नई दिल्ली: श्रीनगर के शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (SKIMS) की नर्स सरला भट का अपहरण कर उन्हें प्रताड़ित करने और हत्या के बाद उनकी गोलियों से छलनी लाश श्रीनगर के डाउनटाउन इलाके में एक पर्ची के साथ फेंक दी गई थी, जिसमें उन्हें मुखबिर बताया गया था. इस घटना के 35 साल से ज्यादा समय बाद अब जम्मू-कश्मीर की स्टेट इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (SIA) इस मामले में नए सबूतों के आधार पर पांच लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने जा रही है.
साढ़े तीन दशक पुराने इस मामले की दोबारा जांच के लिए जांचकर्ताओं ने कई गवाहों को खोजा, जिनकी उम्र अब 80 साल से ज्यादा है. उन्होंने 1990 के शुरुआती दौर की हिंसा को कवर करने वाले पत्रकारों से भी बात की और नए बैलिस्टिक परीक्षण के जरिए फोरेंसिक सबूत भी जुटाए.
पुलिस सूत्रों के मुताबिक, सबसे अहम सबूतों में से एक यह था कि घटनास्थल से मिले तीनों कारतूसों की जांच में पुष्टि हुई कि वे एक ही हथियार से चलाए गए थे, जिसका इस्तेमाल जेकेएलएफ के आतंकियों ने किया था. इस बात की पुष्टि उन प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों से भी हुई, जिन्होंने हत्या के दौरान उसी हथियार से लगातार गोलियां चलते देखीं और सुनी थीं.
इन सबूतों के आधार पर SIA ने जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) के पांच सदस्यों को इस हत्या का जिम्मेदार माना है. इनमें से तीन की मौत हो चुकी है, एक हिरासत में है और एक फरार है.
जांचकर्ताओं का मानना है कि उनका मकसद स्थानीय कश्मीरियों में डर फैलाना और कश्मीरी पंडितों के पलायन को बढ़ावा देना था. SIA के एक सूत्र ने बताया कि आरोपी अपने मकसद में कामयाब भी रहे.
सूत्रों के मुताबिक, फरार आरोपी के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी कर दिए गए हैं और उसे भगोड़ा घोषित करने की कार्रवाई भी शुरू कर दी गई है.
सरला भट की हत्या कश्मीरी पंडितों के पलायन का एक बड़ा मोड़ साबित हुई थी. इस घटना के तुरंत बाद घाटी में बचे कई कश्मीरी पंडित परिवारों ने भी कश्मीर छोड़ना शुरू कर दिया.
कश्मीर की SIA यूनिट ने पिछले साल अगस्त में इस मामले की दोबारा जांच शुरू की थी और आरोपियों की तलाश में कई जगह छापे मारे थे.
एक अधिकारी ने कहा, “प्रत्यक्षदर्शियों तक पहुंचने में करीब एक साल लग गया. अब उनकी उम्र काफी ज्यादा हो चुकी है और उन्हें गवाही देने के लिए तैयार करना भी आसान नहीं था. जांच की शुरुआत बहुत कम जानकारी से हुई थी, क्योंकि 1990 के दशक में मामले तो दर्ज हुए थे, लेकिन उनकी जांच नहीं हुई थी. उस समय आतंकवाद अपने चरम पर था और हालात बेहद खराब थे. कई हत्याएं हुईं, लेकिन अपराधियों को कभी सजा नहीं मिली.”
उन्होंने आगे कहा, “यह बहुत मुश्किल जांच थी. कई संदिग्धों की मौत हो चुकी थी, सबूत भी सीमित थे. लेकिन टीमों ने कड़ी मेहनत की और जांच को एक नतीजे तक पहुंचाया.”
2017 में सुप्रीम कोर्ट ने कश्मीरी पंडितों की हत्याओं की दोबारा जांच की मांग वाली याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि इतने समय बाद सबूत मिलना “संभव नहीं” है. 2023 में अदालत ने ‘रूट्स इन कश्मीर’ नाम के संगठन की पुनर्विचार याचिका भी खारिज कर दी थी, जिसमें कश्मीरी पंडितों की हत्याओं की जांच की मांग की गई थी.
पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, 1989 के बाद से आतंकियों ने 209 कश्मीरी पंडितों की हत्या की थी. इनमें से अकेले 1990 में 109 लोगों की हत्या हुई थी.
गवाहों से पूछताछ
पुलिस सूत्रों के मुताबिक, SIA ने सरला भट को जानने वाले कई लोगों का पता लगाकर उनके बयान दर्ज किए. इन गवाहों ने बताया कि 18 अप्रैल 1990 को दोपहर करीब 2:30 बजे सरला को आखिरी बार SKIMS में जिंदा देखा गया था. इसके बाद जेकेएलएफ के आतंकियों ने उनका अपहरण कर लिया.
गवाहों ने यह भी बताया कि सरला को जेकेएलएफ के आतंकियों के साथ बुचपोरा क्रॉसिंग के पास देखा गया था. वहां से उन्हें इलाहीबाग-लाल बाजार इलाके की तरफ ले जाया गया, जहां उनके साथ बेरहमी से मारपीट की गई, घसीटा गया, प्रताड़ित किया गया और आखिर में ऑटोमैटिक राइफल से गोली मारकर हत्या कर दी गई.
दूसरे सूत्र ने बताया कि घटनास्थल का दोबारा निरीक्षण भी किया गया. पुराने फोटो और वीडियो भी जुटाए गए ताकि पूरी घटना का क्रम साबित किया जा सके.
उन्होंने कहा, “प्रत्यक्षदर्शियों ने आतंकियों की पहचान की.”
सूत्र ने आगे बताया, “1990 का दशक ऐसा समय था जब जेकेएलएफ के निर्देश पर इस तरह की कई चुनिंदा हत्याएं की गईं. फारूक अहमद डार उर्फ बिट्टा कराटे के कई इंटरव्यू मौजूद हैं, जिनमें वह खुद इन हत्याओं में शामिल होने की बात स्वीकार करता है. इन्हें भी रिकॉर्ड का हिस्सा बनाया गया है ताकि सिर्फ सरला भट ही नहीं, बल्कि ऐसी कई चुनिंदा हत्याओं में जेकेएलएफ की भूमिका साबित की जा सके.”
एक सुनियोजित अभियान
SIA की जांच में यह भी सामने आया कि सरला भट की हत्या, कश्मीरी पंडितों में डर फैलाने और उन्हें घाटी छोड़ने पर मजबूर करने के लिए जेकेएलएफ के चलाए जा रहे अभियान का हिस्सा थी.
पहले सूत्र ने कहा, “सरला कोई मुखबिर नहीं थीं. यह सिर्फ उन्हें मारने और एक संदेश देने का बहाना बनाया गया था. चाहे सरला की हत्या हो या 1989 में गंजू की हत्या, ये सभी हमले कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाकर किए गए थे ताकि डर का माहौल बनाया जाए और उन्हें घाटी छोड़ने पर मजबूर किया जाए. आखिरकार वे इसमें कामयाब भी रहे.”
चार्जशीट दाखिल होने और अदालत द्वारा मामले का संज्ञान लेने के बाद आरोप तय किए जाएंगे और मुकदमे की सुनवाई शुरू होगी. यह सब उस घटना के 35 साल से ज्यादा समय बाद होगा, जब गोलियों से छलनी सरला भट का शव श्रीनगर के डाउनटाउन इलाके में मिलने से पूरे कश्मीरी समाज में सनसनी फैल गई थी.
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