नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां ने रविवार को कहा कि ऐसी कोई भी प्रक्रिया, जिसके कारण लाखों भारतीय अपने वोट देने के अधिकार से वंचित हो जाएं और “बिना वोटिंग अधिकार वाले नागरिक” बन जाएं, वह “अपने आप में मनमानी” है और “किसी भी तरह की whataboutery इसे सही नहीं ठहरा सकती.”
भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की ओर से कराई गई स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया का सीधे तौर पर ज़िक्र किए बिना जज ने कहा, “मेरी राय में, ऐसी कोई भी प्रक्रिया जो बड़े स्तर पर नागरिकों को वोट देने के अधिकार से वंचित करती है और उन्हें बिना वोटिंग अधिकार वाला नागरिक बना देती है, वह संविधान के अनुच्छेद 326 और 14 का पूरी तरह उल्लंघन होगी.”
ये टिप्पणी SIR प्रक्रिया के बाद कथित तौर पर बड़े पैमाने पर वोटरों के नाम हटाए जाने को लेकर उठ रही चिंताओं के बीच आई है.
अनुच्छेद-326 सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार से जुड़ा है, जिसके तहत 18 साल से ज्यादा उम्र के सभी नागरिकों को वोट देने का अधिकार मिलता है. इसके तहत किसी व्यक्ति को वोटर के तौर पर रजिस्टर होने या वोट देने के अधिकार से सिर्फ कुछ खास आधार पर रोका जा सकता है, जैसे किसी जगह का निवासी न होना, मानसिक रूप से अस्वस्थ होना और आपराधिक रिकॉर्ड. अनुच्छेद 14 समानता के अधिकार की गारंटी देता है.
जस्टिस भुइयां ने हैदराबाद में NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ कैंपस में आयोजित एक कार्यक्रम में कहा, “अनुच्छेद 326 के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ नहीं की जा सकती. कोई अथॉरिटी ऐसा नहीं कर सकती और कोई अदालत भी इसे मंजूरी या समर्थन नहीं दे सकती. संविधान से ऊपर कोई नहीं है.” उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान नागरिकों के दो वर्ग नहीं बनाता—एक वोट देने के अधिकार वाला और दूसरा बिना वोटिंग अधिकार वाला.
अपने संबोधन में जस्टिस भुइयां ने उस “लंबे और मुश्किल सफर” के बारे में बात की, जिससे हमारा देश हर नागरिक को, चाहे वह कितना भी साधारण, अशिक्षित या गरीब हो, बराबर वोट का अधिकार देने के लिए गुज़रा है.
उन्होंने कहा, “अगर किसी प्रक्रिया के कारण लाखों-करोड़ों भारतीय नागरिक अपने वोट देने के अधिकार से वंचित हो जाते हैं और अपने ही देश में दूसरे दर्जे के नागरिक बन जाते हैं, यानी ऐसे नागरिक जिनके पास वोट देने का अधिकार नहीं है, तो ऐसी प्रक्रिया अपने आप में मनमानी है. किसी भी तरह की whataboutery इसे सही नहीं ठहरा सकती. यह संविधान के मूल पर चोट करती है. मैं यहां तक कहूंगा कि यह उस संवैधानिक व्यवस्था को नकारना है, जिसे हमने भारत के संविधान के तहत अपनाया है.”
उन्होंने कहा, “इसलिए, मेरी राय में, किसी भारतीय नागरिक का वोट डालने का अधिकार खुद संविधान के मूल ढांचे के सिद्धांत का अहम हिस्सा है. वास्तव में, वोट देने का अधिकार नागरिकता का असली मतलब है. यह भारत के किसी आम नागरिक के लिए देश के शासन में भाग लेने का एकमात्र तरीका है.”
जस्टिस भुइयां ने आगे बताया कि भारत में वोट देने का अधिकार देश के औपनिवेशिक शासन के खिलाफ लंबे स्वतंत्रता संघर्ष का नतीजा है. उन्होंने कहा कि यह एक लंबे संघर्ष का परिणाम है. उन्होंने यह भी कहा कि वोट देने का अधिकार सिर्फ कानून से मिला अधिकार नहीं है, बल्कि यह एक संवैधानिक अधिकार है, जो अनुच्छेद 326 से मिलता है. यह अनुच्छेद वयस्क मताधिकार के आधार पर लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव की गारंटी देता है.
उन्होंने ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में वोट देने के अधिकार और सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के विकास का भी ज़िक्र किया. उन्होंने स्वराज प्रस्ताव, लखनऊ पैक्ट 1916 और मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार या भारत सरकार अधिनियम 1919 का उल्लेख किया.
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के कुछ पुराने फैसलों का भी ज़िक्र किया, जिनमें People’s Union for Civil Liberties vs Union of India, Anoop Baranwal फैसला (2023) और Lal Babu Hussein फैसला (1995) शामिल हैं. इन मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने उन वोटरों के लिए दिशानिर्देश दिए थे, जो वोट देने के अधिकार से वंचित हो गए थे.
अनुच्छेद 326 के तहत 18 साल की उम्र पूरी कर चुका व्यक्ति लोकसभा और विधानसभा चुनावों में वोट देने का हकदार है. हालांकि, संविधान में बताए गए कुछ आधारों पर उसे अयोग्य ठहराया जा सकता है. इनमें किसी जगह का निवासी न होना, मानसिक रूप से अस्वस्थ होना, अपराध या भ्रष्ट और गैरकानूनी गतिविधियां शामिल हैं. उन्होंने कहा, “इन सीमाओं का उल्लंघन करने वाला कोई भी कानून अमान्य होगा.” उन्होंने कहा कि यह भी उतना ही ज़रूरी है कि प्रशासनिक प्रक्रियाओं के जरिए वोट देने के अधिकार को बिना किसी तर्क या उचित कारण के कम न किया जाए.
उन्होंने कहा कि वोट देने के अधिकार को किसी नागरिक की पहचान से अलग नहीं किया जा सकता. उन्होंने कहा, “यह शरीर से आत्मा निकालने जैसा होगा.”
उन्होंने कहा, “मैं खुद से पूछता हूं, किसी नागरिक की उसके वोट देने के अधिकार के बिना क्या कीमत है?”
‘NALSAR के छात्रों पर गर्व है’
अपना भाषण खत्म करने से पहले जस्टिस भुइयां ने NALSAR के छात्रों की तारीफ की. वह पहले इस यूनिवर्सिटी के चांसलर रह चुके हैं.
उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि मुझे NALSAR के छात्रों पर गर्व होना चाहिए. आपने देश और दुनिया को दिखाया है कि यूनिवर्सिटी के छात्र, खासकर कानून के छात्र, कैसे होने चाहिए. आप बहुत होनहार हैं. आप निडर हैं और बहादुर हैं.”
हाल ही में यह संस्थान एक विवाद के केंद्र में रहा था. छात्रों के एक समूह ने अपने दीक्षांत समारोह में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत को बुलाने का विरोध किया था. इस विवाद के बीच बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष और बीजेपी के राज्यसभा सांसद मनन कुमार मिश्रा ने राज्य बार काउंसिलों को निर्देश दिया था कि NALSAR से पास होने वाले छात्रों में से किसी का भी नामांकन न किया जाए और इस मामले की जांच की जाएगी. हालांकि, कड़े विरोध के बाद यह निर्देश वापस ले लिया गया और मिश्रा को माफी भी मांगनी पड़ी.
रविवार को जस्टिस भुइयां ने NALSAR के शिक्षकों की भी तारीफ की. उन्होंने कहा, “आपने अपनी जिम्मेदारियां बहुत अच्छी तरह निभाई हैं. आपने वही किया है, जो यूनिवर्सिटी के शिक्षक से उम्मीद की जाती है. जब मैं चांसलर था, तब प्रोफेसर (श्रीकृष्ण देव) राव को वाइस चांसलर नियुक्त किया गया था. मुझे कहना होगा कि उन्होंने यूनिवर्सिटी का बहुत अच्छी तरह नेतृत्व किया है. उन्होंने शिक्षकों और छात्रों को निराश नहीं किया है.”
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