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Wednesday, 15 July, 2026
होमदेश‘सरकार के खिलाफ नारे लगाना देशद्रोह नहीं’: हाई कोर्ट ने बताया विरोध और राज्य के खिलाफ अपराध में फर्क

‘सरकार के खिलाफ नारे लगाना देशद्रोह नहीं’: हाई कोर्ट ने बताया विरोध और राज्य के खिलाफ अपराध में फर्क

पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने राम रहीम को दोषी ठहराए जाने के बाद कैथल में आगजनी के मामले में बरी किए गए 4 लोगों के खिलाफ राज्य सरकार की अपील खारिज की. फैसले में सिर्फ इस मामले ही नहीं, बल्कि कानून को लेकर भी अहम बात कही गई.

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गुरुग्राम: एक उग्र भीड़. सरकारी दफ्तर में आग. पेट्रोल बम. गंडासी और लाठियां. जेल में बंद एक धर्मगुरु के समर्थन में और सरकार के खिलाफ नारे. कागज़ों पर यह मामला आगजनी और देशद्रोह का सीधा मामला लग रहा था.

लेकिन कैथल में सरकारी दफ्तर में आग लगाने की घटना के नौ साल बाद पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने अभियोजन पक्ष के पूरे मामले को खारिज कर दिया. साथ ही एक अहम बात भी कही कि सरकार के खिलाफ नारे लगाना विरोध (असहमति) है, देशद्रोह नहीं.

2 जुलाई को जस्टिस विनोद एस. भारद्वाज और जस्टिस सुखविंदर कौर की खंडपीठ ने हरियाणा सरकार की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें 2019 में धर्मपाल, जसबीर और शिव कुमार समेत चार लोगों को बरी किए जाने के फैसले को चुनौती दी गई थी. इन लोगों पर 25 अगस्त 2017 को कैथल के कलायत में उत्तर हरियाणा बिजली वितरण निगम (UHBVN) के दफ्तर में आग लगाने का आरोप था. उसी दिन डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को दुष्कर्म के मामले में दोषी ठहराया गया था.

हाई कोर्ट का आदेश अब पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट की वेबसाइट पर उपलब्ध है.

अदालत में टिक नहीं पाया मामला

एफआईआर के मुताबिक, बिजली निगम के सब-डिविजनल अधिकारी संदीप भारत अपने छह साथियों के साथ दफ्तर में काम कर रहे थे. तभी 14-15 लोग लाठी, डंडे, गंडासी और पेट्रोल की बोतलें लेकर वहां पहुंचे. वे डेरा प्रमुख के समर्थन और सरकार के खिलाफ नारे लगा रहे थे.

भीड़ ने दफ्तर में तोड़फोड़ की और उसमें आग लगा दी. बाद में चार लोगों को गिरफ्तार किया गया. उनके खिलाफ देशद्रोह, आगजनी, आपराधिक साजिश और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने से जुड़े कानून के तहत मामला दर्ज किया गया.

लेकिन जब मामला ट्रायल कोर्ट पहुंचा तो अभियोजन पक्ष की कहानी जल्दी ही कमजोर पड़ गई.

अभियोजन पक्ष के किसी भी गवाह ने अपनी पहली शिकायत में आरोपियों का नाम नहीं लिया था. गवाहों ने अदालत में कहा कि वे आरोपियों को पहले से नहीं जानते थे, फिर भी पुलिस ने कभी पहचान परेड (Test Identification Parade) नहीं कराई.

मधुबन स्थित फॉरेंसिक साइंस लैब को जली हुई चीज़ों पर पेट्रोल, केरोसिन या डीजल का कोई निशान नहीं मिला, जबकि अभियोजन पक्ष का दावा था कि आग पेट्रोल बम से लगाई गई थी.

पुलिस के एक गवाह ने कहा कि उसने भीड़ का एक किलोमीटर तक पीछा किया और पूरे समय अपने वरिष्ठ अधिकारियों से फोन पर बात करता रहा, लेकिन उसके पास मोबाइल होने के बावजूद उसने आरोपियों की न तो कोई फोटो ली और न ही वीडियो बनाई. बाद में उसने यह भी दो अलग-अलग बयान दिए कि किस आरोपी के पास कौन-सा हथियार था.

इन सब वजहों से ट्रायल कोर्ट ने चारों आरोपियों को बरी कर दिया. इसके बाद राज्य सरकार हाई कोर्ट गई, लेकिन हाई कोर्ट ने भी अपील खारिज कर दी.

‘नाराजगी, देशद्रोह नहीं होती’

इस फैसले का सबसे अहम हिस्सा जांच की कमियां नहीं, बल्कि यह है कि अदालत ने साफ किया कि देशद्रोह किसे माना जाएगा और किसे नहीं.

अदालत ने कहा कि कोई हिंसक प्रदर्शन दंगा हो सकता है, लेकिन सिर्फ इसी वजह से उसे सरकार के खिलाफ नफरत फैलाने वाला अपराध नहीं माना जा सकता.

खंडपीठ ने कहा कि लोकतांत्रिक देश में सिर्फ सरकार या सरकारी संस्थाओं के खिलाफ नारे लगाने भर से किसी पर देशद्रोह का मामला नहीं लगाया जा सकता.

अदालत ने कहा कि नाराजगी, असंतोष या गुस्सा, देशद्रोह या सरकार के प्रति नफरत के बराबर नहीं है.

कोर्ट ने यह भी कहा कि देशद्रोह जैसे गंभीर आरोप में सजा बहुत कड़ी होती है. इसलिए इसके लिए जरूरी सभी कानूनी शर्तों को सख्ती से साबित करना होगा. सिर्फ प्रदर्शन में शोर-शराबा होने से देशद्रोह नहीं माना जा सकता.

इसी आधार पर अदालत ने कहा कि इस मामले में जो सबूत सामने आए, वे सिर्फ सरकार के खिलाफ नारे लगाने तक सीमित थे. यह असहमति जताने का तरीका हो सकता है, लेकिन इससे सरकार के प्रति नफरत या देशद्रोह साबित नहीं होता.

सिर्फ शक से मामला साबित नहीं होता

अदालत ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 188 के तहत लगाए गए आरोप को भी सही नहीं माना. अभियोजन पक्ष ने जिस धारा 144 के आदेश का हवाला दिया था, वह घटना के करीब 10 महीने बाद जारी किया गया था. इसलिए अदालत ने उसे कानूनी रूप से इस मामले में लागू नहीं माना.

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष सिर्फ इतना दिखा पाया कि आरोपी “शायद” इस घटना में शामिल थे, जबकि कानून कहता है कि यह “पक्का” साबित होना चाहिए कि वे शामिल थे.

जजों ने कहा कि शक और अनुमान सबूत नहीं होते.

इसी के साथ हाई कोर्ट ने चारों आरोपियों को बरी करने के ट्रायल कोर्ट के फैसले को पूरी तरह सही माना और नौ साल पुराने इस मामले का अंत कर दिया. यह मामला आगजनी से शुरू हुआ था, लेकिन खत्म ऐसे फैसले के साथ हुआ जिसने विरोध प्रदर्शन और राज्य के खिलाफ अपराध के बीच का फर्क साफ कर दिया.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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