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Tuesday, 29 September, 2026
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दाल से सात गुना ज़्यादा: पनीर से लेकर मट्ठे तक, भारत में प्रोटीन वाले खाने की महंगाई को समझिए

हालांकि, यह मुद्दा फूड सेफ्टी से जुड़ा लग सकता है, लेकिन असल में यह एक आर्थिक चिंता है, जिसमें नकली पनीर एक खास उदाहरण है.

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नई दिल्ली: भारत में ऐसा होना आम बात है कि कोई परिवार पनीर टिक्का ऑर्डर करे और उसे ऐसा खाना मिले, जिसमें उसकी जानकारी के बिना दूध की जगह नॉन-डेयरी प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल किया गया हो. ग्राहक अक्सर इस बदलाव को पहचान नहीं पाते और रेस्टोरेंट उनकी इसी जानकारी की कमी का फायदा उठाते हैं.

हाल ही में, भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने एक ड्राफ्ट संशोधन का प्रस्ताव दिया है. इसमें दूध के बिना बने प्रोडक्ट्स को पनीर के नाम से बेचने, उन पर पनीर लिखने या उनका पनीर के तौर पर प्रचार करने पर रोक लगाने की बात कही गई है.

महाराष्ट्र में जुलाई में ही ऐसे प्रोडक्ट्स पर रोक लगा दी गई थी. यह मामला देखने में भले ही खाद्य सुरक्षा से जुड़ा लगता है, लेकिन असल में यह आर्थिक चिंता का विषय है. नकली पनीर इसका एक बड़ा उदाहरण है.

भारत में इस समय प्रोटीन वाले खाने की कीमतों में धीरे-धीरे महंगाई बढ़ रही है. इसके चलते बाजार तीन अलग-अलग तरीकों से बदलाव कर रहा है: दूसरे विकल्पों को पनीर के तौर पर पेश करना, व्हे की जगह मटर के प्रोटीन का इस्तेमाल करना और प्रोडक्ट्स का आकार कम करना. आर्थिक स्थिति की जांच से पता चलता है कि 100 ग्राम प्रोटीन की कीमत पनीर में दाल की तुलना में करीब 7 गुना ज्यादा है.

महंगी होती है ज्यादा पौष्टिक थाली

1941 में अमेरिकी कृषि अर्थशास्त्री मेरिल के. बेनेट ने कहा था कि जैसे-जैसे लोगों की आय बढ़ती है, उनके खाने में स्टार्च वाली मुख्य चीज़ों की जगह ज्यादा प्रोटीन वाले फीड प्रोडक्ट्स आने लगते हैं. इसे बेनेट का नियम कहा जाता है. यह 1857 में अर्न्स्ट एंगेल की उस बात से मिलता-जुलता है, जिसमें उन्होंने कहा था कि जैसे-जैसे परिवार की आय बढ़ती है, उसकी कुल आय में खाने पर खर्च होने वाला हिस्सा कम होता जाता है.

ये सिद्धांत आजकल के भारतीय खाने के तरीकों में दिखते हैं. जब मिनिस्ट्री ऑफ स्टैटिस्टिक्स एंड प्रोग्राम इम्प्लीमेंटेशन (MoSPI) ने हाउसहोल्ड कंजम्पशन एक्सपेंडिचर सर्वे 2023-24 के आधार पर कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स को अपडेट किया, तो अनाज को दिए जाने वाले वज़न में काफी कमी आई. यह बदलाव भारतीयों में खाने के इस्तेमाल में कमी नहीं दिखाता; बल्कि, यह खाने की क्वालिटी में सुधार दिखाता है, जिससे खर्च ज़्यादा होता है.

यह चिंता नई नहीं है. अक्टूबर 2010 में भारतीय रिजर्व बैंक के तत्कालीन डिप्टी गवर्नर सुबीर गोकार्न ने ‘द प्राइस ऑफ प्रोटीन’ नाम से भाषण दिया था. उन्होंने कहा था कि जैसे-जैसे भारतीयों की आय बढ़ेगी, प्रोटीन की मांग सप्लाई से ज्यादा हो जाएगी. इससे कीमतों में लगातार बढ़ोतरी होगी और यह खाद्य महंगाई का एक स्थायी कारण बनेगा.

16 साल बाद के आंकड़े इस ट्रेंड के बारे में उनकी भविष्यवाणी की पुष्टि करते हैं. हालांकि, प्रोटीन का बाजार एक जैसा नहीं है. इसमें तीन अलग-अलग हिस्से हैं और हर हिस्से की अपनी अलग स्थिति है.

दालों की कीमतों में उतार-चढ़ाव होता रहता है. अगस्त 2015 में, दाल की कीमतों में 26 परसेंट की बढ़ोतरी हुई, इसके बाद 2017 में किसानों की रिकॉर्ड फसल के बाद कीमतों में 24 परसेंट की गिरावट आई. 2023 और 2024 में कीमतें 13 से 14 परसेंट बढ़ीं, फिर 2025 में 14.5 परसेंट कम हो गईं. यह पैटर्न कोबवेब थ्योरम से मेल खाता है, जिसे 1934 में निकोलस काल्डोर ने पेश किया था और 1938 में मोर्दकै इज़ीकील ने इसे औपचारिक रूप दिया था, जो यह बताता है कि किसान पिछले सीज़न की कीमतों के आधार पर बुआई करते हैं, जिससे कभी ज़्यादा तो कभी कम फसल होती है. डेटा में सामने आई अच्छी बात यह है कि भारतीय किसान बहुत ज़्यादा तेज़ी से प्रतिक्रिया देते हैं.

दूध की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी हुई है. 2015 से हर साल इसमें 2 से 8 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. यह बेनेट के नियम का उदाहरण है, जिसमें आय बढ़ने के साथ मांग बढ़ने और कीमतों में बढ़ोतरी की बात कही गई है.

इसके उलट, अंडे और मांस की कीमतों पर अचानक आने वाले झटकों का असर पड़ता है. उदाहरण के लिए, 2020 में कोरोना लॉकडाउन के दौरान मांस और मछली की कीमतें 16.5 प्रतिशत बढ़ीं. वहीं, 2021 में चारे की कीमत बढ़ने के कारण अंडों की कीमत 16 प्रतिशत बढ़ गई.

महामारी के दौरान बहुत कम समय में दो बड़े झटके आए. फरवरी 2020 में व्हाट्सऐप पर यह अफवाह फैली कि चिकन से कोरोना फैलता है. कुछ ही हफ्तों में ब्रॉयलर चिकन की कीमत आधी हो गई.

साल के दूसरे हिस्से में कहानी बदल गई. डॉक्टरों ने कोविड-19 मरीजों को अंडे खाने की सलाह देना शुरू किया और ‘इम्युनिटी के लिए प्रोटीन’ की बात तेजी से फैलने लगी. इसके साथ लॉकडाउन से सप्लाई पर असर पड़ा और 2021 के मध्य तक पोल्ट्री फीड की कीमत तीन गुना हो गई. इससे अगस्त 2020 में मांस और मछली की कीमतों में महंगाई 16.5 प्रतिशत तक पहुंच गई. इसके एक साल बाद अंडों की कीमतों में भी 16 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई.

अर्थशास्त्री ऐसी मान्यताओं के फैलने को ‘इन्फॉर्मेशन कैस्केड’ कहते हैं. इस विचार को सुशील बिखचंदानी, डेविड हिर्शलाइफर और इवो वेल्च ने 1992 में बताया था. इसमें लोग अपनी जानकारी पर भरोसा करने के बजाय दूसरों की मान्यताओं को अपना लेते हैं. इसका मतलब है कि प्रोटीन की कीमतों पर सिर्फ सप्लाई का असर नहीं होता, बल्कि लोगों के बीच फैली बातों का भी उतना ही असर हो सकता है.

चार्ट में काली लाइन खाने की कुल महंगाई को दिखाती है, जो एक सीमित दायरे में रहती है. वहीं, प्रोटीन की कीमतों के आंकड़े -24 प्रतिशत से +26 प्रतिशत के बीच ऊपर-नीचे होते हैं. पिछले 10 साल में खाने की कुल महंगाई के आंकड़े ने भारतीय खाने की सबसे ज्यादा उतार-चढ़ाव वाली चीजों के असर को औसत कर दिया है.

2026 में स्थिति अलग है, क्योंकि कीमतों के तीनों पैटर्न एक साथ दिखाई दे रहे हैं. जनवरी में अरहर दाल पिछले साल के मुकाबले 24.9 प्रतिशत सस्ती थी, जिससे परिवारों के प्रोटीन वाले खाने के बजट को राहत मिली. अगस्त तक अरहर की कीमत 5.6 प्रतिशत और उड़द की कीमत 7.4 प्रतिशत बढ़ गई. चिकन की कीमत 14.1 प्रतिशत और अंडों की कीमत 11 प्रतिशत बढ़ी. वहीं, मार्च के बाद पनीर की महंगाई करीब तीन गुना बढ़कर 4.1 प्रतिशत हो गई. पहले मिलने वाली कीमतों की राहत अब खत्म हो गई है.

प्रोटीन की सीढ़ी

ध्यान महंगाई की दर पर नहीं, बल्कि रुपये में होने वाली असली लागत पर होना चाहिए. खास तौर पर यह देखना चाहिए कि किसी भारतीय परिवार को 100 ग्राम प्रोटीन के लिए वास्तव में कितना पैसा खर्च करना पड़ता है.

उपभोक्ता मामलों के विभाग की खुदरा कीमतों, पनीर और सप्लीमेंट की ऑनलाइन कीमतों और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रिशन की खाद्य संरचना तालिकाओं में दिए गए प्रोटीन के आंकड़ों का इस्तेमाल करके की गई लागत की जांच से एक साफ तस्वीर सामने आती है.

मसूर दाल में 100 ग्राम प्रोटीन की कीमत 37 रुपये है. वहीं, अंडे, दूध और पनीर में यही कीमत क्रमशः 107 रुपये, 187 रुपये और 252 रुपये है. जिम जाने वाले लोगों के बीच पसंद किए जाने वाले प्रोटीन स्रोत व्हे कॉन्संट्रेट की कीमत 362 रुपये है. यानी एक ही पोषक तत्व की कीमत इस बात पर 10 गुना तक बदल सकती है कि आप उसे कहां से खरीदते हैं.

1966 में केल्विन लैंकेस्टर ने कहा था कि ग्राहक सामान नहीं, बल्कि उसमें मिलने वाली चीजों और सुविधाओं को खरीदते हैं. ग्राहक सिर्फ व्हे नहीं चाहते. वे प्रोटीन, अमीनो एसिड और सुविधा चाहते हैं. जब किसी एक उत्पाद का पैकेज महंगा हो जाता है, तो ग्राहक दूसरे विकल्पों की ओर चले जाते हैं. सप्लीमेंट बाजार में भी यही बदलाव दिखाई देता है. मटर के प्रोटीन से बना आइसोलेट 100 ग्राम प्रोटीन के लिए 124 रुपये का पड़ता है. यह व्हे की कीमत का करीब एक-तिहाई है. इसी वजह से कंपनियां अपने उत्पादों में बदलाव कर रही हैं.

व्हे की बढ़ती कीमत को अल्फ्रेड मार्शल की 1890 की किताब ‘प्रिंसिपल्स ऑफ इकोनॉमिक्स’ से समझा जा सकता है. इसमें संयुक्त सप्लाई वाले सामान की बात की गई है. यानी ऐसे उत्पाद जिन्हें अलग-अलग बनाया नहीं जा सकता.

व्हे चीज़ बनाने के दौरान मिलने वाला एक बाय-प्रोडक्ट है. इसलिए इसकी सप्लाई भारत में जिम जाने वाले लोगों की संख्या पर नहीं, बल्कि दुनियाभर में बनने वाले चीज़ की मात्रा पर निर्भर करती है. दुनिया में सबसे ज्यादा दूध पैदा करने वाला देश होने के बावजूद भारत का डेयरी उद्योग मुख्य रूप से तरल दूध, दही और पनीर पर ध्यान देता है, चीज़ पर नहीं.

इस वजह से उद्योग के अनुमान के मुताबिक भारत अपने सप्लीमेंट में इस्तेमाल होने वाले व्हे का 80 से 90 प्रतिशत आयात करता है. इसका भुगतान डॉलर में होता है. जुलाई में रुपया करीब 97 रुपये प्रति डॉलर तक पहुंच गया था.

शाकाहारी परिवारों के लिए प्रोटीन की सीढ़ी में पनीर सबसे ऊपर है. जो परिवार अंडे या मांस नहीं खाते, उनके लिए दाल के अलावा डेयरी प्रोटीन का मुख्य स्रोत है. मसूर दाल की तुलना में पनीर में प्रति ग्राम प्रोटीन की कीमत करीब 7 गुना ज्यादा है.

कीमतों में इतना बड़ा अंतर धोखाधड़ी की गुंजाइश पैदा करता है. 1970 में जॉर्ज एकरलॉफ ने बताया था कि जब खरीदार किसी सामान की क्वालिटी नहीं जांच सकते, तो खराब नकली प्रोडक्ट असली उत्पादों की जगह ले सकते हैं. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि असली सामान बेचने वाले उन गुणों की कीमत नहीं ले सकते, जिन्हें ग्राहक देख नहीं सकते. ग्राहक करी में नकली और असली पनीर में अंतर नहीं कर सकते. इससे ‘मार्केट फॉर लेमन्स’ जैसी स्थिति बनती है. इससे यह सवाल उठता है कि क्या सस्ते नकली पनीर की वजह से उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) में दर्ज पनीर की औसत कीमत कम दिखाई दे रही है.

भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) का ड्राफ्ट नियम इस समस्या का एक सीधा समाधान देता है. एकरलॉफ के मुताबिक ‘लेमन्स’ की समस्या का समाधान जानकारी देना था. उत्पाद की संरचना के आधार पर नाम रखने से खरीदारों को यही जानकारी मिलती है. अगर कोई उत्पाद दूध से नहीं बना है, तो उस पर पनीर नहीं लिखा जा सकता.

कीमतों के झटके से अवसर तक

भारत में प्रोटीन वाले खाने की महंगाई को नाकामी के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए. यह दिखाता है कि देश में प्रोटीन खाने की खपत तेजी से बढ़ रही है, लेकिन मौजूदा सप्लाई चेन उसकी मांग के बराबर नहीं बढ़ पाई है. अब अगला कदम इन सप्लाई चेन को बढ़ाना होना चाहिए, न कि इस प्रगति को रोकना.

भारत पहले भी ऐसी चुनौतियों से निपटने की क्षमता दिखा चुका है. 2015-16 के दाल संकट के बाद देश ने 2016-17 में 23 मिलियन टन से ज्यादा की रिकॉर्ड पैदावार हासिल की. इससे दाल की कीमतों में बड़ी कमी आई. इससे पता चलता है कि भारतीय कृषि कीमतों में बदलाव के संकेतों पर तेजी से प्रतिक्रिया करती है.

डेयरी क्षेत्र भी इसी तरह आगे बढ़ सकता है. जिस सहकारी नेटवर्क ने भारत को दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक बनाया, उसमें चीज और व्हे के उत्पादन को बढ़ाने की क्षमता है. इससे मार्शल की संयुक्त सप्लाई वाली समस्या को आयात कम करने के अवसर में बदला जा सकता है. सही लेबलिंग से यह बदलाव आसान होगा और असली पनीर अपनी वास्तविक संरचना के आधार पर बाजार में प्रतिस्पर्धा कर सकेगा.

पनीर टिक्का ऑर्डर करने वाले परिवारों जैसे ग्राहकों को अपने खाने के बारे में सही जानकारी पाने का अधिकार है. इसी तरह, देश को ऐसी प्रोटीन रणनीति की जरूरत है जो बढ़ती मांग के हिसाब से हो. जिस तरह भारत ने अपनी दाल खुद उगाने में क्षमता हासिल की है, उसी तरह वह अपना व्हे भी बनाने की क्षमता विकसित कर सकता है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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