नई दिल्ली: छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले के हरदीडीह गांव के प्रवासी मजदूर दीपक रात्रे का अपने गांव में एक अधूरा काम था. छोटी उम्र से ही परिवार का पेट पालने की जिम्मेदारी उठाने वाले दीपक अपने ननिहाल के गांव में एक घर बनवा रहे थे.
जब दीपक सिर्फ चार साल के थे, तब उनके पिता ने आत्महत्या कर ली थी. इसके बाद परिवार हरदीडीह गांव आ गया. परिवार में कमाने वाले इकलौते पुरुष दीपक ही थे. उन्हें अपने दिव्यांग छोटे भाई की जिम्मेदारी भी उठानी पड़ती थी.
अब दीपक के परिवार का यही सहारा खत्म हो गया है. उनके परिवार में उनकी मां, पत्नी और भाई हैं. शुक्रवार शाम दक्षिण कश्मीर के कीलम गांव में आतंकियों ने उनकी झोपड़ी के बाहर ही 24 साल के दीपक को गोली मार दी.
इसी जिले के रहने वाले उनके साथी मजदूर भूपेंद्र भैना ने श्रीनगर के एक अस्पताल में इलाज के दौरान दम तोड़ दिया. एक हफ्ते से थोड़ा ज्यादा समय में यह दूसरा आतंकी हमला है. इससे पहले 22 जुलाई को अनंतनाग में एक हेड कांस्टेबल की हत्या कर दी गई थी.
“दीपक ही पूरे परिवार का सहारा था और वही सबसे बड़ा कमाने वाला था.” उनके चाचा दिलहरन सांडे ने बिलासपुर से फोन पर दिप्रिंट को बताया. “गांव में पक्का घर बनाने का सपना ही था, जिसकी वजह से दीपक ने कहा था कि वह इस सीजन में कश्मीर जाएगा और पैसे लेकर वापस आएगा.”
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने शनिवार को दोनों मारे गए प्रवासी मजदूरों के परिवारों को 10-10 लाख रुपये की अनुग्रह राशि देने का ऐलान किया.
Chief Minister has strongly condemned the dastardly killing of two labourers in Kulgam and expressed profound grief over the loss of innocent lives.
He announced ex-gratia relief of ₹10 lakh each from the Chief Minister’s Relief Fund for the next of kin of the deceased. This…
— Office of Chief Minister, J&K (@CM_JnK) August 1, 2026
द रेजिस्टेंस फ्रंट (TRF), जो लश्कर-ए-तैयबा (LeT) का एक सहयोगी संगठन है, ने शुक्रवार की हत्या की जिम्मेदारी ली है. इसी आतंकी संगठन ने अप्रैल 2025 में पहलगाम में हुए नरसंहार को भी अंजाम दिया था.
जम्मू-कश्मीर पुलिस के सूत्रों ने बताया कि इस दर्दनाक हत्या के आरोपियों की पहचान कर ली गई है और उन्हें पकड़ने की कोशिश की जा रही है.
जम्मू-कश्मीर पुलिस के एक अधिकारी ने दिप्रिंट से कहा, “कम से कम दो संदिग्धों की पहचान हो चुकी है. इनमें से एक TRF का वरिष्ठ आतंकी है, जबकि दूसरे ने उस इलाके की पहले से रेकी की थी, जहां प्रवासी मजदूर रह रहे थे, और हमलावरों को हर तरह की मदद दी थी.”
‘उसे राजमिस्त्री का काम पसंद नहीं था’
भूपेंद्र के पिता दहसथ, मां नागेश्वरी और छोटे भाई अनुराग पिछले छह महीने से हिमाचल प्रदेश के बद्दी में काम करके परिवार चला रहे हैं.
अनुराग ने बद्दी से फोन पर दिप्रिंट को बताया कि उनके पिता वहां राजमिस्त्री का काम करते थे और वही भूपेंद्र को भी अपने साथ ले गए थे.
भूपेंद्र की छोटी बहन अन्नू ने बिलासपुर से फोन पर दिप्रिंट को बताया, “घर की कमाई से खर्च नहीं चल रहा था. गांव में भी काम नहीं मिल रहा था. इसलिए उसने छत्तीसगढ़ से बाहर जाकर काम करने का फैसला किया.”
पहला विकल्प यही था कि वह पूरे परिवार के साथ बद्दी में राजमिस्त्री का काम करे, लेकिन भूपेंद्र की सोच अलग थी. अन्नू ने कहा, “उसे राजमिस्त्री का काम बिल्कुल पसंद नहीं था. इसलिए उसने ईंट भट्ठे पर काम करना बेहतर समझा.”
28 साल का भूपेंद्र करीब दो-तीन महीने पहले अपनी पत्नी के साथ कुलगाम चला गया था. उसने अपने बच्चे को अन्नू के पास छोड़ दिया था. शनिवार दोपहर कुलगाम प्रशासन ने उसका अंतिम संस्कार कराया. उस समय वहां सिर्फ उसकी पत्नी थी. दीपक की पत्नी के साथ भी ऐसा ही हुआ.
अनुराग ने कहा, “हम शायद उसकी पत्नी से बात नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि हमले में उसका फोन खराब हो गया होगा. हमें इस घटना की जानकारी तब मिली जब गांव में हमारे रिश्तेदारों को स्थानीय पुलिस ने बताया और उन्होंने हमें फोन किया.”
‘दो महीने पहले आए थे’
छत्तीसगढ़ के सक्ती जिले की रहने वाली राम कुमारी साहू ने बताया कि उनकी मुलाकात कुलगाम में दीपक और भूपेंद्र जैसे प्रवासी मजदूरों से हुई थी.
उन्होंने कुलगाम से फोन पर दिप्रिंट को बताया, “जून से अगस्त तक का समय कश्मीर में मजदूरों के लिए सबसे ज्यादा काम का होता है. दीपक और भूपेंद्र जिस समूह के साथ आए थे, वह करीब दो महीने पहले जम्मू से कुलगाम आया था.”
उन्होंने बताया कि कीलम गांव में जहां ये सभी प्रवासी मजदूर रहते हैं, वहां की हालत किसी झुग्गी बस्ती से भी बदतर है. वहां करीब 60 परिवार अस्थायी झुग्गियों में रह रहे हैं.
उन्होंने बताया कि दीपक और भूपेंद्र के परिवार एक ही झुग्गी में रहते थे, जिसके बीच सिर्फ एक अस्थायी दीवार थी.
उन्हें सिर्फ इतना याद है कि शुक्रवार शाम अचानक गोलियों की आवाज आई. उन्होंने बताया, “हम सभी गोलियों की आवाज की तरफ दौड़े. वहां पहुंचकर देखा कि दोनों जमीन पर घायल पड़े थे और उनके परिवार के लोग जोर-जोर से रो रहे थे.”
उन्होंने कहा, “महिलाओं ने हमें बताया कि पहले कुछ नकाबपोश लोग बाहर आए और उन्होंने पूछा कि इस बस्ती में कितने लोग रहते हैं और वे कहां के रहने वाले हैं. इसके बाद उन्होंने पुरुषों को बाहर बुलाया और फिर उन्हें पास से कई गोलियां मार दीं.”
बिलासपुर में मौजूद दीपक के चाचा अपनी विधवा बहन की किस्मत पर दुख जताते हुए कहते हैं, “उसने कम उम्र में अपने पति को खो दिया था. रोज संघर्ष करके परिवार चलाया. फिर दीपक बड़ा हुआ और उसने परिवार की लगभग सारी जिम्मेदारियां संभाल लीं. वही सबसे बड़ा कमाने वाला बन गया…”
“अब इस परिवार का क्या होगा, यह सिर्फ भगवान ही जानता है. आतंकियों ने उस पूरे परिवार का भविष्य बर्बाद कर दिया, जो हर दिन सिर्फ दो वक्त की रोटी के लिए मेहनत कर रहा था.”
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