ऊना (हिमाचल प्रदेश), छह नवंबर (भाषा) हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले में धान की कटाई के बाद किसान अब खेतों को खाली छोड़ने की जगह बिना जुताई किए ही आलू की बुवाई कर रहे हैं। इस तकनीक में आलू के बीज को मिट्टी के बजाय धान की बची हुई पराली से ढक दिया जाता है। इससे जुताई और सिंचाई पर होने वाला खर्च बचता है और खेत में मौजूद नमी का भी इस्तेमाल हो जाता है।
अखरोट स्थित कृषि अनुसंधान उपकेंद्र किसानों को यह बुवाई तकनीक अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है। उपकेंद्र के एक प्रवक्ता ने बताया कि नंदपुर गांव में रंजना देवी के खेत में शून्य जुताई (जीरो टिलेज) पद्धति से आलू की सफलतापूर्वक बुवाई की गई है।
इस तकनीक की खास बात यह है कि धान की कटाई के बाद खेत की दोबारा जुताई करने की जरूरत नहीं पड़ती। मिट्टी में पहले से मौजूद नमी का इस्तेमाल करके आलू लगाए जाते हैं और धान की बची हुई पराली के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। इससे मिट्टी की नमी बनी रहती है और कृषि अवशेषों का भी उपयोग हो जाता है।
रंजना देवी ने पीटीआई-भाषा के साथ बातचीत में कहा कि उन्होंने शून्य जुताई पद्धति का प्रशिक्षण लेने के बाद इस साल अपने खेत में इस पद्धति को अपनाया। अब वह दूसरे किसानों को भी इस तकनीक को अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं।
इस पद्धति का प्रमुख लाभ यह है कि धान की कटाई और अगली फसल की बुवाई के बीच खेत को खाली छोड़ने की जरूरत नहीं पड़ती। साथ ही, जुताई और सिंचाई पर होने वाला खर्च भी काफी कम हो जाता है।
इससे पराली जलाने या उसके निस्तारण की समस्या से भी किसानों को राहत मिल सकती है। यह तकनीक मिट्टी की संरचना और उसकी सेहत में सुधार लाने में भी मददगार है।
कृषि अनुसंधान उपकेंद्र किसानों के खेतों में इस तकनीक का प्रदर्शन कर रहा है और इसे अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है। इसका उद्देश्य किसानों को कम लागत वाली, पानी बचाने वाली और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति अधिक सक्षम खेती के तरीकों से जोड़ना है।
सकारात्मक परिणाम मिलने पर यह पद्धति किसानों के लिए अतिरिक्त आमदनी का एक प्रभावी जरिया बन सकती है। इससे धान की कटाई के बाद आलू की खेती के साथ प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी होगा।
भाषा प्रेम प्रेम रमण
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