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Sunday, 28 June, 2026
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संकट के हर दौर में सार्वजनिक क्षेत्र की पेट्रोलियम कंपनियां बनीं ऊर्जा सुरक्षा की रीढ़

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नयी दिल्ली, 28 जून (भाषा) भारत ने जब-जब किसी बड़े संकट का सामना किया है हर बार देश की सरकारी पेट्रोलियम विपणन कंपनियों (ओएमसी) ने निर्बाध ईंधन आपूर्ति सुनिश्चित कर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। चाहे 2015 की विनाशकारी बाढ़ हो, कोविड-19 महामारी हो या फिर वैश्विक कच्चे तेल की आपूर्ति का संकट उत्पन्न करने वाला पश्चिम एशिया का हालिया संघर्ष।

विश्लेषकों और उद्योग जगत के अधिकारियों का कहना है कि हर राष्ट्रीय आपातकाल ने इस बात को और मजबूत किया है कि सरकारें देश की ऊर्जा जीवनरेखा को नियंत्रित करने वाली इन कंपनियों पर से अपनी पकड़ ढीली करने में क्यों कतराती रही हैं।

दशकों से भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) की अक्सर कम मुनाफे, ईंधन मूल्य निर्धारण में सरकारी हस्तक्षेप और बड़े परिचालन के लिए आलोचना की जाती रही है। इन्हें दो बार निजीकरण के दायरे में भी लाया गया था। वर्ष 2002 में भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (एचपीसीएल) को बेचने की योजना ने गति पकड़ी, जिसे उच्चतम न्यायालय के एक फैसले ने रोक दिया। इसके बाद 2020 में फिर से यह प्रक्रिया शुरू की गई, लेकिन पर्याप्त बोलियां न मिलने के कारण इसे छोड़ दिया गया।

अधिकारियों ने कहा कि जब 2015 में अभूतपूर्व बाढ़ ने चेन्नई को जलमग्न कर दिया था, तब इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (आईओसी), बीपीसीएल और एचपीसीएल ने वैकल्पिक मार्गों से ईंधन पहुंचाने, डूबे हुए डिपो को बहाल करने और आपातकालीन सेवाओं को आपूर्ति जारी रखने के लिए दिन-रात काम किया।

इसी तरह, कोविड-19 महामारी के दौरान देशव्यापी लॉकडाउन के बावजूद इन कंपनियों ने लगभग बिना किसी बाधा के काम किया।

उन्होंने बताया कि सख्त आवाजाही प्रतिबंधों के बीच भी ईंधन स्टेशन खुले रहे, रिफाइनरियां न्यूनतम कर्मचारियों के साथ चलती रहीं, करोड़ों घरों में एलपीजी सिलेंडर पहुंचाए गए और राहत एवं चिकित्सा उड़ानों के लिए विमान ईंधन (एटीएफ) की आपूर्ति बनाए रखी गई।

पश्चिम एशिया में हालिया संघर्ष ने एक बार फिर इन कंपनियों के रणनीतिक महत्व को रेखांकित किया है।

ईरान युद्ध के कारण जब कच्चे तेल के व्यापार मार्ग प्रभावित हुए और होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ीं, तो भारत की सरकारी रिफाइनरियों ने तेजी से अपने परिचालन को व्यवस्थित किया।

उन्होंने पेट्रोरसायन से ध्यान हटाकर एलपीजी उत्पादन बढ़ाया, विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों से कच्चे तेल की खरीद में विविधता लेकर आईं और स्थानीय स्तर पर किल्लत से बचने के लिए देश भर में ईंधन की आपूर्ति का समन्वय किया।

एक उद्योग अधिकारी ने कहा, ‘इसका परिणाम यह हुआ कि देश के किसी भी कोने में ईंधन की कमी नहीं हुई। पड़ोस सहित कई देशों के विपरीत, भारत में ईंधन की कोई सीमित आपूर्ति देखने को नहीं मिली।’

इन कंपनियों ने यह सब वैश्विक तेल कीमतों में हुई भारी बढ़ोतरी का न्यूनतम बोझ उपभोक्ताओं पर डालकर किया। तीन सरकारी कंपनियों ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में 50 प्रतिशत से अधिक के उछाल को खुद झेला। इसके बाद उन्होंने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 7.50 रुपये प्रति लीटर, एलपीजी दरों में 89 रुपये प्रति सिलेंडर और सीएनजी में छह रुपये प्रति किलोग्राम की वृद्धि की, जो दुनिया की अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में हुई बढ़ोतरी की तुलना में बेहद कम थी।

यह प्रतिक्रिया दशकों में तैयार की गई रणनीति को दर्शाती है: पहले वैश्विक झटकों को खुद झेलना और उपभोक्ताओं को जब तक संभव हो, सुरक्षित रखना।

क्रिसिल रेटिंग्स के अनुसार, सार्वजनिक क्षेत्र की तीनों तेल कंपनियों को मार्च और मई के बीच 40,000-45,000 करोड़ रुपये का शुद्ध नुकसान (अंडर-रिकवरी) होने का अनुमान है, जो उनके संयुक्त वार्षिक लाभ के लगभग बराबर है। इसके विपरीत, नायरा एनर्जी और शेल जैसी निजी क्षेत्र की कंपनियों ने इस अवधि के दौरान खुदरा कीमतों में अधिक अंतर से बढ़ोतरी की।

ऐसा ही कुछ कोविड-19 के दौरान भी देखा गया था, जब मांग घटने पर कई निजी खुदरा विक्रेताओं ने अपने आउटलेट पर ‘नो स्टॉक’ के बोर्ड लगा दिए थे, जबकि सार्वजनिक क्षेत्र की पेट्रोलियम कंपनियों ने आपूर्ति जारी रखी थी।

भाषा योगेश अजय

अजय

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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