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Friday, 12 June, 2026
होमदेशघर तैयार, पार्किंग नहीं; मुंबई में कार लिफ्ट की कमी से खरीदार और बिल्डर दोनों परेशान

घर तैयार, पार्किंग नहीं; मुंबई में कार लिफ्ट की कमी से खरीदार और बिल्डर दोनों परेशान

पार्किंग लिफ्ट की कमी के कारण प्रोजेक्ट्स का कब्जा (हैंडओवर) देने में भारी देरी हो रही है, जिससे घर खरीदारों और डेवलपर्स दोनों को परेशानी हो रही है.

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मुंबई: अगर आप मुंबई में खरीदे गए अपने नए फ्लैट में शिफ्ट होने की तैयारी कर रहे हैं, तो आपको थोड़ा और इंतज़ार करना पड़ सकता है. वजह कोई कानूनी विवाद नहीं, बल्कि कार पार्किंग लिफ्ट की भारी कमी है, जिसके कारण कई प्रोजेक्ट्स का कब्ज़ा देने में देरी हो रही है.

इस समस्या ने खरीदारों और डेवलपर्स दोनों की चिंता बढ़ा दी है. खरीदार इसलिए परेशान हैं क्योंकि वे अपने फ्लैट में नहीं जा पा रहे हैं, जबकि बिल्डर इसलिए परेशान हैं क्योंकि देरी का असर उनके मुनाफे पर पड़ रहा है.

डेवलपर्स अभी ग्राहकों को पूरा ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट (ओसी) नहीं दे पा रहे हैं, जिससे ग्राहकों की अंतिम भुगतान प्रक्रिया भी अटक रही है. अगर इमारत पुनर्विकास (रीडेवलपमेंट) परियोजना है, तो डेवलपर को पुराने मकान मालिकों को ट्रांजिट किराया भी देना पड़ता है, जिससे वित्तीय दबाव और बढ़ जाता है.

रियल एस्टेट सलाहकार विशाल भार्गव ने दिप्रिंट से कहा, “हम पिछले एक साल से यह समस्या देख रहे हैं. यह ऐसा मुद्दा है जो डेवलपर्स से लेकर खरीदारों तक सभी हितधारकों को प्रभावित करता है. यह एक नया पैटर्न है, जिसमें पूरी इमारत बनकर तैयार है, बस पार्किंग लिफ्ट लगनी बाकी है.”

उन्होंने कहा, “अगर किसी इमारत का काम एक साल देर से पूरा होता है, तो बिल्डर को एक साल अतिरिक्त किराया देना पड़ता है. खरीदार को अपना घर एक साल देर से मिलता है और उसे लंबे समय तक ईएमआई भी चुकानी पड़ती है. यानी इसमें सभी का नुकसान है.”

कार पार्किंग लिफ्ट हाइड्रोलिक प्लेटफॉर्म होते हैं, जो ऊपर-नीचे उठाने वाली तकनीक की मदद से पार्किंग की जगह का अधिकतम उपयोग करते हैं. कारों को एक-दूसरे के बगल में खड़ा करने की बजाय उन्हें एक के ऊपर एक रखा जाता है. जगह की कमी वाले इलाकों में यह व्यवस्था उपयोगी होती है, इसलिए मुंबई में इसकी लोकप्रियता तेज़ी से बढ़ी है.

ये लिफ्ट डेवलपर्स को उपलब्ध फ्लोर स्पेस इंडेक्स (FSI) के भीतर जगह का अधिकतम इस्तेमाल करने की सुविधा देती हैं.

बिल्डरों ने दिप्रिंट को बताया कि बिना पार्किंग के किसी इमारत को बेचा नहीं जा सकता. यहां तक कि छोटे प्रोजेक्ट्स में भी पार्किंग की व्यवस्था देना जरूरी होता है. उनका कहना है कि जिन परियोजनाओं में पोडियम पार्किंग की गुंजाइश नहीं होती, वहां पार्किंग टावर या मैकेनिकल टावर ही एकमात्र विकल्प होते हैं.

नेशनल रियल एस्टेट डेवलपमेंट काउंसिल (NAREDCO) के चेयरमैन डॉ. निरंजन हिरानंदानी ने दिप्रिंट से कहा, “सीमित सप्लायर्स और बाधित सप्लाई चेन के कारण पार्किंग लिफ्ट की मौजूदा कमी रियल एस्टेट सेक्टर में समय पर ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट मिलने में एक बड़ी बाधा बन गई है.”

उन्होंने कहा, “इस देरी के कारण डेवलपर्स को लंबे समय तक ट्रांजिट किराया देना पड़ता है और घर खरीदारों के अंतिम भुगतान में भी देरी होती है. इसका असर परियोजनाओं की आर्थिक व्यवहार्यता और कीमत तय करने की क्षमता पर पड़ता है. इस सप्लाई संकट को दूर करना जरूरी है ताकि परियोजनाएं समय पर पूरी हो सकें और सभी हितधारकों के हित सुरक्षित रह सकें.”

निर्माता और इंस्टॉलेशन एजेंसियों के भरोसे

बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) ने पहली बार 2012 में कार पार्किंग लिफ्ट के लिए दिशा-निर्देश जारी किए थे. इसमें कहा गया था, “कारों की बढ़ती संख्या को देखते हुए यह ध्यान देने योग्य है कि इमारतों के विकास के लिए लगभग कोई खाली जमीन उपलब्ध नहीं है और अधिकांश निर्माण पुराने भवनों के पुनर्विकास के रूप में हो रहा है.”

कम जगह में अधिक पार्किंग उपलब्ध कराने के लिए “मैकेनिकल स्टैक पार्किंग, रोबो पार्किंग, पिट टाइप पार्किंग और रोटरी टाइप पार्किंग जैसी विभिन्न प्रकार की मशीनी पार्किंग प्रणालियां” प्रस्तावित की गई थीं.

बीएमसी ने यह भी कहा था कि जब पार्किंग सुविधा दिशा-निर्देशों के अनुसार बना ली जाती है और उसे इमारत के ब्लूप्रिंट में शामिल किया जाता है, तब बीएमसी का डेवलपमेंट प्लान विभाग उसे मंजूरी देता है. इसके अलावा मुंबई फायर ब्रिगेड से भी मंजूरी लेनी होती है. फायर विभाग के अधिकारी साइट का दौरा करते हैं, कार लिफ्ट का निरीक्षण करते हैं और उसके बाद अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) जारी करते हैं.

जब बिल्डर को अंतिम एनओसी मिल जाती है, तब वह फ्लैट खरीदार को सौंप सकता है.

भार्गव ने कहा कि हालांकि मुंबई में मैकेनिकल पार्किंग लंबे समय से प्रचलित है, लेकिन कोविड के बाद के दौर में इसका बाज़ार तेज़ी से बढ़ा है क्योंकि अब कई प्रोजेक्ट्स पूरा होने के करीब पहुंच रहे हैं.

बिल्डरों का कहना है कि एक कार पार्किंग टावर की लागत प्रति पार्किंग स्लॉट 7 से 10 लाख रुपये तक आती है. डेवलपर्स के अनुसार, 900 वर्ग मीटर से छोटे क्षेत्रों में टावर के बिना कार पार्किंग बनाना लगभग असंभव है.

बाजार में चार से पांच बड़े खिलाड़ी हैं, जिनमें सबसे बड़ी कंपनियों में से एक RR Parkon है.

दिप्रिंट ने कंपनी से ईमेल के जरिए प्रतिक्रिया मांगी है. जवाब मिलने पर इस रिपोर्ट को अपडेट किया जाएगा.

रियल एस्टेट संगठन CREDAI-MCHI के पूर्व अध्यक्ष डोमिनिक रोवेल ने दिप्रिंट से कहा कि निर्माताओं ने अपनी क्षमता से अधिक ऑर्डर ले लिए हैं.

उन्होंने कहा, “सभी कंपनियों की लिफ्ट बनाने की तकनीक और तरीके अलग-अलग हैं. मैं सरकार से अनुरोध करूंगा कि मानकीकरण किया जाए ताकि सुरक्षा के दृष्टिकोण से कोई महत्वपूर्ण चीज छूट न जाए और जब भी वे कोई वादा करें, उसे समय पर पूरा करें.”

उन्होंने कहा, “मैं समझता हूं कि ये छोटी और मध्यम उद्योग (SMEs) हैं, लेकिन इसका असर आखिरकार उस ग्राहक पर पड़ रहा है जो घर खरीद रहा है और ईएमआई चुका रहा है. इसलिए उन्हें ऐसा वादा करना चाहिए जो स्पष्ट और पक्का हो.”

WiseBiz Developers के पार्टनर और NAREDCO के संयुक्त कोषाध्यक्ष चिंतन वसानी ने दिप्रिंट से कहा कि पार्किंग कंपनियों से ज्यादा समस्या उन एजेंसियों की है जो पार्किंग लिफ्ट लगाती हैं. उनकी संख्या कम होने के कारण उनका लगभग एकाधिकार जैसा माहौल बन गया है. उन्होंने कहा कि ऐसी एजेंसियों की संख्या बढ़नी चाहिए.

वसानी ने कहा, “हम समय पर काम पूरा करने के लिए इन एजेंसियों पर निर्भर हैं. इसका असर डेवलपर्स की साख पर भी पड़ता है. यह बिल्कुल भी स्वस्थ स्थिति नहीं है.”

एक डेवलपर ने दिप्रिंट को बताया कि इस समस्या के कारण उसके लिए नए प्रोजेक्ट शुरू करना मुश्किल हो रहा है.

उसने कहा, “इस समय बाजार बहुत अच्छा नहीं है. इसलिए मुझे खरीदारों को आकर्षित करने के लिए नए तरीके अपनाने पड़ रहे हैं. मेरे पास 10:30:60 फॉर्मूला है, यानी मुझे 60 प्रतिशत राशि तभी मिलती है जब मैं कब्ज़ा सौंप देता हूं. लेकिन मेरे तीन चल रहे प्रोजेक्ट्स में कार लिफ्ट का मुद्दा लंबित है, जिसकी वजह से मैं कब्जा नहीं दे पा रहा हूं.”

डेवलपर ने, जिसने अपनी पहचान जाहिर नहीं करने की शर्त पर बात की, कहा कि वह स्टैंड-अलोन प्रोजेक्ट्स बना रहा है, लेकिन खरीदारों को अब संदेह होने लगा है कि क्या वह प्रोजेक्ट पूरा करना चाहता भी है या नहीं.

उसने कहा, “इससे मेरी प्रतिष्ठा को भी नुकसान पहुंचता है.”

एक अन्य डेवलपर, जिसने भी नाम न बताने की शर्त पर बात की, ने दिप्रिंट को बताया कि बोरीवली इलाके में उसके दो वाणिज्यिक प्रोजेक्ट इसी वजह से अटके हुए हैं.

उन्होंने कहा, “दोनों प्रोजेक्ट तीन महीने पहले ही पूरी तरह तैयार हो गए थे, लेकिन कार लिफ्ट तैयार नहीं थी. इसलिए हम ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट (OC) के लिए आवेदन नहीं कर सके. मेरे पैसे तीन-चार महीने तक फंसे रहे. मैं कार लिफ्ट विक्रेता पर जल्दी काम पूरा करने का दबाव भी नहीं डाल सकता था, क्योंकि मुझे पता है कि इससे लंबे समय में गुणवत्ता प्रभावित होगी.”

डेवलपर ने आगे कहा, “यह सब अमेरिका-ईरान युद्ध से पहले की बात है, यानी पुर्जों की कमी की समस्या शुरू होने से पहले. अब युद्ध के बाद मुझे लगता है कि समस्याएं और बढ़ेंगी.”

मुंबई का रीडेवलपमेंट बाजार

जहां रियल एस्टेट बाजार का एक बड़ा हिस्सा धीमा चल रहा है, वहीं मुंबई का रीडेवलपमेंट बाज़ार तेज़ी से बढ़ रहा है. नई परियोजनाओं के लिए जमीन की कमी को देखते हुए बिल्डर अब रीडेवलपमेंट की ओर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं.

नाइट फ्रैंक के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, 2025 में यह बाजार 2024 की तुलना में 16 प्रतिशत बढ़ा. यह वृद्धि 2026 में भी जारी है और पहली तिमाही में ही 70 से अधिक रीडेवलपमेंट परियोजनाओं पर हस्ताक्षर किए जा चुके हैं.

आंकड़े यह भी बताते हैं कि पिछले छह वर्षों में पश्चिमी उपनगरों का माइक्रो-मार्केट तेज़ी से बढ़ा है. बोरीवली, अंधेरी, मालाड और बांद्रा जैसे इलाकों में बड़ी संख्या में नई यूनिट्स जुड़ी हैं, जिससे रियल एस्टेट बाजार में आपूर्ति बढ़ी है.

रोवेल का कहना है कि यह बताना मुश्किल है कि इस समस्या के कारण कितनी परियोजनाएं अटकी हुई हैं.

उन्होंने कहा, “हर परियोजना में कार पार्किंग की जरूरत होती है और सिर्फ रैंप पार्किंग पर्याप्त नहीं है. इसके अलावा विजिटर पार्किंग भी चाहिए. इसलिए मुंबई में हर दूसरी या तीसरी परियोजना में मैकेनिकल पार्किंग का इस्तेमाल हो रहा होगा.”

भार्गव ने बताया कि 10 रीडेवलपमेंट परियोजनाओं में से नौ छोटे आकार की होती हैं, जहां रैंप पार्किंग की सुविधा एक तरह की विलासिता बन जाती है.

उन्होंने कहा, “यह बिल्कुल टी-20 मैच जैसा है. बिल्डर 19वें ओवर तक पहुंच चुका है और यहीं पर बिल्डर और खरीदार दोनों को नुकसान हो रहा है.”

उन्होंने आगे कहा, “एक खतरा यह भी है कि अगर लागत बढ़ती है, तो बिल्डर समय पर डिलीवरी या डिलीवरी की गुणवत्ता से समझौता कर सकता है.”

वसानी ने कहा कि जैसे-जैसे फ्लोर स्पेस इंडेक्स (FSI) बढ़ता है, खरीदारों को आवंटित पार्किंग स्थानों की संख्या भी उसी अनुपात में बढ़ानी पड़ती है. इसलिए पार्किंग टावर ही एकमात्र विकल्प बचता है.

उन्होंने कहा, “यह एक टिक-टिक करता हुआ बम है. यह मेरे हाथ में नहीं है. ऐसा नहीं है कि मैं सिर्फ मुनाफे के लिए काम कर रहा हूं, लेकिन एक अच्छा डेवलपर तो ऐसे छोटे प्रोजेक्ट्स बनाने से ही बचना चाहेगा.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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