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Wednesday, 8 July, 2026
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हरियाणा में जन्म लेने के बावजूद बाहरी: मोल की बहुओं के बच्चों की स्वीकार किए जाने की लड़ाई

जींद और महेंद्रगढ़ में किए गए अध्ययन में सामने आया कि हरियाणा के बिगड़े लिंगानुपात की सबसे बड़ी कीमत अब 'मोल की बहुओं' (दूसरे राज्यों से आई दुल्हनों) की अगली पीढ़ी चुका रही है.

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गुरुग्राम: हरियाणा पिछले दो दशकों से बिगड़े हुए लिंगानुपात के असर झेल रहा है. हरियाणा के गांवों में हज़ारों ऐसे पुरुष हैं, जिन्हें स्थानीय लड़कियां नहीं मिलीं. इसलिए उन्होंने असम, बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और झारखंड जैसे दूर-दराज के राज्यों की महिलाओं से शादी की. इन महिलाओं को आज भी स्थानीय भाषा में “मोल की बहु” या “खरीदकर लाई गई दुल्हन” कहा जाता है.

इन महिलाओं के हरियाणा के परिवारों में आने पर कई सालों से चर्चा होती रही है और इस पर कई अध्ययन भी हुए हैं, लेकिन अब तक इस बात पर बहुत कम ध्यान दिया गया कि उनकी पहचान उनके बच्चों तक कैसे पहुंचती है. अब एक नए पीयर-रिव्यू स्टडी में कहा गया है कि इन महिलाओं को जिस तरह का भेदभाव झेलना पड़ता है, वही अब उनके बेटों और बेटियों तक भी पहुंच रहा है. इनमें से कई बच्चे हरियाणा में पैदा हुए और वहीं पले-बढ़े हैं, लेकिन उन्हें आज भी समाज में स्वीकार किए जाने का इंतज़ार है.

पोलैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ व्रोकला के लिए की गई इस स्टडी को स्कोपस-इंडेक्स्ड जर्नल एशियन एथनिसिटी में पब्लिश किया गया है. इसका टाइटल है “लेफ्ट बिहाइंड ऑर लेफ्ट आउट? माइग्रेंट ब्राइड्स वरीज़ फॉर देयर चिल्ड्रन्स फ्यूचर इन क्रॉस-रीजनल मैरिजिस इन रूरल हरियाणा”.

इस स्टडी को मुंबई के इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर पॉपुलेशन साइंसेज (IIPS) से पीएचडी कर चुकीं मनीषा कौशिक और अंकित (जो सिर्फ अपने पहले नाम का इस्तेमाल करते हैं) ने लिखा है. अंकित ने इसी साल मई में पोलैंड के यूनिवर्सिटी ऑफ व्रोकला के डॉक्टोरल कॉलेज ऑफ सोशियोलॉजी से पीएचडी पूरी की है.

इस स्टडी के लिए अगस्त 2024 में फील्डवर्क किया गया था.

दोनों शोधकर्ताओं ने जींद और महेंद्रगढ़ जिलों में दूसरे राज्यों से आई 24 दुल्हनों से सेमी-स्ट्रक्चर्ड इंटरव्यू किए. इन दोनों जिलों को इसलिए चुना गया क्योंकि स्थानीय मीडिया रिपोर्टों में इन्हें दूसरे राज्यों की दुल्हनों की शादी के बढ़ते केंद्र के तौर पर बताया गया था.

जींद जिले में जाट समुदाय की आबादी सबसे ज्यादा है, जबकि महेंद्रगढ़ में अहीर समुदाय की संख्या अधिक है. दोनों जिलों में दलित समुदाय की भी अच्छी-खासी आबादी है.

‘बिहारी’ और ‘चीनी’ कहकर चिढ़ाना

रिसर्च के दौरान हुए इंटरव्यू में दोनों जिलों में एक जैसी बात सामने आई. दूसरे राज्यों से आई दुल्हनों के बच्चों को स्कूल में, अपने ही गांव की गलियों में अपमानजनक नामों से बुलाया जाता है. अक्सर उन्हें वही ताने सुनने पड़ते हैं, जो उनकी मां को सुनाए जाते हैं.

बिहार की रहने वाली बबीता ने शोधकर्ताओं को बताया कि शुरू में उनके बच्चों को “बिहारी की औलाद” कहकर चिढ़ाया जाता था. बाद में उन्होंने ऐसा कहने वालों का विरोध किया.

ओडिशा की रहने वाली मधु ने बताया कि गांव के बच्चे उनके बेटों और बेटियों को “बिहारिन के” कहकर चिढ़ाते थे, यानी बिहारी मां के बच्चे.

इसी तरह असम से हरियाणा आई अंजू ने बताया कि बचपन में उनके बेटे को “चीनी” तक कहा जाता था. इससे पता चलता है कि सिर्फ दूसरे राज्य से होना ही नहीं, बल्कि शक्ल-सूरत भी भेदभाव की वजह बन जाती है.

पश्चिम बंगाल की रहने वाली एक दूसरी महिला सुनीता ने कहा कि उनके गांव में एक कहावत है कि उनके जैसे परिवारों ने अपने बच्चों के लिए यह अपमान “खरीद लिया” है.

उन्होंने शोधकर्ताओं से कहा, “लोग मेरे बारे में क्या कहते हैं, इससे मुझे शायद फर्क न पड़े, लेकिन मुझे यह चिंता इसलिए जतानी पड़ रही है, क्योंकि हमारे बच्चों को भी घर से बाहर लोगों की गालियां और अपमान झेलना पड़ता है.”

मायके से रिश्ता टूटना

स्टडी में पाया गया कि इनमें से कई बच्चों ने कभी अपने ननिहाल वालों से मुलाकात ही नहीं की. कई मामलों में तो उन्हें अपनी मां के गांव का नाम तक नहीं पता.

ओडिशा की रहने वाली मीना ने बताया कि शादी की रस्मों के दौरान उनकी बेटी ने उनसे पूछा था कि ननिहाल की क्या अहमियत होती है, लेकिन मीना इस सवाल का जवाब नहीं दे सकी, क्योंकि उनका खुद अपने मायके वालों से संपर्क टूट चुका था.

उन्होंने कहा, “मेरे भाई की जिम्मेदारियां कौन निभाएगा? यह तो सिर्फ भगवान ही जानते हैं.”

असम की रहने वाली 30 साल की एक विधवा ने शोधकर्ताओं को बताया कि उनके बच्चे हमेशा अपने ननिहाल जाने की ज़िद करते हैं. उन्होंने कहा कि वह उन्हें यही जवाब देती हैं कि अब उन्हें वहां जाने का रास्ता याद नहीं है. वह कहती हैं कि जब बच्चे बड़े हो जाएंगे और पढ़-लिख जाएंगे, तब वे वहां जा सकेंगे.

जायदाद का विवाद और सवाल—‘यह किसका बच्चा है?’

सिर्फ ताने सुनने तक ही बात नहीं रुकती. इस स्टडी में इसके और भी गंभीर असर सामने आए हैं.

झारखंड की रहने वाली मीनू, जो अपने दो बच्चों की अकेले परवरिश कर रही हैं, उन्होंने बताया कि उनकी सास ने उन्हें परिवार की ज़मीन में कोई हिस्सा देने से इनकार कर दिया. जबकि उनके मुताबिक, “मेरे बच्चों को भी स्थानीय बहुओं के बच्चों की तरह ज़मीन में हक मिलना चाहिए.”

स्टडी में कहा गया है कि पिता की मौत के बाद दूसरे राज्यों की महिलाओं से हुई शादी के बच्चों को अक्सर पैतृक संपत्ति में अपना हिस्सा लेने में मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. जबकि हरियाणा के पितृसत्तात्मक समाज में परिवार की जाति और ज़मीन पर हक पिता की पहचान के आधार पर ही तय होता है.

अगली पीढ़ी के लिए शादी करना भी आसान नहीं होता.

शोधकर्ताओं ने पाया कि हरियाणा में लड़कियों की कमी होने की वजह से दूसरे राज्यों से आई दुल्हनों की बेटियों की शादी कभी-कभी स्थानीय परिवारों में हो जाती है, लेकिन बेटों के लिए रिश्ता मिलना काफी मुश्किल होता है, क्योंकि कई परिवार अपनी बेटी की शादी ऐसे घर में नहीं करना चाहते, जहां मां को “बाहरी” माना जाता हो.

कुछ परिवार इस समस्या का हल ‘अट्टा-सट्टा’ शादी से निकालते हैं. इसमें एक परिवार अपनी बेटी की शादी दूसरे परिवार में करता है और बदले में अपने बेटे के लिए उसी परिवार से दुल्हन लाता है. उत्तर प्रदेश की रहने वाली आशा ने बताया कि उन्होंने अपने बेटे के भविष्य के लिए ऐसा ही किया.

पढ़ाई ही निकलने का रास्ता

भेदभाव के बावजूद स्टडी में लगभग हर इंटरव्यू में एक बात समान मिली. ज्यादातर मांएं अपने बच्चों की पढ़ाई पर अपनी पूरी ताकत और पैसा लगा रही हैं. उन्हें उम्मीद है कि अच्छी शिक्षा मिलने के बाद उनके बच्चों को जन्म की वजह से होने वाला भेदभाव नहीं झेलना पड़ेगा.

पश्चिम बंगाल की रहने वाली बबली ने कहा कि वह अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल में पढ़ाती हैं, “क्योंकि सरकारी स्कूलों में पढ़ाई का अच्छा माहौल नहीं है.” उन्होंने कहा, “हमें चाहे कितनी भी मुश्किलें झेलनी पड़ें, लेकिन हमारे बच्चों की ज़िंदगी बेहतर होगी.”

बिहार की रहने वाली नीलम ने कहा कि वह अपने बच्चों से कहती हैं कि बड़े होकर मेहनत करेंगे, तो “बिहारी” कहकर चिढ़ाना मायने नहीं रखेगा.

ओडिशा की रहने वाली मीना ने कहा कि उनकी सबसे बड़ी इच्छा है कि उनके बेटे को एक अच्छी और स्थायी नौकरी मिल जाए.

हरियाणा का संदर्भ: बिगड़ा हुआ लिंगानुपात

स्टडी में इन सभी बातों को हरियाणा के लंबे समय से चले आ रहे बिगड़े हुए लिंगानुपात से जोड़कर देखा गया है. अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने 1992 में ‘मिसिंग वुमेन’ की अवधारणा दी थी. उसके बाद से हरियाणा को भारत में बिगड़े लिंगानुपात का बड़ा उदाहरण माना जाता रहा है. इसकी वजह कन्या भ्रूण हत्या, बच्चियों की हत्या और बेटों को ज्यादा महत्व देने की सोच रही है.

हरियाणा को अक्सर अमर्त्य सेन के इस सिद्धांत के लंबे समय तक रहने वाले असर का सबसे मजबूत वास्तविक उदाहरण माना जाता है.

स्थानीय लड़कियों की कमी होने के कारण, खासकर कम ज़मीन वाले या शादी के लिए कम पसंद किए जाने वाले पुरुषों के लिए, दूसरे राज्यों की महिलाओं से शादी एक व्यावहारिक विकल्प बन गई. हालांकि, समाज में इसे पूरी तरह स्वीकार नहीं किया गया.

स्टडी में पाया गया कि ऐसी शादियां गांवों में जाति की सीमाओं को भी पार करती हैं. ज्यादातर शादियां रिश्तेदारों, दुकानदारों, यहां तक कि ट्रक ड्राइवरों जैसे अनौपचारिक बिचौलियों के जरिए कराई जाती हैं.

समय के साथ यह एक तय पैटर्न बन गया है, जिसे शोधकर्ता “चेन मैरिज माइग्रेशन” कहते हैं. यानी एक महिला की किसी गांव में शादी होने के बाद उसके इलाके की दूसरी महिलाओं के लिए भी उसी गांव में शादी का रास्ता खुल जाता है.

शोधकर्ताओं ने यह भी बताया कि गांव की सामाजिक संस्थाओं का इन शादियों को लेकर रवैया दोहरा है.

खाप पंचायतें, जो स्थानीय अंतरजातीय और एक ही गोत्र में होने वाली शादियों का कड़ा विरोध करती हैं, दूसरे राज्यों की महिलाओं से होने वाली शादियों का उतना खुलकर विरोध नहीं करतीं. इसकी बड़ी वजह यह मानी जाती है कि जब स्थानीय दुल्हन नहीं मिलती, तब ऐसी शादियां परिवार की पुरुष वंश परंपरा को आगे बढ़ाने में मदद करती हैं.

लेकिन स्टडी में कहा गया है कि यह स्वीकार्यता इन शादियों से पैदा हुए बच्चों तक नहीं पहुंचती. समाज के यही ढांचे आज भी इन बच्चों को अलग या कमतर नज़र से देखते हैं.

यह स्टडी क्यों हुई और और अभी क्यों?

दिप्रिंट से बात करते हुए अंकित ने बताया कि इस शोध का विचार 2021 में पीएचडी शुरू करने से भी कई साल पहले आया था. उस समय वह त्रिपुरा में ग्रामीण विकास मंत्रालय के तहत कॉन्ट्रैक्ट पर काम कर रहे थे.

उन्होंने कहा, “जब मैं वहां के लोगों को बताता था कि मैं हरियाणा से हूं, तो वे कहते थे कि त्रिपुरा की कई महिलाओं की शादी हरियाणा में हुई है. मुझे हैरानी हुई, क्योंकि त्रिपुरा हरियाणा से करीब 2,500 किलोमीटर दूर है. बाद में मुझे हरियाणा की ‘मोल की बहुओं’ के बारे में पता चला और तभी इस विषय में मेरी दिलचस्पी बढ़ी.”

इसी जिज्ञासा की वजह से उन्होंने जींद की रहने वाली मनीषा कौशिक से संपर्क किया.

अंकित ने कहा, “मैं मनीषा को पहले से जानता था. वह हरियाणा के जींद की रहने वाली हैं. इसलिए मैंने उनके साथ मिलकर यह शोध किया. उन्होंने जींद में डेटा इकट्ठा किया और मैंने महेंद्रगढ़ में.”

अंकित ने ‘बिट्टू’ नाम की एक डॉक्यूमेंट्री भी बनाई है. यह महेंद्रगढ़ के एक गांव में रहने वाले 18 साल के लड़के की कहानी है, जिसकी मां पूर्वोत्तर भारत से हरियाणा आई थी. यह डॉक्यूमेंट्री ओटीटी ऐप स्टेज पर उपलब्ध है.

इस डॉक्यूमेंट्री में बिट्टू बताता है कि गांव के लोग उसे हमेशा “बंगाली” कहकर बुलाते हैं. वह कहता है कि वह चाहता है कि उसकी पढ़ाई-लिखाई एक दिन लोगों को उसे अलग नज़र से देखने पर मजबूर कर दे. डॉक्यूमेंट्री बनने के समय वह 12वीं क्लास में पढ़ता था और पढ़ाई में अच्छा था.

डॉक्यूमेंट्री में बिट्टू कहता है कि उसने मोहल्ले के लड़कों के तानों की वजह से बाहर जाकर खेलना छोड़ दिया है. वह कहता है, “वे मेरा मज़ाक उड़ाते हैं. कहते हैं कि बंगाली लोग कीड़े-मकोड़े और दूसरे जीव खाते हैं, उनकी औरतें जादू-टोना करती हैं. मैं यह सब नहीं सुन सकता, क्योंकि इससे मुझे बहुत गुस्सा आता है.”

वह यह भी कहता है कि स्कूल ही एक ऐसी जगह है, जहां उसे अच्छा महसूस होता है, क्योंकि वहां उसके शिक्षक उसकी पढ़ाई की वजह से उसके साथ अच्छा व्यवहार करते हैं.

मनीषा कौशिक के लिए यह विषय और भी ज्यादा निजी था. उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “मैं बचपन से अपने गांव कसून (जींद) में मोल की बहुओं को देखती आई हूं और उनकी मुश्किल ज़िंदगी के बारे में जानती थी.” उन्होंने कहा कि जब अंकित ने उन्हें इस स्टडी में साथ काम करने के लिए कहा, तो “मैंने तुरंत हां कर दी.”

आगे का रास्ता

स्टडी में यह भी माना गया है कि इसकी कुछ सीमाएं हैं. इसमें सिर्फ दो जिलों की 24 महिलाओं को शामिल किया गया. साथ ही यह विषय संवेदनशील होने की वजह से कई महिलाओं ने अपनी मूल जाति जैसी जानकारी देने से इनकार कर दिया. उन्हें डर था कि समाज उन्हें गलत नज़र से देखेगा या उनके ससुराल वाले उन पर सिर्फ पति के परिवार की जाति बताने का दबाव डालेंगे.

लेकिन शोधकर्ताओं का कहना है कि इस स्टडी के नतीजे इतने अहम हैं कि इन पर सरकार और नीति बनाने वालों को ध्यान देना चाहिए. खास तौर पर दूसरे राज्यों की शादियों से पैदा हुए बच्चों के संपत्ति के अधिकार, उनकी जाति और पहचान से जुड़े दस्तावेज़ और ऐसे बच्चों के लिए मानसिक स्वास्थ्य व शिक्षा से जुड़ी मदद की व्यवस्था पर.

स्टडी के लेखकों का कहना है कि हरियाणा में प्रवासी दुल्हनों के बच्चों पर दोहरी मार पड़ती है. वे पहले अपनी मां को अपमान और भेदभाव झेलते देखते हैं, फिर खुद भी उसी तरह के भेदभाव का सामना करते हैं. उनकी पहचान हमेशा उनकी मां के राज्य से जोड़ दी जाती है, जबकि उसमें उनका कोई चुनाव नहीं होता.

शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि अगर यह स्थिति नहीं बदली, तो हरियाणा में ऐसी पूरी पीढ़ी तैयार हो सकती है, जिसे यह भी नहीं पता होगा कि आखिर उसकी अपनी जगह कहां है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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