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Saturday, 26 September, 2026
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यूनिवर्सिटी से ICU और अवैध इमारतों तक: जस्टिस अमानुल्लाह की बेंच कैसे बढ़ा रही है न्यायिक निगरानी

फरवरी 2023 में सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत हुए जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, पटना हाई कोर्ट और आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट में जज के तौर पर काम कर चुके हैं.

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नई दिल्ली: दिल्ली में बिना मंजूरी बनी इमारतों से लेकर अनदेखे पड़े विरासत स्मारकों, खराब हालत वाली प्राइवेट यूनिवर्सिटियों और ICU के मानकों तक, ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की अगुवाई वाली बेंच की नजर से कुछ भी नहीं बचा है.

तमिलनाडु या नोएडा से जुड़ा कोई एक मामला पूरे देश के लिए निर्देश और गाइडलाइन में बदल जाना, और सुप्रीम कोर्ट का खुद उनके पालन की निगरानी करना, यहां तक कि लापरवाही होने पर अधिकारियों की “व्यक्तिगत जवाबदेही” तय करने की बात कहना. जस्टिस अमानुल्लाह के हाल के हस्तक्षेप इसी तरह के रहे हैं.

फरवरी 2023 में सुप्रीम कोर्ट के जज बनने से पहले जस्टिस अमानुल्लाह पटना हाई कोर्ट और आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट में जज रह चुके हैं. पिछले हफ्ते उनकी बेंच ने पब्लिक यूनिवर्सिटियों से जुड़े एक बड़े मुद्दे पर सुनवाई की. एक छात्र की याचिका को आधार बनाकर कोर्ट ने इस मुद्दे को बड़ा रूप दिया और पूरे देश के लिए एक निर्देश जारी किया कि प्राइवेट यूनिवर्सिटियां मुनाफा कमाने वाले कारोबारी संस्थान के रूप में नहीं चल सकतीं.

यह मामला नोएडा की एमिटी यूनिवर्सिटी की छात्रा आयशा जैन की शिकायत से शुरू हुआ था. उन्होंने आरोप लगाया था कि कॉलेज के रिकॉर्ड में अपना नाम बदलवाने की मांग करने पर उन्हें परेशान किया गया और इसके बाद उन्हें कथित तौर पर इसके नतीजे भुगतने पड़े.

मामले का दायरा बढ़ाते हुए कोर्ट ने पूरे देश में प्राइवेट यूनिवर्सिटियों के नियमन, कामकाज और यहां तक कि उनकी स्थापना से जुड़े मुद्दों की भी जांच शुरू कर दी.

मार्च के एक आदेश में बेंच ने कहा कि मौजूदा मामले और इसी तरह के दूसरे मामलों से यह साफ है कि बिल्डिंग बायलॉज और जमीन के इस्तेमाल से जुड़े नियमों का बड़े पैमाने पर और खुले तौर पर उल्लंघन हो रहा है.

कोर्ट ने कहा, “अक्सर लागू नियमों और कानूनों का खुले तौर पर उल्लंघन करते हुए निर्माण किया जाता है, यहां तक कि उन जगहों पर भी जहां निर्माण की अनुमति नहीं है. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि निर्माण पूरा होने के बाद जमीन और इमारतों का इस्तेमाल अक्सर उस काम के अलावा दूसरे काम के लिए किया जाता है, जिसके लिए मंजूरी दी गई थी.”

17 सितंबर को जस्टिस अमानुल्लाह और एन.वी. अंजिरिया की बेंच ने कहा कि किसी भी प्राइवेट यूनिवर्सिटी को मुनाफा कमाने वाली संस्था के रूप में चलाने की इजाजत नहीं दी जा सकती.

कोर्ट ने कहा कि यूनिवर्सिटी का कोई उद्देश्य होना चाहिए और उसके पास कुछ आर्थिक गुंजाइश भी होनी चाहिए, ताकि उसके पैसे और संसाधनों का जिम्मेदारी से इस्तेमाल हो और संस्था ठीक से चल सके. साथ ही टीचिंग और नॉन-टीचिंग कर्मचारियों को उचित वेतन दिया जा सके. कोर्ट ने कहा कि यह व्यवस्था आम जनता के लिए है, खासकर शिक्षा से जुड़े मामलों में. कोर्ट ने साफ किया कि कोई भी प्राइवेट यूनिवर्सिटी मुनाफा कमाने वाली संस्था के रूप में नहीं चलाई जाएगी. उसे शिक्षा के बड़े सार्वजनिक उद्देश्य की सेवा करनी होगी.

अब इस मामले की अगली सुनवाई 19 नवंबर को होगी. केंद्र, राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों को प्राइवेट यूनिवर्सिटियों के बारे में और जानकारी देनी होगी. इसके लिए मुख्य सचिवों को खुद हस्ताक्षर किए हुए हलफनामे दाखिल करने होंगे. नियामक संस्थाओं को भी अलग-अलग हलफनामे दाखिल करने का निर्देश दिया गया है.

कोर्ट ने काफी विस्तृत जानकारी मांगी है. इसमें यह बताना होगा कि छात्रों को एडमिशन देने, प्रश्नपत्र बनाने, परीक्षा कराने, उत्तर पुस्तिकाओं की जांच करने और पैसों को संभालने के लिए कौन जिम्मेदार है. इन कामों में यूनिवर्सिटी के मैनेजमेंट की क्या भूमिका है, यह भी बताना होगा. केंद्र या राज्य सरकारों से मिली किसी भी तरह की मदद या लाभ की जानकारी भी देनी होगी. हर कोर्स में एडमिशन की प्रक्रिया और एडमिशन के समय तथा पूरे कोर्स के दौरान ली जाने वाली फीस की जानकारी भी देनी होगी.

टीचिंग और नॉन-टीचिंग कर्मचारियों की भर्ती कैसे की गई और उन्हें कितना भुगतान किया गया, यह भी बताना होगा. यह भी बताना होगा कि उनकी सेवा की शर्तों को औपचारिक रूप से तय किया गया है या नहीं. जनवरी 2025 से हर शिक्षक को कितनी कक्षाएं दी गईं, वास्तव में कितनी कक्षाएं ली गईं और शिक्षक के उपलब्ध न होने पर क्या वैकल्पिक व्यवस्था की गई, इसकी जानकारी भी देनी होगी.

पिछले तीन साल में मिली शिकायतों की संख्या और उनका प्रकार, उन शिकायतों पर क्या फैसला लिया गया और उन्हें हल करने में कितना समय लगा, इसकी जानकारी भी मांगी गई है. अस्पतालों से जुड़े कॉलेजों को उन अस्पतालों के साथ अपने संबंधों की जानकारी भी देनी होगी.

अस्पताल और ICU

इसी हफ्ते जस्टिस अमानुल्लाह और आर. महादेवन की बेंच ने लंबे समय से चल रहे एक मामले में अंतिम तौर पर लागू किए जाने वाले निर्देश जारी किए. यह मामला खास तौर पर ICU और गंभीर मरीजों की देखभाल के बुनियादी ढांचे की निगरानी से जुड़ा था.

कोर्ट ने केंद्र, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ-साथ अस्पतालों को “Guidelines for Organization and Delivery of Intensive Care Services” (इंटेंसिव केयर सेवाओं के आयोजन और उन्हें उपलब्ध कराने के लिए दिशानिर्देश) का पालन तय समय सीमा के अंदर करने का निर्देश दिया. कोर्ट ने चेतावनी दी कि किसी भी तरह की “लापरवाही” या आदेश न मानने पर सख्त रुख अपनाया जाएगा.

इन गाइडलाइनों में कम से कम 3 महीने की समय सीमा दी गई है. इस दौरान इमरजेंसी उपकरण, जैसे वेंटिलेटर, डिफिब्रिलेटर और ECG मशीनें उपलब्ध करानी होंगी. ICU के पास बेडसाइड सुविधाएं, जैसे मॉनिटर, ऑक्सीजन की सप्लाई, बिजली के सॉकेट, IV पंप आदि भी उपलब्ध कराने होंगे. लैब सेवाएं और X-ray तथा अल्ट्रासाउंड जैसी इमेजिंग सुविधाएं भी ICU के पास होनी चाहिए.

अनुपालन रिपोर्ट 12 महीने के बजाय 9 महीने के अंदर दाखिल करनी होगी.

यह मामला जुलाई 2024 में सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले से जुड़ी एक याचिका से शुरू हुआ था, जिसमें मेडिकल लापरवाही के एक विवाद पर फैसला दिया गया था. उस मामले में देशभर में ICU और गंभीर मरीजों की देखभाल के लिए एक जैसी सुरक्षा व्यवस्था, मरीजों को ICU में भर्ती करने के नियम और मानक गाइडलाइन नहीं होने का मुद्दा सामने आया था.

अब सुप्रीम कोर्ट पूरे देश में ICU के लिए एक जैसे न्यूनतम मानक बनाने और उन्हें लागू कराने की लगातार निगरानी कर रहा है.

अप्रैल में इसी जजों की बेंच ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को ICU के न्यूनतम मानकों को लागू करने के लिए समयबद्ध एक्शन प्लान बनाने का निर्देश दिया था.

कोर्ट ने कहा था कि तुरंत कदम के तौर पर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में स्वास्थ्य और मेडिकल शिक्षा विभाग के प्रमुख अतिरिक्त मुख्य सचिव या सचिव को इस काम में शामिल सभी विशेषज्ञों की बैठक बुलानी चाहिए. इसका उद्देश्य गाइडलाइनों को लागू करने के लिए एक एक्शन प्लान तैयार करना था. कोर्ट ने कहा था कि यह प्लान वास्तविक और व्यावहारिक होना चाहिए.

बेंच ने एक ऐसी प्रक्रिया भी तय की थी, जिसमें राज्यों की रिपोर्ट केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को भेजी जानी थी. इसके बाद राष्ट्रीय स्तर पर बैठक करके एक साझा फ्रेमवर्क और गाइडलाइन तैयार की जानी थी. कोर्ट द्वारा बनाई गई टीम को सभी राज्यों को एक अंतिम और सभी की सहमति से तैयार ड्राफ्ट भेजना था. इसके बाद स्वास्थ्य सचिव द्वारा अंतिम रिपोर्ट या सिफारिश कोर्ट के सामने रखी जानी थी.

“Guidelines for Organization and Delivery of Intensive Care Services” (गहन देखभाल सेवाओं के संगठन और वितरण के लिए दिशानिर्देश) नाम का एक दस्तावेज पहले ही कोर्ट के रिकॉर्ड में रखा जा चुका था.

सुनवाई के दौरान इंडियन नर्सिंग काउंसिल और पैरामेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया को भी इस मामले में पक्ष बनाया गया. उनसे ICU की जरूरतों को पूरा करने के लिए पाठ्यक्रम और ट्रेनिंग बेहतर बनाने के उपाय सुझाने को कहा गया. यह कदम तब उठाया गया जब कोर्ट को बताया गया कि गंभीर मरीजों की देखभाल में प्रशिक्षित कर्मचारियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है.

मई में कोर्ट ने राज्यों और कोर्ट द्वारा बनाई गई कमेटी के बीच सहमति से तैयार किए गए “तीन स्तर वाले ICU मॉडल” को मंजूरी दी.

राज्य की जिम्मेदारी और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार पर जोर देते हुए बेंच ने कुछ निर्देश दिए.

सभी राज्यों को 2 महीने के अंदर यह जांच पूरी करने को कहा गया कि ICU के मामलों में कितनी कमी है. इसके बाद Level 1 ICU से न्यूनतम ICU मानकों को लागू करने के लिए एक फ्रेमवर्क तैयार करने को कहा गया. राज्यों से यह भी कहा गया कि स्थानीय आबादी के लिए, खासकर इमरजेंसी के समय, कम से कम Level 1 ICU उपलब्ध कराने के उपाय बताए जाएं.

केंद्र सरकार को देशभर के अस्पतालों और ICU सुविधाओं की GPS आधारित ट्रैकिंग व्यवस्था बनाने को कहा गया. अस्पतालों के बीच एक ऐसा नेटवर्क बनाने को भी कहा गया जिससे मरीजों को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल ले जाने के दौरान बेहतर बातचीत और तालमेल हो सके.

बिना मंजूरी के निर्माण

जुलाई में इसी बेंच ने दिल्ली-NCR में अवैध इमारतों का ऑडिट कराने का आदेश दिया. कोर्ट ने बड़े पैमाने पर हो रहे बिना मंजूरी के निर्माण पर अधिकारियों की कड़ी आलोचना भी की.

अगस्त में बेंच ने एक स्वतंत्र ऑडिट का आदेश दिया. कोर्ट ने चेतावनी दी कि अगर किसी अधिकारी ने कोर्ट के आदेश के बावजूद अपना काम नहीं किया तो उसकी “व्यक्तिगत जिम्मेदारी” तय की जाएगी.

देशभर में निगरानी वाला यह मामला तमिलनाडु के एक विवाद से शुरू हुआ था. उस मामले में स्थानीय बिल्डिंग कानूनों का खुले तौर पर उल्लंघन करके एक इमारत बनाई गई थी. कोर्ट ने कहा कि समस्या केवल एक संपत्ति की नहीं है और बेंच ने इस मामले का दायरा पूरे देश तक बढ़ा दिया.

यह मामला दिल्ली के मालवीय नगर में लगी आग के करीब एक महीने बाद सामने आया था. इस आग में 21 से 23 लोगों की मौत हुई थी. एक अखबार की उस रिपोर्ट को भी कोर्ट ने संज्ञान में लिया, जिसमें बताया गया था कि गुरुग्राम में 93 प्रतिशत संस्थान फायर सेफ्टी के नियमों का पालन नहीं कर रहे थे.

5 अगस्त के एक आदेश में कोर्ट ने कहा था कि अगर कोई अथॉरिटी या सरकार कोर्ट के किसी आदेश में दखल देने की कोशिश करती है, तो कोर्ट संबंधित अथॉरिटी, सरकार या व्यक्ति के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई करने में संकोच नहीं कर सकता.

इसके बाद एक विशेषज्ञ जांच टीम ने दिल्ली के लाजपत नगर, साकेत और मालवीय नगर के साथ-साथ लखनऊ के अलीगंज में जमीन पर जाकर निरीक्षण किया.

दक्षिण दिल्ली में एक पेइंग गेस्ट बिल्डिंग गिरने के बाद, 10 सितंबर को बेंच ने दिल्ली हाई कोर्ट में लंबित PIL और उसकी निगरानी का संज्ञान लिया. सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट को निर्देश दिया कि वह इस मामले की नियमित अंतराल पर सुनवाई करे.

ASI के संरक्षण वाले स्मारक

दिल्ली के रहने वाले राजीव सूरी ने ASI के खिलाफ एक मामला दायर किया था. इसमें उन्होंने डिफेंस कॉलोनी में स्थित 15वीं सदी के मकबरे, गुमटी ऑफ शेख अली, की सुरक्षा की मांग की थी.

सूरी की याचिका पर जस्टिस अमानुल्लाह की बेंच ने उस मकबरे को संरक्षित स्मारक घोषित करने का आदेश दिया. कोर्ट ने डिफेंस कॉलोनी रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन को भी तुरंत मकबरे पर किए गए अवैध कब्जे को खाली करने का आदेश दिया.

इस अतिक्रमण के मुद्दे पर कार्रवाई के बाद जस्टिस अमानुल्लाह और एन. कोटिस्वर सिंह की बेंच ने दिल्ली के प्राचीन स्मारकों की अनदेखी के बड़े मुद्दे पर ध्यान दिया. इसके बाद कोर्ट ने पूरे दिल्ली में विरासत स्थलों के प्रबंधन और अतिक्रमण पर कार्रवाई से जुड़ी निगरानी शुरू की. विरासत स्थलों की अनदेखी और कुप्रबंधन पर भी सख्त कदम उठाए गए.

फरवरी में दिल्ली की विरासत इमारतों की बारीकी से निगरानी करते हुए कोर्ट ने ASI को दिल्ली में मौजूद 173 खास संरक्षित स्मारकों की संरक्षण स्थिति पर एक व्यापक और अनिवार्य हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया. इसमें फोटो और मैपिंग की जानकारी भी देनी थी.

जब ASI ने हलफनामा दाखिल नहीं किया तो अगले महीने कोर्ट ने ASI के महानिदेशक को औपचारिक अवमानना नोटिस जारी किया. कोर्ट ने इसे न्यायिक आदेशों का “जानबूझकर उल्लंघन” बताया और महानिदेशक को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में पेश होने के लिए बुलाया.

मई में जस्टिस अमानुल्लाह ने दिल्ली पुलिस प्रमुख को सख्त आदेश जारी करने का निर्देश दिया. कोर्ट ने कहा कि अगर किसी पुलिस थाना क्षेत्र में किसी विरासत स्थल पर तोड़फोड़, चोरी या नया अतिक्रमण होता है तो संबंधित थाना प्रभारी यानी SHO को तुरंत निलंबित किया जाएगा.

उसी महीने सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली गोल्फ क्लब के प्रवेश द्वार के अंदर ASI द्वारा संरक्षित स्मारकों के आसपास तुरंत 100 मीटर का प्रतिबंधित क्षेत्र बनाने का आदेश दिया. हालांकि जुलाई के आखिर में होने वाली अगली सुनवाई तक कोर्ट ने अपने इस आदेश पर रोक लगा दी.

अगस्त में MCD और ASI ने अनुपालन हलफनामे दाखिल किए. इनमें कहा गया कि दक्षिण दिल्ली के विरासत स्थल साफ और अच्छी तरह सुरक्षित हैं. इसके बाद याचिकाकर्ता ने फोटो सबूत पेश किए, जिनमें जमरूदपुर इलाके में लोदी काल के मकबरों के आसपास भारी अतिक्रमण दिखाया गया था.

इसके बाद कोर्ट ने अधिकारियों के “पूरी तरह लापरवाह” रवैये और यहां तक कि “तथ्यों को दबाने” की आलोचना की. MCD और ASI के अधिकारियों को अक्टूबर में अगली सुनवाई के दौरान व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में मौजूद रहना होगा.

अधिवक्ता उर्जा पांडे के मुताबिक, पहली नजर में ये सभी मामले एक-दूसरे से बिल्कुल अलग लगते हैं. लेकिन इन सभी मामलों में एक ही संस्थागत समस्या दिखाई देती है. जिन अधिकारियों और संस्थाओं की कानूनी जिम्मेदारी नियमों को लागू करने, जांच करने और कार्रवाई करने की है, वे अक्सर अपना काम नहीं करते.

पांडे कहती हैं कि जब नियामक संस्थाएं “निष्क्रिय” रहती हैं, जांच के बाद भी कार्रवाई नहीं होती और बार-बार दिए गए आश्वासनों से जमीन पर बहुत कम बदलाव आता है, तब सुप्रीम कोर्ट को दखल देना पड़ता है.

उनका कहना है कि इन मामलों में कोर्ट का हस्तक्षेप प्रशासन को अपने हाथ में लेने के बारे में कम और एक बुनियादी संवैधानिक सवाल पूछने के बारे में ज्यादा है.

“अगर कानून किसी अथॉरिटी को कोई जिम्मेदारी देता है, तो यह कौन सुनिश्चित करेगा कि वह जिम्मेदारी वास्तव में निभाई जाए? इस नजरिए से देखें तो अनुपालन, जानकारी देने, निरीक्षण करने और गलती करने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने के निर्देश मौजूदा व्यवस्था को काम करने लायक बनाने के लिए हैं, न कि नई व्यवस्था बनाने के लिए.”

हालांकि, उनका मानना है कि इस तरह के हस्तक्षेप की एक महत्वपूर्ण सीमा भी है.

“संवैधानिक कोर्ट किसी अथॉरिटी को उसके कानूनी दायित्व निभाने के लिए कह सकता है. वह खुद उस अथॉरिटी की जगह नहीं ले सकता. यह फर्क खास तौर पर तब महत्वपूर्ण हो जाता है जब न्यायिक कार्यवाही बार-बार रिपोर्ट, हलफनामे और अनुपालन की सुनवाई के जरिए कई सालों तक चलती रहती है,” पांडे ने दिप्रिंट से कहा. पांडे सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार की वकील हैं.

पांडे के मुताबिक, जब सिर्फ एक आदेश से काम पूरा होने की संभावना कम हो और प्रशासन की निष्क्रियता लगातार बनी हुई हो, तब लगातार न्यायिक निगरानी जरूरी हो सकती है. लेकिन न्यायिक निगरानी आखिरकार निगरानी ही रहनी चाहिए.

वह कहती हैं, “असली सवाल यह नहीं है कि कोर्ट को हस्तक्षेप करना चाहिए या नहीं, बल्कि यह है कि यह हस्तक्षेप कब खत्म होना चाहिए.”

“जहां सार्वजनिक स्वास्थ्य, सुरक्षा, शिक्षा, पर्यावरण या संरक्षित सार्वजनिक संपत्ति का मामला हो, और सामान्य प्रशासनिक व्यवस्था बार-बार नाकाम रही हो, वहां न्यायिक निगरानी उचित हो सकती है. लेकिन इस हस्तक्षेप का उद्देश्य उस व्यवस्था को फिर से काम करने लायक बनाना होना चाहिए, न कि हमेशा के लिए उसकी जगह ले लेना.”

पांडे कहती हैं, “एक कोर्ट को किसी अथॉरिटी से यह कहने में सक्षम होना चाहिए. कानून ने जो जिम्मेदारी आपको दी है, उसे निभाइए. बताइए कि आप ऐसा करने में क्यों नाकाम रहे और जरूरी सुरक्षा उपाय लागू कीजिए. जब संस्था ठीक से काम करना शुरू कर दे, तब कोर्ट को पीछे हटने में सक्षम होना चाहिए. न्यायिक हस्तक्षेप की सफलता इस बात से तय नहीं होती कि कोर्ट कितने लंबे समय तक किसी समस्या की निगरानी करता है. असली सफलता यह है कि क्या प्रशासन आखिरकार बिना कोर्ट के लगातार निगरानी में खड़े रहने के भी उस समस्या से खुद निपटने में सक्षम हो जाता है.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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