नेटवर्क में से एक बन चुका है. उसका दावा है कि हर जिला अदालत में उसके लगभग 200 वकील हैं. यह जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर सम्मेलन आयोजित करता है, जिनमें मौजूदा और पूर्व जज, केंद्रीय मंत्री, वकील और विशेषज्ञ शामिल होते हैं.
इन सम्मेलनों से न्यायपालिका की भागीदारी साफ दिखाई देती है.
दिसंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विजय बिश्नोई ने राजस्थान के बालोतरा में ABAP के 17वें राष्ट्रीय सम्मेलन में मुख्य भाषण दिया. उन्होंने “सामाजिक सद्भाव” पर बात की. इस कार्यक्रम में केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और राजस्थान हाई कोर्ट के जस्टिस पुष्पेंद्र सिंह भाटी भी मौजूद थे.
एक साल पहले, सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा ने गुजरात में ABAP की राष्ट्रीय परिषद बैठक में भाषण दिया. उन्होंने कहा कि धर्म, जाति और समुदाय के आधार पर लोगों को बांटने वाली बातें संविधान की भाईचारे की भावना के लिए खतरा हैं.
जजों की मौजूदगी इससे भी पहले की है.
2023 में सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन जस्टिस बी.आर. गवई, जो बाद में भारत के मुख्य न्यायाधीश बने, ABAP की सुप्रीम कोर्ट शाखा के एक कार्यक्रम में मुख्य अतिथि थे. यह कार्यक्रम डॉ. बी.आर. आंबेडकर की विरासत को सम्मान देने के लिए आयोजित किया गया था. 2021 में सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन जस्टिस अब्दुल नज़ीर ने हैदराबाद में ABAP की राष्ट्रीय परिषद बैठक में हिस्सा लिया.
दिसंबर 2022 में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में हुए ABAP के 16वें राष्ट्रीय सम्मेलन में तत्कालीन सुप्रीम कोर्ट जस्टिस और वर्तमान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत मुख्य वक्ता थे. सम्मेलन का विषय था: ‘75 साल का उभरता भारत – कानून और न्याय के बदलते रूप’. उस कार्यक्रम में जस्टिस शर्मा भी मौजूद थीं. उनके साथ मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के जस्टिस जी.एस. अहलूवालिया, मद्रास हाई कोर्ट के जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और तत्कालीन केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू भी थे.
2018 के राष्ट्रीय सम्मेलन में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एम.आर. शाह और इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस अत्ताउ रहमान मसूदी शामिल हुए थे. इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन जस्टिस दीपक मिश्रा ने 2015 में बेंगलुरु में ABAP के एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया था.
इससे पहले के रिकॉर्ड बताते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन जस्टिस ए.के. पटनायक ने 2012 में ओडिशा के कटक में हुए सम्मेलन में हिस्सा लिया था और जस्टिस सी.के. ठक्कर 2009 में दिल्ली के एक कार्यक्रम में मौजूद थे.
ABAP के कार्यक्रमों में जजों की भागीदारी 2014 में भाजपा के सत्ता में आने से पहले भी थी. हालांकि, 2014 से पहले के रिकॉर्ड कम उपलब्ध हैं. यह साफ नहीं है कि ऐसा ABAP की रिकॉर्ड रखने और प्रकाशित करने की बेहतर व्यवस्था के कारण है या किसी और वजह से.
मर्यादा बनाम परंपरा
केजरीवाल से जुड़े आबकारी नीति मामले में खुद को अलग करने से इनकार करते हुए जस्टिस शर्मा ने कहा कि ABAP के कार्यक्रम में शामिल होना किसी निजी वैचारिक जुड़ाव का संकेत नहीं है. उन्होंने इसे उन कई सार्वजनिक कानूनी कार्यक्रमों जैसा बताया, जिनमें दूसरे मौजूदा जज भी शामिल होते रहे हैं.
केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने भी केजरीवाल की मांग का विरोध करते हुए यही बात कही. एजेंसी ने कहा कि अगर ABAP के कार्यक्रम में मौजूद होना वैचारिक पक्षपात माना जाए, तो कई हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों से राजनीतिक मामलों में खुद को अलग करने की मांग उठ सकती है.
ABAP के एक सदस्य, जिन्होंने नाम नहीं बताने की शर्त पर बात की, ने कहा कि संगठन जजों को इसलिए बुलाता है क्योंकि वे रोज संविधान की व्याख्या करते हैं. उन्होंने कहा, “वकीलों की बड़ी संख्या इन कार्यक्रमों में आती है, इसलिए उन्हें जजों के विचार सीधे सुनने का मौका मिलता है, जिन्हें वे आमतौर पर फैसलों में पढ़ते हैं.”
जजों को बुलाने के सवाल पर उन्होंने कहा, “हम सभी को बुलाते हैं, आना या न आना उन पर निर्भर है. हम राष्ट्रवादी सोच रखते हैं, लेकिन हम किसी भी दूसरे बार संगठन जैसे ही हैं, तो इसमें आपत्ति क्यों होनी चाहिए?”
रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट जस्टिस हेमंत गुप्ता ने भी इससे सहमति जताई.
उन्होंने कहा, “देशभर में जज बार एसोसिएशन, कानूनी संस्थाओं, लॉ स्कूल और कॉलेजों के कार्यक्रमों में हिस्सा लेते हैं. जज ऐसे संगठनों के कार्यक्रमों में भी भाषण दे चुके हैं जिनका झुकाव वामपंथी विचारधारा की ओर माना जाता है.”
उनके अनुसार, ABAP के कार्यक्रमों में शामिल होना तब तक स्वीकार्य है, जब तक चर्चा कानूनी विषयों तक सीमित रहे. उन्होंने कहा, “अगर ABAP के सेमिनार और सम्मेलन में कानूनी मुद्दों पर चर्चा हो रही है और राजनीतिक विचार या जुड़ाव की बात नहीं हो रही, तो इससे पक्षपात साबित नहीं होता.”
सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपनाई गई न्यायिक आचरण संहिता ‘रिस्टेटमेंट ऑफ वैल्यूज़ ऑफ ज्यूडिशियल लाइफ ’ का हवाला देते हुए जस्टिस गुप्ता ने कहा, “अधिवक्ता परिषद वकीलों का संगठन है. बार और बेंच न्याय व्यवस्था के दो पहिए हैं और उन्हें तालमेल और सहयोग के साथ चलना चाहिए. मौजूदा और पूर्व जज ऐसे कार्यक्रमों में जाते रहे हैं. मेरी राय में जजों को ‘रिस्टेटमेंट ऑफ वैल्यूज़’ की तय सीमाओं को पार नहीं करना चाहिए.”
‘रिस्टेटमेंट ऑफ वैल्यूज़ ऑफ ज्यूडिशियल लाइफ’ 1997 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपनाई गई 16 बिंदुओं की आचार संहिता है. इसका उद्देश्य उच्च न्यायपालिका में स्वतंत्रता, निष्पक्षता और ईमानदारी बनाए रखना है. यह कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है, बल्कि न्यायिक नैतिकता के लिए खुद लागू की गई सलाहकारी संहिता है. इसके साथ एक आंतरिक प्रक्रिया भी है, जिसके जरिए इसका पालन सुनिश्चित किया जाता है.
लेकिन सभी लोग इन सीमाओं को एक जैसा नहीं मानते.
सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस अभय एस. ओका ने इस साल अप्रैल में ABAP के एक ऑनलाइन कार्यक्रम में कहा कि अगर वे जज रहते हुए ऐसा निमंत्रण पाते, तो विनम्रता से मना कर देते. उन्होंने कहा, “अगर मैं मौजूदा जज के रूप में अधिवक्ता परिषद के मंच पर बोलने के लिए बुलाया जाता, तो मैं मना कर देता, क्योंकि मेरा मानना था कि अधिवक्ता परिषद का राजनीतिक झुकाव है.”
हालांकि, 2020 में कर्नाटक हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहते हुए जस्टिस ओका ने ABAP के एक ऑनलाइन कार्यक्रम को संबोधित किया था.
सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण, जो पहले AAP के वरिष्ठ नेता रह चुके हैं लेकिन बाद में पार्टी से अलग हो गए, ने कहा कि ABAP के कार्यक्रमों में शामिल होने को लेकर कोई भ्रम नहीं होना चाहिए. उन्होंने कहा, “ABAP साफ तौर पर एक राजनीतिक पार्टी से जुड़ा हुआ है और जज अक्सर राजनीतिक हितों से जुड़े मामलों की सुनवाई करते हैं. इसलिए यह अच्छा विचार नहीं है.”
उन्होंने आगे कहा, “आखिरकार भाजपा RSS की राजनीतिक शाखा है, जैसे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) उसकी छात्र शाखा है और अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद (ABAP) उसकी कानूनी शाखा है.”
ABAP के कार्यक्रमों में जजों की भागीदारी संस्थागत रूप से आम बात हो सकती है, लेकिन क्या यह पूरी तरह उचित है, इस सवाल पर न्यायपालिका ने अभी तक कोई अंतिम फैसला नहीं किया है.
सौम्या शर्मा, दिप्रिंट स्कूल ऑफ़ जर्नलिज़्म की एल्युमनाई हैं, और अभी दिप्रिंट के साथ इंटर्नशिप कर रही हैं.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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