नई दिल्ली: तमिलनाडु के मद्रास हाई कोर्ट ने थूथुकुडी जिले के एक मंदिर में होने वाले ‘आडल पाडल’ (Aadal Paadal) डांस कार्यक्रम के लिए अश्लीलता रोकने संबंधी सख्त नियम तय किए हैं.
मंदिर में सांस्कृतिक कार्यक्रम की सशर्त अनुमति देते हुए हाई कोर्ट ने किसी भी तरह के “अश्लील या गरिमा के खिलाफ” प्रदर्शन पर सख्त चेतावनी दी है. मदुरै बेंच ने एक तय ड्रेस कोड भी लागू किया है, जिसके तहत ऐसे “सभ्य” कपड़े पहनने होंगे जिनमें पेट, जांघ, पैर या सीना दिखाई न दे. खास तौर पर पुरुषों को धोती या पायजामा पहनना होगा, जबकि महिलाओं को साड़ी, हाफ साड़ी या ऊपर दुपट्टे के साथ चूड़ीदार पहनना होगा.
जस्टिस एल. विक्टोरिया गौरी ने कहा कि अगर अश्लीलता या ड्रेस कोड से जुड़ी किसी भी शर्त का उल्लंघन हुआ तो तुरंत कानूनी कार्रवाई होगी. इसमें आयोजकों और मंदिर समिति के सभी सदस्यों की गिरफ्तारी भी शामिल होगी.
अन्य नियमों में रात 10 बजे के बाद कार्यक्रम पर रोक, किसी भी तरह के राजनीतिक या सांप्रदायिक संदेश पर प्रतिबंध और पूरे कार्यक्रम की वीडियो रिकॉर्डिंग करना शामिल है.
उन्होंने यह भी आदेश दिया कि कार्यक्रम के दौरान किसी भी महिला प्रतिभागी को कपड़ों या किसी अन्य तरीके से “अश्लील या गरिमा के खिलाफ” नहीं दिखाया जाएगा. इसके अलावा “डबल मीनिंग” वाले गाने बजाने पर भी रोक लगाई गई है, ताकि कार्यक्रम से “छात्रों और युवाओं के दिमाग पर बुरा असर” न पड़े.
सीनियर वकील महालक्ष्मी पावनी ने द प्रिंट से बातचीत में कोर्ट के आदेश को संतुलित नजरिए से देखने की बात कही. उन्होंने कहा कि इसे सही संदर्भ में समझना चाहिए. “कोर्ट ने सांस्कृतिक कार्यक्रम पर रोक नहीं लगाई है. इसके उलट, उसने समय, सार्वजनिक सुरक्षा, सांप्रदायिक सौहार्द, राजनीतिक तटस्थता और कार्यक्रम की प्रकृति से जुड़ी कुछ शर्तों के साथ इसकी अनुमति दी है.”
उन्होंने कहा, “ड्रेस कोड इन सभी शर्तों का सिर्फ एक हिस्सा है, जिसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि कार्यक्रम मंदिर उत्सव के धार्मिक और सांस्कृतिक स्वरूप के अनुरूप रहे.” उन्होंने कहा कि धार्मिक आयोजनों से जुड़े सांस्कृतिक कार्यक्रमों को नियंत्रित करने का अधिकार अदालतों के पास है, खासकर जब ऐसा सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता और आयोजन की पवित्रता बनाए रखने के लिए किया जाए.
उन्होंने कहा कि ये कलात्मक अभिव्यक्ति पर पूरी तरह से रोक लगाने वाले आदेश नहीं हैं, बल्कि सार्वजनिक धार्मिक स्थल पर होने वाले एक खास कार्यक्रम के लिए तय की गई सुरक्षा संबंधी शर्तें हैं.
उन्होंने बताया कि तमिलनाडु समृद्ध सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत वाला राज्य है, जहां मंदिर आज भी आस्था, परंपरा और सामुदायिक जीवन के केंद्र हैं. साथ ही, भारत के कई मंदिरों में, जिनमें तिरुमला तिरुपति देवस्थानम और गुरुवायूर श्रीकृष्ण मंदिर जैसे प्रसिद्ध मंदिर भी शामिल हैं, मंदिर परिसर में प्रवेश करने वाले श्रद्धालुओं के लिए ड्रेस कोड पहले से लागू है.
पावनी ने कहा कि यह भी ध्यान देने वाली बात है कि यह आदेश जस्टिस एल. विक्टोरिया गौरी ने दिया है. इससे साफ होता है कि मंदिर उत्सव में मर्यादा बनाए रखने पर जोर किसी एक लिंग का नजरिया नहीं है, बल्कि कार्यक्रम की सांस्कृतिक परंपरा को बनाए रखने का प्रयास है.
उन्होंने कहा कि मंदिर उत्सव के संदर्भ में देखें तो इन नियमों का उद्देश्य उस स्थान की पारंपरिक गरिमा बनाए रखना है, न कि लोगों के रोजमर्रा के कपड़ों या फैशन को नियंत्रित करना.
इस साल मार्च में भी हाई कोर्ट में एस. अरुण ने याचिका दायर कर मदुरै जिले में श्री कालीअम्मन मंदिर उत्सव के दौरान 31 मार्च और 1 अप्रैल को होने वाले वल्ली तिरुमनम नाटक और डांस कार्यक्रम के लिए पुलिस सुरक्षा और अनुमति मांगी थी.
जस्टिस गौरी ने याचिका मंजूर करते हुए आदेश दिया था, “सांस्कृतिक कार्यक्रम में भाग लेने वाली किसी भी महिला को कपड़ों या किसी अन्य तरीके से अश्लील या गरिमा के खिलाफ नहीं दिखाया जाएगा.” मार्च में भी जून वाले हालिया आदेश जैसी ही शर्तें लगाई गई थीं. जैसे रात 10 बजे के बाद कार्यक्रम पर रोक और “डबल मीनिंग” वाले गानों पर प्रतिबंध.
मार्च में जस्टिस गौरी की बेंच ने एक और ऐसा ही आदेश दिया था. ए. वैथियानाथन ने पुलिस से अनुमति न मिलने के बाद हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी. उन्होंने त्रिची जिले के अरुलमिगु कालीगापरमेश्वरी मंदिर में 8 से 10 मार्च तक होने वाले मंदिर उत्सव के दौरान ‘करगट्टम’ लोक नृत्य कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति मांगी थी. सरकारी वकील ने कहा कि ‘करगट्टम’ के नाम पर लोग असली करगट्टम नहीं करते, बल्कि अश्लील ‘आडल पाडल’ (डांस और गाना) करते हैं. इसी वजह से पुलिस ने अनुमति नहीं दी.
जस्टिस गौरी ने कहा कि पारंपरिक करगट्टम नृत्य को न तो नृत्य करने के तरीके में और न ही पहनावे में बदला जाना चाहिए. उन्होंने साफ किया कि नर्तकों को करगट्टम करते समय तमिल फिल्म ‘करगट्टाकरण’ में दिखाए गए सही ड्रेस कोड का पालन करना होगा.
जस्टिस गौरी की 2023 में जज के रूप में नियुक्ति विवादों में रही थी. वकील और भारतीय जनता पार्टी महिला मोर्चा की पूर्व राष्ट्रीय सचिव एल. विक्टोरिया गौरी को जज बनाए जाने का कई वकीलों ने विरोध किया था, जब तत्कालीन चीफ जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाले सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने उनके नाम की सिफारिश की थी.
हालांकि, उत्सव आयोजकों के लिए ड्रेस और आचरण से जुड़े सख्त नियम तय करने वाली वह अकेली जज नहीं हैं.
पिछले एक दशक में ऐसे कई फैसले आए हैं. इनमें ड्रेस कोड तय करने से लेकर “डबल मीनिंग” वाले गानों पर रोक तक, ऐसे कई समान आदेश दिए गए हैं ताकि उत्सवों के कार्यक्रम “गरिमापूर्ण” बने रहें.
हर त्योहार के मौसम में मद्रास हाई कोर्ट के सामने वही कानूनी सवाल आता है. सांस्कृतिक उत्सव और अश्लीलता की सीमा कहां खत्म होती है?
लगभग हर साल एक जैसी स्थिति बनती है. जिन लोगों को संगीत और डांस कार्यक्रम आयोजित करने की पुलिस से अनुमति नहीं मिलती, वे हाई कोर्ट पहुंचते हैं. हाई कोर्ट उन्हें अनुमति देता है और ड्रेस कोड, “डबल मीनिंग” वाले गानों और समय सीमा जैसी शर्तें लगाता है.
पिछले साल दिसंबर में करूर गांव के एक निवासी की याचिका पर हाई कोर्ट ने 1 जनवरी को खेल प्रतियोगिताएं और “आडलुम पाडलुम” सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति दी. शर्त सिर्फ इतनी थी कि कार्यक्रम में कोई अश्लील प्रदर्शन न हो और कानून-व्यवस्था की समस्या न पैदा हो.
जनवरी 2023 में हाई कोर्ट में मुथु मुरुगन ने याचिका दायर की थी. वह वनवेंगाइगल पेरावै संगठन के महासचिव थे, जो कुरावर समुदाय के लोगों के कल्याण और सामाजिक उत्थान के लिए काम करता है. कुरावर तमिलनाडु और केरल का एक आदिवासी समुदाय है. उन्होंने मांग की थी कि ऐसे सांस्कृतिक डांस कार्यक्रमों पर रोक लगाई जाए, क्योंकि इनमें कथित तौर पर कुरावर समुदाय को अपमानजनक तरीके से दिखाया जाता है. इस पर हाई कोर्ट ने एक अहम आदेश दिया.
जस्टिस आर. महादेवन और जे. सत्य नारायण प्रसाद की बेंच ने तमिलनाडु सरकार को निर्देश दिया कि मंदिर उत्सवों के नाम पर होने वाले डांस कार्यक्रमों में किसी जाति या आदिवासी समुदाय का अपमान न किया जाए और अश्लील डांस को ‘कुरवन-कुरथी’ नृत्य बताकर पेश न किया जाए.
बेंच ने माना कि हाई कोर्ट के कई आदेशों के बावजूद डांस कार्यक्रमों में अश्लीलता जारी है. साथ ही, कुरावर समुदाय की पारंपरिक कला को गलत तरीके से दिखाना और उसका गलत इस्तेमाल करना उनकी भावनाओं को ठेस पहुंचाता है.
मई 2017 में भी मदुरै के कई लोगों और संगठनों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. जस्टिस के. कल्याणसुंदरम ने कुछ शर्तों के साथ अनुमति दी. उन्होंने कहा, “कार्यक्रम के दौरान किसी भी प्रतिभागी की ओर से किसी तरह का अश्लील नृत्य या अशोभनीय संवाद नहीं होना चाहिए. किसी भी राजनीतिक दल, धर्म, समुदाय या जाति से जुड़े गाने या नृत्य नहीं होने चाहिए.” राजनीतिक संदेश वाले फ्लेक्स और बैनर लगाने की भी अनुमति नहीं दी गई.
2017 में दशहरा उत्सव के लिए भी हाई कोर्ट ने ऐसा ही आदेश दिया था. जस्टिस के.के. ससीधरन और जी.आर. स्वामीनाथन ने कहा था कि इस उत्सव में श्रद्धालु देवी-देवताओं का रूप धारण कर धार्मिक आस्था के साथ आते हैं. ऐसे माहौल में अश्लील नृत्य स्वीकार नहीं किया जा सकता.
अक्टूबर 2015 में नमक्कल जिले के एक मंदिर उत्सव में सांस्कृतिक डांस कार्यक्रम की अनुमति देते हुए, जबकि पुलिस ने पहले अनुमति देने से इनकार कर दिया था, मद्रास हाई कोर्ट ने आयोजकों के लिए आठ शर्तें तय की थीं. यह कार्यक्रम तिरुचेंगोडे कस्बे के थोंडिकाराडु श्री महा मारियम्मन मंदिर उत्सव का हिस्सा था.
जस्टिस एम.एम. सुंदरश ने कहा था कि आयोजक “कार्यक्रम के दौरान किसी भी तरह का अश्लील नृत्य या अशोभनीय संवाद नहीं होने देंगे. छात्रों और युवाओं के दिमाग पर बुरा असर डालने वाले डबल मीनिंग गाने नहीं बजाए जाएंगे.”
उन्होंने यह भी कहा कि किसी राजनीतिक दल, धर्म, समुदाय या जाति का जिक्र करने वाले गाने या नृत्य नहीं होने चाहिए. कार्यक्रम धार्मिक और सांप्रदायिक सौहार्द को प्रभावित किए बिना और जाति के आधार पर किसी तरह का भेदभाव किए बिना आयोजित होना चाहिए.
फरवरी 2014 में भी मद्रास हाई कोर्ट ने एक होटल मालिक की याचिका खारिज कर दी थी. उसने रात में सांस्कृतिक डांस कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति मांगी थी. कोर्ट ने कहा कि महिलाओं को अशोभनीय तरीके से पेश किए जाने की आशंका के आधार पर भी पुलिस पहले से कार्रवाई कर सकती है. जस्टिस वी. रामासुब्रमणियन ने कहा था कि पुलिस का “सामाजिक दायित्व” है कि वह अपराध होने का इंतजार करने के बजाय पहले से रोकथाम के कदम उठाए.
कोर्ट ने 1986 के ‘महिलाओं के अशोभनीय चित्रण (प्रतिषेध) अधिनियम’ पर भी जोर दिया. इस कानून में महिलाओं के ऐसे किसी भी चित्रण को अशोभनीय माना गया है, जो उनकी गरिमा को ठेस पहुंचाए या सार्वजनिक नैतिकता को नुकसान पहुंचाने की संभावना रखता हो.
कोर्ट ने खास तौर पर कहा कि कानून सिर्फ अशोभनीय चित्रण ही नहीं, बल्कि सार्वजनिक नैतिकता को नुकसान पहुंचने की संभावना पर भी रोक लगाता है. जज ने कहा कि अगर लाइसेंस देने वाला अधिकारी पिछले अनुभवों के आधार पर यह मानता है कि लाइसेंस देने से सार्वजनिक नैतिकता को नुकसान पहुंच सकता है, तो उसके फैसले को गलत नहीं माना जा सकता.
कोर्ट ने महिलाओं के खिलाफ सभी प्रकार के भेदभाव के उन्मूलन संबंधी अंतरराष्ट्रीय संधि (CEDAW) का भी हवाला दिया. कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों की जिम्मेदारी है कि वे सांस्कृतिक कार्यक्रमों की आड़ में होने वाली महिलाओं की तस्करी और शोषण को रोकें. इसी आधार पर याचिका खारिज कर दी गई.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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