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Tuesday, 8 September, 2026
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DU हॉस्टल की कमी ने बढ़ाई PG माफिया की मनमानी, एक बेड के लिए छात्र दे रहे 16 हजार

सत्या निकेतन अकेला मामला नहीं है. डीयू के कई कॉलेजों के हॉस्टल मरम्मत के चलते बंद हैं, जिससे स्टूडेंट्स जर्जर इमारतों में बने छोटे और तंग PG में रहने को मजबूर हैं, जहां कमरे कम रोशनी वाले हैं और छतों से पानी टपकता है.

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नई दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी के सत्या निकेतन में रातभर मलबे से स्टूडेंट्स को निकालने और फिर प्रदर्शन में शामिल होने के बाद पसीने से पूरी तरह भीगे और बिना सोए 18 साल के ऋषभ सौरवकर के मन में सिर्फ एक सवाल है: “अगर यहां मैं होता तो?”

उन्हें कोलकाता से राम लाल आनंद कॉलेज में पॉलिटिकल साइंस पढ़ने के लिए दिल्ली आए अभी मुश्किल से दो महीने ही हुए हैं, लेकिन इतने कम समय में ही उन्हें दिल्ली यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट एरिया में रहने की सच्चाई का सामना करना पड़ा है.

कॉलेज के हॉस्टल में जगह नहीं मिलने के बाद ऋषभ को पेइंग गेस्ट (PG) में रहना पड़ा.

ऋषभ की चिंता दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) के उन हज़ारों स्टूडेंट्स की साझा समस्या को दिखाती है, जो देश के अलग-अलग हिस्सों से उच्च शिक्षा के लिए यहां आते हैं. कैंपस में हॉस्टल की कमी के कारण उन्हें छोटे, महंगे PG या किराए के फ्लैट में रहना पड़ता है, जहां सुरक्षा की बुनियादी सुविधाएं भी नहीं होतीं.

डीयू स्टूडेंट और कोलकाता के रहने वाले ऋषभ सौरवकर मोती बाग गांव में अपने PG के सामने | फोटो: समृद्धि तिवारी/दिप्रिंट
डीयू स्टूडेंट और कोलकाता के रहने वाले ऋषभ सौरवकर मोती बाग गांव में अपने PG के सामने | फोटो: समृद्धि तिवारी/दिप्रिंट

रविवार को सत्या निकेतन के एक पीजी की इमारत गिर गई. इस हादसे में सात लोगों की मौत हो गई. इसके बाद ये समस्याएं एक बार फिर सामने आ गईं. इस हादसे से पता चला कि DU के व्यावसायिक होते जा रहे रिहायशी इलाकों में स्टूडेंट्स PG मालिकों, ब्रोकरों और मकान मालिकों के बीच फंसे हुए हैं.

सोमवार दोपहर तक स्टूडेंट्स की यह नाराज़गी सड़कों पर दिखाई देने लगी. ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA), नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के छात्र संगठनों ने साउथ कैंपस में अलग-अलग प्रदर्शन किए. उन्होंने PG पर सख्त नियम लागू करने, सुरक्षा जांच कराने और मकान मालिकों की कानूनी जवाबदेही तय करने की मांग की.

ये प्रदर्शन सितंबर में होने वाले दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन (DUSU) चुनाव से कुछ ही हफ्ते पहले हुए हैं. ऐसे में स्टूडेंट हॉस्टल का मुद्दा छात्र संगठनों के चुनावी घोषणापत्र का हिस्सा बन सकता है.

NSUI के संभावित DUSU उम्मीदवार दीपांशु शोकीन ने दिप्रिंट से कहा, “यह कई सालों से चल रहा है. इस मुद्दे पर कई बार चर्चा हुई है और इसे उठाया भी गया है, लेकिन सत्या निकेतन में जो हुआ, उसके बाद यह मुद्दा फिर से सामने आ गया.”

उन्होंने कहा कि इस बार DUSU चुनाव में स्टूडेंट्स को सुरक्षित और ठीक जगह पर रहने की सुविधा देना एक बड़ा मुद्दा है. “हमारा लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि छात्रों को घर वापस न जाना पड़े और उनकी पढ़ाई प्रभावित न हो. कॉलेज प्रशासन यह क्यों कह रहा है कि उसके पास पैसे नहीं हैं? क्या उनके पास कार्यक्रम कराने के लिए पैसे हैं?”

डीयू के नॉर्थ और साउथ कैंपस में तेजी से बढ़ रहे PG के खिलाफ ABVP, NSUI और लेफ्ट संगठनों के सदस्यों ने अलग-अलग प्रदर्शन किए | फोटो: समृद्धि तिवारी/दिप्रिंट
डीयू के नॉर्थ और साउथ कैंपस में तेजी से बढ़ रहे PG के खिलाफ ABVP, NSUI और लेफ्ट संगठनों के सदस्यों ने अलग-अलग प्रदर्शन किए | फोटो: समृद्धि तिवारी/दिप्रिंट

दिल्ली यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर योगेश सिंह ने सोमवार को एक बयान जारी कर सभी प्रिंसिपलों से यह सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाने को कहा कि ऐसी दुखद घटना दोबारा न हो.

बयान में कहा गया, “उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यूनिवर्सिटी और कॉलेजों को इसे सुनिश्चित करने के लिए हर संभव कोशिश करनी चाहिए. उन्होंने प्रिंसिपलों से अपने-अपने कॉलेजों में स्टूडेंट्स के लिए उपलब्ध रहने की सुविधाओं की समीक्षा करने को कहा.”

उन्होंने निर्माणाधीन हॉस्टल प्रोजेक्ट्स का काम भी तेज़ी से पूरा करने को कहा, ताकि स्टूडेंट्स को जल्द से जल्द ये सुविधाएं मिल सकें. उन्होंने प्रिंसिपलों से अपने कॉलेजों में नए हॉस्टल बनाने की संभावना तलाशने और अगर ऐसी संभावना हो तो जल्द से जल्द इसकी योजना तैयार करने को भी कहा.

बयान में आगे कहा गया, “लक्ष्य यह होना चाहिए कि ज्यादा से ज्यादा स्टूडेंट्स को रहने की सुविधा मिल सके. उन्होंने कहा कि दिल्ली यूनिवर्सिटी हर संभव सहायता देने के लिए हमेशा तैयार है.”

कमरा ढूंढने की मुश्किल

ऋषभ ने कहा कि जो स्टूडेंट्स दूर से आते हैं, वे रिकमेंडेशन पर भरोसा करते हैं. उन्हें बताया गया कि PG एक सस्ता ऑप्शन है, इसलिए उन्होंने एक कमरा ढूंढने का फैसला किया.

उन्होंने कहा, “पहले दिन से ही एक अच्छा कमरा ढूंढना एक मुश्किल काम रहा है. कई दिनों के बाद, मुझे एक शेयर्ड रूम में एक सिंगल बेड मिला और उसकी कीमत 16,000 रुपये थी, जबकि एक सस्ता कमरा 8,000 रुपये का था.”

लेकिन 16,000 रुपये का कमरा भी सेफ्टी की गारंटी नहीं देता.

ऋषभ ने कहा, “फ्लैट एक-दूसरे से सटे हुए हैं. कोई जगह नहीं है. अगर उनमें से एक गिर गया, तो दूसरा भी गिर जाएगा. कोई फायर सेफ्टी के तरीके नहीं हैं, कोई इमरजेंसी एग्जिट नहीं है और हर फ्लोर पर इतने सारे स्टूडेंट्स हैं…हमारी चिंताएं नहीं बदलतीं. सिर्फ हमारे कमरे बदलते हैं.”

मोती बाग गांव की तंग गलियों के अंदर, जहां ऋषभ एक PG में रहते हैं | फोटो: समृद्धि तिवारी/दिप्रिंट
मोती बाग गांव की तंग गलियों के अंदर, जहां ऋषभ एक PG में रहते हैं | फोटो: समृद्धि तिवारी/दिप्रिंट

इन अंधेरी, घुटन भरी गलियों में रहने वाले स्टूडेंट्स आराम या सुरक्षा के बजाय कॉलेज के पास होने की वजह से इन कमरों को चुनते हैं. हर कोने पर खतरा मंडराता हुआ लगता है: कभी, यह गिरता हुआ AC यूनिट होता है, तो कभी कोई टूटी-फूटी बिल्डिंग.

सत्या निकेतन हर गली में चार से पांच मंज़िला PGs से भरा हुआ है. कमरों में मुश्किल से ही कोई नैचुरल धूप आती ​​है.

सत्या निकेतन कॉलोनी, जिसे DU स्टूडेंट्स के बीच ‘सत्या’ के नाम से जाना जाता है, सरदार पटेल मार्ग और चाणक्यपुरी के पास है. कभी साउथ कैंपस के स्टूडेंट्स को रहने की जगह देने वाला एक शांत इलाका, यह सालों से कमर्शियल और रेजिडेंशियल बिल्डिंग्स का हब बन गया है क्योंकि स्टूडेंट्स की आबादी बढ़ी और रहने की जगह की डिमांड भी बढ़ी है.

जिन तंग गलियों में PGs हैं, वहां JCB या फायर इंजन के लिए भी जगह नहीं है. ऋषभ ने कहा, “एम्बुलेंस को भी मेन रोड पर रुकना पड़ता है, जिससे इमरजेंसी में स्ट्रेचर ही एकमात्र ऑप्शन रह जाता है.”

उन्होंने आगे कहा, “मकान मालिकों ने दो लोगों के लिए बनी बिल्डिंग पर गैर-कानूनी तरीके से चार और पांच मंज़िला बिल्डिंग बना दी हैं, जिसमें सिंगल-रूट एग्जिट है और फायर सेफ्टी इक्विपमेंट भी नहीं हैं. एक गैस धमाका और पूरा इलाका परेशान हो जाएगा. इसी डर के साथ हम जी रहे हैं और जीएंगे.”

DU की असली प्रॉब्लम

यूनिवर्सिटी में रहने की जगह की कमी की वजह से स्टूडेंट्स के पास बहुत कम ऑप्शन बचते हैं. रामजस और हिंदू जैसे कॉलेजों में हॉस्टल या तो बंद हैं या फिर उन्हें फिर से बनाया जा रहा है, जिससे कई स्टूडेंट्स प्राइवेट मार्केट में जा रहे हैं.

हिंदू कॉलेज में देरी एक बड़ी प्रॉब्लम का हिस्सा है. पिछले साल भी, DUSU इलेक्शन के दौरान यह एक बड़ा टॉपिक था, जिसे दिप्रिंट ने कवर किया था. पिछले सितंबर में AISA और स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) की महापंचायत में एक संभावित कैंडिडेट ने कहा था, “बुर्ज खलीफा बनने में छह साल लगे, लेकिन हिंदू कॉलेज का हॉस्टल इतने ही सालों से बन रहा है.”

टीचर्स और स्टूडेंट्स ने सालों से इस पर चिंता जताई है, लेकिन फोर ईयर अंडरग्रेजुएट प्रोग्राम (FYUP) की वजह से स्टूडेंट्स को बिना नए क्लासरूम, स्टाफ या हॉस्टल के एक एक्स्ट्रा साल तक कैंपस में रहना पड़ रहा है, जिससे यह टेंशन बढ़ रहा है.

सचिन ने पूछा, “यह PG माफिया और ब्रोकर्स के बीच का नेक्सस है, लेकिन DU भी इसमें शामिल है. अगर यूनिवर्सिटी हॉस्टल नहीं देगी, तो स्टूडेंट्स कहां जाएंगे?”

दिल्ली यूनिवर्सिटी टीचर्स यूनियन एसोसिएशन (DUTA) के पूर्व वाइस-प्रेसिडेंट सुधांशु कुमार ने दिप्रिंट को बताया कि समस्या यह थी कि कई हॉस्टल रिपेयर के लिए बंद हैं और जो चल रहे हैं उनकी कैपेसिटी लिमिटेड है. “जिन कॉलेजों में हॉस्टल हैं, वे रिकंस्ट्रक्शन के दौर से गुज़र रहे हैं. तो फिर क्या मतलब है? समय के साथ स्टूडेंट्स की संख्या बढ़ गई है.”

फिर भी, जबकि मौजूदा सुविधाओं को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है, नए डिपार्टमेंट और ब्लॉक अभी भी बन रहे हैं. इन्हें ग्रांट से नहीं, बल्कि कॉलेजों द्वारा हायर एजुकेशन फाइनेंशियल एजेंसी (HEFA) से लिए गए लोन से फाइनेंस किया जाता है, जो हायर एजुकेशन में कैपिटल प्रोजेक्ट्स को फाइनेंस करने के लिए शिक्षा मंत्रालय और केनरा बैंक का एक जॉइंट वेंचर है.

21 मार्च 2025 को हुई यूनिवर्सिटी कोर्ट की 92वीं सालाना मीटिंग के मिनट्स के मुताबिक, फाइनेंस मंत्रालय ने सात प्रोजेक्ट्स के लिए HEFA से 938.33 करोड़ रुपये मंज़ूर किए. HEFA ने पहले ही पांच प्रोजेक्ट्स के लिए 576.33 करोड़ रुपये मंज़ूर कर दिए हैं. काम पहले ही शुरू हो चुका है, और तीन प्रोजेक्ट्स का उद्घाटन हो चुका है. इन प्रोजेक्ट्स में सिर्फ हाउसिंग ही नहीं, बल्कि कैंपस का दूसरा इंफ्रास्ट्रक्चर भी शामिल है.

HEFA के डेटा से पता चलता है कि इसने सेंट्रल यूनिवर्सिटी कैटेगरी के तहत 32 इंस्टीट्यूशन को फंड दिया है. मंज़ूर रकम 6,773.58 करोड़ रुपये थी, जबकि बांटी गई रकम 3,353.74 करोड़ रुपये है.

साउथ कैंपस के मोती बाग गांव में एक पतली गली, सत्या निकेतन में बिल्डिंग गिरने की जगह से बस कुछ मीटर दूर | फोटो: हरिनी टीएस/दिप्रिंट
साउथ कैंपस के मोती बाग गांव में एक पतली गली, सत्या निकेतन में बिल्डिंग गिरने की जगह से बस कुछ मीटर दूर | फोटो: हरिनी टीएस/दिप्रिंट

दिल्ली की पूर्व मेयर और डीयू प्रॉक्टर रजनी अब्बी ने दिप्रिंट को बताया कि साउथ कैंपस के कॉलेज बाद में बने और उनमें हॉस्टल के लिए ज़्यादा जगह नहीं थी. “या तो सरकार पैसा देती है, और हम हॉस्टल बनाते हैं. फीस पर पहले से ही सब्सिडी है और अगर 5-10 रुपये की बढ़ोतरी होती है, तो विरोध होता है. अगर हमें फंड मिलते हैं तो ही हम कुछ कर सकते हैं.”

उन्होंने आगे कहा कि पिछले कुछ सालों में पैटर्न बदल गया है. “बहुत सारे स्टूडेंट्स दिल्ली के बाहर से आ रहे हैं. उन्हें रहने के लिए जगह चाहिए. प्राइवेट PGs रहने की जगह देने में अहम रोल निभाते हैं. भले ही वे अच्छे खाने, रहने या सेफ्टी का भरोसा न दें, स्टूडेंट्स को वहीं रहना पड़ता है.”

डीन ऑफ कॉलेजेज़ बलराम पानी ने दिप्रिंट को बताया कि DU में करीब 1 लाख स्टूडेंट्स हैं और करीब 22-23 हॉस्टल हैं. “हॉस्टल की फैसिलिटी सभी को नहीं दी जा सकती. कुछ कॉलेज ऐसे हैं जिनके पास हॉस्टल हैं, लेकिन कई कॉलेजों के पास हॉस्टल के लिए ज़मीन या जगह भी नहीं है. जिन कॉलेजों के पास जगह है, हमने उन्हें बता दिया है कि वे हमें प्रपोज़ल भेजें, ताकि हम हॉस्टल बनाने की कोशिश कर सकें.”

हॉस्टल बंद, प्राइवेट PG माफिया

20 किलोमीटर से भी कम दूरी पर दिल्ली यूनिवर्सिटी का नॉर्थ कैंपस है. इसकी दीवारें हमेशा पोस्टरों से ढकी रहती हैं और इसकी सड़कें स्टूडेंट्स से गुलज़ार रहती हैं. मेन कैंपस एरिया—हिंदू, श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स, रामजस जैसे कॉलेजों के आस-पास में पेड़ों से घिरी चौड़ी सड़कें, मशहूर कॉलोनियल ज़माने की इमारतें और बड़े लॉन हैं.

नॉर्थ कैंपस में भीड़भाड़ वाला विजय नगर इलाका, जहां DU के स्टूडेंट्स रहते हैं | फोटो: समृद्धि तिवारी/दिप्रिंट
नॉर्थ कैंपस में भीड़भाड़ वाला विजय नगर इलाका, जहां DU के स्टूडेंट्स रहते हैं | फोटो: समृद्धि तिवारी/दिप्रिंट

लेकिन इसके आगे DU के सस्ते स्टूडेंट मोहल्ले हैं. कमला नगर, विजय नगर और हडसन लेन घने मोहल्ले हैं जहां बिजली के तार, खुले कूड़े के धब्बे और खराब ड्रेनेज की दिक्कत है. रिहायशी बिल्डिंग्स को PG में बदल दिया गया है, जिससे यह मोहल्ला स्टूडेंट हाउसिंग का हब बन गया है.

विजय नगर की एक गली में कचरा फेंका गया है, जहां कई PG और किराए के कमरे हैं जहां DU नॉर्थ कैंपस के स्टूडेंट रहते हैं | फोटो: हरिनी टीएस/दिप्रिंट
विजय नगर की एक गली में कचरा फेंका गया है, जहां कई PG और किराए के कमरे हैं जहां DU नॉर्थ कैंपस के स्टूडेंट रहते हैं | फोटो: हरिनी टीएस/दिप्रिंट
विजय नगर में एक किराए का घर, जिसके एंट्रेंस पर बिजली के तार लटक रहे हैं. घर में फायर सेफ्टी एंट्री-एग्जिट नहीं है | फोटो: समृद्धि तिवारी/दिप्रिंट
विजय नगर में एक किराए का घर, जिसके एंट्रेंस पर बिजली के तार लटक रहे हैं. घर में फायर सेफ्टी एंट्री-एग्जिट नहीं है | फोटो: समृद्धि तिवारी/दिप्रिंट

ऐसी ही एक बिल्डिंग में, बिहार के औरंगाबाद के हिंदी ऑनर्स के स्टूडेंट सुभाष आर्य ने अपने लिए एक कमरा ढूंढ लिया. छोटे चौकोर कमरे में दो बेड हैं जो एक अलमारी से बंटे हुए हैं, कोई AC नहीं है और एक छोटी बालकनी है. यह PG लगभग छह मंज़िला है, जिसमें हर मंज़िल पर चार कमरे हैं.

जब सुभाष ने कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट (CUET) पास किया, तो उन्होंने सोचा कि उन्हें हिंदू कॉलेज में हॉस्टल का कमरा मिल जाएगा, लेकिन पुरानी बिल्डिंग के गिराए जाने के बाद से हॉस्टल बन रहा है.

सुभाष ने कहा, “जब मैं यहां आया, तो मुझे पता चला कि हॉस्टल बन रहा है. मुझे विजय नगर में एक पीजी लेने के लिए मजबूर होना पड़ा. इसमें मुझे 12,000 रुपये खर्च करने पड़े. मैं बिहार से आता हूं, जहां ज़्यादातर स्टूडेंट्स को पढ़ाई तक पहुंच नहीं है. नॉर्थ कैंपस के आस-पास के PG और फ्लैट्स में रहने की हालत खराब है. कमरों में धूप नहीं आती, टाइलें टूटी हुई हैं और कमरे पान के दाग वाले हैं.”

सुभाष एक ऐसे शहर से आते हैं जहां ज़्यादातर चर्चाएं खराब हैंडपंप, टूटी सड़कें और बिजली की दिक्कत जैसे मुद्दों पर घूमती हैं.

अब, सालों बाद, हिंदू कॉलेज में एक स्टूडेंट के तौर पर, सुभाष एक अलग माहौल में हैं, लेकिन उनके आस-पास की ज़्यादातर चिंताएं वही हैं. स्टूडेंट्स से किए गए वादे के मुताबिक हॉस्टल बंद हैं और मानसून में छतें टपकती हैं. स्टूडेंट्स टूटे हुए टॉयलेट और पानी भरी सड़कों की बात करते हैं.

विजय नगर में DU के पुरुष स्टूडेंट्स के लिए हॉस्टल का ऐड | फोटो: हरिनी टीएस/दिप्रिंट
विजय नगर में DU के पुरुष स्टूडेंट्स के लिए हॉस्टल का ऐड | फोटो: हरिनी टीएस/दिप्रिंट

ABVP के संभावित DUSU कैंडिडेट ईशु मौर्य के मुताबिक, हॉस्टल की सुविधाओं की कमी DUSU चुनावों से कहीं ज़्यादा है. “यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर सिर्फ अभी बात नहीं होनी चाहिए. हमें इस बारे में हर समय बात करनी होगी. स्टूडेंट्स को हॉस्टल की सुविधाएं क्यों नहीं मिलतीं?”

उनका कहना है कि मकान मालिक और PG मालिक बिना बेसिक सुविधाओं या फायर सेफ्टी उपायों वाले कमरों के लिए लगभग 30,000-40,000 रुपये चार्ज करते हैं. “ज़्यादातर बिल्डिंग पुरानी और टूटी-फूटी हैं. कमरे छोटे हैं और उनमें रहना मुश्किल है. हमारा लक्ष्य यह पक्का करना है कि स्टूडेंट्स को हॉस्टल की सुविधाएं मिलें और रेंट कंट्रोल एक्ट लागू हो ताकि किराए पर रोक लगाई जा सके. हम यह भी चाहते हैं कि PG का रेगुलर सेफ्टी ऑडिट हो. इसे लागू किया जाना चाहिए.”

रेंट कंट्रोल एक्ट की मांग

कई स्टूडेंट्स के लिए, प्राइवेट PG छोड़कर फ्लैट किराए पर लेना एक सस्ता ऑप्शन लगता है.

लेकिन रामजस कॉलेज के स्टूडेंट सचिन कांत झा ने कहा कि प्राइवेट रेंटल की अपनी दिक्कतें होती हैं. झारखंड के रामगढ़ के रहने वाले हिस्ट्री ऑनर्स के थर्ड-ईयर स्टूडेंट सचिन तीन साल पहले DU आए थे क्योंकि घर पर ऑप्शन लगभग न के बराबर थे.

रामजस के स्टूडेंट सचिन, जो पहले PG में रहते थे, अब बढ़ते किराए की वजह से प्राइवेट रहने की जगह में चले गए हैं | फोटो: हरिनी टीएस/दिप्रिंट
रामजस के स्टूडेंट सचिन, जो पहले PG में रहते थे, अब बढ़ते किराए की वजह से प्राइवेट रहने की जगह में चले गए हैं | फोटो: हरिनी टीएस/दिप्रिंट

उन्होंने कहा, “दिल्ली लिबरल आर्ट्स के लिए मशहूर है. अगर बिहार या झारखंड में अच्छे कॉलेज होते, तो हमें घर छोड़ने की ज़रूरत नहीं पड़ती.”

हालांकि, दिल्ली में उनका एक्सपीरियंस “खट्टा-मीठा” रहा है.

महंगे PG से बचने के लिए, सचिन और उनके दो दोस्तों ने नॉर्थ कैंपस के विजय नगर में 16,000 रुपये महीने पर एक फ्लैट किराए पर लिया और खर्च आपस में बांट लिया.

नॉर्थ कैंपस के गुड़मंडी इलाके में बिल्डिंग्स पर लटकते तार, जहां DU के स्टूडेंट्स रहते हैं | फोटो: समृद्धि तिवारी/दिप्रिंट
नॉर्थ कैंपस के गुड़मंडी इलाके में बिल्डिंग्स पर लटकते तार, जहां DU के स्टूडेंट्स रहते हैं | फोटो: समृद्धि तिवारी/दिप्रिंट

फ्लैट में न तो एयर कंडीशनिंग थी और न ही बेड, बस एक खाली फर्श था. मेन कॉलेज कैंपस के पास किराया बढ़ जाता है, जिससे स्टूडेंट्स को दूर पुरानी, ​​खराब मेंटेनेंस वाली प्रॉपर्टीज़ में जाना पड़ता है.

सचिन ने कहा, “आपके पास ब्रोकर्स के पास जाने के अलावा कोई ऑप्शन नहीं होता, जो आपको काम करने वाले बाथरूम वाला एक बेसिक कमरा दिखाने के लिए भारी फीस लेते हैं.”

इन किराए के फ्लैट्स में रहने के हालात अक्सर खतरनाक होते हैं. सचिन का कमरा ग्राउंड फ्लोर पर है, जहां उन्हें मानसून के दौरान गंदे नाले के पानी को अंदर आने से रोकने के लिए एंट्रेंस पर एक बड़ा टाइल ब्लॉक लगाना पड़ा.

पिछले तीन हफ़्तों में, उन्होंने चूहों से निपटते हुए सीवेज में मिला हुआ बारिश का पानी बाहर निकालने में घंटों बिताए हैं वह और उनके फ़्लैटमेट्स सीधे फर्श पर बिछे पतले गद्दों पर सोते हैं.

सचिन ने कहा, “कोई साफ-सफाई नहीं है, और गलियां पूरी तरह से जाम हैं. हम इतनी दूर पढ़ने आए हैं; क्या हम बस मलबे में दबकर मर जाएंगे?”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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