नई दिल्ली: पेगासस स्पाईवेयर के आरोप, मणिपुर हिंसा, चार धाम हाईवे प्रोजेक्ट और जुलाई में छात्रों के विरोध प्रदर्शन. इन सबमें क्या समानता है? कुछ भी नहीं, सिवाय इसके कि इन सभी मामलों की जांच सुप्रीम कोर्ट की ओर से बनाई गई समितियां कर रही हैं. इन समितियों की अध्यक्षता ज्यादातर रिटायर्ड जज कर रहे हैं और ये समितियां शीर्ष अदालत की विस्तारित शाखा की तरह काम करती हैं.
लेकिन ये समितियां कैसे काम करती हैं, इनके सदस्य कौन हैं और इनकी सिफारिशों का क्या होता है? इन समितियों के उद्देश्य अलग-अलग हैं, लेकिन हर समिति एक ही सवाल उठाती है: जब सुप्रीम कोर्ट किसी समिति को कोई काम सौंपता है, तो उसके बाद क्या होता है? दिप्रिंट ने पिछले कुछ सालों में बनी कुछ अहम समितियों के काम और उनकी सिफारिशों की मौजूदा स्थिति की पड़ताल की है.
पेगासस सॉफ्टवेयर (2021)
यह समिति बीजेपी सरकार पर लगे उन आरोपों की जांच के लिए बनाई गई थी, जिनमें कहा गया था कि सरकार ने कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, नेताओं, जजों और सरकारी अधिकारियों को निशाना बनाने के लिए इजरायली स्पाईवेयर पेगासस का इस्तेमाल किया.
अक्टूबर 2021 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (CJI) रमना और तत्कालीन जजों सूर्यकांत और हिमा कोहली की बेंच ने एक विशेषज्ञ समिति बनाई थी. इसकी निगरानी सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस आर. वी. रवींद्रन कर रहे थे.
कई जनहित याचिकाओं (PIL) में पेगासस स्पाईवेयर के कथित इस्तेमाल की स्वतंत्र जांच की मांग की गई थी. वहीं, केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए विस्तृत हलफनामा दाखिल करने से इनकार कर दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा को न्यायिक समीक्षा से बचने के लिए हर मामले में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. अदालत ने निजता और अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरे का हवाला देते हुए अपनी समिति बनाने के केंद्र के प्रस्ताव को खारिज कर दिया और स्वतंत्र समिति बनाने का फैसला किया.
इस समिति में दो सदस्य और तीन तकनीकी विशेषज्ञ थे. उन्हें यह पता लगाना था कि क्या भारतीय नागरिकों की जासूसी के लिए पेगासस का इस्तेमाल किया गया था, इस स्पाईवेयर को किसने खरीदा था और क्या इसका इस्तेमाल कानूनी तरीके से हुआ था. समिति से भारत की साइबर सुरक्षा बेहतर बनाने के लिए सिफारिशें देने और नागरिकों के निजता के अधिकार की रक्षा के उपाय सुझाने को भी कहा गया था, खासकर अवैध निगरानी के मामलों में.
समिति ने दिसंबर 2021 से फरवरी 2022 के बीच इस मामले से जुड़े विशेषज्ञों और याचिकाकर्ताओं के बयान दर्ज किए. इनमें सांसद जॉन ब्रिटास और पत्रकार शशि मेनन और सिद्धार्थ वरदराजन शामिल थे. मई 2022 में तकनीकी समिति को अपनी जांच पूरी करने और रिपोर्ट सौंपने के लिए और समय दिया गया.
आखिरकार समिति ने अगस्त 2022 में अपनी रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में सुप्रीम कोर्ट को सौंप दी. आदेश में कहा गया है कि अदालत में सीलबंद लिफाफे खोले गए और जजों ने रिपोर्ट के कुछ हिस्से पढ़े. CJI ने कहा, “इसके बाद रिपोर्ट को फिर से सीलबंद कर दिया गया और सुप्रीम कोर्ट के महासचिव की सुरक्षित निगरानी में रख दिया गया. जब भी अदालत को इसकी जरूरत होगी, वे इसे उपलब्ध कराएंगे.”
CJI ने इस मामले में पेश हुए वकीलों को यह भी बताया कि तकनीकी समिति ने 29 फोन की जांच की थी. इनमें से पांच फोन में कुछ मैलवेयर मिला था, लेकिन तकनीकी समिति ने कहा कि यह नहीं कहा जा सकता कि वह पेगासस था.
इसके बाद से इस मामले में कोई अहम सुनवाई नहीं हुई है. विशेषज्ञ समिति अब सक्रिय नहीं है, जबकि मामला अदालत में लंबित है. 2022 से 2026 के बीच यह मामला पांच बार सूचीबद्ध हुआ. आखिरी बार अप्रैल 2025 में इसकी सुनवाई के लिए तारीख लगी थी. हालांकि, इन मौकों पर सिर्फ अतिरिक्त दस्तावेज दाखिल किए गए और मामले को बार-बार अगली तारीख के लिए सूचीबद्ध किया गया.
चार धाम हाईवे प्रोजेक्ट समिति (2022)
सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2019 में उत्तराखंड में चार धाम हाईवे प्रोजेक्ट से जुड़ी पर्यावरण संबंधी चिंताओं की जांच के लिए एक हाई पावर कमेटी (HPC) बनाई थी. इस प्रोजेक्ट के तहत हिमालयी क्षेत्र में चार तीर्थस्थलों को जोड़ने वाली सड़कों को चौड़ा किया जाना है.
तत्कालीन CJI चंद्रचूड़ और जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने इस समिति को नियुक्त किया था. इसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस ए. के. सीकरी कर रहे थे. उन्होंने पर्यावरणविद् प्रोफेसर रवि चोपड़ा की जगह ली थी. चोपड़ा ने जनवरी/फरवरी 2022 में सड़क की चौड़ाई और रक्षा जरूरतों को लेकर मतभेदों के कारण पद से इस्तीफा दे दिया था.
सुप्रीम कोर्ट की बनाई इस समिति में शुरुआत में जाने-माने पर्यावरणविद् चोपड़ा अध्यक्ष थे, लेकिन इसके अंदर गंभीर मतभेद पैदा हो गए. 21 सदस्यों के बहुमत की राय में सरकारी और संस्थागत अधिकारियों का दबदबा था. वे 12 मीटर चौड़ी सड़क के पक्ष में थे. इसमें सात मीटर की डबल लेन सड़क के साथ पक्के और कच्चे किनारे शामिल थे.
उनका कहना था कि अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के पास सेना के भारी वाहनों की आवाजाही और बर्फ हटाने के लिए चौड़ी सड़कें जरूरी हैं. उनका यह भी तर्क था कि भूस्खलन पहाड़ी इलाके की अपनी कमजोरी है, न कि सड़क की कटाई का सीधा नतीजा.
वहीं, चोपड़ा के नेतृत्व में चार सदस्यों ने बहुमत की राय से असहमति जताई. उनका कहना था कि इस प्रोजेक्ट में सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) के 2018 के सर्कुलर का पालन होना चाहिए. इसमें कमजोर पहाड़ी इलाकों में सड़क की चौड़ाई 5.5 मीटर रखने का नियम है.
रिपोर्ट में पहाड़ियों की अवैज्ञानिक तरीके से कटाई, सड़क चौड़ी करने और रक्षा जरूरतों को लेकर मतभेदों के साथ-साथ पर्यावरण को हुए भारी नुकसान का जिक्र किया गया. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित काम की निगरानी के लिए पूर्व जज जस्टिस ए. के. सीकरी को नियुक्त किया.
जस्टिस सीकरी की समिति अब चार धाम प्रोजेक्ट के काम की निगरानी कर रही है. यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि प्रोजेक्ट नवंबर 2021 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक हो. इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को प्रोजेक्ट के तहत 12 मीटर चौड़ी डबल लेन पक्के किनारों वाली सड़क (DLPS) बनाने की इजाजत दी थी. हालांकि, अदालत ने टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल तरीके अपनाने की जरूरत पर भी जोर दिया था.
केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने इस सड़क नेटवर्क को पूरा करने के लिए 2026 के अंत की समयसीमा तय की है.
सितंबर 2026 में समिति ने सुप्रीम कोर्ट को अपनी 18वीं स्टेटस रिपोर्ट सौंपी. धाराली इलाके में भीषण बाढ़ के बाद पर्यावरण और भूगर्भ से जुड़ी चिंताओं को देखते हुए समिति ने सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) के साथ मिलकर गंगोत्री-उत्तरकाशी-भागीरथी इको-सेंसिटिव जोन में 100 किलोमीटर तक फैले पांच अहम हिस्सों की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) वापस लेकर उनकी समीक्षा की. समिति की गहन जांच के बाद नेताला में एक बड़े बाईपास का निर्माण रोक दिया गया. ऐसा जमीन के नीचे की स्थिति की विस्तृत जांच होने तक किया गया है.
LGBTQIA+ अधिकार समिति (2024)
जब सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने से इनकार किया था, तब अक्टूबर 2023 के अपने फैसले में अदालत ने बीजेपी सरकार के उस आश्वासन का जिक्र किया था, जिसमें उसने कहा था कि समलैंगिक जोड़ों को सरकारी सुविधाओं और लाभों तक पहुंचने में होने वाले भेदभाव की जांच और उसे दूर करने के लिए एक समिति बनाई जाएगी. सरकार ने अप्रैल 2024 में कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में समिति तो बना दी, लेकिन तब से अब तक इसकी सिर्फ दो बैठकें हुई हैं और रिपोर्ट का इंतजार है.
दूसरी समितियों के विपरीत, जिनके सदस्यों को सीधे सुप्रीम कोर्ट ने नियुक्त किया था, यह समिति अदालत के निर्देश पर सरकार ने बनाई थी. छह सदस्यों वाली इस समिति में कैबिनेट सचिव और गृह मंत्रालय, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, कानून एवं न्याय मंत्रालय और सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के सचिव शामिल हैं. समिति को समलैंगिक जोड़ों के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं समेत कल्याणकारी योजनाओं और दूसरी सुविधाओं तक पहुंच की जांच करने का काम भी सौंपा गया है.
हालांकि, समिति बनने के दो साल से ज्यादा समय बाद भी इसकी रिपोर्ट लंबित है और इसे सौंपने की कोई स्पष्ट तारीख नहीं बताई गई है. अगस्त 2026 में लोकसभा में कांग्रेस सांसद शशि थरूर के एक सवाल के जवाब में केंद्र सरकार ने बताया कि समिति बनने के बाद मई और अगस्त 2024 में इसकी पूरी समिति की सिर्फ दो बैठकें हुई हैं. जवाब में यह भी कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट ने रिपोर्ट सौंपने की कोई समयसीमा तय नहीं की थी और अलग-अलग उप-समितियों की बैठकें भी हुई थीं.
मणिपुर हिंसा समिति (2023)
अगस्त 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने रिटायर्ड जज गीता मित्तल की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समिति बनाई थी. इसका काम मणिपुर में भड़की हिंसा के दौरान पैदा हुए मानवीय संकट पर नजर रखना और राज्य में राहत, पुनर्वास, मुआवजे, राहत शिविरों और घरों तथा धार्मिक स्थलों को दोबारा बनाने से जुड़े उपायों की जांच करना था.
समिति बनने के दो हफ्ते बाद ही उसने सुप्रीम कोर्ट को तीन रिपोर्ट सौंपीं. पहली रिपोर्ट में कहा गया कि मणिपुर हिंसा शुरू होने के बाद कई पीड़ितों के आधार कार्ड समेत जरूरी दस्तावेज खो गए थे. CJI डी. वाई. चंद्रचूड़ ने इस पर चिंता जताते हुए कहा था, “सरकारी लाभ आधार कार्ड के जरिए दिए जाते हैं, इसलिए यह बहुत जरूरी है.”
दूसरी रिपोर्ट में समिति ने मौजूदा मुआवजा योजना में “बड़े सुधार” करने की जरूरत बताई. इस योजना के तहत अगर किसी व्यक्ति को पहले ही किसी दूसरी योजना के तहत लाभ मिल चुका है, तो उसे मुआवजा नहीं दिया जाता. समिति ने सुझाव दिया कि इस योजना को राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) की योजना के ढांचे के मुताबिक बनाया जाना चाहिए. 2018 की NALSA योजना के तहत यौन हिंसा और दूसरे अपराधों की शिकार महिलाओं को मुआवजा दिया जाता है.
तीसरी रिपोर्ट में समिति ने “स्थानीय प्रशासनिक विशेषज्ञों” की पहचान की और सिफारिश की कि उन्हें हिंसा के पीड़ितों के मुआवजे, व्यापक मनोवैज्ञानिक सहायता और मानसिक स्वास्थ्य देखभाल, चिकित्सा सुविधा, राहत शिविरों और आंकड़ों की रिपोर्टिंग की निगरानी करनी चाहिए.
मानवीय स्थिति में बदलाव के साथ समिति लगातार रिपोर्ट सौंपती रही. उसका काम सिर्फ एक बार जांच करने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह देखना भी था कि पीड़ितों को मदद मिल रही है या नहीं और प्रशासनिक इंतजाम पर्याप्त हैं या नहीं.
जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने समिति का कार्यकाल 31 जुलाई 2026 तक बढ़ा दिया. अदालत को बताया गया था कि समिति अब तक 42 रिपोर्ट सौंप चुकी है. अदालत ने जुलाई 2025 से समिति के काम को जारी रखने की मंजूरी भी दी.
सितंबर 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने समिति की 47वीं रिपोर्ट पर ध्यान दिया. इस रिपोर्ट में राहत शिविरों में रह रहे विस्थापित लोगों की अप्राकृतिक मौतों और इन मौतों के रजिस्ट्रेशन तथा जांच में कमियों को लेकर चिंता जताई गई थी.
कृषि कानून समिति (2021)
12 जनवरी 2021 को सुप्रीम कोर्ट ने किसानों के भारी विरोध का सामना कर रहे तीन कृषि कानूनों के अमल पर रोक लगा दी थी. साथ ही, किसानों, किसान संगठनों, राज्य सरकारों और दूसरे पक्षों की बात सुनने और सिफारिशें देने के लिए एक समिति बनाई थी.
इस समिति में कृषि अर्थशास्त्री डॉ. अशोक गुलाटी, किसान नेता अनिल घनवट और कृषि नीति विशेषज्ञ प्रमोद कुमार जोशी शामिल थे.
समिति ने 19 मार्च 2021 को अपनी रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में सौंपी थी. हालांकि, उसी साल दिसंबर 2021 में ये कानून वापस ले लिए गए. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब कानून वापस लेने की घोषणा की और संसद ने दिसंबर 2021 में इन्हें रद्द कर दिया, तो इस मामले से जुड़ा कानूनी विवाद भी लगभग खत्म हो गया. बाद में अनिल घनवट ने स्वतंत्र रूप से समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक कर दी, लेकिन अदालत ने समिति की सिफारिशों पर आगे कोई ठोस सुनवाई नहीं की.
रिपोर्ट में इस बात पर निराशा जताई गई थी कि जनता और नीति बनाने वालों को आंकड़ों से दूर रखा जा रहा है. रिपोर्ट में कहा गया था कि किसानों का एक “खामोश बहुमत” असल में इन सुधारों के पक्ष में था.
ट्रांसजेंडर लोगों के लिए सलाहकार समिति (2025)
17 अक्टूबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने एक ट्रांस महिला जेन कौशिक को मुआवजा देते हुए एक समिति बनाई थी. जेन कौशिक को उनकी लैंगिक पहचान के कारण निजी स्कूलों ने शिक्षक के पद से हटा दिया था.
अदालत ने केंद्र सरकार की नीति बनने तक संस्थानों के लिए दिशा-निर्देश भी तय किए थे. इस समिति की अध्यक्षता दिल्ली हाई कोर्ट की रिटायर्ड जज जस्टिस आशा मेनन कर रही हैं. इसमें ट्रांसजेंडर अधिकार कार्यकर्ता और प्रोफेसर भी शामिल हैं. वरिष्ठ वकील जयना कोठारी इस मामले में एमिकस क्यूरी हैं.
इस समिति का मकसद ट्रांसजेंडर और जेंडर के तय मानकों से अलग पहचान रखने वाले लोगों के लिए रोजगार के समान अवसर, समावेशी चिकित्सा सुविधाएं और सुरक्षा सुनिश्चित करना है.
दूसरी समितियों के विपरीत, जो पहले लगाए गए आरोपों की जांच करती हैं, इस समिति की भूमिका भविष्य को ध्यान में रखकर तय की गई है. इसका काम अदालत की ओर से दिए गए सुरक्षा उपायों को संस्थानों की नीतियों और सुरक्षा इंतजामों में लागू करने में मदद करना है. ट्रांसजेंडर अधिकार और समान अवसर समिति इस समय राष्ट्रीय स्तर पर अलग-अलग पक्षों से बातचीत कर रही है, ताकि बाध्यकारी राष्ट्रीय समान अवसर नीति (EOP) का मसौदा तैयार किया जा सके.
मार्च 2026 में जब केंद्र सरकार ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 पेश किया, तो समिति ने औपचारिक रूप से इसमें हस्तक्षेप किया. इस विधेयक में व्यक्ति की खुद तय की गई लैंगिक पहचान की जगह मेडिकल बोर्ड से जांच कराना अनिवार्य करने का प्रस्ताव था.
मार्च में समिति की बैठक के बाद जस्टिस आशा मेनन ने सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय को एक प्रस्ताव भेजा. इसमें उन्होंने इस विधेयक को “बहुत बड़ा झटका” बताया और निजता तथा मानवाधिकारों से जुड़ी गंभीर चिंताओं के कारण केंद्र से इसे वापस लेने की अपील की.
जुलाई में छात्रों के विरोध प्रदर्शन की जांच समिति (2026)
अगस्त 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने नई दिल्ली के जंतर-मंतर और दूसरी जगहों पर छात्रों के विरोध प्रदर्शन के दौरान हिंसा के आरोपों की जांच के लिए पांच सदस्यों वाली एक हाई पावर जांच समिति बनाई. इसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी कर रहे थे.
दो महीने बाद, अक्टूबर 2026 में समिति ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि शिकायतें और सबूत जमा करने के लिए एक पोर्टल तैयार है. इस पोर्टल के जरिए शिकायत करने वालों की पहचान और उनकी जानकारी गोपनीय रखी जाएगी. अदालत ने गृह मंत्रालय को समिति के काम के लिए जरूरी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने का निर्देश दिया.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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