(कोमल शर्मा)
रामनगर (उत्तराखंड), 22 अक्टूबर (भाषा) ‘‘गलत जगह पकड़ लिया चाचा’’-28 वर्षीय पीतांबर ने जिम कॉर्बेट वन्यजीव अभयारण्य के भीतर बाघ द्वारा दबोचे जाने के कुछ ही क्षण बाद अपने साथी से यह बात कही। ये शब्द इंसान और वन्यजीव की उस खौफनाक मुठभेड़ की कहानी बयां करते हैं, जिसमें वह बाल-बाल बच गया।
दिहाड़ी मजदूर पीतांबर 20 जुलाई को नियमित गश्त पर निकले चार सदस्यीय दल का हिस्सा था। दल के दो सदस्य कुछ आगे चल रहे थे, जबकि रामनाथ उनके बीच में था, अचानक रामनाथ को एहसास हुआ कि पीतांबर उनके साथ नहीं है। पीछे मुड़कर देखने पर रामनाथ ने बाघ को पीतांबर के ऊपर बैठा पाया।
दोस्त को बचाने के लिए कुछ करने का बहुत कम समय था, ऐसे में रामनाथ ने वह किया जिसकी हिम्मत बहुत कम लोग जुटा पाते हैं। उन्होंने हाथ में पकड़ी लाठी से बाघ पर तीन बार प्रहार किया। बाघ को ऐसे प्रतिरोध की अपेक्षा नहीं थी, लिहाजा उसने पीतांबर को छोड़ दिया और झाड़ियों में चला गया।
इसके बाद रामनाथ ने पीतांबर से कहा, ‘‘मेरा हाथ पकड़ो’’ तथा उन्होंने उसे उठने और अन्यत्र ले जाने में मदद की। उस समय पीतांबर अपने साथी रामनाथ से बस इतना ही कह सका कि बाघ ने उसे गलत जगह, यानी गर्दन पर काट लिया है।
गनीमत यह रही कि बाघ के काटने से पीतांबर को गहरा घाव नहीं हुआ और समय पर मदद मिलने से उसकी जान बच गई। वनकर्मियों ने उसे प्राथमिक उपचार दिया और फिर इलाज के लिए उसे पहले रामनगर और उसके बाद काशीपुर ले जाया गया।
हालांकि, सभी वन रक्षकों की किस्मत पीतांबर जैसी नहीं होती।
पिछले 37 वर्ष से वन विभाग में काम कर रहे फॉरेस्टर धर्मपाल नेगी ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया कि जब वे गश्त पर निकलते हैं, तो हर कोई मन ही मन यही सोचता है कि चार लोग जंगल में जा रहे हैं, लेकिन हो सकता है कि लौटकर केवल तीन ही आएं।
मारे गए कई वनकर्मियों को जल्द ही भुला दिया जाता है और कुछ मामलों में तो उनके शव भी बरामद नहीं हो पाते।
जब देश के सबसे पुराने राष्ट्रीय उद्यान ने वन्यजीवों के हमलों में जान गंवाने वाले वनकर्मियों की याद में स्मारक बनाने का फैसला किया, तो 33 लोगों की सूची तैयार करने में ही 18 महीने लग गए।
अब स्मारक की पट्टिका पर किसी और नाम के लिए जगह नहीं बची है। जंगल के ढांगढ़ी द्वार पर स्थित संग्रहालय के कर्मचारियों की इच्छा है कि भविष्य में दूसरी या इससे बड़ी पट्टिका लगाने की जरूरत कभी न पड़े।
करीब 1,300 वर्ग किलोमीटर में फैले इस उद्यान में लगभग 700 वन रक्षक गश्त करते हैं। इनमें से अधिकतर दिहाड़ी मजदूर हैं। उद्यान के कुल क्षेत्र में 500 वर्ग किलोमीटर से अधिक का मुख्य क्षेत्र भी शामिल है।
वन रक्षक चार-चार लोगों के समूह में और अलग-अलग पालियों में गश्त करते हैं। जंगल में विभिन्न स्थानों पर बनी चौकियों से वे पैदल निकलते हैं। दल में केवल एक व्यक्ति के पास बंदूक होती है, जबकि बाकी के पास सिर्फ लाठियां होती हैं।
शहर के निवासियों का कहना है कि उन्हें और हर दिन सफारी के लिए आने वाले सैकड़ों पर्यटकों को सुरक्षित घूमने का मौका वन रक्षकों की बदौलत मिलता है।
सहायक आयुक्त (जीएसटी) मितेश्वर आनंद ने कहा कि वन रक्षक न केवल शिकारियों और अवैध रूप से पेड़ काटने वालों को रोकने के लिए अपनी जान जोखिम में डालते हैं, बल्कि वन्यजीवों की सुरक्षा भी सुनिश्चित करते हैं।
उन्होंने कहा कि उनके काम में वन्यजीवों की परेशानी के संकेत पहचानना भी शामिल है। यदि कोई हाथी लंगड़ाता दिखाई देता है या बाघ घायल नजर आता है, तो वे पशु चिकित्सकों और बचाव दल को इसकी सूचना देते हैं।
अभयारण्य के बाहरी इलाके में स्थित एक बड़े रिसॉर्ट के महाप्रबंधक ने कहा कि कभी-कभार बाघ इंसानी बस्तियों में आ जाते हैं, लेकिन वन रक्षक लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘सच्चाई यह है कि हम उनके इलाके में आए हैं, वे हमारे इलाके में नहीं आए हैं।’’
नेगी को इस महीने की शुरुआत में यहां राष्ट्रीय उद्यान में आयोजित देश के पहले साहित्य महोत्सव में आमंत्रित किया गया था। उन्होंने कहा कि इस घटना में केवल खतरा ही नहीं, बल्कि उन चंद सेकंड में रामनाथ की सूझबूझ भी उल्लेखनीय थी।
रामनाथ और पीतांबर के बीच रिश्ता जंगल में काम की जरूरतों से कहीं बढ़कर है। पीतांबर रामनाथ को चाचा कहता है और रामनाथ उसके साथ बेटे जैसा व्यवहार करते हैं।
यह घटना जंगल के भीतर करीब 18 किलोमीटर दूर स्थित एक वन चौकी से लगभग 300 से 400 मीटर की दूरी पर हुई।
फॉरेस्टर के पद पर कार्यरत नेगी ने कहा, ‘‘मदद के लिए फोन करने या स्थिति का आकलन करने का समय नहीं था। रामनाथ ने तत्काल उपलब्ध एकमात्र हथियार, यानी अपने हाथ में मौजूद लाठी का इस्तेमाल किया।’’
रामनाथ का बाघ पर प्रहार करने का फैसला पीतांबर को बचाने में अहम साबित हुआ होगा। हालांकि, यदि वह चीखते या चिल्लाते, तो बाघ उनकी ओर भी मुड़ सकता था।
पीतांबर को बचाए जाने के बाद भी बाघ दहाड़ता रहा और उस इलाके में घूमता रहा। वह बेचैन नजर आ रहा था। सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए वनकर्मियों की अतिरिक्त टीम भेजी गई और रास्ते में मौजूद झाड़ियों को साफ किया गया।
बाद में बाघ की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए कैमरे लगाए गए, क्योंकि आशंका थी कि उसने इंसान का खून चख लिया है।
बाघ तीन से चार दिन तक उस इलाके में रहा, लेकिन इसके बाद ऐसी कोई घटना सामने नहीं आई। अंततः अधिकारियों ने निष्कर्ष निकाला कि बाघ अभी आदमखोर नहीं हुआ है।
वनकर्मियों के लिए यह घटना उनके काम से जुड़े खतरों की याद दिलाती है। उन्हें जंगली जानवरों के प्राकृतिक आवास में पैदल गश्त करनी पड़ती है और कई बार वे ऐसी जगहों पर होते हैं, जहां तुरंत चिकित्सा सहायता मिलना मुश्किल होता है।
नेगी ने कहा, ‘‘रामनगर में निकटतम अस्पताल लगभग 18 किलोमीटर दूर है, जबकि जिन मरीजों को बेहतर इलाज की जरूरत होती है, उन्हें अक्सर काशीपुर या हल्द्वानी भेजा जाता है।’’
घायल कर्मचारी को अस्पताल तक पहुंचाने में समय लग सकता है। पीतांबर के मामले में उसे पहले पैदल वन चौकी तक लाना पड़ा, जहां से इलाज के लिए वाहन की व्यवस्था की गई। कर्मचारियों के तत्काल मदद के लिए दौड़ने के बावजूद इस प्रक्रिया में करीब 30 से 40 मिनट लगे।
भाषा शोभना सिम्मी
सिम्मी
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